ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य

मन से विषयों का चिन्तन न करते हुए एक परमात्मा का निरन्तर चिन्तन ही ब्रह्मचर्य का आचरण है।स्वामी अड़गड़ानन्द

ब्रह्मचर्य के नाम पर संसार में बहुत बड़ी भ्रान्ति है। जननेन्द्रिय-संयम को ही समाज ब्रह्मचर्य के नाम से जानता है; किन्तु यह सत्य नहीं है। यदि कोई हाथ से वासना-उत्तेजक वस्तु का स्पर्श करता है, कान से वासना-उद्दीपक शब्दों का श्रवण करता है, मुख से ऐसा बोलता है, आँख से ऐसा ही दृश्य देखता है, मन से वासनाओं का चिन्तन करता है, तो वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं कर सकता। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार- जो हठपूर्वक इन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है वह दम्भाचारी है, पाखण्डी है।

पूज्य महाराजजी बताया करते थे कि उनकी पिछले जन्म में निवृत्ति हो चली थी; किन्तु स्त्री और गाँजा पीने की दो इच्छाएँ मन में बनी रह गयीं। शरीर को उन्होंने दृढ़तापूर्वक रोक रखा था किन्तु मन में इनका चिन्तन बना था, जिससे उनकी निवृत्ति नहीं हुई, जन्म लेना पड़ा और जन्म लेते ही भगवान ने थोड़े समय में ही दिखा-सुनाकर दो चटकन लगाकर समझा दिया कि, ‘यह महान् पाप है, भजन कर! इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं, इनकी सेवा कर!’ इस प्रकार दो-तीन आकाशवाणियाँ हुईं। जहाँ गुरु महाराज का दर्शन हुआ, श्रद्धा स्थिर हुई, तो तीसरे दिन से ही अनुभव आरम्भ हो गया। इष्टदेव हृदय से रथी हो गये, निवृत्ति हो गई।

हमने पूछा था कि महाराजजी! क्या गाँजा पीने से भजन में सहायता मिलती है? तो वे खूब हँसे, बोले- नहीं रे! गाँजा पीकर धरे ध्यान, गृहस्थ होकर छाँटे ज्ञान। साधू होकर कूटे भग, कहैं कबीर ये तीनों ठग।।गाँजा पीकर ही ध्यान होता, तब तो लोग क्लोरोफार्म सूँघकर, नशीली वस्तु खाकर कर लेते। इससे भजन का कोई सम्बन्ध नहीं है। भजन तो एकमात्र परमात्मा की स्मृति का नाम है। सबकुछ भूलकर एक परमात्मा का चिन्तन ही भजन है। हर पल उसकी स्मृति अन्तःकरण पर बनी रहे अन्यथा उधर से हटकर मन माया में ही तो जायेगा। अस्तु, मन से विषयों का चिन्तन करते हुए जननेन्द्रिय मात्र को रोकना असम्भव है। कदाचित् ऐसा हो भी, तब भी व्यर्थ है, दम्भाचरण है। जन्म लेना पड़ेगा और भोगकर निकलना पड़ेगा, जैसा कि महापुरुषों के जीवन-चरित्र से स्पष्ट है।

