अगर है शौक मिलने का
अगर है शौक मिलने का तो हरदम लौ लगाता जा।
जलाकर खुदनुमाई को भसम तन पर लगाता जा।।
पकड़ कर इश्क का झाड़ू सफा कर हुजरा–ए–दिल को।
दुई की धूल को लेकर मुसल्लह पर उड़ाता जा।।
मुसल्ला छोड़ तसबी तोड़ किताबें डाल पानी में।
पकड़ तू दस्त फरिश्तों का गुलाम उनका कहाता जा।।
अगर है……।।
न मर भूखा न रख रोजा न जा मसजिद न कर सिजदा।
वजू का तोड़ दे कूजा शराबे शौक पीता जा।।
हमेशा खा हमेशा पी न गफलत में रहो एकदम।
नशे में सैर कर अपनी खुदी को तू जलाता जा।।
अगर है……।।
न बन बभ्भन न हो मुल्ला दुइन का छोड़ घर झगड़ा।
हुकुम है शाह कलन्दर का अनलहक तू कहाता जा।।
कहे मंसूर मस्ताना ये हक मैंने दिल में पहचाना।
यही मस्तों का मयखाना इसी के बीच आता जा।।
अगर है……।।
विश्व में महात्मा कहीं भी हुए हों, यदि प्राप्तिवाले हैं तो उनकी उपलब्धि, रहनी-गहनी एक-जैसी रही है। ईसा मसीह ने अपने साधनकाल में चालीस उपवास किये, भगवान के लिये रोते रहे। अपनी आयु के चौदह से उन्तीस वर्ष तक उन्होंने यहीं भजन किया था। अंग्रेज जबसे भारत आये, पता नहीं क्यों ईसा का यह इतिहास उन्होंने लुप्त कर दिया? उनके आरंभिक तेरह वर्षों का इतिहास बताया; तीसवें, इकतीसवें और बत्तीसवें– अंतिम तीन वर्षों का विवरण दिया कि वह यरूशलम में किस प्रकार थे? बीच के साधन-काल के विषय में वे मौन हैं, जबकि यहाँ के लोग जानते हैं कि वह कहाँ रहे! वह जगन्नाथपुरी में रहे, लद्दाख में रहे, कश्मीर में रहे, अयोध्या भी आये। वह भारतीय मूल के महात्मा थे। उनकी नानी मालावार पर्वत क्षेत्र की थी जो तमिलनाडू में है। ईसा प्राप्ति के समीप पहुँच गये थे किन्तु दीन-दुखियों के प्रति दया-भावना में उलझ गये। ‘दया बिनु सन्त कसाई। दया करी तो आफत आयी।’– प्राप्ति से पूर्व साधक लोकोपकार में उलझता है तो वह लक्ष्य से च्युत हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के पीछे रात-दिन षड्यन्त्र चलते रहे, मृत्युदण्ड घूमता रहा; किन्तु प्राप्ति हो चुकी थी इसीलिये सब जगह साफ निकल गये। ईसा का अभी कुछ शेष था, उन्हें समाज-सुधार में नहीं कूदना चाहिए था। गुरु महाराज ने हमसे कहा था– जब तक भगवान आदेश न दें, समाज-सुधार में नहीं कूदना चाहिए। भगवान आदेश दें तो लोकोपकार में अवश्य लगना चाहिए; क्योंकि यदि वह आदेश देते हैं तो उसकी व्यवस्था भी देते हैं, पूर्ति भी करते हैं। इसीलिये सामाजिक दुर्व्यवस्था को संज्ञान में लेते हुए भी सन्त अनजान बने रहते हैं।
