वर्णसंकर
प्रश्न– महाराजजी! अर्जुन को शंका थी कि युद्ध करेंगे तो इतने लोग मरेंगे कि स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी। लोग वर्णसंकर हो जायेंगे जिससे सनातन–धर्म नष्ट हो जायेगा। किन्तु श्रीकृष्ण ने गीता में कहीं भी इस शंका का समाधान नहीं किया कि वर्णसंकर क्या है? कैसे होता है?
उत्तर– श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रत्येक शंका का समाधान कर दिया था। शस्त्र-संचालन की तैयारी के समय अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दीजिए, जिससे मैं इन युद्ध की इच्छावालों को भली प्रकार देख लूँ कि मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना उचित है। श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया, तो अर्जुन ने उस अठारह अक्षौहिणी जनसमुदाय में अपने परिवार को खड़ा पाया। वहाँ अर्जुन ने अपने पिता के भाइयों को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को, मित्रों को, श्वसुर तथा सुहृदों को देखा। इस गणना में कुल दस शब्द आये हैं जिसमें अपना परिवार, ननिहाल का परिवार, ससुराल का परिवार, सुहृद् और गुरुजन ही थे। अठारह अक्षौहिणी लगभग साढ़े छः अरब के करीब होता है। (महाभारत की गणना के अनुसार चालीस लाख के समकक्ष होता है।) इतने जनसमूह में अर्जुन को केवल अपना सुहृद्, सम्बन्धी रिश्तेदार और परिवार दिखाई पड़ा; अन्य कोई नहीं? कहीं इतने रिश्तेदार भी होते हैं? नहीं होते! वस्तुतः महाभारत अन्तःकरण की लड़ाई है।
अर्जुन ने सुहृदों को देखा। देखते ही काँपने लगा, रोमांच हो आया। बोला- भगवन्! मैं अपने ही परिवार को मारकर क्या सुखी होऊँगा? कुलधर्म सनातन है। ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म लुप्त हो जायेगा। कुलधर्म शाश्वत है, युद्ध करने से शाश्वत-धर्म नष्ट हो जायेगा। पुरुषों के संहार से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी, पिण्ड-परम्परा समाप्त हो जायेगी। कुल की स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर पैदा होंगे और वह वर्णसंकर कुल और कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। हम लोग समझदार होकर महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं। अर्जुन ने यह नहीं कहा कि केवल हम ही भूल करते हैं, बल्कि उसने श्रीकृष्ण पर भी आरोप लगाया कि आप भी भूल करते हैं। अर्जुन ने कहा कि जिनके लिए हमें भोग इच्छित हैं, ये सभी तो जीवन की आशा त्यागकर मौत के मुहाने पर खड़े हैं, फिर मैं अकेला यह साम्राज्य लेकर क्या करूँगा? अतः मैं युद्ध नहीं करूँगा।
यहाँ पर अर्जुन दो प्रश्न मुख्य रूप से रखता है। पहला तो यह कि सनातन-धर्म लुप्त हो जायेगा- सनातन-धर्म के लिए वह आहें भरता है। दूसरा प्रश्न था कि वर्णसंकर हो जायेगा। श्रीकृष्ण ने इसका एक ही उत्तर दिया कि अर्जुन! इस विषम-स्थल में, जिसकी समता का कोई स्थल विश्व में नहीं है, तुझे अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ? जिस क्षमता का युद्ध मैं बताता हूँ, उस क्षमता का संघर्ष निःसन्देह कुछ भी नहीं है।
