कर्मकाण्ड
कर्मकाण्ड पोंगापंथी नहीं, मानव–जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसे जन–जन के हृदय में पहुँचाना पुरोहितजनों का उद्देश्य है। – स्वामी अड़गड़ानन्द
मनुष्य के जीवन में घटनेवाली हर घटना एक काण्ड है और हर घटना पर कर्त्तव्य का बोध कराना कर्मकाण्ड है। घटना हर परिवार में होती ही है। कहीं जन्म होता है, तो कहीं कोई मरता है। कहीं शादी होती है, तो कहीं किसी का अन्नप्राशन। किसी का गृह-निष्क्रमण है, तो किसी का गृह-प्रवेश। भारतीय मनीषियों ने मानव-जीवन में होनेवाली इन स्वाभाविक घटनाओं में से पन्द्रह-सोलह को चुना और इन अवसरों पर प्रत्येक परिवार में जाकर उस एक परमात्मा के आंशिक आकार का बीजारोपण करने के लिए षोडश संस्कारों का विधान बनाया। बच्चे-बच्चे में गर्भावस्था से ही एक परमात्मा का संस्कार डाल देना तथा उस एक परमात्मा को पाना ही तुम्हारा कर्म है- इस कर्म का बोध करा देना, बस इतना ही शुद्ध कर्मकाण्ड है।
वैदिक युग में घर-घर जाकर शाश्वत एकमात्र परमात्मा का बोध कराना पुरोहित का कर्त्तव्य था। उपर्युक्त अवसरों पर वेद के पुरुष-सूक्त की ऋचाएँ पढ़ी जाती थीं और इसके साथ ही मनुष्य को प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ, प्रिय भोजन, ताम्बूल, नये वस्त्र, सुगन्धि इत्यादि दी जाती थी, जिससे इन वस्तुओं का प्रयोग करते समय उस एक परमात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य सदैव याद रहे। हर वस्तु को धारण करते समय परमात्मा की विभूतियों का स्मरण होता रहे। इन मन्त्रों के अन्त में अर्घ्यं, पाद्यं, नैवेद्यं कहकर पुरोहित भगवान के हाथ-पाँव धुलाने की भावना करते हैं और हर वस्तु उन प्रभु के लिए हुआ करती है और कहीं न तो भगवान के हाथ-पाँव धुलाते हैं और न अपना धोते हैं बल्कि यजमान के उसके अबोध होने पर, जिस परिवार में काण्ड हुआ है, उसके मुखिया के हाथ-पाँव धुलाते हैं, जिसका आशय केवल इतना ही है कि हाथ धोते, पाँव धोते, पानी पीते, भोजन करते, वस्त्र-गन्ध-शय्या किं बहुना मांगलिक हर वस्तु के उपयोग में उस परमप्रभु की विभिन्न अवस्थाओं (विभूतियों) का चिन्तन होता रहे। ये वस्तुएँ हृदय में स्थित परमात्मा को अर्पित की जाती हैं, हाथ-पाँव धुलाये जाते हैं, जिससे बच्चा-बच्चा यह समझ ले कि कोई परमात्मा उनके हृदय के भीतर है जिसे देखना है, जिससे मानव मात्र, बच्चा-बच्चा उस सदा रहनेवाले शाश्वत परमात्मा की जानकारी प्राप्त कर ले; सार्वभौम कल्याण हो सके, इस लक्ष्य से भटक जाने का अवसर न मिल सके।
