राम और कृष्ण – मर्यादा के दृष्टिकोण
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे।
जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। (मानस, 2/126/7)
यतिचक्र चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा विरचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार आदिकवि बाल्मिकी का उद्घोष है- राम! आपका चरित्र देख-सुनकर प्रबुद्धजन हर्षित हो जाते हैं किन्तु उसी चरित्र को देख-सुनकर जड़ व्यक्ति मोह को प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, भगवान का रहस्यमय चरित्र मुनिजनों को भी भ्रम में डाल देता है-
निर्गुन रूप सुलभ अति, सगुन जान नहिं कोइ।
सुगम अगम नाना चरित, सुनि मुनि मन भ्रम होइ।। (मानस, 7/73 ख)
अस्तु सामान्यजन भगवत्चरित्र पर टीका-टिप्पणी करें तो आश्चर्य ही क्या? मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तथा लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण भारतीय अध्यात्म तथा संस्कृति के युगपुरुष हैं जिनका ज्योतिर्मय व्यक्तित्व एवं कृतित्व अनन्तकालपर्यन्त जनजीवन को आलोकित करता रहेगा; किन्तु सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों से उत्पीड़ित जन दुर्व्यवस्था को इन महापुरुषों के नाम से प्रवर्तित किया जाता देख अज्ञान एवं आक्रोशवश इन चरित्रनायकों के व्यक्तित्व का ही छिद्रान्वेषण करने लग जाते हैं। भगवान का लोकरंजक स्वरूप उन्हें आकर्षित नहीं कर पाता। उनका आक्षेप है कि वृक्ष-पार्श्व में छिपकर बालि का वध करनेवाले, अनुज लक्ष्मण से शूर्पणखा को विरूपित करानेवाले, अग्नि-परीक्षिता सीता का परित्याग करनेवाले तथा तपस्यारत शूद्र शम्बूक के हत्यारे राम को वे अपना आराध्य नहीं मान सकते। इसी प्रकार पूतना नामक नारी के हत्यारे, बृजांगनाओं का चीरहरण कर उन्हें नग्नता के लिए विवश करनेवाले, रुक्मिणी इत्यादि पत्नियों के होते हुए भी राधा के साथ रमण करनेवाले कृष्ण उनके आदर्श नहीं हो सकते।
आश्रमीय प्रकाशनों, विशेषतः ‘अनछुए प्रश्न’ नामक पुस्तिका में भगवान श्रीराम का इतिहास, सीता-परित्याग, शम्बूक तथा ‘द्रविड़ और आर्य’ प्रकरण में बालि और शूर्पणखा-प्रसंगों की चर्चा है। उन सबकी समग्र पुनरावृत्ति न कर उक्त आक्षेपों पर समासतः विचार अपेक्षित है।
भगवान श्रीराम का चरित्र लाखों वर्षों से जनमानस को अनुप्राणित करता रहा है। आदिकवि से लेकर अद्यावधि रामकथा पर लेखन चलता रहा है- ‘नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।’ (मानस, 1/32/6)- सौ करोड़ और इससे भी अधिक, अपार रामायण। टेलीविजन पर रामायण सीरियल प्रसारित करनेवालों ने कम्ब रामायण इत्यादि सात-आठ रामायणों से उद्धरण लिया। रामायण मूलतः भगवान शिव के हृदय की उपज है- ‘रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाखा।।’ (मानस, 1/34/11) सीताहरण के पश्चात् भगवान राम का दर्शन कर शंकरजी ने मस्तक टेककर उन्हें प्रणाम किया। कुसमय जानकर उनके समीप नहीं गये। उनके इस व्यवहार से उनकी अर्धांगिनी सती चिन्ता में पड़ गई कि यत्र-तत्र अपनी नारी की खोज में भटकनेवाला भगवान कैसे हो सकता है? जबकि उन्हीं राम की कथा वे महर्षि अगस्त्य से सुनकर आ रहे हैं। भगवान शिव ने ही महर्षि को रामकथा सुनाई थी। अपने शिष्यों की जानकारी कैसी है? इसकी जानकारी लेते हुए भगवान भोलेनाथ आगे बढ़ रहे थे। सती को संदेह हुआ जिसके निवारण का उपक्रम रामकथा के ही माध्यम से भगवान शिव को करना पड़ा।
