महाराजजी की विद्या

महाराजजी की विद्या

अनुसुइया में मेरे आने के दो दिन पश्चात् ही ब्रह्मचारीजी के साथ चित्रकूट जाने का अवसर प्राप्त हुआ। महाराजजी ने उनसे कहा, ‘‘इसे भी लेता जा, मार्ग में साधनात्मक उतार-चढ़ाव की सूक्ष्मता समझाना।’’ उन्होंने बताया कि हर समय भजन में लगे रहना चाहिए। एक भी श्वास चिन्तनविहीन व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। हमने निवेदन किया, ‘‘अभी चलते हुए आप मुझसे जो वार्तालाप कर रहे हैं, क्या इस दशा में भी भजन सम्भव है?’’ उन्होंने बताया, ‘‘दस-बीस मिनट का अन्तराल कोई महत्त्व नहीं रखता है।’’- यह समाधान मुझे युक्तिसंगत न लगा। मन में एक बात बैठ गयी कि एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। नियम तो नियम! इसमें शिथिलता कैसी?

आश्रम पहुँचने पर गुरुदेव ने समझाया कि साधक को अपनी टेक का पक्का होना चाहिए, हठी होना चाहिए। हठ ही हनुमान है। कैसी ही परिस्थिति क्यों न आ जाय, उसकी दृष्टि सीधे लक्ष्य पर ही होनी चाहिए। उपलब्धि अन्तरायों (मन के अन्दर के विकारों) से संघर्ष के अन्त का प्रतिफलन है।

साधक को अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मन में भी विषयों का चिन्तन नहीं आना चाहिए। वह सतत अभ्यास से सुदृढ़ होता है। संग तें जती कुमंत्र ते राजा। (मानस, 3/20/10)- बेटा, संगदोष से बड़े-बड़े यती भी नष्ट हो जाते हैं। साधक को सदैव जागरुक रहना चाहिए। संगत अपने से अच्छों की करनी चाहिए। सूर्पणखा के नाक-कान काटे बिना कोई यती नहीं हो सकता। साधक के लिए संसार की प्रत्येक स्त्री माता ही है। फिर भी स्त्रियों की ओर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तो हमें पुत्र नहीं मानती। उसकी दृष्टि सांसारिक होना स्वाभाविक है। उसके चिन्तन का भी प्रभाव पड़ता है। बहुत आवश्यकता पड़ने पर ही लक्ष्मण की तरह केवल उनके चरणों में देख, उन्हें माँ समझ मन में प्रणाम कर ले। चिन्तन के अतिरिक्त अन्य कोई संकल्प स्फुरित भी नहीं होना चाहिए।

नाम महाराजजी ने कहा, ‘ओम्’, ‘राम’ या ‘शिव’ दो-ढाई अक्षर का कोई एक नाम पकड़ लो। अध्ययन करते-करते हमने पाया कि स्वयं महाराजजी ओम् का जप करते हैं। अतएव हमने भी उसी नाम का चयन किया। नाम-जप की विधि पर प्रकाश डालते हुए महाराजजी ने कहा कि एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है- बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। नाम-जप की प्रारम्भिक अवस्था बैखरी है। बैखरी वह है जो व्यक्त हो जाय। इसमें नाम का स्पष्ट उच्चारण करना होता है, जिसे समीप बैठने वाला भी साफ सुन सकता है। मध्यमा में यही नाम मध्यम स्वर में जपा जाता है। जिह्वा मुँह के भीतर स्पन्दित होती रहे, होंठ हिलते रहे। यह जप कण्ठ से होता है; किन्तु अत्यन्त समीप बैठने वाले को भी सुनाई न पड़े। बिना बैखरी का निरन्तर जप किये मध्यमा जागृत नहीं होती और बिना मध्यमा वाणी का निरन्तर जप किए श्वास का जप पकड़ने की क्षमता नहीं आती। इसलिए बैखरी और मध्यमा का दीर्घकाल तक अभ्यास करते-करते जब मन शान्त हो जाय, टिकने की क्षमता आ जाय तो पश्यन्ती की प्रवेशिका आती है। यह जप श्वास से होता है। इसके लिए शान्त बैठ जाओ। मन को द्रष्टा की तरह खड़ा कर दो। श्वास कब भीतर गयी, उसे देखो। कितनी देर अन्दर रुकी, उसे जानो। कब बाहर निकली, उसे जानो। बाहर कितनी देर रुकी (लगभग आधा सेकेण्ड) उसे पहचानो। पुनः कब अन्दर गई, उसे जानो। जब मन जानने लगे तो धीरे-धीरे चिन्तन द्वारा उसमें नाम ढाल दो। श्वास भीतर गयी तो ‘ओम्’, बाहर आयी तो ‘ओम्’, अथवा श्वास में ‘रा’ और ‘म’ देखते रहो।