कालान्तर में ईश्वर को सदैव स्मरण रखनेवाली भावना के नाम पर बुद्धिजीवी वर्ग-विशेष ने अपने जीने-खाने के लिए दैनिक जीवन की प्रत्येक क्रियाओं को काण्ड की संज्ञा देकर बृहत् कर्मकाण्ड की रचना कर डाला, जिसमें शौच जाने का मन्त्र, स्नान करने का मन्त्र, भोजन करने का मन्त्र, विधि-निषेध और इनके पालन में भूल होने पर प्रायश्चित रूप में दान लेने का क्षेत्र विस्तृत बनाया गया। हृदयस्थ एक परमात्मा की खोज के स्थान पर बाहर अनेक देवी-देवताओं की पूजा को कर्म घोषित कर तत्सम्बन्धी पूजनविधियों का कर्मकाण्ड के रूप में प्रचार किया गया। परमात्मा को जानने की क्रिया छूट गई, अनुष्ठान और मन्त्र याद करना रह गया। एक धर्म के स्थान पर संकीर्ण साम्प्रदायिक संगठन बन गये। शाश्वत का पुजारी नश्वर के पीछे भागने लगा।
अण्डे की सुरक्षा के लिए जो खोल आरम्भ में आवश्यक होता है, बच्चे के आविर्भाव के पश्चात् उसे तोड़ देना उससे भी जरूरी हो जाता है अन्यथा बच्चा उसमें घुट-घुटकर मर जायेगा। इसी प्रकार पूर्वजों ने जिन किन्हीं परिस्थितियों में इन कुरीतियों को झेला, अब वे परिस्थितियाँ नहीं रहीं। सामाजिक शिष्टाचार तथा रहन-सहन के प्रत्येक उपयोगी-अनुपयोगी नियमों को ‘धर्म’ कहकर जनता को गुमराह करने का अब कोई औचित्य नहीं रहा। सदियों पहले से सुखी भौतिक जीवन की व्यवस्था जनादेश पर आधारित राज्य के हाथ में चली गयी। इसीलिए यह स्पष्ट करना जरूरी हो गया है कि धर्म के अन्तर्गत केवल एक बात आती है- आवागमन से रहित शाश्वत शान्ति की खोज करना। यह शान्ति सर्वत्र व्याप्त उस एक शाश्वत परमात्मा में ही है, जिसे खोजने के लिए प्रत्येक मनुष्य को अपने हृदय में उतरना है।
इसी एक परमात्मा की विभूतियों का भली प्रकार चित्रण वेद के पुरुष-सूक्त में है। पुरुष-सूक्त नामकरण भी विशेष अर्थ रखता है- ‘पुरः शेते इति पुरुषः’– वह हृदयरूपी पुर में निवास करता है, अतएव उस परम पुरुष को खोजने की स्थली हृदय-देश है, बाहर नहीं। आज भी कर्मकाण्ड के नाम पर पुरुष-सूक्त के वही मन्त्र पढ़े जाते हैं; किन्तु जनसामान्य की भाषा संस्कृत न होने के कारण लोग इसका आशय समझ नहीं पाते।
अतः प्रत्येक पुरोहित को चाहिए कि इन ऋचाओं का आशय क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा में समझाकर बोध करा दें कि परमात्मा एक है, वही शाश्वत है। ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत् नाशवान् है। ब्रह्मा से उत्पन्न देवी-देवता भी ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता, ९/२१)- पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में गिरते हैं, परवश हैं, उनकी पूजा अविधिपूर्वक होती है, अतएव देवी-देवताओं की पूजा बन्द करके एक परमात्मा के प्रति आस्थावान् होओ। वेद के ऋषि कहते हैं-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। (ऋग्वेद, १०/१२१/१)
अर्थात् सोने-जैसा चमकता हुआ परमात्मा सबसे पहले उत्पन्न हुआ। पैदा हुए सभी प्राणियों का वही एकमात्र पति हुआ। उसी ने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। उसके अतिरिक्त किस देवता की हवि द्वारा पूजा करें?
