चीर-हरण

चीरहरण

श्रीकृष्ण की चीर-हरण लीला और रासलीला को अश्लील तथा मर्यादाविरुद्ध घोषित करने के प्रयास होते ही रहते हैं। यह भी वास्तविकता से मुख मोड़ने जैसा ही है। ग्रामीण परिवेष में पाँच-सात साल तक के बच्चे नंगे रहते ही हैं। माताओं के मध्य उनका या माताओं की क्रीड़ाओं को अस्वाभाविक कहना न्यायोचित नहीं है और न यह अश्लीलता की परिधि में ही आता है। वस्तुतः इन प्रसंगों के आध्यात्मिक निहितार्थ हैं। योगरूपी यमुना में प्रवेश करने पर चित्तरूपी चीर का भगवान हरण कर लेते हैं। भगवत्कृपा से, श्रद्धा-समर्पण से पूरित होने पर चीर साधक की रहनी-गहनी में परिलक्षित होती है।

चीर लेकर वृक्ष पर चढ़ना अचेत आत्माओं को जगाना था। उनकी श्रद्धा को विकसित करना था। अपनी भक्ति का संदेश देना मात्र था। मोहनिसाँ सबु सोवनिहारा।(मानस, 2/92/2), या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।(गीता, 2/69)- जगत्-रूपी रात्रि में जीव अचेत पड़े हैं। उन्हें जगत्-रूपी रात्रि से जगाना, भजन-चिन्तन में प्रवृत्त करना भगवान की अहैतुकी करुणा मात्र है। गोपियों ने वृक्षारूढ़ कन्हैया से वस्त्र माँगे। भगवान ने कहा- आओ, पहचान कर अपने वस्त्र ले लो। गोपियों की समस्या थी कि निर्वस्त्र कैसे बाहर निकलें। श्रीकृष्ण ने पूछा- आपलोग गयी कैसे थीं? उन्होंने कहा- तब वहाँ कोई नहीं था। श्रीकृष्ण ने कहा- था कैसे नहीं? अपने हृदय में देखो कौन है? वहाँ कृष्ण दिखाई पड़े। कहा- जल में देखो कौन है? वहाँ भी कृष्ण दिखाई पड़े। जल में, थल में, ऊपर-नीचे चतुर्दिक कृष्ण ही विराजमान थे। अब कृष्ण को हाथ जोड़कर बाहर आने में उन्हें क्यों आपत्ति होती? इस लीला से भगवान ने अपने स्वरूप का परिचय दिया। गोपियों की निष्ठा दृढ़ हो गयी। उस दिन से गोपियाँ भक्तिमार्ग की पराकाष्ठा पर प्रतिष्ठित हो गयीं, फिर कभी पदच्युत नहीं हुईं।

गोकुल में रहकर श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाएँ कीं। उन सबका एक ही प्रयोजन था – अनन्यता के साथ एक परमात्मा में निष्ठा व समर्पण। गोवर्धन उठाना, कालिया का मानमर्दन, केशी इत्यादि निशाचरों का अन्त, कंस के निमित्त यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों का यज्ञ बन्द कराना, उन्हें अपनी भक्ति में लगा लेना भक्ति का प्रशिक्षण मात्र था। कई अवसरों पर भक्ति की परीक्षाओं में रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि की साधनाएँ पीछे रह गयीं, गोपियाँ आगे निकल गयीं। चीर-हरण लीला द्वारा उन्होंने जगत्-रूपी रात्रि में अचेत पड़े जीवों को अपने स्वरूप का बोध कराया कि भगवान से हम-आप क्या छिप सकते हैं? वह सर्वत्र आँखवाला है, सर्वत्र हाथ-पैरवाला है। इतना ही नहीं, वह बिना हाथ-पैर के सर्वत्र सभी कुछ करता है, देखता है, सुनता है, सक्षम है। बाल्यकाल में भगवान ने जिन्हें प्रशिक्षण दिया, वे शिष्य सर्वोपरि निकले। उनमें से कभी कोई पतित नहीं हुआ।

(राम और कृष्ण – मर्यादा के दृष्टिकोण’ से उद्धृत) * * *

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