इसी तरह के एक महात्मा ह़जरत हुसैन मंसूर हल्लाज अरब में हुए। मुहम्मद साहब के समय में अरब भी भारत ही था। यह लुद्रावा गजनी और समरकंद के किले महाराजा गज और उनके वंश-परम्परावालों ने बनवाये थे। ये सब चन्द्रवंशीय, कृष्णवंशीय क्षत्रिय थे। मुहम्मद भी कुरुवंशीय थे इसीलिये कुरेश कहलाये। उन्होंने जो कुछ सत्य कहा है, गीता में है; उतना ही वह कह पाये। जब वह कहते हैं कि एक ईश्वर ही सत्य है अन्य कोई पूजनीय नहीं है, तो वह गीता ही पढ़ रहे होते हैं। गीता में भगवान कहते हैं कि सिवाय आत्मा के अन्य किसी का अस्तित्व नहीं है। वही एक सत्य है, परमतत्त्व है। गीता कहती है कि ‘हृदय में दैवी सम्पद् का उत्कर्ष ही देवपूजा है। वाह्य देवताओं की पूजा आसुरी वृत्ति की देन है।’ मुहम्मद कहते हैं– ‘ऐसा करनेवाले काफिर हैं।’ गीता कहती है– ‘असुर हैं’; यह कहते हैं– ‘काफिर हैं, नास्तिक हैं।’ एक ही बात कहते हैं। यही कारण है भारत विश्वगुरु था, गीता धर्मशास्त्र जिसका प्रमाण है।
यहीं से प्रेरणाप्राप्त महात्मा मंसूर भी थे, भारत के गीतोक्त धर्म से जुड़े थे। साधना की अधूरी अवस्था में ही वह भी सामाजिक कार्यों में रुचि लेने लगे, अपनी आन्तरिक उपलब्धियों को समाज में व्यक्त करने लगे। उन पर कोड़े बरसाये गये। बगदाद के खलीफा ने उन्हें शूली पर चढ़वा दिया। कहते हैं, उनके लहू के हर बूँद से ‘अनलहक’ अर्थात् ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की ध्वनि सुनायी दे रही थी। उनकी मृत्यु के पश्चात् वहाँ का समाज मंसूर के पक्ष में हो गया है और आज भी सन्तों की परम्परा में मंसूर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है।
महात्मा मंसूर के विचारों को इस पद में व्यक्त किया गया है कि यदि आपमें भगवान से मिलने की प्रबल उत्कण्ठा है तो केवल लौ लगायें। हर समय लौ लगायें। हर समय कैसे?–
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
लौ लगाने के रास्ते में एक बाधा आती है कि मैं ज्ञानी हूँ, ध्यानी हूँ, अच्छे कुल का हूँ। यही खुदनुमाई है, अहं है। मंसूर की सलाह है कि ‘जलाकर खुदनुमाई को भसम तन पर लगाता जा।’– भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा– अर्जुन! देहाभिमानियों की गति नहीं होती कि मैं पहलवान हूँ, विद्वान् हूँ, इतना गुणी हूँ। इसको जला डालो। वह अहंकार खाक हो जाय और शरीर पर उसकी राख दृष्टिगोचर हो; क्योंकि यह भौतिक उपाधियाँ, उपलब्धियाँ जन्म और मृत्यु के बीच का एक पड़ाव मात्र हैं। न पहले हमारी यह जाति थी न भविष्य में रहेगी। कागभुशुण्डि जी ने हजारों शरीर धारण किया, किस-किस पर अभिमान करते? गौतम बुद्ध भी पूर्व के कई जन्मों में पशु-पक्षियों की योनि में गये, समृद्धि के बीच रहे; किन्तु इन नश्वर उपाधियों में उन्हें कोई रुचि नहीं थी। यही मंसूर का भी आशय है कि अहं को जलाकर उसकी राख शरीर पर लगा लो। वैसा ही आपके आचरण में परिलक्षित होना चाहिए। अब हरदम लौ लगाने के लिये मन लगता नहीं इसलिये जरूरत है प्रेम की, श्रद्धा की। जिस साधक में विरह-वैराग्य और भगवान के लिये तड़पन नहीं है उसके लिये भगवान भी नहीं हैं। इसलिये अगली पंक्ति में है–
