अर्जुन गुरुजनों को न मारकर किस भिक्षान्न की कामना करता है?

भिक्षा

प्रश्न- महाराजजी! गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन गुरुजनों को मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न भोगना भी श्रेयतर मानता है। कृपया बतलावें वह भिक्षा कैसी है?

उत्तर- भिक्षा के दो रूप हैं। एक तो हरिभक्त भिक्षान्न ग्रहण करता है, बदले में वह भजन-चिन्तन का कुछ अंश उस दाता भक्त के लिए व्यय करता है, उसे श्रेय-सुलभ आशीर्वाद देता है। यह परिव्राजक के लिए गृहत्याग के अनन्तर विधेय है, जो भजन में अनवरत प्रवृत्त रहता है। भिक्षा के इस स्वरूप से अधिकांश विश्व परिचित है। गौतम बुद्ध इत्यादि भारतीय मनीषियों ने विविध तरीकों से श्रमणों के लिए भिक्षा पर बल दिया और दाता के लिए मंगलकामना की पुष्टि की। इससे साधक को सदैव अपनी दीनता का बोध होता रहता है, साथ ही शुभ संस्कारों के सृजन से परिव्राजकों की लौकिक व्यवस्था का दायित्व समाज अनुभव करता है। इसीलिए ईसा मसीह ने भी अपने शिष्यों को निर्देश दिया कि, ‘‘केवल एक कुर्ता पहनकर, हाथ में पात्र लेकर तुम लोग विचरण करो। जो तुम्हारी सेवा करेगा, तुम्हारे लिए भिक्षा की व्यवस्था करेगा, उसका कल्याण प्रभु करेंगे। जो तुमलोगों का सम्मान करता है, वह मेरा सम्मान करता है।’’

भिक्षा का दूसरा रूप सूक्ष्म और गहन है। गृहत्याग से हिचकिचाने वाले श्रद्धालु सनातन तत्त्व में स्थित महापुरुष, परमप्रभु परमात्मा से श्रद्धा निवेदन कर बदले में कल्याण की माँग करते हैं। यह भी भिक्षान्न ही है। अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्’ (तैत्तिरीय उपनिषद्, 3/2)- ब्रह्म ही वह अन्न है जो आत्मा की पूर्ण तृप्ति करानेवाला है। कृष्णस्वरूप में स्थित महात्माओं के सर्वांगीण पूजन से परमतत्त्व की माँग ही भिक्षा है। जिन पुरुषों में चिन्तन-क्रम में प्रवृत्त होने की क्षमता नहीं है, ममत्व के सभी तागों को बटोरकर जो इष्ट के चरण-कमलों में बाँधने में सक्षम नहीं है, ऐसे लोगों के लिए श्रद्धा, सेवा एवं भक्तिभाव से आप्लावित होकर स्वरूपस्थ प्रभु से ब्रह्मान्न की याचना करते रहना ही कल्याण का लम्बा किन्तु सफल साधन है। यह सद्गृहस्थ आश्रम में रहते हुए आराध्य उपलब्धि की भिक्षाजनित विधि है; किन्तु संघर्षरत साधकों के लिए भिक्षा की आवश्यकता नहीं है।

अर्जुन जन्म-जन्म से चलनेवाला तथा अधिकारी साधक था। पारिवारिक आसक्तिवश स्वजन-सम्बन्धियों में रहते हुए वह परमकल्याण की कामना करने लगता है, बचाव का रास्ता ढूँढ़ने लगता है। कहीं भी उपाय न देखकर भिक्षान्न स्वीकार करने को उद्यत हो जाता है, किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण-जैसे सद्गुरु की पीयूषवर्षिणी प्रवचन-धारा से अर्जुन की कायरता समाप्त हो गई और वह उस परम पावन पथ में प्रवृत्त हो गया। प्रारम्भ में अर्जुन साधन-पथ पर बिना चले ही, स्वजन-सम्बन्धियों में रहते हुए परमकल्याण की आशा करता है और ऐसा सम्भव न देखकर कृष्णस्वरूप महापुरुष की दया, कृपा से जितना कुछ भिक्षान्न मिल जाय उतने से ही सन्तोष कर लेना चाहता है किन्तु सद्गुरु श्रीकृष्ण उसे उत्साहित कर प्रकृति-पुरुष के युद्ध में लगा देते हैं, साधना की कसौटी पर कसकर, तराश कर परमकल्याण का अधिकारी बना देते हैं।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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