ब्रह्मचर्य का आशय है, ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी’- जो ब्रह्म का आचरण करता है, शाश्वत-सनातन ब्रह्म के लिए जो प्रयत्नशील है, वह ब्रह्मचारी है। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति(गीता, ८/११)- उस शाश्वत परम ब्रह्म को जानने के लिए जितने साधन हैं, उन साधनों को अपने में ढालने का प्रयत्न व्यक्ति जिस दिन से शुरू करता है, उस दिन से वह ब्रह्मचारी है। जीवनभर घर पर रहकर दस पुत्र पैदा करने के पश्चात् पचहत्तर वर्ष की आयुवाला व्यक्ति भी जिस दिन से मायिक सम्बन्ध छोड़कर ईश्वर की ओर प्रवृत्त होता है, महापुरुष उसे ब्रह्मचारी कहकर सम्बोधित करते हैं। साधन आरम्भ करने से पूर्व तो सभी अबोध हैं, प्रकृति में बहके हैं, भूले हैं; किन्तु जिस दिन से वह मन-क्रम-वचन से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अर्थ, धर्म इत्यादि सारी चिन्ताएँ छोड़कर, केवल एक इच्छा लेकर, इच्छा राखे मोक्ष की, ताहि शिष्य पहचान’- इस एकमात्र दर्शन की इच्छा को लेकर, उस दर्शन के लिए जो साधन-प्रक्रियाएँ हैं उन सबको धारण करता है, उस दिन से वह ब्रह्म की ओर बढ़नेवाला है, ब्रह्मचारी है।

आरम्भिक स्तर पर संग-दोष पाते ही मन भटक जाता है, इन्द्रियाँ घसीटकर साधन-पथ से च्युत कर देती हैं, प्रकृति सबल पड़ती है, उत्थान-पतन लगा रहता है; फिर भी निरन्तर लक्ष्य की ओर प्रयत्नशील साधक ब्रह्मचारी ही है। यद्यपि अभी हुआ नहीं; किन्तु होने में सन्देह भी नहीं है। ब्रह्मचर्य व्रत में चलनेवाला यही साधक जब सभी इन्द्रियों को संयमित कर मन को भली प्रकार इष्ट में प्रवाहित करनेवाला हो जाता है, उस दिन से ‘स्वामी’ की उपाधि मिलती है। अब वह इन्द्रियों का गुलाम नहीं बल्कि उनका मालिक है। अब इन्द्रियाँ उसे खींचकर विचलित नहीं कर सकतीं; बल्कि वह जहाँ चाहता है इन्द्रियों को खींचकर रखने में समर्थ है, इसीलिए ‘स्वामी’ कहा जाता है।

क्रमशः अभ्यास करते-करते साधना और सूक्ष्म होने पर साधक समस्त संकल्पों का अन्त करने में सक्षम हो जाता है और सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते (गीता, ६/४)- समस्त संकल्पों का जहाँ अभाव है वहीं योगारूढ़ता है, वहीं संन्यास है। उस अवस्था में वह जिस प्रभु को ढूँढ़ता था उसका दिग्दर्शन, स्पर्श और प्रवेश पा लेता है। जब ब्रह्म अलग नहीं, तो आचरण किसका करे और किसलिए करे? यहीं व्रत पूरा हो जाता है।

साधना के नाम पर भी समाज में भ्रान्तियाँ हैं। कोई कुछ भी करता है, तो कहता है- साधना है। वस्तुतः योग-साधना के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों और स्वयं ‘योग’ शब्द को लेकर समाज में रूढ़ियाँ प्रचलित हैं, जबकि योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, प्रकृति के संयोग और वियोग से रहित जो अत्यन्त शान्त और सम है, उस परमतत्त्व के मिलन का नाम योग है। जब उसे साधने के लिए हम-आप चलते हैं तो उसके उपर्युक्त आठ साधन हैं।

यम के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं। अहिंसा के नाम पर लोग किसी की हत्या से बचते हैं, चींटी तक नहीं मारते; किन्तु इससे यौगिक अहिंसा का दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। यदि हम-आप योग के सभी अंगों का पालन करने में प्रवृत्त नहीं हुए, तो चींटी बचाने मात्र से क्या लाभ? जिसने जन्म लिया है उसे मरना तो है ही, आपके बचाने से भी तो उसकी रक्षा नहीं होगी। ये तो वस्त्र हैं, जिन्हें एक दिन परिवर्तित होना है। हाथवालों के बिना हाथवाले भोजन हैं, पैरवालों के बिना पैरवाले भोजन हैं, सबलों के दुर्बल भोजन हैं। चराचर जगत् एक दूसरे का भोजन है। जब सभी भोजन ही हैं, तो रक्षा किसकी करते हैं? जिसका भोजन बन्द होगा, वह भूख से प्राण त्याग देगा। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश आपके हाथ में है भी नहीं, तो फिर आप चींटी को बचाने का दम्भ क्यों करते हैं? अपनी आत्मा को अधोगति में जाने से बचाने का प्रयास ही वास्तविक अहिंसा है।