पकड़कर इश्क का झाड़ू सफा कर हुजरा–ए–दिल को।
इश्क अर्थात् श्रद्धा, समर्पण, प्रेम; इस प्रेम के झाड़ू से हृदय का अंत:पुर स्वच्छ करो। किसी अन्य पंक्तियों में है कि–
दिल का हुजरा साफ कर उसको बिठाने के लिये।
ध्यान गैरों से हटा सद्गुरु के आने के लिये।।
दुई अर्थात द्वैत का भाव साधना में बाधक है कि भगवान कहीं और रहते हैं और हम कहीं और हैं। वे समरकन्द या मक्का में हैं या बद्रीनाथ में रहते हैं। इस द्वैत को मुसल्ले पर बैठकर अर्थात् इबादत द्वारा नष्ट कर दें, हृदय में ही इष्ट को देखने का अभ्यास करें।
दिल के आईने में है तस्वीरे यार।
जब जरा गर्दन झुकाई देख ली।।
आपका काम इतना ही है कि हर समय लौ लगाते जायँ। क्रमश: साधना की उन्नत अवस्थाओं में प्रवेश मिलता जायेगा। उस समय आसन, माला, शास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस पर कहते हैं–
मुसल्ला छोड़ तसबी तोड़, किताबें डाल पानी में।
साधना के आरम्भ के लिये यह आसन, माला, सन्तों के चरित्र का अध्ययन, विरह के पद गुनगुनाना, भजन में मन लगाने के वाह्य उपकरण आवश्यक होते हैं किन्तु स्तर उठ जाने पर यह माला छूट जाती है।
माला तो मन की भली, और काठ की भार।
माला में गुन होत तो, क्यों बेचे मनिहार।।
यदि माला में ही गुण होता तो मनिहार उसे क्यों बेचता? इसलिए जब स्वाँस की माला पकड़ में आ गई तो मुसल्ला (आसन) उपयोगी नहीं रहा, माला भी अब तोड़ दे; ‘इस किताब में यह लिखा है, उस किताब में वह लिखा है!’– इनके पचड़े में न पड़। जनश्रुतियों में है कि मौलाना रूम बहुत पढ़े-लिखे विद्वान् थे। उन्होंने विश्व-ज्ञानकोष (मसनवी) लिख डाला था। उनकी असाधारण प्रतिभा और श्रम की शोहरत सुन सन्त तवरेज उनसे मिलने गये। मौलाना रूम किताबों के बीच बैठकर कुछ लिख रहे थे। उन्होंने सन्त का अभिवादन किया और उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने की सामग्री लेने घर के भीतर गये। इसी बीच सन्त तवरेज ने उनकी मूल्यवान् पुस्तकों को दरवाजे पर बने जल के हौज में फेंकना शुरू किया। मौलाना रूम ने यह देखा तो शिर पकड़कर बैठ गये। उन्होंने मर्माहत हो कहा कि हमने विश्वज्ञान का सारांश जीवनभर परिश्रम कर लिखा था, आपने वह सब एक क्षण में नष्ट कर दिया। आप फकीर हैं, इसका मूल्य क्या जानें? क्या कहूँ आपसे? उन्हें दु:खी देख सन्त तवरेज हौज में उतर गये और किताबें निकाल-निकालकर मौलाना रूम की ओर फेंकने लगे। रूम साहब के आश्चर्य का ठिकाना न रहा क्योंकि पुस्तकों में जल का स्पर्श तक नहीं हुआ था। लिखे हुए अक्षरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। मौलाना उन सन्त के चरणों में गिर पड़े और कहा– ‘‘हमने विश्व का ज्ञान लिखा किन्तु इस विद्या से मैं अनजान था। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।’’ तभी से यह कहावत प्रचलित हो गयी– ‘किताबें डाल पानी में’। भजन हृदय से जागृत हो जाने पर ये किताबें कारगर नहीं होतीं, फिर तो भगवान की तरफ से रोज लिखा-लिखाया उतरा करता है। साधक देखता रहता है कि भगवान कहते क्या हैं, चाहते क्या हैं? वे कहते जायँ, आप समझते जायँ, करते जायँ। इसके लिये करें क्या?–
पकड़कर दस्त फरिश्तों का गुलाम उनका कहाता जा।
महापुरुष– जो भगवान के अन्तरंग फरिश्ते हैं उनका हाथ पकड़ लो; छोड़ना नहीं और उन्हीं का गुलाम, सद्गुरु का दास कहलाते जाओ।
इस भगवत्पथ में बहुत भूखा-प्यासा रहने की जरूरत नहीं है। गीता में भगवान कहते हैं– यह योग न बहुत खानेवाले का या बिल्कुल न खानेवाले का ही सिद्ध होता है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।। (गीता, ६/१७)
न कम खायँ न अधिक खायँ, सन्तुलित आहार लें। विहार अर्थात् विचरण, थोड़ा परिश्रम का नियम बना लें अन्यथा रक्तसंचार शिथिल पड़ जायेगा, रोग घेर लेंगे, भजन नहीं होगा। ‘युक्तचेष्टस्य कर्मसु’– कर्म अर्थात् आराधना में जितनी चाहिए उतनी भरपूर चेष्टा रखें। ‘युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।’– उपयुक्त शयन-जागरण करनेवाले का ही योग सिद्ध होता है। अधिक मत सोओ। बिल्कुल नहीं सोते हो तब भी पागल हो जाओगे। स्वस्थ व्यक्ति को यदि पन्द्रह दिन निद्रा न आये तो सोलहवें दिन वह पागल अवश्य हो जायेगा। जागना परिश्रम है तो सोना श्रम का निवारण है। इसी आशय को मंसूर व्यक्त करते हैं–
न मर भूखा न रख रोजा न जा मसजिद न कर सिजदा।
अब मस्जिद में जाने या सिजदा करने की भी बहुत जरूरत नहीं है। फिर करें क्या?–
वजू का तोड़ दे कूजा शराबे शौक पीता जा।
कूजा कुल्हड़ को कहते हैं। नमाज या इबादत से पहले उस कुल्हड़ के जल से हाथ-मुँह धोते हैं। अरब में उन दिनों पानी की कमी थी। थोड़े से जल से हाथ, उँगली से बाहों की ओर और इसी प्रकार पंजों से घुटने की ओर धोते हैं जिससे अनावश्यक जल बरबाद न हो। यह कोई धर्म नहीं है, न भजन है। यह उस समय की परिस्थिति थी। आज जल बहुतायत में है फिर भी हाथ-पैर धोने का वही तरीका चला आ रहा है। हृदय से भजन जागृत हो जाने पर इस तरह वजू करने या गुसल करने की आवश्यकता नहीं रहती इसलिये कूजा तोड़ दे। और करें क्या?–
‘शराबे शौक पीता जा।’– इस्लाम में शराब पीना हराम है; किन्तु सन्त कहते हैं कि परमात्मा से मिलने का शौक भी एक नशा है, भजन एक खुमारी है। सब नशे आज चढ़ते हैं तो कल उतर भी जाते हैं किन्तु भजन एक ऐसा नशा है जो उत्तरोत्तर चढ़ता ही जाता है–