आरम्भ में यह अभ्यास पकड़ में नहीं आता। ऐसी परिस्थिति में जैसे शरीर पर कहीं तिल जैसा निशान होता है वैसा ही छोटा कोई बिन्दु जमीन पर चुन लो। दृष्टि वहाँ स्थिर कर दो। आँखें पूरी अथवा आधी खुली रखो। आँखें नहीं देखतीं, इनके पीछे विचार देखता है। उस विचार को हृदय में श्वास के पास ले जाओ। देखो श्वास कब अन्दर गयी, कब बाहर आयी। इस प्रकार आँख खुली की खुली रहे किन्तु जो बिन्दु देख रहे हो उसे देखना बन्द कर चिन्तन के द्वारा श्वास में नाम जपाओ। श्वास को न बढ़ाओ न घटाओ बल्कि स्वाभाविक रूप से (अवस्था-भेद से बच्चों में बच्चों-जैसी, वृद्धों मे वृद्धों-जैसी) चल रही है, उसी में नाम ढाल दो। अपनी ओर से दबाव मत डालो। केवल श्वास-प्रश्वास में नाम को देखते रहो। जिसकी पलक जितनी देर तक खुली रहती है, उसका मन उतना ही अधिक रुकता है।

मन एक मतवाले हाथी के सदृश है। इसे वश में करने के लिए एक मजबूत स्तम्भ और उतना ही मजबूत सीकड़ चाहिए। श्वास एक स्तम्भ है। सुरत की सीकड़ से मनरूपी मतवाले हाथी को श्वास से बाँध दो। पहले यह झूमता ही रहेगा, शनैः-शनैः परावाणी के प्रवेशकाल में यह शान्त हो जायेगा। अचल स्थिर ठहर जायेगा।

जब नाम में सुरत स्वाभाविक लग जाय, तैलधारावत् श्वास बाँस की तरह खड़ी हो जाय, क्रम न टूटे, तहाँ अजपा अर्थात् परावाणी में प्रवेश मिल जाता है। परावाणी के प्रवेश के साथ ही नाम अपने अन्तराल में मन को टिकने का स्थान दे देता है। ‘मन अन्तर स मन्त्र।’ जब नाम मन को अपने अन्तराल में रोकने में सफल हो जाय, दूसरा कोई संकल्प, कोई चिन्तन बीच में न आये तो यही साधारण नाम मन्त्र की श्रेणी प्राप्त कर लेता है। पहले श्वास में नाम को ढालना पड़ता था, अब वही नाम श्वास में स्वाभाविक रूप से रवाँ हो जाता है। नाम की, राम अथवा ओम् की धुन स्वतः उठने लगती है। सुरत स्वतः श्वास के साथ जुड़ने लगती है। उस समय यह जप अजपा की श्रेणी प्राप्त कर लेता है। उस समय नाम के अतिरिक्त मन में न कोई संकल्प उठता है और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश ही कर पाते हैं। केवल शब्द मात्र रह जाता है। सुरत समानी सबद में, ताहि काल ना खाय। मन की दृष्टि का नाम सुरत है। जब मन की दृष्टि शब्द में समाहित हो जाय, सुरत समाप्त हो जाय, शब्द मात्र रह जाय; जहाँ ऐसी अवस्था आयी, इसके साथ ही साधक उस परमचेतन का दर्शन, स्पर्श और प्रवेश पा लेता है जो काल से अतीत है।

