कर्म
प्रश्न– महाराजजी! श्रीकृष्ण ने गीता में स्थान–स्थान पर कर्म करने पर बहुत बल दिया है। वह कर्म क्या है?
उत्तर– देखिये, प्रत्येक महापुरुष की दृष्टि में कर्म का शुद्ध अर्थ आराधना ही है-
करम एक आराधना, जेहि विधि रीझै राम।
सो करता करनी करै, पल पल पलटत नाम।।
एकमात्र आराधना ही कर्म है। वह प्रक्रिया ही कर्म है जिससे राम रीझ जायँ, अनुकूल हो जायँ। वही उस कर्म-विशेष का कर्ता है जो क्षण-क्षण पर नाम को पलटता तथा उसका स्मरण करता रहता है। आदि शंकराचार्य की मान्यता है, ‘क्वा कर्म यत्प्रीति करं मुरारे’- कर्म क्या है? जिससे भगवान के चरण-कमलों में अटूट प्रीति का संचार हो जाय। गोस्वामी तुलसीदासजी के अनुसार-
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ।
जहँ न राम पद पंकज भाऊ।। (मानस, 2/290/1)
उस सुख, कर्म, धर्म में आग लग जाय, जहाँ भगवान राम के चरण-कमलों में स्नेह न हो। तात्पर्य यह है कि एकमात्र भगवान के चरण-कमलों में स्नेह, उनकी प्राप्ति करानेवाली प्रक्रिया ही कर्म है। ठीक इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में कर्म का शुद्ध अर्थ है- आराधना।
युद्धस्थल में स्वजन समुदाय को देखकर अर्जुन अधीर हो उठा। अठारह अक्षौहिणी जनसमूह में अर्जुन को केवल अपना परिवार, मामा का परिवार और ससुराल का परिवार ही दिखाई पड़ा। क्या सब अर्जुन के रिश्तेदार ही थे? वास्तव में अनुरागी ही अर्जुन है। प्रत्येक अनुरागी के समक्ष यही समस्या होती है। चिन्तन-पथ में प्रवृत्त होते समय पहले तो बड़ा भाव रहता है किन्तु जब लौकिक सम्बन्धों को त्यागने का स्तर आता है, तहाँ वह अधीर हो उठता है। उस समय परिवार का मोह, ननिहाल का मोह, साथियों का मोह और गुरुजनों का मोह उसे घेर लेता है। जब अनुरागी घर से अलग हो ही गया तो उसके लिए घरवाले मर गये और घरवालों के लिए साधक। उस समय प्रबल मोह से साधक विचलित होने लगता है। अर्जुन ने भी अपने परिवार को मौत के मुहाने पर देखा तो बोला-मैं युद्ध नहीं करूँगा। अपने ही परिवार को मारकर मैं सुखी कैसे होऊँगा? इस प्रकार तो कुलधर्म नष्ट हो जायेगा। कुलधर्म शाश्वत धर्म है, सनातन है, पुरातन है। इस प्रकार के युद्ध से पिण्ड-परम्परा लुप्त हो जाएगी, कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी; वर्णसंकर पैदा होंगे। वह वर्णसंकर कुल एवं कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए उद्यत हुए हैं। इस प्रकार अपने को ही नहीं अपितु श्रीकृष्ण को भी लांक्षित किया कि आप भी पाप करने जा रहे हैं। अन्त में ऐसा स्पष्ट कहकर कि, ‘‘गोविन्द! मैं कदापि युद्ध नहीं करूँगा।’’ रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
अर्जुन यदि न लड़े तो युद्ध का प्रश्न ही खड़ा न हो, क्योंकि उसके ऊपर ही सारा महाभारत आधारित है। पाण्डव-पक्ष में अर्जुन के अतिरिक्त कोई दुर्धर्ष योद्धा नहीं, जिस पर युधिष्ठिर निर्भर हो सके, ‘पल लागत अर्जुन हतैं छुए न दूजो बान।’ वही तो एक विशिष्ट योद्धा था। उस अधीर अर्जुन को एकमात्र कर्म की शिक्षा देकर श्रीकृष्ण ने उस कर्म को दृढ़ाया ही नहीं बल्कि उस पर अर्जुन को चला भी दिया। अतः विचारणीय है कि वह कर्म है क्या? अर्जुन ने पहले ही कह दिया था कि पृथ्वी एवं स्वर्ग के धनधान्य-सम्पन्न साम्राज्य का अकण्टक स्वामी बनने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देनेवाले शोक को मिटा सके। अतः यदि इतना ही मिलनेवाला है तो मैं युद्ध नहीं करूँगा। हाँ, यदि इससे भी आगे कोई सत्य हो तो उसे आप मेरे प्रति कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उस सत्य पर प्रकाश डाला कि आत्मा ही सत्य है, आत्मा परमसत्य है। वही शाश्वत एवं सनातन है। वही अजर-अमर एवं सर्वव्याप्त है; किन्तु अजर-अमर तो कोई सत्ता दिखायी नहीं देती। आये दिन शोक, मोह, सन्ताप ही दिखाई देता है। फिर जो आत्मा सबमें व्याप्त है तो ढूँढ़ा किसे जाय? श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! आत्मा को इस रूप में केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा, सबने नहीं। यह आत्मा अचिन्त्य है- जब तक चित्त और चित्त की लहर है, यह विदित नहीं होता। कोई विरला महापुरुष ही इसे जानता है। विरला ही इसे आश्चर्य की तरह सुनता है। सब न सुनते हैं, न जानते हैं; क्योंकि क्रिया ही नहीं जानते। इसलिए अर्जुन! तू इसकी प्राप्ति के लिए युद्ध कर। क्षत्रिय के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा कर्तव्य नहीं है।
प्रश्न– महाराजजी! अर्जुन यदि क्षत्रिय श्रेणी का साधक था तो उसे परिवार का मोह नहीं होना चाहिए था?
उत्तर– देखिए, शास्त्र की रचना पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए ही होती है। जो सामने है, वह तो पार हो ही जाता है। लिखने की क्या आवश्यकता थी? गीता के समापन पर श्रीकृष्ण इसके प्रचार-प्रसार का निर्देश भी देते हैं। वस्तुतः अर्जुन को निमित्त बनाकर वे सभी साधकों की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन आज क्षत्रिय बना, कभी तो उसकी साधना का भी आरम्भ था। आरम्भिक अवस्था में अनुरागी के समक्ष परिवार की समस्या आती है। स्वजनों का त्याग महान् कष्टदायी होता है अतः वहीं से गीता का प्रारम्भ श्रीकृष्ण करते हैं।
श्रीकृष्ण ने समझाया कि, पार्थ! यह युद्ध क्षत्रिय के लिए खुला हुआ स्वर्ग-द्वार है। इससे बढ़कर क्षत्रिय के लिए अन्य कोई धर्म नहीं है। यदि तू युद्ध नहीं करेगा तो वैरी तुझे भय के कारण रण से उपराम हुआ समझेंगे। जिनसे तूने सम्मान पाया है उसकी दृष्टि से भी गिर जायेगा। हारेगा तो स्वर्ग पायेगा और जीतेगा तो ‘भोक्ष्यसे महीम्’- महामहीम् स्थिति को प्राप्त होगा।
प्रश्न– किन्तु महाराजजी! ‘महीम्’ का अर्थ तो पृथ्वी होता है?
उत्तर– ठीक है, पृथ्वी को भी मही कहते हैं। वह सबका उदर-पोषण करती है, उसकी बड़ी महिमा है इसलिए उसका एक नाम मही भी है; किन्तु सबसे महान् महिमा तो उस महान् महिमामय की है जहाँ से महिमा का प्रसार होता है। ‘महिम्नः पारान्ते’- जिसकी महिमा अपार है, श्रीकृष्ण उसी महीम् स्थिति का प्रलोभन देते हैं। अर्जुन पहले ही त्रैलोक्य का राज्य ठुकरा चुका है। वह उससे भी आगे कोई सत्य पाना चाहता है अतः केवल पृथ्वी के भोगों का प्रलोभन श्रीकृष्ण क्यों देते और अर्जुन क्यों इतने के ही लिए तैयार हो जाता? सिद्ध है कि यह कोई ऐसा युद्ध है जो महामहीम् स्थिति को दिलाता है।
अतः जीतोगे तो सर्वस्व मिलेगा और हारोगे तो देवत्व को प्राप्त करोगे। जीवन भर दैवी सम्पत्ति का ही अर्जन किया है, उसी देवत्व को प्राप्त होगे। इस दृष्टि से हानि और लाभ, सिद्धि और असिद्धि दोनों को समान समझकर युद्ध कर!
अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि ‘युद्ध कर’। अपना हानि-लाभ देखते हुए युद्ध करना ही ‘ज्ञानयोग’ है।
प्रश्न – किन्तु महाराजजी! कई टीकाकारों ने लिखा है कि ‘मै ज्ञानी हूँ, मै पूर्ण हूँ, आत्मा ही सर्वत्र व्याप्त है, इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरतती हैं।’- ऐसा चिन्तन करना ज्ञानयोग है।
उत्तर– ऐसा कैसे होगा? कल घर छोड़ा और आज पूर्ण हो गये? हृदय में तो काम छाया है, क्रोध छाया है; देखने से सच्चिदानन्दघन दिखाई देगा? टीकाकार कुछ भी लिखें, श्रीकृष्ण ऐसा नहीं कहते। श्रीकृष्ण ने जहाँ आत्मा को अजर, अमर, अविकारी, अचल एवं सनातन बताया वहाँ यह नहीं कहा कि यह ज्ञानयोग है। वहाँ तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा को इन विभूतियों से युक्त केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। अन्यत्र वे कहते हैं कि, ‘‘अर्जुन! जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती गयी हैं, उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है और जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयीं उसके लिए उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है; अधोगति और नीच योनियों में फेंकनेवाली होती है। अर्जुन! मनुष्य को चाहिए कि अपनी आत्मा का उद्धार करे, उसे अधोगति में न पहुँचावे।’’ कौन कहता है कि आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है? यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा अधोगति में जाती है। आत्मा का उद्धार होता है। ज्ञानयोगियों ने यह तो रट लिया कि मैं पूर्ण हूँ, यह क्यों नहीं याद किया कि आत्मा अधोगति में जाती है? वस्तुतः मनसहित इन्द्रियों के जीतने पर ही आत्मा का दिग्दर्शन सम्भव है। उसके लिए कर्म तो करना ही पड़ेगा। हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना ज्ञानयोग नहीं है।
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।। (गीता, 2/39)
अर्जुन! अब तक यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गयी, इसी को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्म-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। दोनों में क्रिया एक ही है, केवल कार्य-प्रणाली का अन्तर है, बुद्धि का अन्तर है। ज्ञानयोग में अपना हानि-लाभ स्वयं देखते हुए युद्ध किया जाता है जबकि निष्काम कर्मयोग में साधक इष्ट पर निर्भर होकर युद्ध करता है। उसके हानि-लाभ का विचार इष्ट करते हैं। अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ अर्थात् बीज का नाश नहीं होता। इसका थोड़ा-सा भी साधन करते बन गया, यह क्रिया आरम्भ भर हो जाय फिर माया के पास ऐसा कोई यंत्र नही है जो उसे नष्ट कर दे। माया केवल आवरण डाल सकती है, देर कर सकती है, इससे अधिक कुछ भी नहीं। कागभुशुण्डि को दस हजार जन्म लगे। श्रीकृष्ण दस जन्म से योगी थे। महाराजजी को अनुभव में दिखाई पड़ा कि सात जन्म से साधु थे। अतः इस निष्काम कर्मयोग का रंचमात्र आचरण भी जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार करके ही छोड़ता है। ‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।’ (गीता, 6/45) शिथिल प्रयत्नवाला साधक भी अनेक जन्मों के हेर-फेर से उसी स्थान पर पहुँच जाता है जिसका नाम परमगति या परमधाम है। यह साधन सद्गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी किया जा सकता है, फिर आगेवाली सीढ़ी तो भगवान स्वतः पकड़ायेंगे कि अब त्याग करो। उस समय त्याग करने की क्षमता भी रहेगी। आज हम जिसे छोड़ना नहीं चाहते, उस समय इसी को छूना भी नहीं चाहेंगे। इस निष्काम कर्मयोग में सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि ऋद्धियों-सिद्धियों या स्वर्ग तक ही पहुँचाकर छोड़ दे। इसका स्वल्प आचरण भी जन्म-मरण के भय से छुटकारा दिलाकर ही शान्त होता है।
