शूर्पणखा-विरूपण

शूर्पणखाविरूपण

कतिपय लोगों का आक्षेप है कि जिनके भाई लक्ष्मण ने शूर्पणखा, एक नारी का नाक-कान काट डाला, उन्हें हम अपना आराध्य नहीं मान सकते। इस प्रकरण में भी सर्वप्रथम यह देखना है कि शूर्पणखा कौन थी? श्री रामचरितमानस में सन्तकवि गोस्वामी तुलसीदासजी ने उसका परिचय दिया है-

सूपनखा रावण कै बहिनी।

दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।। (मानस, 3/16/3)

शूर्पणखा नामक रावण की एक बहन थी जो नागिन के समान भयंकर और दुष्टहृदया थी। वह जहाँ भी गयी उसको डस लिया। सुधा सराहिअ अमरताँ, गरल सराहिअ मीचु।(मानस, 1/5) अमृत की सराहना जीवन देने के लिए तथा विष की सराहना मृत्यु प्रदान करने के लिए की जाती है। अस्तु नागिन की तरह ही उसका कीर्तिमान था।

शूर्पणखा का पति युद्ध में रावण के द्वारा मारा गया। आक्रोशित शूर्पणखा रावण को उपालम्भ देने लगी- ‘‘तू मेरा भाई है कि शत्रु, तुमने तो मेरे पति को ही मार डाला। अब लोग मुझे विधवा कहेंगे।’’ रावण ने सांत्वना दी- ‘‘बहन! युद्ध के उन्माद में मैं पहचान नहीं पाया इसलिए वह मेरे हाथों मारा गया। तुम चिन्ता न करो। हमारी जाति में भी कभी विधवा-सधवा होती है क्या? हजारों स्त्रियाँ हम रखते हैं, पुरुषों के प्रति वैसा ही व्यवहार करने के लिए तुम स्वतन्त्र हो। भाई खर-दूषण के संरक्षण में रहकर जनस्थान में मनचाहा विचरण करो।’’

दक्षिण भारत में खर-दूषणादिकों की चौकियाँ इसलिए थीं कि संस्कृति-संवाहक तपस्यारत ऋषि-मुनियों की तपस्या बन्द कराओ और उन्हें खा जाओ। सुररिपु, दुर्मुख, मनुज अहारी इनकी उपलब्धियाँ थीं। सरभंग आश्रम के आगे बढ़ने पर अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।(मानस, 3/8/6)- हड्डियों का ढेर देखकर राम को बड़ी दया आई। ऋषियों से ज्ञात हुआ- निसिचर निकर सकल मुनि खाये। सुनि रघुबीर नयन जल छाये।।(मानस, 3/8/8)- ऋषियों का रक्तपान करनेवाले निशाचर, उनकी टुकड़ी का नायक खर और उनके संरक्षण में स्वच्छन्द विचरण करनेवाली मनचली राक्षसी शूर्पणखा स्वभाव से ही दुष्टा थी।

वाल्मीकि-रामायण का प्रसंग है। चित्रकूट में निवासकाल में ऋषियों का एक समूह राम की ओर कनखियों से संकेत करते हुए आपस में विचार-विमर्श कर रहा था। राम ने कहा- लक्ष्मण! प्रतीत होता है ये ऋषिगण हमलोगों से दुःखी हैं। इनसे क्षमायाचना करनी चाहिए। राम ने कहा- ऋषिवरो! सीता मेरी सेवा में रहती है, उससे कोई भूल हो सकती है। कदाचित् उसने समय से आपको भिक्षा न दी हो, अनुज लक्ष्मण अभी बालक है उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं है, उससे भी भूल हो सकती है अथवा मुझसे ही कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें।

