श्रीमद्भगवद्गीता – यथार्थ गीता – नवम अध्याय – राजविद्या जागृति
(गीता, अध्याय ९, श्लोक ३१)
सदाचारी, दुराचारी सभी को भजन करने का अधिकार है।
निरंतर भजन के प्रभाव से वह सभी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाते है, परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाते है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होते है।
इस भजन के प्रभाव से वह दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाता है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। कौन्तेय! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यदि एक जन्म में पार नहीं लगा तो अगले जन्मों में भी वही साधन करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त होता है। अत: सदाचारी, दुराचारी सभी को भजन करने का अधिकार है।
ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।।
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