स्पष्ट है कि एकमात्र परमात्मा को पाना हमारा-आपका कर्त्तव्य, कर्म है। इसी नियत कर्म का क्रमबद्ध वर्णन गीता में है, जिसके अन्तर्गत दैवी सम्पद् नामक सद्गुणों का विकास करना, एकान्त-देश का सेवन, श्वास-प्रश्वास द्वारा ॐ या भगवान के दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का जप, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, धारावाही चिन्तन, युक्ताहार-विहार और तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण में जाना होता है। इसी क्रिया द्वारा चलकर हृदयस्थ परमात्मा को जान लेने के अतिरिक्त मृत्यु को जीतने का अन्य कोई भी रास्ता नहीं है।
साधनसम्पन्न पूर्वजों ने जिस शाश्वत सत्य को पाया था, वह परमपुरुष यही हृदयस्थित परमात्मा है। हर परिवार में बार-बार जाकर उन्होंने इसी शाश्वत सत्य को दृढ़ाया था और आज भी जो दृढ़ाते हैं, श्रद्धा के पात्र हैं। दक्षिणा इसका मूल्य नहीं, कृतज्ञताज्ञापन मात्र है। इसके बदले उन्हें दक्षिणा देना शाश्वत सत्य को कायम रखना है, जिससे जन-जन तक इस जानकारी के प्रेषण को प्रोत्साहन मिले।
कतिपय प्रदेशों में माल्य-गन्ध इत्यादि अर्पित करते समय पुरुष-सूक्त से भिन्न वैदिक तथा लौकिक मन्त्र-पाठ की भी परम्परा है। उदाहरणार्थ-
त्वां गन्धर्वोऽत्खनस्त्वांमिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान यक्ष्मादमुच्यतः।।
हे औषधि! तुझे गन्धर्व ने, इन्द्र ने तथा बृहस्पति ने खना। विद्वान् सोम राजा तुम्हारे द्वारा राजयक्ष्मा से मुक्त हुआ।
ओषधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः।
अश्वाऽइव सजित्वरीर्व्वीरुधः पारयिष्णवः।।
हे बढ़नेवाली औषधियो! फूलों व फलोंवाली होकर मुदित रहो। घोड़ों के समान शीघ्रता से हमें दुःखों से पार कर दो।
धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्वतं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः।
देवानामसि वह्नितम ँ्सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्।।
आप सबको कँपानेवाले हो। जो हमको कम्पित करता है, उसे नष्ट करो। हम लोग जिसका विरोध करते हैं उसको भी नष्ट करो। आप देवताओं के वाहन, सामर्थ्यवाले, पूर्ण सेवनीय तथा देवों से आवाहित हैं।
ये तीर्थानि प्रचरन्ति शस्त्रहस्ता निषंगिणः।
तेषां सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि।।
जो शस्त्रधारी, तरकसधारी लोग हमारे तीर्थों को दूषित करते हैं, उन्हें धनुष से छूटे बाण के समान हजारों योजन दूर कर दें।
धनुष-बाण और घोड़े का उस काल में भले ही कोई उपयोग रहा हो, आज के युग में इनसे भी श्रेष्ठ आविष्कार हो चुके हैं। इन मन्त्रों से न तो परमपुरुष की महिमा व्यक्त होती है और न ये आज के वैज्ञानिक युग के अस्त्र-शस्त्र के सामने समाज के ही काम आते हैं। किसी ने औषधि सोधा, परीक्षण किया और रोगी को नीरोग कर दिया; किन्तु औषधि हाथ जोड़ने से क्या देगी? वह घोड़े की तरह दौड़कर नहीं आयेगी; वह फायदा तब करेगी, जब प्रयोगशाला में उस पर परीक्षण किया जाय। जिस चिकित्सा-प्रणाली ने शोध जारी रखा, आज वह आगे हो गई। किसी जड़ी-बूटी ने फायदा किया तो उसे देवता मान लेना, हाथ जोड़कर बैठ जाना मन्दबुद्धि की देन है। ‘‘जो हमें कँपाते हैं, उन्हें नष्ट करें।’’- यह कोई धार्मिक मन्त्र नहीं, व्यक्तिगत सुरक्षा मात्र है। धनुष-बाण से आज रक्षा नहीं होगी। आज वे तरीके समाप्त हो गए। लकीर पीटने से क्या होगा? यदि पढ़ना है तो शिक्षाप्रद सदा रहनेवाली शाश्वत ऋचाएँ पढे़ं, जो मुक्ति की संदेशवाहक हैं।
अब उन प्रभु के महिमा-सूत्रों का अवलोकन करें, जिनका स्मरण करना चाहिये-
अथ पुरुष–सूक्तम्
ओम् सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्।।१।।