ध्यान नाम के साथ ही ध्यान के लिए रूप देखने का विधान है। वह भगवान तो तनु बिनु परस नयन बिनु देखा (मानस, 1/117/7) सर्वत्र व्याप्त है किन्तु अमूर्त है, अरूप है। उसे पाने की कुंजी सद्गुरु के चरण ही हैं। अतः हृदय में सद्गुरु का स्वरूप देखना चाहिए। तू अपने हृदय में मेरा रूप देखा कर। सुमति भूमि थल हृदय अगाधू (मानस, 1/35/3)- गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि हृदय एक अगाध स्थल है, एक कक्ष है। इसमें अच्छा-सा मानसिक आसन बिछा दें। उस पर अपने गुरु महाराजजी को बैठायें। उनका सम्पूर्ण रूप नख से शिखापर्यन्त देखें। उनके चरण दिखाई पड़े तो मन की दृष्टि को उनके चरणों और फिर नाखून में स्थिर कर दें। जिस दिन दो-एक मिनट उन चरणों को श्रद्धा से देख ले जाओगे, जहाँ उन चरणों पर ध्यान केन्द्रित हुआ तो जिसका नाम भजन है, वह तुम्हारे हृदय में जागृत हो जायेगा। जैसे शीशे में अपना चेहरा स्पष्ट दिखाई देता है, उतना ही स्पष्ट जब गुरु महाराजजी का रूप झलकने लगे तब ध्यान ठीक है। आरम्भ में तुम रूप पकड़ोगे किन्तु वह अस्पष्ट रहेगा। बार-बार भागता रहेगा। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता है। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। (गीता, 6/35)

महाराजजी द्वारा उनके रूप के ध्यान का निर्देश पाकर हमें चिन्ता हुई कि महाराजजी तो महात्मा ही हैं, शरीरधारी हैं, मुझे तो भगवान चाहिए। इनका रूप देखने से भगवान क्यों मिलेगा? किन्तु आदेश था इसलिए चिन्तन के आधे समय तक महाराजजी के रूप को देखने का प्रयास करते और उतना ही भगवान श्रीकृष्ण के विराट् स्वरूप का ध्यान उस चित्र के अनुसार करते, जिसे हम अपने साथ ले गये थे। यह क्रम लगभग ढाई वर्ष तक चलता रहा। महाराजजी के अनुभवी प्रवेश के पश्चात् ही उस विराट् स्वरूप के प्रति मोह समाप्त हुआ। क्रमशः महाराजजी का रूप स्थायित्व लेने लगा, भीतर से महाराजजी बोलने-बताने लगे। वैसा बाहर देखने को मिलने लगा, तभी मन आश्वस्त हुआ।

आहार नाम और रूप के साथ ही महाराजजी साधकोपयोगी चर्या के अनुपालन के लिए मुझे उत्साहित करते रहते थे। युक्ताहार-विहार पर महाराजजी बहुत बल देते थे। वे कहते थे कि साधक को एकाहार अर्थात् दिन में एक बार ही भोजन करना चाहिए। दिन में एक बार भोजन कर लेने पर रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन की पूर्ण मात्रा से एक रोटी कम ही खाना चाहिए। पेट खाली रहने से भजन में मन अधिक लगता है। पेट भरा होने से आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेर लेता है जिससे साधक भटकशून्य खपतुलेहवास हो जाता है किन्तु भजन नहीं हो पाता है।

महाराजजी जैसा कहते थे, वे स्वयं करते भी थे। उनका आचरण ही उपदेश था। प्रातः नित्यक्रिया से निवृत्त होकर महाराजजी भजन में बैठ जाते थे। उनके साथ ही साधक भी यत्र-तत्र भजन में बैठ जाते थे। लगभग दस बजे महाराजजी भजन से उठते थे। उन्हें स्मरण आता तो बालभोग के रूप में सबको गुड़ की एक भेली दिलाते। बस चाय और स्वल्पाहार के नाम पर इतना ही मिलता था। कदाचित् उन्हें स्मरण न आये तो वह गुड़ भी नहीं मिलता था।