सभी नशे संसार के उतर जात परभात।
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।।
भजन एक नशा है। तुम उसी नशे में चूर रहो। यह भगत कहता है कि भजन का शौक हो जाने पर किसी स्थान या कर्मकाण्ड की अपेक्षा नहीं रह जाती इसलिये कूजा तोड़ दे, मस्जिद में आना-जाना छोड़ केवल भजन की शराब पी। यह तुम्हारे जीवन का शौक बन जाय। फिर मंसूर-जैसे दीवानों के लिये तो–
हमेशा खा हमेशा पी न गफलत में रहो एकदम।
भजन ही भोजन है, इसे हमेशा खाते रहो। भजन एक नशा है, इसे हमेशा पीते रहो। लापरवाही से एक श्वास भी नाम से खाली न जाय। जो समय चला गया वह पुन: लौटकर नहीं आयेगा। गुरु महाराज कहा करते थे– ‘‘भजन कदाचित् किसी दिन कम हुआ हो तो रात-बिरात लगकर उसे पूरा कर लो। भजन में कमी कभी सहन न करो। आज थोड़ा भजन छूटा, किसी दिन फिर थोड़ा छूटा तो कुछ दिनों में भजन सदा के लिये छूट जायेगा। ‘जटा फकिरऊ आचरण गृहस्थऊ’ इसलिये कभी भी गफलत में न रहो। सदा सचेतावस्था में रहो।’’ ‘नशे में सैर कर अपने’– यह नशा तुम्हारा अपना है, तुम्हारे ही हृदय से प्रकट हुआ है, किसी दूकान से खरीदा नहीं है, इसी में सदैव डूबे रहो और ‘खुदी को तू जलाता जा’– अपने अहंकार, दम्भ को जलाते रहो। यह खुदी ही माया है– ‘मैं अरु मोर तोर तैं माया।’ (मानस, ३/१४/२) माया को अपने पास टिकने न दें। ज्ञानाग्नि, संयमाग्नि में जलाते जायँ।
संसार में धार्मिकता का ढोंग करके लोग जीवन काट ले जाते हैं। पण्डित और मौलवी आपस में लड़ते ही रहते हैं। इन दोनों के घरेलू झगड़े में न पड़ो– ‘न बन मुल्ला न हो बभ्भन दोउन का छोड़ घर झगड़ा।’
‘हुकुम है शाह कलन्दर का’– यदि आप नशे में सैर करते रहोगे तो कलन्दर अर्थात् फकीरों, परमहंसों के भी शाह भगवान से आदेश मिलने लगेगा। ‘अनलहक तू कहाता जा’– फिर तो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति होने लगेगी। भगवान अब आपसे अलग नहीं है।
कहे मंसूर मस्ताना ये हक मैंने दिल में पहचाना।
मस्ताने मंसूर ने कहा कि हक को मैंने दिल में पहचाना है। वास्तविकता का दिग्दर्शन हृदय में हुआ।
सब घट मेरा साँइया, सूनी सेज न कोय।
बलिहारी घट तासु की, जा घट परगट होय।।
उस घट के ऊपर मैं अपने को न्योछावर करता हूँ जिस हृदय में वह प्रकट हो जाते हैं। ‘मैंने ही इस सत्य को जाना है’– ऐसी बात नहीं है। ‘वही मस्तों का मयखाना’– सृष्टि में जितने मस्त हुए हैं, महापुरुष जिन्होंने भगवान के नशे को पाया तो हृदय में ही पाया है। वही उनका मयखाना है जहाँ से नशा मिलता है। ‘उसी के बीच चलता जा’– तुम उसी के बीच चलते रहो। श्वास आयी तो ‘ओम्’, गयी तो ‘ओम्’; क्रम न टूटे। मस्ताना वही है जो नशा पाता है। प्राप्ति के पश्चात् न हम रहे, न नशे लायक कोई चीज रही।
