हृदय
दिनांक 5 जून, सन् 2009 को श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ की सायंकालीन सभा में भक्तों की जिज्ञासा कि ‘शरीर का वह कौन–सा अंग है जिसे हृदय कहते हैं, जिस हृदय में भगवान् का निवास होता है?’- पर पूज्य महाराजश्री का प्रवचन।
भगवान् वास्तव में हृदय में ही होते हैं। लोग पता नहीं कहाँ-कहाँ ढूँढ़ते हैं, लेकिन जब कभी किसी ने पाया तो हृदय-देश में। सीताजी तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं से अनुनय-विनय, प्रार्थना कर रही थीं कि स्वयंवर में हम राम का वरण करें; किन्तु कोई लाभ नहीं। अन्त में सब ओर से निराश होकर हृदयस्थ ईश्वर की जिस पल शरण गयीं, उसी क्षण उन्हें सफलता मिल गयी।
सीताजी का स्वयंवर चल रहा था। जब उन्होंने यज्ञभूमि में पदार्पण किया, महान् पराक्रमी राजा-महाराजा धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। रावण और बाणासुर भी अपनी शक्ति का प्रयोग कर किनारे हो गये। राजाओं ने परामर्श किया, दस-दस हजार राजा एक साथ धनुष उठाने लगे। पहले धनुष तो रास्ते से हटे! परस्पर युद्ध कर विजयी नरेश सीता को प्राप्त कर ले! फिर भी धनुष टस से मस नहीं हुआ।
तब रामहि बिलोकि बैदेही।
सभय हृदय बिनवति जेहि तेही।। (मानस, 1/256/4)
सीताजी ने राम की ओर दृष्टिपात् किया- पूफूल की पंखुरी के समान कोमल! जिस धनुष को उठाने के प्रयास में विशाल भुजदण्ड वाले नरेश गिर पड़ते रहे हों, उसे यह कोमल शरीर वाले कैसे उठा पायेंगे? राम को देखकर वह कातर हृदय से ‘बिनवति जेहि तेही’– हे चौरा माँ, हे डीह बाबा, हे पिशाचमोचन, हे संकटमोचन- झटके में जो भी याद आ गया, उन सबको मना डाला। फिर भी सफलता के लक्षण नहीं दिखे।
मनहीं मन मनाव अकुलानी।
होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
करहु सफल आपनि सेवकाई।
करि हितु हरहु चाप गरुआई।। (मानस, 1/256/6)
हे शंकर-पार्वती जी! आज तक मैंने आपकी सेवा की है। उसके बदले में जब मेरा हित सधता दिखायी पड़े, रामजी की अंगुलियाँ धनुष का स्पर्श करती दिखायी पड़ें, उस समय धनुष को हलका कर दें। पहले ही हलका कर देंगे तब तो कोई सामान्य भी धनुष को तोड़ देगा। जब मेरा हित सधता दिखायी पड़े, तभी चाप को हलका करें। सफलता नहीं मिली, तब गणेश जी की ओर उन्मुख हुईं-
गननायक बरदायक देवा।
आजु लगे कीन्हिउँ तुअ सेवा।।
बार बार बिनती सुनि मोरी।
करहु चाप गुरुता अति थोरी।। (मानस, 1/256/7-8)
सीता जी बोलीं- हे गणेश जी! आप तो वर देने में प्रवीण हैं। मेरी विनती है कि चाप की गरुता को स्वल्प कर दें। फिर भी सफलता नहीं दिखायी पड़ी, तब-
देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर।। (मानस, 1/257)
तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का सामूहिक विनय किया, कोई लाभ नहीं हुआ। तब माता सीता उन प्रभु की शरण गईं जिनकी शरण सबको जाना चाहिए-
तन मन बचन मोर पनु साचा।
रघुपति पद सरोज चितु राचा।।
तौ भगवानु सकल उर बासी।
करिहि मोहि रघुवर कै दासी।। (मानस, 1/250/5)
यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सत्य है, राम के चरणों में मेरा मन अनुरक्त है तो भगवान् (कौन-से भगवान्? ‘सकल उर बासी’) जो सबके हृदय में निवास करते हैं, मुझे रघुवीर की दासी बना दें! ‘कृपा निधान राम सबु जाना’– भगवान् ने जान लिया कि अब मुझे पुकार रही है, मेरी शरण आ गयी है-
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।
भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। (मानस, 1/260/8)
जिस क्षण सीता हृदयस्थ ईश्वर की शरण गईं, धनुष टूट गया। जयमाला पड़ गयी। सफलता मिल गयी। अस्तु, भजन एक परमात्मा का ही करना चाहिए। सफलता जब भी मिलेगी, वहीं से मिलेगी। इतने देवी-देवताओं को मनाने का तात्पर्य क्या था? वस्तुतः गोस्वामी तुलसीदास जी के समय में भारतीयों का मस्तिष्क इसी में उलझा हुआ था। उन्होंने इस कथानक के माध्यम से देवी-देवताओं की वास्तविकता बता दी थी। सफलता मिली तो भगवान्- ‘सकल उर बासी’ से! श्रीमद्भगवद्गीता का भी यही सन्देश है- ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ (18/61)- ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में वास करता है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, 18/62)
अर्जुन! उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाओ, सम्पूर्ण भावों से जाओ। कुछ भाव पिशाचमोचन, कुछ संकटमोचन, कुछ चौरा देवी, दुर्गा देवी- तब तो हम भटक गये, इसीलिए सम्पूर्ण भाव से एक परमात्मा की शरण में जायँ। उसकी कृपा-प्रसाद से आप परमशान्ति को प्राप्त कर लेंगे। ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– उस घर को पा जायेंगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। आप रहेंगे और आपका निवास, सदा रहनेवाली शान्ति, सदा रहनेवाली समृद्धि आपका वरण करेगी। इस प्रकार आपके शास्त्रों में भगवान् की पूजा का विधान केवल हृदय में है।
रामचरितमानस के मंगलाचरण में है-
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्।।2।।
गोस्वामी जी कहते हैं- मैं भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ। शंकर आदि सद्गुरु हैं। उन सद्गुरु की- जो शंकाओं से अतीत हैं, कल्याण तत्त्व में स्थित हैं, मैं वन्दना करता हूँ। जिनके बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं पहचान पाते। जनसामान्य की कौन कहे, सिद्धस्तर को प्राप्त लोग भी उनकी कृपा के बिना हृदयस्थ ईश्वर को पहचान नहीं पाते। तुलसीदास जी की रामचरितमानस के अनुसार ईश्वर हृदय में रहता है। गीता के अनुसार ईश्वर हृदय में रहता है। वेदोक्त-उपनिषदोक्त ईश्वर हृदय में है-
अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। (कठोपनिषद्, 2/3/17)
अतः प्रार्थनास्थली हृदय और भजन एक परमात्मा का शास्त्रीय निर्देश है। यह जितने मन्दिर हैं, परमात्मा की पाठशाला हैं, नामघर हैं, पूजाघर हैं, प्रार्थना-स्थलियाँ हैं। भगवान् की मूर्ति तो एक में भी नहीं है; क्योंकि-
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।। (मानस, 1/117/5)
भगवान् अमूर्त हैं, अरूप हैं तो उनकी मूर्ति आयी कहाँ से? आपके पूर्वजों में से जिस किसी ने भगवत्ता को प्राप्त कर लिया, उन महापुरुषों की प्रतिमा इन मन्दिरों में सँजोयी गयी है। यह सामूहिक प्रार्थना-स्थलियाँ भगवान् के समीप पहुँचाने का माध्यम हैं। रामलीला, रासलीला, कथा-वार्ता, नाम-जप, तीर्थ-व्रत, पर्व-उत्सव सभी धर्म के आरम्भिक सोपान हैं; किन्तु प्रशस्त पथ पर आते ही भगवान् का भजन, भगवान् का ध्यान हृदय में ही किया जाता है।
विदेश से एक प्रश्न आया है कि यदि हृदय में भगवान् रहते हैं तो शरीर के किस भाग का नाम हृदय है? भगवान् मस्तिष्क में रहते हैं या सीने में या जो धक-धक करता है, उसमें रहते हैं? हृदय क्या है?