सत्य क्या है? योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, यह आत्मा ही सत्य है, शाश्वत है, सनातन है। इस आत्मा पर दृष्टि रखना ही सत्य है। अस्तेय का अर्थ है- छिपाव का अभाव। जो हृदय में हो, वही वाणी में भी हो। जब साधक को किसी से कुछ लेना नहीं है, सृष्टि में किसी प्रकार का प्रयोजन नहीं है, तो वह छिपाता किसलिए है? क्या छिपाता है? क्या ढूँढ़ रहा है?

इसी प्रकार केवल जननेन्द्रिय-संयम ही ब्रह्मचर्य नहीं है। रूप, रस, गन्ध, शब्द सभी तो स्पर्श हैं। सभी विषय इन्द्रियों के स्पर्शमात्र हैं- मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय(गीता, २/१४)। चिन्तन में जननेन्द्रियाँ समान रूप से बाधक हैं। इन सबका संचालक एक मन है। एक इष्ट का चिन्तन करते-करते यही इन्द्रियाँ जिस दिन से बाह्य जगत् में अपनी खुराक ढूँढ़ना बन्द कर देती हैं, हृदय-देश में ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का आशय इष्ट को बना लेती हैं, उस दिन से वह साधक भली प्रकार यम की योग्यतावाला हो जाता है। यदि कोई भी इन्द्रिय बाह्य स्पर्श-रस लेने लगी तब वह भगवान की ओर बढ़ा ही कब था!

अतः केवल जननेन्द्रिय-संयम ही साधक का मुख्य लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य वह परमात्मा है, जिसे पाने के लिए सभी इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को रोकना है। उस एक परमात्मा के निरन्तर स्मरण से जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम हो जाता है। सकलेन्द्रिय-संयम के पश्चात् ही जननेन्द्रिय-संयम भली प्रकार होता है, सम्भव है। यह बात अलग है कि स्पर्श नामवाली इन्द्रिय अधिक भयंकर है। यह वह मापदण्ड है जिससे पता चलता है कि कौन पतित हो गया और कौन बचा है? श्रृंगी की भृंगी करि डारी, पराशर के उदर बिदार। इन्द्रियाँ बाह्य स्पर्शों की ओर जाती हैं तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि पहले मन ने अनुमति दी, उस इन्द्रिय के साथ बढ़ा और ब्रह्म आचरण से अर्थात् ब्रह्मचर्य से च्युत हो गया। अतः एक परमात्मा का निरन्तर चिन्तन ही ब्रह्मचर्य की कुंजी है।

पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि, मोहि परमप्रिय सोइ।। (रामचरितमानस, ७/८७ क)

भगवान राम कहते हैं कि पुरुष हो, नपुंसक हो (भला नपुंसक किस ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेगा?), नारी हो अथवा चराचर जगत् में कोई भी क्यों न हो, यदि सर्वतोभावेन, सम्पूर्ण हृदय से जो मेरा चिन्तन करता है, वह मुझे परमप्रिय है। अतः मन-क्रम-वचन से जो इष्ट (परात्पर ब्रह्म) की ओर झुकाव ले लेता है, उसी दिन से ब्रह्म की प्राप्ति का आचरण करनेवाला है, इसलिए ब्रह्मचारी है। प्रकृति से सम्बन्ध तोड़कर जो अपने को उस परमात्मा से जोड़ लेता है वह उसी दिन से ब्रह्मचारी है (ब्रह्म की ओर चलनेवाला है) और इसी दृष्टि से नपुंसक भी ब्रह्मचारी हो सकता है।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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