अनुभव इन्हीं निर्देशों के आलोक में ज्योंही दो-ढाई महीने व्यतीत हुए, अनुभव दिखाई देने लगे। वस्तुतः पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाले भजन की शुरुआत अनुभव जागृत होने के पश्चात् ही है। इसके पूर्व का भजन प्रवेशिका के लिए प्रयास है। अनुभव का अर्थ होता है- अन अर्थात् अतीत और भव है संसार, अर्थात् भव से अतीत करनेवाली विशेष जागृति। जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह हमारे आत्मा से अभिन्न होकर जागृत हो जाय और हमारा मार्गदर्शन करने लगे। यह जागृति तत्त्वदर्शी सद्गुरु द्वारा ही सम्भव है। अन्य कोई तरीका नहीं है। ध्यान में आनेवाला गुरु महाराजजी का रूप ही साधक को प्रत्येक श्वास पर सुझाव देते, सम्भालते हुए चलाता है। जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनन्ता। अनुभवगम्य भजहिं जेहि सन्ता।। (मानस, 3/12/12) ब्रह्म तो अखण्ड है, अनन्त है। कण-कण में व्याप्त है। इसे पकड़े कहाँ से? गोस्वामीजी कहते हैं- अनुभव के द्वारा वह गम्य है, वहाँ पहुँचा जा सकता है। जो अनुभव के आलोक में भजन करते हैं, वे सन्त हैं। महाराजजी ने कहा- भगवान जब जागृत होते हैं तो इस पेड़ से बोल सकते हैं।

महाराजजी ने अंग-स्पन्दन के अनुभवों पर प्रकाश डाला। दाहिना कान फड़कने से भगवान कहते हैं इसे सुनो, यह वार्ता तुम्हें सुनने योग्य है। बायाँ कान स्पन्दित हो तो भगवान का निर्देश है मत सुनो, इसके सुनने का दुष्परिणाम तुम्हें साधना से भटकना पड़ेगा। इसी प्रकार दायीं आँख फड़के तो शुभ दर्शन, बायीं आँख का स्पन्दन अशुभ दर्शन इंगित करता है। दाहिना होंठ फड़के तो बोलो, बायाँ फड़के तो मत बोलो। इसी प्रकार ठोढ़ी क्यों फड़कती है? पाँव क्यों फड़कता है? तलवा क्यों फड़कता है? इत्यादि पचासों संकेतों का निरूपण करते हुए आपने बताया कि इससे आगे अब तुझे भगवान पढ़ायेंगे। मेरा रूप तुम्हारे भीतर से तुम्हें पढ़ाता रहेगा। अनुभव दृश्य के रूप में भी आने लगे। जैसे लहलहाती खेती देखना- पुण्य की वृद्धि तथा गन्ना इत्यादि खड़ी फसल का कटना पुण्य क्षीण होना है। बालों का कटना पुण्य क्षीणता का द्योतक है। इन्हीं अनुभवों से ज्ञात हुआ कि वृत्ति ही बहन है, भक्ति ही माता है, ज्ञान ही पिता है। ये प्रतीकात्मक रूप अनुभव में आते रहते हैं।

अनुभव के संचार की अनन्त धारायें हैं; किन्तु स्थूल रूप में उसके चार भाग हैं- 1. स्थूलसुरा सम्बन्धित अनुभव, 2. स्वप्नसुरा सम्बन्धित अनुभव, 3. सुषुप्तिसुरा सम्बन्धी अनुभव, 4. समसुरा सम्बन्धी अनुभव। भगवान जब अपनाते हैं तो सदैव साधक की रक्षा में खड़े रहते हैं। तुम सोते रहो, भजन में बैठो अथवा किसी भी परिस्थिति में हो, भगवान वहाँ सदैव साथ हैं।

दाहिने अंग-स्पन्दन को शकुन और बायें अंग-स्पन्दन को अपशकुन मानते हैं। एक सकारात्मक है तो दूसरा निषेधात्मक; किन्तु इन दोनों संकेतों को देनेवाला भगवान ही है। पूज्य महाराजजी ने बताया कि योगी कभी स्वप्न नहीं देखता। जन्म-जन्मान्तरों के दृश्य अतीत के संस्मरण, वर्तमान में मन की अवस्था, भविष्य का संकेत स्वप्नों में आया करता है। इन संकेतों को समझने में कभी-कभी बुद्धि भी कार्य नहीं करती। ऐसी परिस्थिति में भगवान से सविनय प्रश्न करना चाहिए अथवा गुरु महाराजजी से समाधान करवा लेना चाहिए। ये दोनों अनुभव साधना की आरम्भिक अवस्था में महापुरुषों की टूटी-फूटी सेवा और उनमें श्रद्धा मात्र से जागृत हो जाते हैं। शेष दो अनुभव साधना की उन्नत अवस्था में होते हैं।