जीव विज्ञान की मान्यताओं से भी उच्चतर शोध हमारे आर्षग्रन्थों में है। जिनके अनुसार हृदय कोई ऐसा यन्त्र है जिसमें मात्र भगवान् ही नहीं अपितु सृष्टि का सम्पूर्ण कार्य उससे संचालित होता है-
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।
सत चेतन घन आनन्द रासी।। (मानस, 1/22/6)
वह ब्रह्म कण-कण में व्याप्त है, एक है। वृहद् है इसलिए ब्रह्म, अविनाशी है- जिसका कभी विनाश नहीं होता। वही सत्य है, चेतन है, असीम आनन्द की राशि है। भला वह प्रभु रहता कहाँ है? ‘अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।’ (मानस, 1/22/7)- ऐसा परमात्मा सबके हृदय में निवास करता है अर्थात् ईश्वर का निवास हृदय है।
रावण की भर्त्सना करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं-
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।। (मानस, 6/16 ख)
मूर्ख के हृदय में ज्ञान का उदय नहीं होता। एक अन्य प्रसंग लें! भगवान् पंचवटी में थे। सीताहरण हो चुका था। राम और लक्ष्मण उनकी शोध में थे। भोलेनाथ शिव उधर से निकले।
हृदयँ बिचारत जात हर, केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु, गएँ जान सबु कोइ।। (मानस, 1/48 क)
शंकर जी हृदय में विचार करते चले जा रहे हैं। अर्थात् हृदय ऐसी स्थली है जिसमें विचार-मंथन चलता रहता है। गुरु-वन्दना प्रकरण में है-
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।। (मानस, 1/5/5)
गुरु महाराज के चरण-नख की ज्योति मणि-माणिक्य के तुल्य है। इन चरण-नखों का स्मरण करने से हृदय में दिव्य-दृष्टि का संचार हो जाता है। भगवान् शिव की मान्यता देखें-
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती।
प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।। (मानस, 1/184/3)
जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु उसके लिए उसी रीति से प्रकट होते हैं। अर्थात् हृदय में भक्ति और प्रीति का भी निवास होता है।
गुरु वशिष्ठ जी ने राम से कहा-
सब के उर अंतर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित, होइ सो कहिअ उपाउ।। (मानस, 2/257)
आप सबके हृदय में निवास करते हैं। किसके हृदय में कैसा भाव है, आपको विदित है। अर्थात् हृदय ऐसा स्थल है जहाँ भाव-कुभाव भी रहता है।
महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् का निवास-स्थल ‘मानस’ में इस प्रकार बताया-
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभ्ग सरि नाना।।
भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। (मानस, 2/127/4-5)
जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी मनोरम कथारूपी नदियों से निरन्तर भरते हुए भी कभी तृप्त नहीं होते, उनका हृदय आपके लिए सुन्दर घर है।
विभीषण जी जब शरण में आये, भगवान् ने कहा-
कहु लंकेस सहित परिवारा।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।। (मानस, 5/45/4)
हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल तो कहो! आपका निवास बुरी जगह है।
खल मण्डली बसहु दिनु राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँति।। (मानस, 5/45/5)
दिन-रात आप दुष्टों की मण्डली में रहते हैं, धर्म का निर्वाह कैसे होता है? विभीषण ने कहा-
तब लगि कुसल न जीव कहुँ, सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजन न राम कहुँ, सोक धाम तजि काम।। (मानस, 5/46)
प्रभो! जीवमात्र के लिए सृष्टि में कहीं कुशल है ही नहीं, जब तक वह शोकधाम काम का त्याग करके आपका भजन नहीं करता। जब तक वह भजन नहीं करता, तब तक हृदय में क्या होता है?-
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना।। (मानस, 5/46/1)
ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।। (मानस, 5/46/3-4)
इस प्रकार हृदय में भगवान् ही नहीं रहते, खल भी वहीं निवास करते हैं। अतः विचारणीय है कि हृदय क्या है?
उत्तरकाण्ड के ज्ञानदीप प्रकरण में है-
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी।
ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। (मानस, 7/116/7)
जीव के हृदय में तम विशेष है। अँधेरे में अविद्या की ग्रन्थि दिखायी नहीं देती तो भला छूटेगी कैसे?