उस समय मंसूर की यही अवस्था थी। वह प्राप्ति के बहुत समीप थे। यदि प्राप्ति हो गयी होती तो शूली पर न चढ़ाये जाते। मीरा को क्यों नहीं शूली पर चढ़ाया गया? कोशिश तो बहुत की गई, जहर तक पिलाया गया किन्तु मीरा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
एक भिखारी मन्दिर की सीढ़ियों पर पन्द्रह दिनों तक बैठा रहा। वह एल्यूमीनियम का बड़ा वाला चुचका-पिचका कटोरा रह-रहकर खटखटाता रहा। दर्शनार्थी मंदिर में जाते, भिखारी पर भी दृष्टि पड़ती। वह मुँह घुमाकर चले जाते। किसी ने कुछ दिया ही नहीं। फिर उसने जगह बदली, मस्जिद के दरवाजे पर बैठने लगा। पन्द्रह दिनों तक उसने वहाँ भी श्रम किया। लोग देखते अवश्य थे, आगे बढ़ जाते थे। उसने गुरुद्वारे पर भी समय दिया, चर्च भी गया। उसे देखा सभी ने, पर उसे कहीं भी कुछ न मिला। भटकते-भटकते वह एक मयखाने पर पहुँचा जहाँ शराब बिक रही थी, लोग पी रहे थे। वह मयखाने के दरवाजे के समीप वहीं कटोरा लेकर बैठ गया। लोग शराब के नशे में धुत निकलते, उस भिखारी की ओर निगाह पड़ते ही जेब में दो-चार बचे नोटों को निकालकर कहते– ले तू भी छान-घोंट! एक-एक करके कटोरा पूरा भर गया। तब वह हाथ जोड़कर बोला– वाह रे मालिक! रहते तो कहीं और जगह पर हो, पता कहीं और जगह का दे रखा है।
मनुष्य अबोध जन्मता है। संस्कार-सृजन के लिए आरम्भिक पता तो मन्दिर-मस्जिद ही हैं। भजन का नशा सवार हो जाय, वह वास्तविक पता तो सद्गुरुओं का दरबार, मयखाना है और संसार ही भिखारी है, आध्यात्मिक सम्पत्ति से रहित है– ‘दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया।’ शाश्वत, देने लायक यदि कहीं कुछ है तो इन्हीं सद्गुरुओं के पास है। भगवान श्रीकृष्ण इसीलिये कहते हैं कि तत्त्वदर्शियों के पास जाओ। वे तुझे ज्ञान का उपदेश करेंगे। ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को तू हृदय में अनुभव करेगा जहाँ परमात्मा का निवास है, जिसकी कृपा से तू शाश्वत परमधाम, अक्षय सुख और असीम शान्ति को प्राप्त कर लेगा। इसलिये,
न पीना हराम है न पिलाना हराम है।
पीने के बाद होश में रहना हराम है।।
भजन जागृत हो गया तो रात-दिन एक करके उसी में लग जाओ। जब हो कि सचमुच तुम्हारे पास है तो पिलाओ; वह जागृति सबको प्रदान करो। यह पिलाना भी जायज है, हराम नहीं है। तुमने कहा कि पिया और होश में भी बने रहे तो पिया ही कब? इसलिये पीने के पश्चात् होश में रहना हराम है। नशा चढ़ा ही नहीं और हम भक्त भी कहलाते हैं।
बंचक भगत कहाइ राम के।
किंकर कंचन कोह काम के।। (मानस, १/११/३)
प्रश्न उठता है कि पियें कैसे? पिये हुए की पहचान क्या है?