तीसरा अनुभव सुषुप्ति सुरा का है। साधना में सुषुप्ति काल वह है जब शरीर जागृत रहे किन्तु मन सुप्त हो जाय। मन शान्त, सम, स्थिर श्वास में प्रवाहित हो जाय अथवा ध्यानस्थ हो जाय उस भजनकाल में भगवान एकाध मिनट के लिए आपको चेतनाशून्य करके कुछ बता देते हैं। जिस प्रकार शल्य चिकित्सक क्लोरोफार्म सुंघाकर चेतनाशून्य कर, आवश्यक चीर-फाड़कर पुनः होश में ले आता है, उसी प्रकार जब भगवान को कुछ बताना होता है तो भजनकाल में ही एक मिनट के लिए बेहोश करके कुछ दिखा- सुनाकर पुनः सचेत कर देते हैं। सुषुप्तिसुरा का यह अनुभव ध्रुव अकाट्य होता है।

चौथा अनुभव समसुरा सम्बन्धी है। यह परमात्म-स्थित महापुरुष के लिए है। महाराजजी कहते थे, ‘‘हो, जैसे टेलिफोन एक्सचेंज में सब कनेक्शन धड़ाधड़ काम करते हैं वैसे ही तरह-तरह की परिस्थितियाँ, साधकों की गतिविधियाँ मैं बैठे-बैठे देखता, मारता-पीटता उन्हें व्यवस्थित करता जाता हूँ। ऐसे महापुरुष को भगवान खाते-पीते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, लोगों से बातें करते किसी भी समय, सोते-जागते हर परिस्थिति में, अपना निर्णय देते रहते हैं। इन अनुभवों में आकाशवाणियों का भी समावेश है।

तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै। (विनय0, पद 89) मन तभी वश में होता है जब प्रेरक के रूप में स्वयं सद्गुरु सार-संभार करने लगे। इसके बिना साधक नहीं समझ पाता कि मैं कब सही कर रहा हूँ और कब गलत कर रहा हूँ। छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।। (मानस, 7/48/5) प्रायः लोग कहते हैं कि हमने बहुत विचार करके विकारों को हटाया। विश्लेषण करते-करते विकारों के तह तक पहुँच गये। विशेष दृष्टि से देखा। जैसे काम विकार आया तो हमने चिन्तन किया कि रूप क्षणभंगुर है। विषयासक्ति क्षणिक पागलपन है। हमने देखा और उसे अपने से अलग कर दिया। शान्त होकर बैठ गये किन्तु यह कोई तरीका नहीं है; क्योंकि सारी योजनाएँ तो मन बना रहा है। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।(मानस, 3/14/3)- अपने मन से लिया गया प्रत्येक निर्णय माया के अन्तर्गत है।

ब्रह्मविद्या इसी तारतम्य में ब्रह्मविद्या, मन को साधना की परिधि में बाँधकर रखने की कु॰जी है। साधनाकाल में जितने भी अनुभव आते हैं, उन सबको समझने में यह सहायक है।

योग-साधना में नाम, रूप और ब्रह्मविद्या का सर्वोपरि स्थान है किन्तु ब्रह्मविद्या अधिकारी के लिए है। इसी परिप्रेक्ष्य में भजन की जागृति के पश्चात् महाराजजी ने मुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश किया, जिसमें रामायण की कथावस्तु का आध्यात्मिक रूपक प्रस्तुत किया गया था। यह विद्या अन्तःकरण की आसुरी तथा दैवी वृत्तियों का चित्रण है। जो साधक एक ही बार में इसे याद कर ले, वह सर्वोपरि है। फिर भी आरम्भ के दस महीने तक हम इसे हृदयंगम न कर सके; किन्तु महाराजजी के निरन्तर निर्देशन पर हमने इसे याद करके एक वरिष्ठ सन्त को सुना दिया। उन्होंने कहा- रटने से क्या होगा? यह तब सार्थक है जब यह अन्तःकरण की वृत्तियों में ढल जाय। वैसा दृश्य भीतर दिखाई पड़ने लगे। एक नयी उलझन हमारे सामने खड़ी हो गयी।