नन्दिग्राम में भरत जी की रहनी देखें-
नित पूजत प्रभु पाँवरी, प्रीति न हृदयँ समाति। (मानस, 2/325)
भगवान् के प्रति उनका इतना अगाध प्रेम था कि हृदय छोटा पड़ गया। सुतीक्ष्ण प्रसंग में है-
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा।
प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। (मानस, 3/9/14)
मुनि का अतिशय प्रेम देखकर भगवान् उनके हृदय में प्रकट हो गये।
विभीषण की शरणागति पर, सुग्रीव के परामर्श पर उन्हें सान्त्वना देते हुए भगवान् ने कहा- ‘जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।’ (मानस, 5/43/4) यदि रावण का भाई दुष्ट-हृदय होता तो क्या मेरे समक्ष आ पाता? अर्थात् हृदय में दुष्टता भी होती है।
सुन्दरकाण्ड के आरम्भ में ही है-
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।। (मानस, 5/1/1)
वे उपदेश हनुमान जी को बहुत प्यारे लगे। अर्थात् हृदय उपदेशों को भी ग्रहण करता है। लंका की संरक्षिका लंकिनी ने हनुमान को परामर्श दिया-
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा।। (मानस, 5/4/1)
हृदय में कोशलपुर नरेश का स्वरूप धारण कर लंका में प्रवेश कर सब कार्य करें! हनुमान ने लंका में सीता का दर्शन किया-
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।। (मानस, 5/7/8)
हनुमान ने उन्हें सान्त्वना दिया-
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता।। (मानस, 5/14/9)
सृष्टि के समस्त क्रिया-कलाप हृदय कर रहा है। यहाँ धैर्य भी धारण कर रहा है।
किष्किन्धाकाण्ड का वर्णन है-
बहु छल बल सुग्रीव कर, हियँ हारा भय मानि।
मारा बालि राम तब, हृदयँ माझ सर तानि।। (मानस, 4/8)
हृदय से हार मान लेना, हृदय में बाण मारना जैसे प्रयोग भी रामचरितमानस में द्रष्टव्य हैं। संत-हृदय की तुलना निर्मल जल से की गयी है-
संत हृदय जस निर्मल बारी।
बाँधे घाट मनोहर चारी।। (मानस, 3/38/7)
सरिता सर निर्मल जल सोहा।
संत हृदय जस गत मद मोहा।। (मानस, 4/15/4)
सन्त हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।। (मानस, 7/124/7)
श्रमणी शबरी को उपदेश के क्रम में भगवान् ने कहा-
नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना।। (मानस, 3/35/5)
भक्ति का नवम सोपान है सर्वतोभावेन समर्पण! हृदय में मात्र मेरा भरोसा हो।
मानसरोवर का रूपक बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू।
वेद पुरान उदधि घन साधू।।
बरषहिं राम सुजस बर बारी।
मधुर मनोहर मंगलकारी।। (मानस, 1/35/3-4)
सुन्दर बुद्धि भूमि है। उस बुद्धि के अन्तराल में हृदय ही गहरा स्थान है। वेद-पुराण समुद्र हैं और उसी से जल लेकर मेघमाला की तरह संत भगवान् के मधुर, मनोहर और मंगलकारी सुयशरूपी जल की वर्षा करते हैं।
सारांशतः भगवान् हृदय में, रावण की मूर्खता हृदय में, उपदेशों की धारा हृदय में, बाण से आहत हृदय, सृष्टि के सारे कृत्य हृदय से ही संचालित होते हैं।
वास्तव में हृदय यौगिक शब्दकोश का शब्द है जो वैदिक, गीतोक्त धर्मशास्त्रीय शब्द है। साधना-प्रक्रिया के अन्तर्गत महापुरुषों ने जिस हृदय में भगवान् का निवास बताया, उसे हृदयंगम करने के लिए तीन शरीरों के तीन हृदयों पर ध्यान अपेक्षित है।
शरीर तीन हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। सन्त कबीर ने भी शरीरों की ओर इंगित किया-
कबिरा कबिरा क्या करै, सोधो सकल शरीर।
आशा तृष्णा बस करै, सोइ दास कबीर।।