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बालि–वध
कुछ ऐसी ही शंका उनलोगों को भी है जो कहते हैं कि वृक्ष की ओट में छिपकर बालि का वध करनेवाले राम भगवान नहीं हो सकते, आराध्य नहीं हो सकते। उनका चिन्तन है कि किष्किन्धा-नरेश बालि ने राम के प्रति कोई अपराध नहीं किया था। राम द्वारा उसका वध उन्हें अन्याय प्रतीत होता है किन्तु उनका यह चिन्तन तथ्यों से परे है; क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि ईश्वर की भक्ति से हीन व्यक्ति मानव होते हुए भी पशुतुल्य होता है।
रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्बान।
ग्यानवन्त अपि सो नर, पसु बिनु पूँछ बिषान।। (मानस, 7/78 क)
राम – एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है वह बिना सींग, पूँछ का पशु है। उसमें और पशु में कोई अन्तर नहीं है। मानव भी पशुतुल्य होता है। ‘बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पाँवर पसु अति कामी।।’ (मानस, 4/20/3) – सुग्रीव ने कहा- मैं पामर हूँ, पशु हूँ, कामी हूँ। ‘बिषय मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।’ (मानस, 4/18/3)- विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया।
इसी प्रकार बालि भी था। रावण को बगल में दबाकर घूमनेवाला बालि अन्त में इतना मदान्ध हो गया कि कोई हमारा क्या कर लेगा? वह सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगा। जब भगवान ने उसे बाण मारा, उसने भी आरोप लगाया कि आपने मुझे छिपकर क्यों मारा? मेरी दृष्टिपथ में पड़ जाते तो दो ही घड़ी में मैं आपको यमलोक पहुँचा देता। आपने किस मर्यादा का पालन किया?
भगवान ने बताया- ‘अनुज बधू भगिनी सुत चारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।’– छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। ‘इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।’ (मानस, 4/8/7) उनका वध करने में कोई पाप नहीं होता, ऐसे दुष्टों का अन्त करना ही पुण्य है। तुमने मदान्ध होकर मर्यादा का उल्लंघन किया, तुम पापी हो। दूसरे तुम पशु हो, मानवता का त्यागकर पशुवत् जीवन जी रहे हो। पशुओं को छिपकर ही मारा जाता है। तुम्हारी पशुता का बोध कराने के लिए मुझे ओट लेना पड़ा।
अन्ततः बालि ने समर्पण किया, बोला- ‘प्रभु अजहूँ मैं पापी, अन्तकाल गति तोरि।’ (मानस, 4/9)- आपकी शरण पाकर मैं अब भी पापी ही हूँ? क्षमा माँग लिया। भगवान ने करुणार्द्र हो कहा- ‘अचल करौं तनु राखहु प्राना।’ (मानस, 4/9/2)
प्रभु राम में यह क्षमता थी कि स्पर्शमात्र से शरीर अक्षत कर देते थे। प्रथम मल्लयुद्ध में बालि के प्रहारों से आहत सुग्रीव का स्पर्श कर उन्होंने उसके शरीर में भी शक्ति-सम्पात किया था- ‘कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।’ (मानस, 4/7/6) श्रीराम ने ऐसा ही प्रस्ताव बालि के समक्ष भी रखा किन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। उसने कहा- भगवन्! मुझे देहाभिमानी समझकर ही आप ऐसा कह रहे हैं। एक दिन यह शरीर तो अवश्य छूटेगा। क्या उस दिन भी ऐसा सुयोग मिलेगा कि आप दृष्टिगोचर होंगे और आपका वरदहस्त मेरे सिर पर होगा? ईश्वर के परमधाम की प्राप्ति मानव की सर्वोपरि अभिलाषा होती है। मेरी वह अभिलाषा पूर्ण होने जा रही है। पूर्णकाम! आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीर की रक्षा कौन चाहेगा?