तो क्या शाश्वत-धर्म की सुरक्षा के लिए व्यग्र होना अज्ञान है? वर्णसंकरता के जघन्य दोष से बचा लेने का प्रयास भी क्या अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ अर्जुन! जिसे तू सनातन-धर्म कहता है, न तो श्रेष्ठ पुरुषों ने कभी इसका आचरण किया है न यह परम कल्याण करनेवाला है और न यह कीर्ति को ही बढ़ानेवाला है। सिद्ध है, अर्जुन जिसे सनातन-धर्म समझता था, न तो वह सनातन धर्म था और न उसे वर्ण की सही जानकारी ही थी। वह अर्जुन का भ्रम मात्र था। तभी तो उसने कहा कि यह सब अज्ञान है, तब आप ही बतायें कि धर्म क्या है, वर्ण क्या है?-
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। (गीता, 2/7)
‘‘धर्म के विषय में मोहितचित्त मैं आप से पूछता हूँ। आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ। मुझे वही उपदेश कीजिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।’’ अर्जुन परमकल्याण से वंचित नहीं रहना चाहता। श्रीकृष्ण ने पहले तो सनातन-धर्म की व्याख्या की, तदनन्तर वर्णसंकर पर प्रकाश डाला। अब आइये वर्णसंकर पर विचार किया जाय। तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! इस कर्म को किये बिना न तो कोई उस परम नैष्कर्म्य स्थिति को प्राप्त कर सका है और न भविष्य में कोई प्राप्त कर सकेगा। कर्म ही इस मानव-जीवन की सफलता है किन्तु जो पुरुष आत्मा में ही रत, आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है उसके लिए कर्म करने से न तो कोई लाभ है और न छोड़ देने से कोई हानि ही है। सिद्ध है कि कर्म उस आत्मा तक पहुँचाता है; जिसके पश्चात् फिर कर्म की आवश्यकता नहीं रह जाती। पहले भी इस कर्म को किये बिना न तो कोई पाया है और न भविष्य में कोई पा सकेगा। कर्म ही उसकी प्राप्ति का एकमात्र माध्यम है। यही मानव-तन की सार्थकता है।
‘‘पार्थ! मुझे भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं है तथा प्राप्त होने योग्य किंचित् वस्तु भी अप्राप्त नहीं है फिर भी मैं कर्म में बरतता हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म में न बरतूँ तो यह सब लोक भ्रष्ट हो जाय और मैं वर्णसंकर का कर्ता कहा जाऊँ।’’
गीता की दृष्टि से कर्म का तात्पर्य आराधना ही है, जिससे आराध्य प्रसन्न होते हैं, जिससे आत्मा का साक्षात्कार होता है, जो संसार-बन्धन से सदा-सदा के लिए मुक्ति दिलाता है।
स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर होना तो सुना गया; किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण एक नयी बात कहते हैं कि स्वरूप में स्थित महापुरुष यदि चिन्तन-क्रम को नहीं करता तो सब लोग वर्णसंकर हो जायेंगे। वस्तुतः इस जीवात्मा का शुद्ध वर्ण परमात्मा है-
हंसा तूँ सुबरन बरन, हलकी तेरी चाल।
एक तला के बीछुरे, विकल फिरे बेहाल।।
यह हंस (जीवात्मा) वस्तुतः ‘सुबरन’- शुद्ध वर्ण का है। केवल स्वरूप विस्मृत हो जाने से विकल होकर दर-दर भटक रहा है। इस आत्मा को परमात्मा तक की दूरी तय करा देनेवाली प्रक्रिया-विशेष का नाम कर्म है। इसी कर्म को करके पूर्वकाल में जनक इत्यादि महर्षियों ने नैष्कर्म्य स्थिति को प्राप्त किया था जिसके पश्चात् कर्म किये जाने से न तो कोई लाभ है और न छोड़ देने से कोई हानि ही है। फिर भी ऐसे महापुरुष कर्म में ही बरतते हैं; क्योंकि यदि ऐसे महापुरुष सावधान होकर कर्म में न बरतें तो लोग प्रायः उनकी नकल करेंगे कि महाराजजी तो प्रायः बैठे रहते हैं, भजन तो करते ही नहीं। ऐसे अन्धानुकरण से वे श्रेयपथ से च्युत हो जाते हैं। कोई भी व्यक्ति जब चिन्तन-पथ में है, वह अपने वर्ण की ओर- शुद्ध स्वरूप परमात्मा की ओर अग्रसर होने का प्रयास करता है, किन्तु जब वह आराधना से हट जाता है तो सिद्ध है कि वह प्रकृति की भँवर में फँसाव ले रहा है। यही वर्णसंकर का होना है। परमात्मा ही हमारा शुद्ध वर्ण है। उसकी ओर अग्रसर न होकर जड़ प्रकृति में भटकना ही वर्णसंकर होना है।