कबीर सिद्ध हैं, महापुरुष हैं, कबीर अच्छे महात्मा हैं।- इस प्रकार क्या कबीर-कबीर की रट लगाये पड़े हो। ‘सोधो सकल शरीर’– सकल अर्थात् सभी, शरीर कई होते हैं, उनकी शोध करो। पहला है स्थूल शरीर जो पंचभौतिक पिण्ड है, जिसे हम-आप देखते हैं, स्पर्श कर सकते हैं। इसे संचालित करनेवाला सूक्ष्म शरीर है जो मन का संसार है। मन का निरोध होते ही दृष्टिगोचर होने लगता है। कारण शरीर- आत्मा की वह प्रशक्ति जो संसार (वृत्ति) को धारण कर स्थित है, सबका कारण है चेतन प्रकृति जीवात्मा कहलाती है। अपना परिचय देकर ईश्वरीय विभूतियों से विभूषित कर यह शरीर भी शान्त हो जाता है और उसके अन्तराल में जो शेष है, वही परमात्मा है। हृदय की इस गहराई में परमात्मा का निवास है। उसके दर्शन और स्पर्श के साथ ही प्रकृति सदा के लिए विलीन हो जाती है, पुरुष अपना सहज स्वरूप प्राप्त कर लेता है। ‘कहत कबीर सुनो भाई साधो, नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा।’– वहाँ द्वैत का द्वन्द्व नहीं है। कबीर कहते हैं कि तीनों शरीरों की शोध करनी होगी; किन्तु आशा और तृष्णा के रहते यह शोध पूर्ण होती ही नहीं। इसीलिए ‘आशा तृष्णा बस करै, सोइ दास कबीर।’– आशा और तृष्णा का निरोधकर जो भी इन तीनों शरीरों की शोध कर ले, वही दास है, वही कबीर है। इतना हमने किया, इतना तुम कर लो तो तुम भी कबीर हो जाओगे। यह स्थिति सबके लिए सुलभ है, यह अभ्यासजन्य है।
इसी का चित्रण महर्षि पतंजलि ने ‘योगदर्शन‘ में किया है-
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्। (4/7)
ध्यान के पश्चात् जो प्राप्तिवाला योगी है, उसका लक्षण बताते हुए महर्षि कहते हैं कि योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं अर्थात् योगी के कर्म के न शुभ परिणाम निकलते हैं और न अशुभ संस्कार ही बनते हैं। अन्य सबके कर्म तीन प्रकार के होते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण ‘गीता’ में कहते हैं-
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।। (3/17)
अर्जुन! जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है, जिसका योग पूर्ण है, उस पुरुष को कर्म करने से न कोई लाभ है, न कर्म छोड़ देने से कोई क्षति; क्योंकि अब उसे कोई प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं तो पुकारेगा किसे और किसलिए? न ही उसके पीछे कोई विकार है तो काटेगा किसे? किन्तु महर्षि पतंजलि के अनुसार अन्य लोगों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं- कृष्ण, शुक्ल और मिश्रित; जो शुभ, अशुभ और शुभाशुभमिश्रित परिणाम देते हैं और जन्म-जन्मान्तरों तक कर्ता का पीछा करते रहते हैं-
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।। (योगदर्शन, 4/9)
जाति अर्थात् जन्म, देश अर्थात् किसी भी स्थान, कूकर-शूकर, पेड़-पौधा- कोई भी योनि और काल अर्थात् समय- इन तीनों का व्यवधान रहने पर भी कर्म संस्कार के प्रकट होने में व्यवधान नहीं पड़ता; क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों का एक ही स्वरूप है। स्मृति में वही उभरता है जो संस्कारों में संचित है। संस्कारों की गति अबाध है। ये जन्म-जन्मान्तरों में यत्र-तत्र सर्वत्र कर्ता का अनुगमन करते हैं।
कागभुशुण्डि जी को शंकरजी का आशीर्वाद था कि हजार जन्मों के पश्चात् रामभक्ति मिलेगी। अनेक जन्म मिले, अनेक देशों में गये, कालचक्र से गुजरे किन्तु कोई व्यवधान नहीं पड़ा। अन्ततः उन्हें अविरल रामभक्ति प्राप्त हुई-
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना।
सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। (मानस, 7/108/8)
किन्तु किसी की स्मृति शुद्ध हो गयी हो तो?-
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। (योगदर्शन, 1/43)
स्मृति उस समय पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाती है जब चित्त का निज स्वरूप शून्य हो जाता है। ध्येय लक्ष्यमात्र का आभास रह जाता है। यह निर्वितर्क समाधि की अवस्था है, बीज विद्यमान है। जब वितर्क अर्थात् कुछ संस्कार शेष ही नहीं है तो अब स्मृति-पटल पर उभरेगा क्या?
