वेदान्त

वेदान्त

प्रश्नमहाराजजी! भारतीय मनीषियों ने वेदान्त की बड़ी महिमा बतायी है। कृपया स्पष्ट किया जाय कि वेदान्त क्या है?

उत्तर परमात्मा के शोध की विधि का परिणाम वेदान्त है। भारत का सम्पूर्ण आदिसत्य यही है। परवर्ती महापुरुषों ने क्षेत्रज और देशज भाषाओं में इसी सत्य को दृढ़ाया है। यद्यपि वेदान्त के नाम पर उत्तर-मीमांसा या ब्रह्मसूत्र जैसा ग्रन्थ प्रचलित है फिर भी वास्तविक वेदान्त यहीं तक सीमित नहीं है। वह उस साधना का परिणाम है जिसकी विधि ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ है।

स्वामी विवेकानन्दजी ने विश्व में यत्र-तत्र वेदान्त सोसाइटी स्थापित कर अपने गुरुभाइयों को वहाँ नियुक्त कर निर्देश दिया कि यहाँ गीता-पाठ और उसका उपदेश होना चाहिए, और भी कोई भारतीय दर्शन पढ़ सकते हैं। भारत आने पर अपने वेलूर मठ में वे अपने गुरुभाइयों को स्वयं गीता और उपनिषद् पढ़ाया करते थे; क्योंकि उपनिषदों में सार गीता ही है। वेद का अर्थ है जानकारी! उस अविदित तत्त्व को विदित करने की समग्र विधि गीता है, इसलिये गीता वेदान्त है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि-

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।। (गीता, १५/१५)

अर्जुन! मैं ही सभी प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता हूँ। मुझसे ही स्व-स्वरूप की स्मृति, सम्पूर्ण ज्ञान और अपोहन अर्थात् बाधाओं का शमन होता है। सब वेदों द्वारा मैं ही जानने में आता हूँ और मैं ही वेदान्त अर्थात् वेद की अन्तिम स्थिति का कर्त्ता हूँ। उस परमतत्त्व की जानकारी के पश्चात् जब जानने योग्य कोई अन्य सत्ता रह ही नहीं गयी, वहाँ वेद का भी अन्त हो जाता है, जिसका नाम है विशुद्ध वेदान्त। यह एक स्थिति है। वेदान्त साधना का परिणाम है। इसी का नाम मुक्ति है। यही कैवल्य ज्ञान है।

भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में वेदान्त पर बहुत बल दिया है-

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।। (गीता, ७/२६)

अर्जुन! भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों को मैं जानता हूँ; किन्तु मुझे कोई नहीं जानता। क्यों नहीं जान पाते? इस पर कहते हैं-

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। (गीता, ७/२७)

इच्छा, द्वेष अर्थात् राग और द्वेष के द्वन्द्व से प्राणी अत्यन्त अज्ञान को प्राप्त हो रहे हैं, इसलिये मुझे नहीं जानते। तो क्या कोई जानेगा ही नहीं? इस पर कहते हैं-

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।। (गीता, ७/२८)

किन्तु पुण्यकर्म (जो आपको पूर्णत्व प्रदान करता है जिसे नियत कर्म, यज्ञार्थ कर्म, तदर्थ कर्म, मदर्थ कर्म, कार्यम् कर्म, यज्ञ की प्रक्रिया कहकर बारम्बार समझाया उस कर्म को) जो करते हैं, व्रत में दृढ़ रहकर निरन्तर जो भजते हैं वे सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं। जरा-मरण से छूटने के लिये जो सतत अभ्यास करते हैं वे सम्पूर्ण ब्रह्म को जानते हैं; सम्पूर्ण अध्यात्म, सम्पूर्ण कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञसहित मुझे जानते हैं और उस अवस्था से पुनः कभी विचलित न होकर सदा रहनेवाला धाम और शान्ति को प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ पर, वेद जो जानने में आया और वेद का भी अन्त अर्थात् सहज स्वरूप में स्थिति वेदान्त है। वेदान्त परिणाम है। इस प्रकार वेदान्त साधना का परिणाम है, क्रियाजन्य है। उस परिणाम में ब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन और सदा उसी स्वरूप में स्थिति मिल जाती है।