ऋषियों ने कहा- नहीं राम! तुमसे कभी भूल हो ही नहीं सकती और न लक्ष्मण या देवी सीता से ही कोई भूल हुई है। आपलोगों का यहाँ चित्रकूट में रुकना ही हमलोगों के उद्वेग का कारण है। राक्षस खर ने आपका यहाँ आगमन सुन लिया है। वह ऋषियों का वध करते, उनकी अँतड़ियों को क्षत-विक्षत करते यहाँ चला आ रहा है। यहाँ वह हमलोगों का शरीर क्षत-विक्षत करे, इससे पूर्व ही हमलोग इस स्थान को छोड़कर अन्यत्र जाना चाहते हैं। राम! आप इन निशाचरों का वध करने में सक्षम हैं किन्तु सीता के साथ रहने पर आप भी उन्हें मार नहीं पायेंगे। इसलिए आप भी हमलोगों के साथ ही चलें। वहाँ अच्छा जलाशय है, कन्दमूल, फल की प्रचुर मात्रा है, हमलोग वहाँ आपकी सेवा करेंगे। इस प्रकार ऋषिवृन्द इन राक्षसों के आतंक से पलायन करते ही रहते थे। हाँ, उन बीहड़ अरण्य में कुछ तपोधन ऐसे भी थे जिन पर इन निशाचरों का प्रभाव काम ही नहीं करता था; जैसे- महर्षि अत्रि, सरभंग, अगस्त्य इत्यादि।

स्वच्छन्द विचरण के ही क्रम में शूर्पणखा एक बार पंचवटी की ओर आई- पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।(मानस, 3/16/4)- उसने राम और लक्ष्मण को देखा तो विकल हो गयी। भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।। होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहिं बिलोकी।। (मानस, 3/16/5-6)- आसुरी स्वभाववाली नारियाँ भाई को भाई नहीं समझतीं, पिता को पिता नहीं समझतीं, पुत्र को पुत्र नहीं मानतीं। मन में विकार आने पर वे इन पवित्र मर्यादित सम्बन्धों के स्थान पर पुरुष-भाव से देखने लगती हैं। इसलिए वह रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।। (मानस, 3/16/7)- सुन्दर रूप धारण कर प्रभु के पास पहुँच गयी, मुस्कराकर बोली- आप जैसा सौन्दर्यसम्पन्न पुरुष और मेरे समान नारी सृष्टि में कहीं है ही नहीं। मैंने आपने अनुरूप योग्य वर तीनों लोकों में खोजा किन्तु कोई पसन्द नहीं आया इसलिए मैं आज तक अविवाहित रही। मन माना कछु तुम्हहि निहारी।(मानस, 3/16/10)- आपको देखकर मेरा मन थोड़ा-बहुत मान गया है। जन्म हुआ है तो जीना ही पड़ेगा। आप हमसे अधिक सुन्दर नहीं है किन्तु काम चल जायेगा। थी तो राक्षसी किन्तु परिचय दिया सौन्दर्य-सम्पन्नता का।

सीता की ओर दृष्टि-निक्षेप कर भगवान राम ने कहा- यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण भी राजकुमार है। तब वह लक्ष्मण के समीप गयी। लक्ष्मण ने कहा- सुन्दरी! यह मेरे अग्रज हैं, स्वामी हैं, मैं इनके चरणों का दास हूँ। सेविका बनने में तुम्हें कौन-सा सुख मिलेगा? लक्ष्मण की ओर से हताश शूर्पणखा राम की ओर उन्मुख हुई। प्रभु ने कहा- मेरा विवाह तो हो चुका है। देखो, यह मेरी पत्नी है। उसने कहा- असहमति का कारण यह है तो चलो उसी को खा डालती हूँ। फिर तो ब्याह करेंगे। उसका आक्रामक तेवर देखते ही राम ने संकेत किया, लक्ष्मण ने उसे विरूपित कर दिया। नाक-कान में खरोंच लगते ही वह छद्मवेश भूलकर वास्तविकता में आ गयी। वह राक्षसी दहाड़ने लगी। भ्राता खर-दूषण को प्रोत्साहित किया। वे सब मारे गये। अन्ततः वह रावण के पास पहुँची, कहा- करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।(मानस, 3/20/7)- तू मदिरा पीकर सोया है। तुझे ज्ञात नहीं है कि तुम्हारी सीमा पर शत्रु ने कदम रख दिया है। रावण ने कहा- तू अपनी बात तो बता, वहाँ तू गयी किसलिए थी? गयी तो थी अपना ब्याह करने; किन्तु भाई को बताया कि तुम्हारे लिए परम सुन्दरी नारी लाने गयी थी। उसने पूरी लंका का सर्वनाश करा दिया। वह राम को छलने आयी थी। करोड़ों निशाचरों का सर्वनाश करानेवाली शूर्पणखा क्या अबला थी?