वह परम पुरुष सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणवाला है। वह विश्व की समस्त भूमि को सब ओर से व्याप्त करके पंच स्थूलभूत और पंच सूक्ष्मभूत (रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श) इन्हीं दस के पैमाने में निवास करता है अर्थात् हृदय-देश में स्थित है। ऐसे प्रभु की मैं कामना करता हूँ। उनका आवाहन करें-
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।।२।।
भूत, भविष्य और वर्तमान- यह सब वे परम पुरुष ही हैं। वे ही अमरत्व के स्वामी हैं। ईश्वरीय चिन्तनरूपी अन्न से वह बढ़ते हैं। सामान्य अन्न शरीर का पोषण करता है; किन्तु आत्मा का पोषक अन्न चिन्तन है, जिससे हृदयस्थ ईश्वर बढ़ता है। वस्तुतः परमात्मा घटता-बढ़ता नहीं, किन्तु साधक के लिए ऐसा ही है। आसन लगावें।
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।३।।
भूत, भविष्य और वर्तमान से सम्बद्ध यह समस्त ब्रह्माण्ड उस परम पुरुष का वैभव है और वह इन सबसे भी श्रेष्ठ है। यह सब आकाश, पृथ्वी आदि चराचर जगत् इस परमात्मा का एक अंश है तथा तीन अंश अमृत और ज्योतिस्वरूप है। अतः वही एक धारण करने योग्य है, अन्य नहीं। पैर धुलावें।
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि।।४।।
उपर्युक्त तीन अंशोंवाला परमपुरुष उत्तम, मुक्तिस्वरूप है, जो संसार से पृथक् प्रकट होता है। उसके एक चरण से ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है और वही सम्पूर्ण जड़-चेतन में व्याप्त है। मुक्ति उन्हीं के पास है। अर्घ दें, मुँह धुलावें।
ॐ तस्माद् विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः।।५।।
उन्हीं परम पुरुष से विराट् ब्रह्माण्ड पैदा हुआ और वही इस विराट् के अधिपुरुष हुए। वे उत्पन्न होकर अत्यधिक प्रकाशित हुए। पीछे उन्हीं ने भूमि तथा शरीर उत्पन्न किया। अतः उन्हें जानना चाहिए। स्नान करायें।
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्मः इध्म शरद्धविः।।६।।
देवताओं ने उस पुरुष में ही हवि की भावना द्वारा यज्ञ सम्पन्न किया। उस यज्ञ में वसंत घृत, ग्रीष्म ईंधन और शरद् हवि था। इस प्रकार दिव्य वृत्तियों ने प्रत्येक वस्तु में उसका चिन्तन कर उसे जाना। अतः सदैव उसी एक का चिन्तन करना चाहिए। वस्त्र पहनाएँ।
ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये।।७।।
देवाः अर्थात् दैवी सम्पद् को हृदय में उतारनेवाले साध्य, साध्याः अर्थात् परमात्मा के लिए साधन करनेवाले योगाभ्यासी तथा ऋषयः अर्थात् मन का निरोध करनेवाले ज्ञानी इन लोगों ने शरीरस्थ पुरुष को साधनों के द्वारा विशुद्ध किया, उसे अग्रजन्मा अर्थात् अग्रगण्य बनाया, पुरुषोत्तम बनाया। इसी रीति से यजन करके, आत्मशोधन करके सभी ने मोक्ष प्राप्त किया। तुम्हें भी यही करना चाहिये। गन्ध दें।
ॐ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँन्ताँश्चक्रे वायव्यानरण्यान् ग्राम्याश्च ये।।८।।
जिसमें सब कुछ हवन कर दिया गया था, ऐसे उस यज्ञ से प्रशस्त घृत उत्पन्न हुआ- आविष्कार हुआ। उस परमपुरुष ने यज्ञ से ही वायु में रहनेवाले, ग्राम में रहनेवाले, वन में रहनेवाले तथा दूसरे पशुओं को उत्पन्न किया। सबमें उसी परमपुरुष का प्रकाश है। उसे जानो। माल्यार्पण करें।
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत।।९।।
जिसमें सब कुछ हवन कर दिया जाता है, उसी यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए, उसी से अथर्ववेद प्रकट हुआ, उसी से यजुर्वेद अर्थात् यजन करनेवाले मन्त्रों की भी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार वेदों का भी मूल यज्ञ है। यज्ञ द्वारा उस परमपुरुष को जानना चाहिए। धूप दें।
ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः।।१०।।