सारांशतः श्रीकृष्ण का आशय है कि इस कर्म को किये बिना उस परम नैष्कर्म्य स्थिति को न किसी ने पाया है, न भविष्य में प्राप्त कर सकेगा। कर्म अर्थात् आराधना अनिवार्य है। किन्तु जो कर्म करके आत्मरत, आत्मतृप्त और आत्मसन्तुष्ट हो गया उसके द्वारा कर्म किये जाने से न कोई लाभ है, न छोड़ने से हानि ही है फिर भी वह महापुरुष पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए कर्म में बरतता है। कदाचित् वे कर्म में न बरतें तो उन महापुरुष की तो कोई क्षति नहीं लेकिन उनका अनुकरण करनेवाला समाज वर्णसंकर हो जायेगा। समाज महापुरुषों का अनुकरण करता ही है क्योंकि वे सभी जीवात्माओं के मूल केन्द्र में स्थित हैं। जिस प्रकार समुद्र की ओर सभी नदियाँ स्वभावतः झुकती हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जीवात्माओं का केन्द्र परमात्मा है। परमात्मा से ही सभी संचालित होते हैं। उसी कक्षा में महापुरुष भी स्थित होता है इसीलिए सभी जीवात्माएँ महापुरुषों का अनुसरण करती ही हैं। केवल कोरे उपदेश से साधन-क्रम पकड़ में आता भी नहीं। महापुरुष क्रियात्मक ढंग से उन उपदेशों को अपने आचरण में ढालकर लोक-शिक्षण का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। किन्तु यदि महापुरुष क्रिया में नहीं बरतता तो कतिपय साधक साधना स्थगित करके महापुरुष की नकल करके अपना पूर्णत्व जताने लगते हैं। इससे वे पूर्ण नहीं हो जाते बल्कि स्वरूप से भटककर वर्णसंकर हो जाते हैं।
तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी को चाहिए कि कर्म में लगे हुए अज्ञानियों को चलायमान न करे बल्कि स्वयं कर्मों का भली प्रकार आचरण करता हुआ उनसे भी करावे। यदि महापुरुष ऐसा नहीं करता तो वह वर्णसंकर का कर्ता होगा; क्योंकि साधक उसका अनुकरण करके साधना से विरत हो जायेंगे, आत्मिक पथ से च्युत हो जायेंगे। दूसरे शब्दों में वर्णसंकर हो जायेंगे। ठीक इसी प्रकार, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उन मनीषियों से तुलना करते हुए कहा कि यदि वे महापुरुष सावधान होकर क्रिया में न बरतें अथवा मैं न बरतूँ तो वर्णसंकर का कर्ता होऊँ।
जहाँ तक स्त्रियों के दूषित होने से उत्पन्न वर्णसंकरता का प्रश्न है, महापुरुषों की दृष्टि में वह कोई दोष नहीं हैं; किन्तु सामाजिक संगठन के लिए रक्त की शुद्धता अपरिहार्य है। वह जीवन की मर्यादा है, कल्याणपथ-अन्वेषण की पहली सीढ़ी है। दाम्पत्य-जीवन के लिए समाज में नितान्त आवश्यक है। उसमें अमेरिकियों की तरह नष्ट नहीं होते बल्कि बाल-माधुर्य बचा रहता है। प्रश्नकर्त्ता अर्जुन, सभी पाण्डव, स्वयं पाण्डु, व्यास सब-के-सब वर्णसंकर थे। इतना ही नहीं, अधिकांश महापुरुष लौकिक दृष्टि से वर्णसंकर ही थे। उनकी तो मुक्ति नहीं होनी चाहिए थी। ‘नरकेऽनियतं वास’ का विधान होना चाहिए था; किन्तु वर्णसंकरता उनके रास्ते में व्यवधान नहीं डाल सकी। महापुरुषों के इतिवृत्त से प्रमाणित है कि माता-पिता की त्रुटियों का कर्तव्य-परायण पथिक पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।