कुरुनन्दन! इस निष्काम कर्मयोग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है। क्रिया एक है, दिशा एक है। तब जो लोग बहुत-सी क्रियायें बताते हैं क्या वे भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- वे भजन नहीं करते। अज्ञानियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिए भजन की ओट में बहुत-सी क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। ऐसे लोगों की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। ऐसे लोग स्वर्ग को ही परमश्रेष्ठ माननेवाले होते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी से वेद के उन्हीं बातों में अनुरक्त रहते हैं जिससे भोगैश्वर्य की वृद्धि हो। सिद्ध है कि कर्म के नाम पर प्रचलित कर्मकाण्ड कर्म नहीं है। फलासक्ति से किया जानेवाला कर्म, कर्म नहीं है।
अर्जुन! तू फल की वासनावाला मत हो। तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फल में कभी नहीं। इसके साथ ही कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। निरन्तर करने के लिए तत्पर हो जा। इसमें बुद्धि को इष्ट के अधीन रखना होता है, इसलिए निष्काम कर्मयोग को बुद्धियोग भी कहते हैं। इसमें कामनाओं का सर्वथा अभाव है, इसलिए यह निष्काम कर्मयोग कहलाता है। क्रमशः उत्थान करते-करते यह इष्ट के साथ समत्व की स्थिति दिला देता है, इसलिए समत्व योग कहलाता है। अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में इन्द्रिय सहित मन के निरोध का बड़ा महत्त्व है। क्योंकि विषयों में विचरती हुई जिस भी इन्द्रिय के साथ मन रहता है वह अकेली इन्द्रिय ही इस अयुक्त मन का अपहरण कर कहीं ले जाकर उसी प्रकार पटक देती है जैसे वायु नाव का हरण कर लेती है। इसलिए महाबाहो! इन्द्रियों को विषयों से सब प्रकार से समेटकर कर्म का आचरण कर।
अर्जुन को कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानमार्ग में सरलता दिखाई पड़ी। ज्ञानमार्ग में अनुरागी हानि-लाभ का स्वयं विचार कर निर्णय लेता है। साधना पूरी हो जाय तो महामहिम स्थिति मिलती है और इसके पूर्व शरीर का समय समाप्त होने पर देवत्व मिलता है जबकि निष्काम कर्मयोग में कर्म करने का ही अधिकार है, फल में कभी नहीं। यह तो निश्चित है कि कभी-न-कभी हम बन्धन से छूट जायेंगे; किन्तु कब, कितना छूटेंगे?- अभी से कोई निर्णय नहीं। केवल कर्म कर! ऐसा समझ कि फल है ही नहीं। मिलना-जुलना कुछ नहीं और करने में अश्रद्धा भी न हो। कौन अकारण खाक छानता फिरे? हाँ, अन्त में कभी कल्याण हो जायेगा। इससे अच्छा तो ज्ञानयोग है जिसमें साधक अपनी गति-प्रगति को देखते हुए चलता है। इसलिए तीसरे अध्याय में अर्जुन ने प्रश्न किया-
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। (गीता, 3/1)
‘‘भगवन्! यदि निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानमार्ग आपको श्रेष्ठ मान्य है तो फिर मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? (कर्मों में अर्जुन को भयंकरता दिखाई देती है।) मिले हुए से वाक्यों से आप मेरी बुद्धि को मोहित क्यों करते हैं? कृपया निश्चित करके उस एक मार्ग को कहिए, जिससे मैं परमकल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।’’ अर्जुन परमकल्याण का इच्छुक था।