महाराजजी ने कहा, ‘‘देखो, जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं, रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर, सोभा अति अनुराग।।(मानस, 1/11) राम के चरित्रों को युक्तिपूर्वक वेधकर अर्थात् इसका आशय यह है, इसका अर्थ यह है- इस प्रकार वेधकर, स्मृति के धागे में पिरोकर पहन लो। अभ्यास करो, मनन करो। हमने तो अभी सामान्य रूपरेखा दी है। विस्तार से तुम्हारे हृदय में मैं पढ़ाऊँगा। गुरोर्मौन व्याख्यानं छिन्नते सर्वसंशयम्’- गुरु मौन व्याख्यान हृदय से देते हैं, जिससे सारे संदेह मिट जाते हैं। अब इसे चिन्तन द्वारा सूक्ष्म करना, विस्तृत करना तुम्हारा कार्य है। प्रतिदिन इसकी एक माला, एक आवृत्ति अवश्य किया करो।’’ हम इसके चिन्तन में लग गये। आरम्भ में इसमें आधा घण्टा लगता था। जब यह सूक्ष्म होने लगी, क्रमशः समय बढ़ने लगा और यह अभ्यास तीन घंटे तक पहुँच गया। यह समय ऐसे बीत जाय कि समय का भान ही न हो। एक ओर से आरम्भ कर इसका यह आशय, उसका वह अर्थ करते हम दूसरे छोर पर पहुँच जाते थे। बीच में तीन-चार बार इतर संकल्प आकर मन में विक्षोभ उत्पन्न करने का प्रयास करते, किन्तु आने से पूर्व ही जानकारी हो जाया करती थी। उसे काटकर हम तत्क्षण ब्रह्मविद्या में पूर्ववत् लगे रहते थे। नित्य एक माला की आवृत्ति से साधन सूक्ष्म होता जाता है और विस्तार में भटकनेवाले मन को घसीटकर एक ब्रह्म की धारा में प्रवाहित कर देता है। मस्तिष्क में ब्रह्मविद्या का एक-एक प्रसंग अलग-अलग तालिका-जैसा स्पष्ट हो गया। तब अनुभव में आया कि अब तुम्हें ब्रह्मविद्या आ गयी। इसके उपरान्त भी ब्रह्मविद्या चलती रही।

मन तो इतना बड़ा है जितना बड़ा संसार! किन्तु ब्रह्मविद्या के मनन से यह सिमट जाता है। उसी क्षण इस सिमटे हुए मन को श्वास में लगा दो। श्वास में दो-तीन घंटे जब मन और सिमट जाय तो उसी मन को स्वरूप के ध्यान में लगा दो। बस मन लगने लगेगा। मन नहीं लगता, यह शिकायत समाप्त हो जायेगी। भगवान शिव, कागभुशुण्डि और लोमश से लेकर अद्यावधि यह ब्रह्मविद्या गुरु-शिष्य परम्परा में सुरक्षित है। किन्तु यह गोपनीय है, अधिकारी के लिए है।

महाराजजी कहा करते थे, ‘‘भजन जागृत होने के पश्चात् हर समय मन के पीछे विचारों का पहरा लगाये रखो। मन को नाम, रूप या ब्रह्मविद्या में ही सदैव लगाकर रखो। यह अन्यत्र कहीं भटकने न पाये। यदि मन को भजन से छुट्टी दोगे, यह माया में जायेगा। विरह हो, वैराग्य हो, इष्ट के प्रति श्रद्धा हो, हारिल पक्षी की तरह टेक (हारिल एक पक्षी है। वह एक लकड़ी तोड़कर, पंजे में लेकर जमीन पर उतरता है, दाना चुगता है, वृक्ष पर जाते समय लकड़ी छोड़कर वृक्ष की शाखा पकड़ लेता है, उतरते समय पुनः पंजे में लकड़ी ले लेता है; लकड़ी का साथ कभी नहीं छोड़ता। इसी तरह साधक को भी टेक का पक्का होना चाहिए।) अर्थात् प्रतिज्ञाबद्धता हो तभी सफलता मिलती है। जिस साधक में विरह नहीं, वैराग्य नहीं, भगवान को पाने की तड़फन नहीं है; उसके लिए भगवान नहीं हैं।’’

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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