ईसा मसीह वर्णसंकर थे। उनकी माँ का विवाह हुआ तो सात महीने का लड़का पेट में था। लोगों ने ‘मरियम’ को कुलक्षणा कहकर उन्हें समाज एवं नगर से निकालने का विचार किया (लगता है पातिव्रत धर्म उस समय जेरूसलम में प्रचलित था। आज तो कोई नहीं निकलता) फिर, स्वप्न दिखाई पड़ा कि इनके पेट में जो बालक है वह पवित्रात्मा है। बाद में लोगों ने जोड़ दिया कि वह पवित्रात्मा से गर्भवती हुई। वस्तुतः कोई पुण्यात्मा ही पेट में था न कि परमात्मा मरियम से गन्धर्व विवाह करने आया। अस्तु, ईसा बड़े अच्छे महापुरुष हुए। विश्व का काफी बड़ा भाग उनका अनुसरण करता है। भारतीय विचारधारा, भारतीय दर्शन ही उनके उपदेशों में भी है। प्राप्तिवाले सभी महापुरुषों का उपदेश एक ही जैसा है; क्योंकि एक ही सत्ता को सभी ने देखा तो दूसरा कोई कहेगा क्या? प्राप्तिवाले महापुरुष समाज के बीच कभी दरार डाल ही नहीं सकते। वे कभी नहीं कहते कि आप हिन्दू हैं, वह ईसाई है, तुम बौद्ध, जैन, पारसी या सिख हो। महापुरुषों के नाम पर उनके अनुयायी पीछे दरार डालते रहते हैं। स्वार्थ-सिद्धि के लिए महापुरुष के नाम से वे अनेक भ्रान्तियों, रूढ़ियों, सम्प्रदायों का प्रचलन करते रहते हैं। प्रायः प्रत्येक महापुरुष के साथ ऐसा होता आया है। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद, कबीर सबके उपदेशों पर कुरीतियाँ पनप गयी हैं। यदि किसी ने उस सत्ता का स्पर्श पा लिया, जो सबकी आत्मा में संचारित है फिर वह मानव-मानव में दरार कैसे डालेगा? यदि दरार डालता है तो सिद्ध है कि वह लक्ष्य से अभी दूर है।
कबीर ‘लहरतारा तालाब’ पर पडे़ मिले। अनुयायियों ने गढ़ना प्रारम्भ किया कि प्रकाश-पुंज आकाश से उतरा। बहुत देर मँडराता रहा, एक कमल पर केन्द्रित होकर गिरा, बालक बन गया। जुलाहे की स्त्री गयी और ले आयी। इस प्रकार स्वयं परम चेतन परमात्मा ही कबीर के रूप में प्रगट हुआ। माता-पिता के संयोग से उनकी उत्पत्ति नहीं हुई। लेकिन कबीर ने अपना परिचय दिया कि मैं ही कबीर हूँ, ऐसी बात नहीं; आप भी कबीर हो सकते हैं-
कबिरा कबिरा क्या करै, सोधो सकल शरीर।
आशा तृष्णा बस करे, सोई दास कबीर।।
कबीर अच्छे हैं, कबीर महात्मा हैं- क्या कबीर-कबीर रट लगा रखा है? ‘सोधो सकल शरीर’- स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों की शोध कर लो। किन्तु आशा और तृष्णा के रहते वह शोध सम्भव नहीं है। अतः ‘आशा तृष्णा बस करे’- आषा, तृष्णा जिसने भी वश में किया, ‘सोई दास कबीर’– जितना हमने किया, आप भी कर लें तो आप भी कबीर बन जायँ। ‘काया का बीर सोई कबीर।’
ठीक इसी प्रकार वशिष्ठ उर्वशी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। वाल्मीकि कोल थे। कोलों में उठना-बैठना, खाना-पीना, शादी-विवाह सब था, किन्तु महर्षि हुए। क्षत्रिय विश्वामित्र अन्ततः महर्षि बने। मछोदरी के लड़के व्यास वर्णसंकर थे; किन्तु सर्वोपरि ब्रह्मर्षि कहलाये। वस्तुतः माता-पिता की भूलों का उत्पन्न होनेवाले बालक पर कोई प्रभाव नहीं पडता। ‘अपनी करनी पार उतरनी’- सभी अपनी करनी लेकर आते हैं। माता-पिता, स्त्री-पुरुष, बच्चे सभी जन्म-जन्मान्तरों के बदले हैं; जिसे कोई पिता बनकर, कोई पुत्र बनकर चुकाता रहता है। ‘बदला’ वर्णसंकर नहीं होता। वस्तुतः वर्णसंकर का अर्थ यह है कि यदि आत्मज्ञ महापुरुष क्रिया में नहीं बरतता तो उसी की नकल करके जो लोग क्रिया में नहीं बरतते, वे वर्णसंकर हो जाते हैं।
।। ओम् ।।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)