पत्नी की रक्षा करना पति का दायित्व है। राम ने उस दायित्व का निर्वाह किया। शूर्पणखा को अपने रूप-सौन्दर्य का बहुत गर्व था। राम ने उसका वास्तविक स्वरूप उद्घाटित कर दिया। अहिनी थी और अहिनी हो गयी। झूठ-सच बोलकर सम्पूर्ण लंका को खा गयी। जिनके ऊपर वह झपट पड़ी थी, उन सीताजी का तो कोई दोष ही नहीं था। वह तो पतिव्रत धर्म का निर्वाह करते हुए पति के साथ कंटकाकीर्ण पथ पर चल रही थी। हर नारी का यही कर्त्तव्य है। पति यदि दिव्य प्रासाद में रहता है तो वहाँ सेवा करे। कदाचित् दुर्योग से युधिष्ठिर या राम की तरह वनवास मिल गया तब भी कंधे से कंधा मिलाकर चले। पति की दशा में सन्तुष्ट रहना, उनका सहयोग करना, उनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करना पतिव्रत है। नारियों का उत्कर्ष-अपकर्ष सामाजिक व्यवस्था की देन है; भगवान के यहाँ दोनों बराबर हैं-

पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोइ।। (मानस, 7/87 ख)

भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर कहे जाते हैं। आधा नारी और आधा पुरुष बनकर परब्रह्म परमात्मा की सृष्टि में उत्पत्ति, पालन और परिवर्तन चलता ही रहता है। नारी और पुरुष सृष्टि में समान सहयोगी हैं। असुरों से पराभूत देवताओं को एक नारी ने ही विजय दिलायी थी, वह भी युद्ध करके। ताड़का नारी ही थी। उसमें एक हजार हाथियों का बल था। इन्द्र का बसाया हुआ करुष देश उसने उजाड़कर उसे जंगल बना दिया था। उसके पुत्र मारीच और सुबाहु भी पराक्रमी थे। नारी सृष्टि में द्वितीय श्रेणी की नागरिक कभी न थी। हाँ, समय-समय पर इन पर आपदायें आयीं। कभी इनकी सुरक्षा के लिए पर्दा-प्रथा का प्रचलन हुआ, छीना-झपटी होने पर ‘नारी अवध्य है’, ‘रक्षणीय है’ जैसे आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ। सम्प्रति समान अधिकार का आन्दोलन ‘फूट डालो और राज्य करो’ की मनोवृत्ति मात्र है। मानवीय मर्यादा के अनुसार गृहस्थी का दायित्व नारियों का है, अर्जन पुरुषों का। गृह-विभाग और संग्रह-विभाग के रूप में कार्य-विभाजन पूर्वजों द्वारा नियत मर्यादा है।

एक बार विद्वान लोगों ने भगवान राम के समक्ष यज्ञ करने का प्रस्ताव रखा। भगवान राम ने स्वीकृति दे दी। विद्वानों ने कहा- फिर तो आपको विवाह करना होगा क्योंकि नारी के बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता। यह उस समय का प्रस्ताव था जब सीता बाल्मीकि आश्रम में थीं। एक पत्नीव्रत राम का आदर्श था। उन्होंने कहा- यदि ऐसा है तो मुझे यज्ञ नहीं करना है। विद्वानों ने उपाय बताया- सीता की सुवर्ण प्रतिमा बनाकर यज्ञ सम्पन्न हो सकता है। इस प्रकार पुष्कल, दान-दक्षिणा के साथ वह यज्ञ सम्पन्न हुआ किन्तु राम एक पत्नीव्रत ही रहे। यह पतिव्रत और पत्नीव्रत जैसी मर्यादायें स्त्री-पुरुष दोनों के लिए श्रीराम ने स्थापित किया जो तब भी उचित था और आज भी है।

(राम और कृष्ण – मर्यादा के दृष्टिकोण’ से उद्धृत) * * *

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