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः। (योगदर्शन, 1/47)
जब निर्वितर्क या निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल हो जाती है, तब योगी में ‘अध्यात्म प्रसादः’– आत्मिक विभूतियाँ भली प्रकार प्रसारित हो जाती हैं। सनातन पुरुष अजन्मा, शाश्वत जिन विभूतियों वाला है, वह सारी विभूतियाँ योगी को प्राप्त हो जाती हैं, आत्मा का आधिपत्य स्थापित हो जाता है। आत्मिक विभूतियों का सारा प्रसाद उसे प्राप्त हो जाता है। अब कोई विभूति उससे अलग नहीं है।
उस समय बुद्धि ऋतम्भरा होती है, ऋतुमती होती है। जैसे खेत बुआई के लिए पूर्णतः तैयार है। बीज डालो जम जायेगा। ऋतम्भरा अवस्था उस ज्योतिर्मय परमात्मा को धारण करने की क्षमतावाली है, बुद्धि परमात्म- स्वरूप हो जाती है। इस ऋतम्भरा प्रज्ञा के भी अत्यन्त निर्मल होने पर-
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः। (योगदर्शन, 1/51)
वह ईश्वर मिलकर अपना सारा प्रसाद दे देता है। जब तक यह लेन-देन लगा है, तब तक कारण शरीर कार्य कर रहा है। जब वह ईश्वर भली प्रकार मिल गया, सारा संस्कार भी शान्त कर देता है। यहाँ कारण शरीर भी शान्त हो गया। इस प्रकार संस्कारों के बीज का भी सर्वथा अभाव हो जाने पर इस अवस्था का नाम निर्बीज समाधि है। इसी को कैवल्य पद कहते हैं, कैवल्य ज्ञान कहते हैं। कैवल्य समाधि भी इसी का नाम है।
सारांशतः पहले स्थूल शरीर पंच महाभूतों से निर्मित यह पिण्ड है। जिसका हृदय यह दिल है जो धक-धक करता है। यह दिल जब कार्य करना बन्द करता है तो मौत होती है। यह शरीर मरता-जीता रहता है। ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’– पुरुष पुराना वस्त्र त्यागकर जिस प्रकार नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, ऐसे ही भूतादिकों का स्वामी जिस शरीररूप वस्त्र को त्यागता है, नवीन शरीररूप वस्त्र धारण कर लेता है, फिर उस नये वस्त्र में वह ज्यों-का-त्यों है। जो व्यवस्था वहाँ पर मिली थी, वह सब यहाँ पर विद्यमान हैं। उसने कुछ खोया ही नहीं। यह वस्त्र-परिवर्तन का अनन्त सिलसिला चला आ रहा है।
गीता में भगवान् ने कहा- अर्जुन! शरीर नाशवान् है इसलिए तू युद्ध कर। तो क्या पाण्डव पक्ष के शरीर अविनाशी थे? इस आदेश से यह तो स्पष्ट होता नहीं कि वह केवल कौरवों को मारे। आधे रिश्तेदार पाण्डव पक्ष में भी खड़े थे। जहाँ भी शरीर दिखायी पड़े, चलाओ बाण! क्योंकि शरीर तो है ही नाशवान्।