पीना ही है तो इस कदर पी।
कि हम पीयें, जहां के मुँह से बू निकले।।
इस प्रकार पियो कि तुम गुफा में बैठकर शान्त-एकांत में पियो और वह सबके हृदय में, घट-घट में, चिदाकाश में बोलने लगे। यह प्रचार, वह माध्यम– यह सब अनावश्यक हैं। जब वह प्रभु हृदय में उतर आयेगा – भगवान तो कण-कण में व्याप्त है – वह सबकी आत्मा में, जो पुण्यात्मा हैं उनके अन्तराल में स्वत: प्रसारित हो जायेगा, सूचना भेज देगा।
भगवान दत्तात्रेय एक महापुरुष थे। तितिक्षा उनकी रहनी थी। वह निराधार विचरण कर रहे थे। तीन उपवास-चार उपवास आये दिन की घटना थी फिर भी वह मस्त थे; क्योंकि उन्हें नशा था, वह पिये हुए थे। उनके चतुर्दिक अनायास भीड़ बढ़ने लगी। उन्होंने भगवान से पूछा– ‘‘प्रभो! हमें तो कोई नहीं पूछता था। आजकल यह भीड़ क्यों हो रही है?’’ भगवान ने कहा– ‘‘लक्ष्मीजी तुम्हारी सेवा करना चाहती हैं।’’ दत्तात्रेय ने कहा– ‘‘भगवन्! लक्ष्मीजी को तो मैंने पुकारा नहीं! हमें उनकी जरूरत भी नहीं है, फिर वह क्यों सेवा करना चाहती हैं?’’ भगवान ने बताया कि ‘‘तुम्हारे हृदय में मैं जो आ गया हूँ इसलिये वह तुम्हारे माध्यम से मेरी सेवा कर रही हैं।’’ दत्तात्रेय ने कहा– ‘‘प्रभो! एकान्त में आपके साथ जो सुख है वह इस भीड़भाड़ में कदापि नहीं है। अत: आप बने रहें, लक्ष्मी जी को विदा कर दें।’’ भगवान ने कहा– ‘‘मेरा चरण छोड़कर उनका और कोई ठिकाना भी तो नहीं है। जहाँ मैं रहूँगा, वह तो रहेंगी ही।’’
निरुपाय दत्तात्रेय भागने लगे। जहाँ भीड़ हो जाय वहाँ से रात को चुपचाप उठें और दूसरी जगह चले जायँ; किन्तु लक्ष्मी जी वहाँ पहले ही प्रबन्ध कर रखती थीं, वहाँ भी भीड़ विद्यमान रहती। तब दत्तात्रेय पहले संकल्प करते कि दस किलोमीटर पूरब जायेंगे और दस किलोमीटर पश्चिम बढ़ जाते, संकल्प के विपरीत भागने लगे। लक्ष्मी जी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भीड़भाड़ लिये-दिये वहाँ भी उपस्थित हो जातीं।
दत्तात्रेय बहुत झल्लाये। उन्हें तो भजन का नशा चाहिए था। भगवान ने उन्हें समझाया– ‘‘घबड़ाओ मत! अब यह माया नहीं है। अब यह मेरी इच्छा है। भजन का नशा करके तुम जिसे ढूँढ़ते थे, वह मैं तुम्हारे सम्मुख हूँ। अब कहीं बैठ जाओ। लक्ष्मी तो सेवा करेगी ही।’’ दत्तात्रेय ने सोचा–देखें, लक्ष्मी कैसे सेवा करती है? उन्हें घूमते-घूमते गिरनार पर्वत दिखायी पड़ा, बब्बर शेरों से भरा घनघोर जंगल। वह उत्तुंग पर्वत शिखर पर चढ़ते चले गये। बहुत ऊँचाई पर उन्हें एक झरना दिखायी पड़ा। वहीं वह धूना लगाकर बैठ गये। वहाँ से दस-पन्द्रह किलोमीटर तक कोई गाँव नहीं था। दूरदराज के लोगों को स्वप्न दिखायी पड़ने लगा कि इस पहाड़ के शिखर पर एक महापुरुष बैठे हैं। वहाँ झरना है, धूना है। दूसरे ने कहा– हमने भी ऐसा देखा है; उन्हें प्रणाम किया, उन्होंने आशीर्वाद दिया। तीसरे ने कहा– मुझे स्वप्न में उनके पास त्रिशूल भी दिखायी पड़ा। चौथे ने कहा– हमें उनके तीन शिर दिखाई पड़े। लोगों ने सोचा, सबको एक जैसा स्वप्न क्यों दीख रहा है कि पहाड़ पर महापुरुष, नारायणस्वरूप! चलें, देखा जाय। लोग ग्यारह हजार सीढ़ियाँ बनाकर शिखर तक पहुँच गये। लोगों ने देखा, वह महापुरुष वहाँ बैठे थे।
