अधम कौन है ? – कर्म क्या है ? – यज्ञ क्या है ?

प्रश्नअधम कौन है? कर्म क्या है? यज्ञ क्या है?

उत्तर :- योग-विधि यज्ञ है। उस विधि को क्रियान्वित करना कर्म है। यज्ञ के द्वारा देवताओं की उन्नति करो, देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे। परस्पर उन्नति करते हुए परमश्रेय को प्राप्त हो जाओ। इसके पश्चात् दैवी सम्पद् की आवश्यकता नहीं और तुम भी अलग नहीं हो। देवता हृदय की वस्तु है।

सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! प्राणियों के स्वभाव दो प्रकार के होते हैं, देवताओं-जैसा और असुरों-जैसा। दैवी सम्पद् परमकल्याण के लिए है और आसुरी सम्पद् अधोगति और नीच योनियों में भटकाने के लिये है। दैवी सम्पद् के लक्षण बताये, जो सब के सब तो किसी करीब पहुँचने वाले महापुरुष के लक्षण हैं, आंशिक रूप से आप में भी हैं। जो परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित करा दे उसका नाम दैवी सम्पद् है और जो देवत्व अर्जित न कराये, प्रकृति के अन्धकार की ओर प्रवृत्त करे, आसुरी सम्पद् है।

आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष अपने को ही ईश्वर और ऐश्वर्य का भोक्ता मानता है। वह समझता है कि स्त्री-पुरुष के संयोग से यह सृष्टि है, भगवान नाम की कोई वस्तु नहीं है। मेरे पास इतना धन है, इतना और होगा। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, उसे मारूँगा। वह अनन्त इच्छाओं, अनन्त वासनाओं से आक्रान्त रहता है।

आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष कहता है कि मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और यश प्राप्त करूँगा। शास्त्र-विधि से रहित, गीतोक्त नियत विधि से रहित, नाममात्र के यज्ञों से जो दम्भ से यजन करते हैं वे क्रूरकर्मी, पापाचारी और मनुष्यों में अधम हैं। वे करते हैं कर्म; किन्तु हो जाते हैं क्रूरकर्मी। वे आचरण करते हैं यज्ञ का; किन्तु पापाचारी हैं। वे ही नराधम हैं। क्या भजन करनेवाला भी अधम होता है। यज्ञ है नहीं लेकिन यज्ञ नाम दे रखा है। कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया, हो गया यज्ञ। ऐसे नराधम मुझ अंतर्यामी परमात्मा से द्वेष करने वाले हैं। मनुष्य मनुष्य से द्वेष करके कदाचित् बच भी जाय, क्या ये भी बच जायेंगे? कृष्ण कहते हैं- कदापि नहीं, ऐसे नराधमों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ। दुश्मनी हो गयी भगवान से! बचकर कहाँ जायेंगे?

अतः शास्त्र-विधि एक, योग-विधि यज्ञ, उसे चरितार्थ करना कर्म, कर्म भी एक- नियत कर्म, अन्य सभी भ्रामक हैं। इस कर्म को आचरण में ढालना धर्माचरण है। शास्त्र-विधि को छोड़कर कल्पना से कुछ गढ़ लेना और कहना कि यज्ञ है, वही नराधम है, अन्य कोई अधम नहीं है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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