कालान्तर में वेदान्त को लोगों ने वाग्विलास का साधन बना लिया, जैसे- रस्सी में सर्प का भ्रम हो जाना, सीप में चाँदी का भ्रम हो जाना। इसी प्रकार संसार भी अनित्य है, केवल सत्य जैसा प्रतीत होता है। मरुभूमि में जेष्ठ के महीने में सूर्य की किरणें सीधी पड़ने से उत्तप्त रेत पर वाष्प की लहरें देख मृगों को जल का भ्रम हो जाता है। वहाँ छोटी-छोटी झाड़ियों में प्राणधारी छिपे रहते हैं। मृग भी उसी में रहते हैं। ऊष्मा इतनी बढ़ जाती है कि चार-चार, पाँच-पाँच फीट ऊँची वाष्प की लहरें चला करती हैं जिन्हें देखकर मृगों को भ्रम हो जाता है कि दूर वहाँ जल है। चलें, जल पीकर आयें। मृग उस स्थान तक दौड़ लगाता है, वहाँ जल न पाकर दूसरी ओर जल जैसा देखकर भागता है, फिर तीसरी ओर! वहाँ भी मरीचिका। जल की आशा में दौड़ते-दौड़ते वह अन्ततः झुलसकर मर जाता है। इस प्रकार सांसारिक सुख मृगतृष्णा का जल है। ‘मैं शरीर नहीं हूँ, मैं परम चेतन आत्मा हूँ।’; ‘आँखें नहीं देखतीं; आँखें जिसके द्वारा देखती है, मैं वह हूँ।’; ‘कान नहीं सुनते; कान जिसके द्वारा सुनते हैं, मैं वही हूँ।’; ‘मैं ही परम चेतन परमतत्त्व हूँ, परमात्मा हूँ।’- इस प्रकार चिन्तन करने, बौद्धिक वार्ता का क्रम बैठा लेने और इन दार्शनिक मतवादों के खण्डन-मण्डन को ही लोगों ने वेदान्त की संज्ञा दे डाला। वे कहने लगे- ‘मैं ब्रह्म हूँ, आत्मा हूँ’; किन्तु वास्तविक वेदान्त परिणाम है, साधनजन्य है, योग-साधना का परिणाम है। भगवान कहते हैं कि साधना के परिणाम में उस वेदान्त की अवस्था को प्राप्त साधक सम्पूर्ण ब्रह्म (अब कुछ भी अनजाना नहीं), सम्पूर्ण कर्म (अब कुछ भी करने योग्य शेष नहीं), सम्पूर्ण अध्यात्म (प्रत्येक कार्य आत्मा के आधिपत्य में होने लगे) और अधियज्ञसहित मुझे जानते हैं। मुझे जानकर मुझमें स्थित हो जाते हैं। स्थिति के पश्चात् कर्म करने से उस महापुरुष को न कोई लाभ है, न कर्म छोड़ने से उसकी कोई क्षति, न ही प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य है; फिर भी ऐसे महापुरुष लोकहित के लिये कर्म करते हैं। स्वयं के लिये उनका कुछ प्रयोजन नहीं है। ऐसे महापुरुष सद्गुरु होते हैं। सद्गुरु एक स्थिति है।

भगवान श्रीकृष्ण का कथन है- ‘‘अर्जुन! हम दोनों के इस संवाद (गीता) को जो इन भटके हुए भक्तों में कहेगा, प्रसारित करेगा, उसके समान मेरा प्रिय कार्य करनेवाला और कोई नहीं है। श्रवण कर जो पालन करेगा, वह मुझे प्राप्त कर लेगा। जो केवल सुनेगा, वह भी उत्तम लोकों को प्राप्त होगा। अर्जुन! अहंकारवश यदि तू नहीं सुनेगा तो जड़-मूल से विनष्ट हो जायेगा।’’ अर्थात् मोक्ष का अन्य कोई रास्ता नहीं है।

अतः भारत में अनादिकाल से जो चला आ रहा है, विशुद्ध शास्त्र परमात्मा के श्रीमुख का सीधा गायन ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ ही है। वेदप्राण विविध उपनिषद् इसी का विस्तार हैं। इसका अनुशीलन कर आचरण में ढालें और अमरकीर्ति प्राप्त करें।

अब संस्कृत लोकभाषा नहीं रही। अतः गीता को यथावत् समझने के लिये कि धर्म क्या है? सत्य क्या है? कर्म क्या है? वर्ण क्या है? कर्म करने का अधिकार किसे है? भजन किसका और कैसे करें?- इन समस्त शंकाओं के समाधान के लिये ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भाष्य ‘यथार्थ गीता’ की तीन-चार आवृत्ति अवश्य करें। इसी के आलोक में आप विशुद्ध वेदान्त प्राप्त करने में सक्षम होंगे।

विवेकानन्दजी की मान्यता थी कि शुष्क वेदान्त साधना खो बैठा है। यही कारण था कि वेदान्त सोसाइटी की स्थापना करने पर भी उन्होंने ब्रह्मसूत्र नाम से प्रचलित दर्शन-ग्रन्थ का नाम तक नहीं लिया, केवल गीता की अनुशंसा की और यदा-कदा उससे सन्दर्भित उपनिषदों के अनुशीलन का परामर्श दिया।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

Q & A
×