अब वहाँ भक्तलोग जाने लगे। कोई गेहूँ का आटा ले जाता, कोई ज्वार-बाजरे का आटा। हर प्रकार का आटा, नमक, मिर्च जो भी आता, सब एक में मिलाकर टिक्कड़ बन जाता था। एक-एक मन का टिक्कड़, आज के वजन में ३०-४० किलो का टिक्कड़ शाम को धूने में घुसाड़ देते थे, सुबह तक टनाटन पका हुआ ब्रेड कुल्हाड़ी से काटकर, चाकू से काटकर सबको प्रसाद मिल जाता था। वही महात्मा का भी भोजन था। आज भी गिरनारी टिक्कड़ बनाने की परम्परा वहाँ यथावत् है।
भाविक भक्तों में एक स्टेट (महोलगढ़) के राजा ने ताम्रपत्र पर लिखकर अपना राज्य ही दत्तात्रेय जी को समर्पित कर दिया। महाराज ने पूछा– ‘‘यह क्या है?’’ राजा ने कहा– ‘‘भगवन्! अपना राज्य हमने आपको भेंट कर दिया।’’ महाराज ने कहा– ‘‘अरे! मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? मैं साधु हूँ, सबकुछ छोड़ चुका हूँ।’’ राजा ने निवेदन किया– ‘‘भगवन्! क्षत्रिय बात से पीछे नहीं हटता, फिर दान को वापस लेने का तो प्रश्न ही नहीं है। हमने संकल्प कर दिया तो कर दिया।’’ महाराज ने कहा– ‘‘वह तो ठीक ही है; हमारे आदेश का पालन करोगे?’’ राजा ने कहा– ‘‘भगवन्! हुकुम करें तो मैं शीश भी दे दूँगा।’’ महाराज ने कहा– ‘‘अरे नहीं भाई! शीश रहेगा तब ही तो पालन करोगे। ऐसा करो, तुम हमारे दीवान (प्रधानमंत्री) बनकर राज्य-कार्य देखते रहो। जीवन-पर्यन्त सिंहासन के नीचे बैठकर शासन की देखरेख करो, कोई गड़बड़ी न होने पाये।’’ जीवन में एकाध बार एक घंटे के लिये दत्तात्रेय भी वहाँ पहुँचे, उस गद्दी को ठोक-ठाँककर, आशीर्वाद देकर चले आये। गोस्वामी जी ने लिखा है–
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं।
जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ।
धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।। (मानस, १/२९३/२-३)
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं।
अन्तकाल रघुपति पुर जाहीं।। (मानस, ७/१४/४)
ऐसा स्वाभाविक होने लगता है–
तहवाँ लक्ष्मी झाड़ू देत हैं, शंभु करैं कोतवाली।
तवन घर चेतिहे रे भाई! तोहरा आवागमन मिटि जाई।।
जहाँ भगवान रहते हैं, जहाँ सबका नियन्ता रहता है; वह परात्पर ब्रह्म जहाँ अपनी दृष्टि गड़ा देता है वहाँ उसके समस्त कर्मचारी लक्ष्मी-देवता सब-के-सब डेरा डाल देते हैं कि प्रभु को कष्ट न होने पाये। इसी तरीके से भगवान सन्त की सेवा करवा लेते हैं। दत्तात्रेय को भजन का नशा था। उन्हें कुछ भी प्रभु के सिवा नहीं चाहिए था। वह चाहते थे कि उनके पास कोई न आये, भजन-चिन्तन में व्यवधान उपस्थित न हो; किन्तु पुण्यात्माओं के हृदय में वहाँ का दृश्य प्रसारित होने लगा, जिनका कल्याण होना था उनके अन्त:करण में बोलने लगा।
‘गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु…।’ (मानस, १/४८ क)– भगवान का अवतरण यद्यपि गुप्त होता है फिर भी पुण्यात्माओं के संज्ञान में आ ही जाता है। उसकी सुगंध संसार में फैलते देर नहीं लगती।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)
