धर्म में उपासना स्थलों (मन्दिर, मस्जिद, चर्च आदि) का क्या महत्त्व है?

प्रश्नधर्म में उपासना स्थलों (मन्दिर, मस्जिद, चर्च आदि) का क्या महत्त्व है?

उत्तर :- ये प्रार्थना-स्थलियाँ हैं। प्रत्येक ग्राम-नगर, घर-घर जाकर कोई महापुरुष सत्य का प्रचार नहीं कर सकता। पूर्वकाल में महापुरुषों ने शिवलिंग की स्थापना कर दी। लिंग का अर्थ है चिह्न। वह ईश्वर एक है। वह ज्योतिर्मय है। उसी एक की शरण जाओ। शिवलिंग का अभिप्राय इतना ही है। जो भी महापुरुष ज्योतिर्मय परमात्मा की उपलब्धिवाले थे, उनका शरीर छूटा तो भक्तों ने उनकी स्मृति में एक शिवलिंग स्थापित कर दिया और उन महापुरुष का नाम भी उससे जोड़ दिया। ज्योतिर्लिंगों ने क्रमशः मन्दिरों का रूप ले लिया। जो महापुरुष चले गये, मन्दिर उनके पीछे श्रद्धालु भक्तों द्वारा सँजोयी हुई स्मृति है।

मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा में- गुरु महाराज ने क्या पाया? क्या राह दिखायी? इसका उपदेश चलता है। कदाचित् उपदेश नहीं चलता और केवल मन्दिर है, तो वह अभी अधूरा है। दीवालें तो कुछ कहती नहीं। उन महापुरुष के सन्देश भी जन-जन तक पहुँचना चाहिए।

मन्दिरों में अनन्तकाल से ईश्वर की उपलब्धिवाले कैवल्यपदप्राप्त तत्त्वदर्शी महापुरुषों की प्रतिमायें हैं, उनसे सभी आशीर्वाद लेते हैं, वे हमारे प्रेरणा-स्रोत हैं। यदि इन स्मारकों में यह नहीं बताया जाता कि किस महापुरुष की प्रतिमा है, उन्होंने क्या संदेश दिया तो उस मन्दिर का दुरुपयोग है। यदि वहाँ गीतोक्त एक परमात्मा का सन्देश दिया जाता है, परमात्मा को प्राप्त करने की गीतोक्त विधि बतायी जाती है तो मन्दिर का सदुपयोग है। यदि वहाँ अनेक क्रियाओं की धूर्तता बतायी जाती है तो समझें कि लोगों ने गढ़ लिया है, मूढ़बुद्धि अविवेकियों की देन है।

मन्दिर खुली पुस्तकें हैं, श्रद्धा के केन्द्र हैं। यदि उन मन्दिरों में गीतोक्त एक परमात्मा ही सत् है और उसे प्राप्त करने की विधि पर प्रकाश नहीं डाला जाता तो वह उस विद्यालय के समान है जहाँ अध्यापक नहीं हैं, केवल घण्टे बज रहे हैं। इसलिए गीता का प्रसारण प्रत्येक मन्दिर से होना ही चाहिए।

महापुरुषों ने जहाँ जन्म लिया, तपस्या की, जहाँ उपदेश किया, जहाँ जप किया, जहाँ महाप्रयाण को प्राप्त हुए, उन सभी स्थलियों पर श्रद्धालुओं ने स्मारक बनाये। यही मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों का इतिवृत्त है, इसके अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं है। धर्म के नाम पर जितने भी सम्प्रदाय, उप-सम्प्रदाय बने हैं- सब के सब महापुरुषों के पीछे श्रद्धालुओं का सिमटा हुआ संगठन है; किन्तु उस महापुरुष ने क्या पाया? क्या साधना दी? – यदि इस पर प्रकाश नहीं डाला गया तो उनसे प्रेरणा कैसे मिलेगी? आरम्भिक प्रेरणा इन स्थलियों से ही मिलती है किन्तु सम्पूर्ण साधना को प्राप्त करने के लिए किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण ही जाना पड़ेगा। उन्हीं के द्वारा भक्ति की जागृति होती है। भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।। (मानस, ३/१५/२)- लक्ष्मण! भक्ति अनुपम सुख की मूल है; किन्तु यह मिलेगी तब जब सन्त अनुकूल हों, सीधा तो मैं भी नहीं दे सकता। यह शून्य में नहीं फलित होती। किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा हृदय में यह साधना जागृत हो जाती है, तो भगवान बोलने लगते हैं, बातें करने लगते हैं, उठाने-बैठाने-चलाने लगते हैं।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत)  * * *

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