यह भी तो प्रश्न अपनी जगह है कि शरीर मारने से क्या मर जायेगा? इधर शरीर छूटा, उधर दूसरा शरीर तैयार! एक वस्त्र बदला, दूसरा वस्त्र तैयार! जब तक अन्तिम संस्कार का अन्त नहीं हो जाता, तब तक शरीरों का क्रम अनवरत बना रहता है। अन्तिम संस्कार का मिटना, पुनः शरीर-निर्माण के कारण का मिट जाना- एक साथ घटित होता है। यही है शरीर का अन्त अर्थात् मन का निरोध और मन का अचल स्थिर ठहर जाना और शरीरों के पुनर्निर्माण के कारणों का समाप्त हो जाना एक साथ घटित होता है।
इसके साथ ही वह प्रभु आप में दृष्टि बनकर संचारित हो जायेंगे, सामने तो स्वयं हैं ही। आप नहीं समझेंगे तब भी स्वतः समझ में आ जायेगा।
इस प्रकार शरीर एक स्थूल वस्त्र है। इसके अन्दर एक सूक्ष्म शरीर है जिससे बार-बार शरीर मिलता है- वह है मन का संसार। इन्द्रिय और मन के संयम के पश्चात् सूक्ष्म शरीर का भी संयम हो जाता है। तब कारण शरीर दृष्टिगोचर होता है। सबका कारण परमात्मा की वह प्रशक्ति जो सृष्टि का संचालन करती है। अब वह आत्मा अपना प्रसाद प्रसारित करने लगती है, विभूतियों से अवगत कराने लगती है। देना-लेना लगा है तब तक तो वह साधक है। वह अवगत करा चुकी तहाँ बुद्धि ऋत् से भर गयी, परमात्मा को धारण करने की क्षमता आ गयी। इसके भी शान्त होने पर कैवल्य ज्ञान, परमतत्त्व परमात्मा! इस गहराई में भगवान् का निवास है। इसी हृदय में भगवान् रहते हैं।
अर्थात् तीन शरीर हृदय में हैं। यह यौगिक है; योग के परिवेश में ये तीनों शरीर हैं- स्थूल शरीर मरता-जीता रहता है, इसमें भगवान् नहीं रहते। इसका यह आशय नहीं है कि वह स्थान भगवान् से रिक्त है। जिस प्रकार दूध में मक्खन या काष्ठ में अग्नि रहते हुए भी उपयोग के लिए प्रत्यक्ष नहीं है, उसी प्रकार इस स्थूल हृदय में रहते हुए भी भगवान् साक्षी मात्र हैं। यद्यपि साधना इसी के द्वारा सम्पन्न होती है- ‘तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।’ (मानस, 7/95/5)- यही शरीर है।
दूसरा है सूक्ष्म शरीर! एक भी संस्कार है, तब तक सूक्ष्म शरीर विद्यमान है- ‘जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।’ (मानस, 4/9 छन्द-2)- पवन अर्थात् श्वास-प्रश्वास की गति का संयम कर, श्वास में भले उद्वेग उठें तो वायुमंडल शुद्ध है, बुरे संकल्प उठें तो वायुमंडल गन्दा है; शुभ और अशुभ श्वास की दो ही धाराएँ चलती हैं।- इस श्वास की गति रोककर अर्थात् मन में भले-बुरे संकल्प न उठें और न बाह्य संकल्प भीतर प्रवेश कर पायें- इस प्रकार प्राणों को जीतकर मन और इन्द्रियों को निर्मल कर सतत् अभ्यास के फलस्वरूप मुनिजन भगवान् को ध्यान में पा जाते हैं- मन का निरोध करके, तन को निर्मल करके केवल एक शरीर से पार हुए।
मन और बुद्धि के निरोध के साथ ही सूक्ष्म शरीर समूल शान्त हो जाता है। चेतन आत्मा अपना परिचय देने लगती है। यह कारण शरीर भी परिचय देकर शान्त हो जाता है। वहाँ जो शेष बचता है वह है परमात्मा!