उसी परमपुरुष से घोड़े उत्पन्न हुए। इसके अतिरिक्त दोनों ओर दाँतोंवाले, गाय, बकरी इत्यादि अन्यान्य पशु-पक्षी उत्पन्न हुए। सबकी उत्पत्ति उसी परमात्मा से है। उस एकमात्र परमेश्वर पर विश्वास लाना चाहिए। अन्य कोई पूजनीय नहीं है। इत्र लगाएँ।
ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य किं बाहू का उरू पादा उच्येते।।११।।
जिस पुरुष का विधान किया गया, विचारकुशल पुरुषों ने उस परमपुरुष की कल्पना कितने प्रकार से की, उसका मुख क्या था, बाहुएँ क्या थीं और पैर क्या था? अब यह बताया जाता है। सामयिक फल दें।
ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पदभ्यां शूद्रो अजायत।।१२।।
ब्राह्मण इसका मुख था। क्षत्रिय दोनों भुजाएँ बना। इसकी जो दोनों जंघाएँ थीं वही वैश्य हुईं और पैरों से शूद्र जन्मा। द्रव्य चढ़ाएँ।
( विशेष– ध्यान देने की बात है कि केवल शूद्र ही जन्मता है; क्योंकि उत्पत्तिकाल में भजन ही शूद्र स्तर का होता है। वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण स्तर विकास से हो जाते हैं। जो भजन नहीं करता, वह तो शूद्र भी नहीं है, वह जड़–जीव मात्र है। साधन की इन चार श्रेणियों को पार कर लेने पर साधक ब्राह्मण भी नहीं रह जाता। ‘न ब्राह्मणो न क्षत्रियः न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपो शिवो केवलोऽहम्।’ की स्थिति आ जाती है। )
यह गलत बात है कि इन सोपानों की नकल करके समाज में चार जातियाँ भी इन नामों से बन गयी हैं और इसी प्रथा की दुहाई देकर शूद्र को सबसे निकृष्ट माना जाता है; क्योंकि वह चरण से पैदा हुआ। विचारणीय है कि वह परमपुरुष तो सर्वत्र हाथ, पैर और मुँहवाला था। जहाँ पैर था क्या वहाँ सिर नहीं था? एक ही पाद में तो सम्पूर्ण सृष्टि है। तब तो सभी शूद्र हो गए। जिन चरणों से पतितपावनी गंगा निकली, उसी चरण से निकला शूद्र इतना अपवित्र कि छू दे तो धर्म नष्ट हो जाय, परम पुरुष ही मर जाय! कितनी भ्रान्ति है।
वास्तविकता को छिपाकर मनुस्मृतिकार कहते हैं कि जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं। हाँ, संस्कार करने से ब्राह्मण बन जाते हैं। और संस्कार के नाम पर यज्ञोपवीत पहनाकर दो-चार मन्त्र पढ़ा देते हैं। यदि इसी प्रकार ब्राह्मण बनते हैं तो सबको ब्राह्मण बनाकर अपनी संख्या क्यों नहीं बढ़ा लेते। वस्तुतः वे संस्कार भी नहीं हैं। संस्कार का आशय है ‘स अंश आकारः’- उस परमात्मा का आंशिक आकार डाल देना, उसकी चाह पैदा कर देना। इतने के लिए ही कर्मकाण्ड की सार्थकता है। अस्तु, वेद के नाम पर मानव-मानव में दरार न डालें। परमात्मा सबमें है और सभी इस दृष्टि से समान हैं, सभी उसे पाने के हकदार हैं।
ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निष्च प्राणाद्वायुरजायत।।१३।।
उसी परमपुरुष के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, नेत्रों से सूर्य प्रकट हुआ, कानों से वायु और प्राण तथा मुख से अग्नि उत्पन्न हुई। दीप जलाएँ।
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्ष शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्।।१४।।
उस परमपुरुष की नाभि अन्तरिक्ष थी। मस्तक से स्वर्गलोक प्रकट हुआ, पैरों से पृथ्वी और कानों से दिशाएँ हुईं। इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुष में ही विद्यमान हैं। कल्पित हुए यह सब एक ही पुरुष की विभूतियाँ हैं, उन्हें जानो। नैवेद्य दें।
ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्रि: सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरुषं पशुम्।।१५।।
दैवी सम्पद् युक्त लोगों ने यज्ञ करते समय योग की सात भूमिकाओं में प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंच स्थूलभूत, पंच सूक्ष्मभूत, पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा तीन गुण इन इक्कीस समिधाओं का हवन करके उस पुरुषरूपी पशु को बाँध लिया। इन सबके हवन हो जाने पर जो शेष बचा रहता है, उसे जानो। साधन द्वारा वह अवश्य प्राप्त होता है। ताम्बूल-इलायची दें।
