संसार में धार्मिक कौन – ईश्वर की प्राप्ति की निर्दिष्ट क्रिया का आचरण धर्म है-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥१८/६६॥
धार्मिक उथल-पुथल को छोड़ एकमात्र मेरी शरण हो जा अर्थात् एक भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म का मूल है, उस प्रभु को पाने की नियत विधि का आचरण ही धर्माचरण है (अध्याय २, श्लोक ४०) और जो उसे करता है वह अत्यन्त पापी भी शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है (अध्याय ९, श्लोक ३०)।
भगवान श्रीकृष्ण के हजारों वर्ष पश्चात् परावर्ती जिन महापुरुषों ने एक ईश्वर को सत्य बताया, गीता के ही सन्देश वाहक हैं। ईश्वर से लौकिक, पारलौकिक सुखों की कामना, ईश्वर से डरना, अन्य किसी को ईश्वर न मानना, यहाँ तक तो सभी महापुरुषों ने बताया किन्तु ईश्वरीय साधना, ईश्वर तक की दूरी तय करना- यह केवल गीता में ही सांगोपांग क्रमबद्ध सुरक्षित है। गीता से सुख, शान्ति, समृद्धि तो मिलती है किन्तु यह अक्षय, अनामय परमपद भी देती हैं।
इसे प्राप्त करने के लिए देखें श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत टीका “यथार्थ गीता।”
More on Yatharth Geeta and Ashram Publications: http://www.yatharthgeeta.com/
Download Official Yatharth Geeta Application on Android and iOS to Stay in Touch.
© Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.