वैदिक वाङ्मय और औपनिषदिक साहित्य में ‘अङ्गुष्ठमात्र पुरुष’ का वर्णन है, जिसका आशय प्रचलित है कि अंगूठे के आकार और परिमाण अर्थात् मात्रा में भगवान् सबके हृदय में निवास करते हैं। कहा जा सकता है कि हाथी के हृदय में उसके अंगूठे के बराबर, चींटी में उसके अंगूठे के आकार का; किन्तु सर्प में? उसे तो अंगूठा होता ही नहीं! असंख्य जीवाणुओं में अंगूठे के बराबर परमात्मा क्या नहीं होते जबकि वह सर्वत्र हैं- अणु-परमाणु से भी छोटे! बड़े से बड़े! वस्तुतः इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- ये जब सिमट जायँ, योग के अंग-उपांग, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- सिमटकर वृत्ति शान्त प्रवाहित हो जाय, श्वास आयी तो ‘ॐ’, गयी तो ‘ॐ’ , बीच में अन्य संकल्पों का स्फुरण न हो। जिस समय यह संयम सधा, योग के अंग जब संगठित हुए, एक धारा में वृत्ति हुई, वहीं पर भगवान् हैं। यही अङ्गुष्ठ प्रमाण है। अङ्गुष्ठ प्रमाण का आशय है योग के अंग-प्रत्यंगों का सध जाना, गठित हो जाना।
वस्तुतः तीन शरीरों का विश्लेषण महापुरुषों की सूक्ष्म शोध है। जिन्होंने भगवान् को पाया इस गहराई में पाया। इन्द्रियों के संयम के साथ ही स्थूल शरीर सध जाता है और साधक सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, तेजस और प्राज्ञ- इन सोलह तत्वों का सूक्ष्म शरीर है जो मन का संसार है। मन के निरोध के साथ ही सूक्ष्म शरीर भली प्रकार सध जाता है। संसार (माया) मन पर अंकित है। जिस धरातल पर माया काम करती है वह है मन! जब माया के ठहरने की जगह ही नहीं बची, ‘मन मिटा माया मिटी, हंसा बेपरवाह।’– इस मन के निरोध के साथ ही सूक्ष्म शरीर भी सध जाता है, तहाँ कारण शरीर जो इन सबका कारण है साधक के समक्ष आता है।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- आठ भेदों वाली जड़ प्रकृति है, जीवात्मा मेरी चेतन प्रकृति है जो सबको धारण करके स्थित है। यही कारण है। सूक्ष्म शरीर के निरोध के साथ ही अर्थात् मन के निरोध के साथ ही वह कारण शरीर; परमात्मा की वह प्रशक्ति जो सबको धारण कर स्थित है भली प्रकार परमात्मा का बोध करा देता है। प्रकृति से सम्बन्ध छोड़ चुका है आत्मिक विभूतियों का बोध करा देता है- कैसे कण-कण में व्याप्त है, कैसे ज्योतिर्मय है, कैसे काल से अतीत है? जब तक यह कार्य चलता है, वह कारण है और अन्तिम समाधान के साथ कारण शरीर भी शान्त हो जाता है। वहाँ जो शेष बचता है, वह केवल परमात्मा है।
यह साधनगम्य है। आप साधना में प्रवृत्त हो जायँ, एक-एक सोपान स्वतः पार होते चले जायेगे। हमें करना कुछ भी नहीं है। जब तक भजन जागृत नहीं होता, तब तक हम प्रत्याशी हैं लेकिन किसी तत्त्वदर्शी सद्गुरु के सान्निध्य में गीतोक्त साधना पकड़ लेने पर, थोड़ा स्तर उठ जाने पर वह चेतन परमात्मा आपके मन, अन्तःकरण में जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगता है फिर उनके निर्देशन में चलना ही भजन है, योग-साधना है; और निर्देशन में चलते हुए उस परम का स्पर्श करते ही वह बताने वाला भी शान्त हो जाता है, केवल सहज स्वरूप रह जाता है। बुद्धि के अन्तराल में जो यह अगाधता है उसका नाम हृदय है; किन्तु यह जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष द्वारा ही संभव है। इसकी सम्पूर्ण विधि ‘गीता’ है। ‘गीता’ संस्कृत में है जो आज जनसामान्य की भाषा नहीं रही। अतः इसे विधिवत् समझने के लिए इसकी व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का अनुशीलन करें। यही मानव का आदि धर्मशास्त्र है। इसी का विस्तृत वर्णन वेद इत्यादि समस्त शास्त्र हैं। विविध भाषा-शैलियों में सृष्टि के समस्त महापुरुषों की वाणियों में भी यही है। ‘एक ईश्वर’- जो भी कहते हैं, ‘गीता’ के ही संदेशवाहक हैं।
(‘पुनर्जन्म एवं हृदय’ से उद्धृत)
।। ॐ ।।