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।१६।।
दैवी सम्पद् को हृदय में ढालनेवालों ने परमपुरुष की प्राप्तिरूप उपरोक्त यज्ञ द्वारा यज्ञरूपी परमपुरुष का यजन किया। इस प्रकार के यज्ञ द्वारा सर्वप्रथम धर्म की उत्पत्ति हुई। इसके आचरण से दैवी सम्पद् सम्पन्न लोग महान् महिमावाले होकर उस स्वर्गलोक का सेवन करते हैं। प्रदक्षिणा करें। (ऋग्वेद, १०/९०/१–१६)
( नोट– निम्नलिखित दो मन्त्र ऋग्वेद में नहीं मिलते, किन्तु ‘मूल उपनिषद्’, ‘परमात्मिकोपनिषद्’, ‘महावाक्योपनिषद्’, ‘चित्युपनिषद्’ में पुरुष–सूक्त नाम से हैं। )
ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसस्तु पारे।
सर्वाणि भूतानि विचिन्त्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते।।१७।।
मैंने उस महान् पुरुष को जान लिया है, जो आदित्य के समान प्रकाशस्वरूप और तामस से परे है। वह सभी रूपों की रचना कर उनका नामकरण करता है और वैसा ही व्यवहार करते हुए सबकी बुद्धि में रमण करता हैं। वही इष्ट है।
ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्ररिशश्चतस्रः।
तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते।।१८।।
पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने जिसकी स्तुति की थी, इन्द्र ने चारो दिशाओं में जिसे व्याप्त जाना था, उस परम पुरुष को जो जानता है वह यहीं, इसी जन्म में अमृतपद प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त अमर होने का अन्य कोई भी मार्ग नहीं है। उस एकमात्र परमेश्वर पर विश्वास लाना चाहिए और इसी जीवन में उसे प्राप्त कर लेना चाहिए।
पुरुष-सूक्त के इन मन्त्रों के अनुशीलन से स्पष्ट है कि एक परमात्मा में अपनी श्रद्धा को स्थिर करना ही कर्मकाण्ड का लक्ष्य है। इस परमात्मा को कहीं बाहर नहीं ढूँढ़ना है। पुरुष-सूक्त की मान्यता है कि इस परमात्मा को केवल मानसिक यज्ञ द्वारा ही पाया जाता है, अन्य कोई रास्ता नहीं है; किन्तु आज कर्मकाण्डों में वेदी बनायी जाती है, चौक पूरा जाता है, नैवेद्य चढ़ाया जाने लगा है। जिसका आशय केवल इतना ही है कि भगवान के लिए हृदय पवित्र कैसे बनाया जाय। ऐसी ही स्वच्छता, समर्पण की भावना अपने हृदय में करें। बाहर तो मात्र नमूना (दृष्टान्त) है। अन्त में परमात्मा के निमित्त अर्पित सात्विक वस्तुओं को आपस में बाँटकर खाने की प्रथा है जिससे आत्मीयता, संगठन और एकता का सम्बन्ध हो।
आज संसार का प्रबुद्ध समाज प्रचलित कर्मकाण्ड को पोंगापंथी की संज्ञा देता है। आरोप लगाता है कि शिक्षा को एकांगी रखकर वर्ग-विशेष इसके माध्यम से अपनी जीविका चलाता आ रहा है। कभी पुरोहित समाज में गौरव के साथ प्रवेश करता था, आज पत्रा लिए पुरोहित दीनों-जैसा हो गया है, जिसका कारण यह भ्रान्ति ही है। ऐसी परिस्थिति में अपने गौरव की उज्ज्वलता पुनः प्राप्त करना कौन नहीं चाहेगा? इसके लिए कर्मकाण्ड की इस वास्तविक विधि का प्रचार सबकी समझ में आनेवाली प्रचलित, सरल भाषा में करना होगा, इसे जन-जन के हृदय में पहुँचाना होगा।
सभी पुरोहितजन सदैव ध्यान में रखें कि एक परमपुरुष के अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं की ओर श्रद्धा को न ले जायँ, क्योंकि ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत् आवागमन के चक्कर में है, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है, इन्हें बढ़ावा देना अज्ञानियों का काम है। अस्तित्वविहीन को बढ़ावा देना नास्तिकता को बढ़ावा देना है।
।। ॐ।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)