श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड, अट्ठाइसवें दोहे के पश्चात् छठीं-सातवीं चौपाई में है-
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली।
फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली।।
सोइ करतूति बिभीषन केरी।
सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।।
अर्थात् जिस पाप के लिए ब्याध की तरह बालि को मार डाला, वही पाप सुग्रीव ने किया और वही करनी विभीषन की थी; किन्तु ‘सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।’– स्वप्न में भी हृदय में उस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उन सबने प्रभु से क्षमा माँग लिया। प्रभु की मान्यता है- ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।’ (मानस, 5/43/2) जीव ज्योंही मेरी ओर उन्मुख होता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। सृष्टि का ऐसा कोई पाप नहीं है जो प्रभु की ओर, एक राम की ओर उन्मुख होने पर समाप्त न हो जाय। यह थोड़ी देर का किया हुआ क्षणिक पाप, वर्ष-दो वर्ष का पाप किस गणना में है? सुग्रीव ने भूल की, बालि ने वही किया, वही विभीषण ने किया – तीनों का अपराध एक जैसा, तीनों ने क्षमा माँगी। भगवान ने तीनों को क्षमा कर दिया। पापी को दण्ड ही दिया जाता है, दिया जाना भी चाहिए किन्तु सज्जन को दण्ड देना न्याय के विरुद्ध है। पाप शरीर नहीं, वृत्तियों में प्रवाहित स्वभाव होता है। पापों के लिए जिन-जिन ने क्षमा माँग ली, जिनसे भविष्य में पाप की सम्भावना नहीं है, ऐसे पुरुषों को दण्ड देना सत्पुरुष को दण्ड देना है। इसलिए जिन-जिन ने क्षमा माँग ली, भगवान राम ने उन सबको क्षमा कर दिया और उन्हें वही स्थान दिया जो एक सज्जन को दिया जाना चाहिए। ‘रहति न प्रभु चित चूक किये की। करत सुरति सय बार हिए की।।’ (मानस, 1/28/5) किन्तु बालि संसार की नश्वरता को समझ चुका था इसलिए उसने मोक्ष का ही वरण किया। यह थी श्रीराम की न्यायप्रियता।
श्रीराम ने बुजदिल और कायर सुग्रीव को रावण से युद्ध करने योग्य बना दिया। सीता की खोज में भगवान राम ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में पहुँचे तो अनेक पहरेदारों के मध्य रहनेवाले सुग्रीव की ही दृष्टि श्रीराम पर सबसे पहले पड़ी। वह सबसे अधिक सतर्क था क्योंकि उसे मृत्यु का भय था, कहीं बालि आ न जाय अथवा किसी को भेज न दे। उसने कहा- हनुमान! शीघ्र जाओ। दो शूरवीर धनुर्धर इधर आ रहे हैं। संकेत कर देना, मैं भाग जाऊँगा। विचारणीय है कि सुग्रीव पूर्वनरेश है, सेना भी रही होगी। जामवन्त-जैसे महान् बुद्धिमान मंत्री, हनुमान-जैसे पराक्रमी सेनानायक के होते हुए भी पराक्रम इतना कि ‘संकेत कर देना, मैं भाग जाऊँगा।’ ऐसे पलायनवादी, भीरु मनोवृत्ति के व्यक्ति को भगवान ने वीरता का विधिवत प्रशिक्षण दिया। बालि से एक बार घायल होने पर वह पुनः लड़ा। उसके हृदय में प्रसुप्त पराक्रम जागृत हो गया और जब वह लंका पहुँचा तो त्रैलोक्य विजयी रावण को भी उसने ललकार दिया। सुग्रीव से युद्ध में पार पाता न देख रावण छल, बल और माया का प्रयोग करने लगा। विकल होकर सुग्रीव राम के पास चला आया। राम ने कहा- सखे! आपने इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी कि व्यूह से अकेले निकल पड़े और रावण तक पहुँच गये? सुग्रीव ने कहा- प्रभो! माता सीता का अपहरण करनेवाले उस दुष्ट को देखते ही मैं अपने को रोक नहीं पाया। भगवान ने उसे शान्त करते हुए समझाया- वह मायावी है, अतः केवल बल का ही नहीं अपितु बुद्धि-कौशल का भी प्रयोग करना होगा। आपको व्यूहबद्ध होकर चलना चाहिए। इस प्रकार राम का लक्ष्य सुग्रीव को शौर्यसम्पन्न बनाना था, बालि को उसकी पशुता का बोध कराना था, विभीषण के माध्यम से शरणागत की रक्षा का बोध कराना था। किसी को मारना राम का अभीष्ट नहीं था।