भगवान कहते हैं- अर्जुन! दो प्रकार की निष्ठा पहले मेरे द्वारा कही गयी है। पहले का तात्पर्य सतयुग या त्रेता नहीं बल्कि अभी-अभी अध्याय दो में कह आये हैं। इसी को सुनकर तो अर्जुन का प्रश्न खड़ा हुआ। अर्जुन! मेरे द्वारा दो प्रकार की निष्ठा कही गयी- ज्ञानियों को ज्ञानयोग से और योगियों को निष्काम कर्मयोग से; किन्तु किसी भी मार्ग में कर्मों को छोड़ने का विधान नहीं है। कर्म तो हर दशा में करना ही होगा। ऐसा नहीं है कि कर्मों को न करके कोई नैष्कर्म्य की परमसिद्धि को प्राप्त कर ले। निष्कर्म का आशय अकर्मण्य नहीं होता। हम कुछ न करें तो हो गये निष्कर्मी? कोई ऐसा बचाव न ढूँढ़ लें इसलिए श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि अर्जुन! कर्मों को न करने से न तो कोई नैष्कर्म्य को प्राप्त होता है और आरम्भ की हुई क्रिया को त्याग देने से न तो कोई संन्यास की परमसिद्धि पाता है। बहुत से लोग कहते हैं- हम तो ज्ञानी हैं, अग्नि नहीं छूते, हमारे लिए भजन का कोई विधान नहीं है। आगे कोई परमात्मा नहीं है तो किसको भजें?, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादि…। प्राप्ति के पश्चात् ठीक ऐसा ही है लेकिन किये बिना कोई पाता नहीं। श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि क्रिया का त्याग करके न तो कोई निष्कर्मी बनता है और न संन्यास की परमसिद्धि को ही पाता है। अब आपको ज्ञानयोग अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, कर्म तो हर दशा में करना ही होगा; क्योकि कोई पुरुष क्षणमात्र कर्म किये बिना नहीं रह सकता।
प्रश्न– महाराजजी! अध्याय चार में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ की पूर्ति में ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाता है। सम्पूर्ण कर्मों की ज्ञान पराकाष्ठा है। ज्ञान में सम्पूर्ण कर्म विलय हो जाते हैं। ऐसे पुरुष द्वारा कर्म होते ही नहीं और यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानयोग अच्छा लगे या निष्काम कर्मयोग, कर्म तो करना ही होगा। ऐसा विरोधाभास क्यों?
उत्तर– श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।’ (गीता, 3/5)- प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश जीव हर हालत में क्रिया में बरतता है। जब तक प्रकृति है, प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों का मस्तिष्क पर दबाव है, तब तक किसी-न-किसी रूप में कर्म तो करना ही होगा। प्रकृति के आश्रित हुआ पुरुष कर्म किये बिना नहीं रह सकता; किन्तु जिस समय ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’ (गीता, 4/19)- ज्ञान में कर्म विलय हो जाता है उस समय प्रकृति का विलय हो जाता है, इसलिए उस पुरुष द्वारा कर्म नहीं होता।
अतः जब तक पुरुष प्रकृति से पार नहीं हो जाता, कर्म करना ही पड़ता है। फिर भी जो पुरुष हठ से इन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिन्तन करते हैं और कहते हैं- मैं ज्ञानी हूँ, मैं पूर्ण हूँ, मैं परमतत्त्व में स्थित हूँ, श्रीकृष्ण कहते हैं- वे दम्भाचारी हैं, पाखण्डी हैं। अर्जुन तू नियत कर्म को कर!
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।। (गीता, 3/8)
सिद्ध है कि कर्म बहुत से हैं, उनमें से कोई कर्म निर्धारित किया गया है। सोलहवें अध्याय के अन्त में कहते हैं- जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बरतता है वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परमगति तथा सुख को ही प्राप्त होता है। इसलिए कार्य और अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। अतः शास्त्र द्वारा नियत कर्म को कर। किस शास्त्र द्वारा नियत? अन्य शास्त्रों से यहाँ तात्पर्य नहीं; गीता शास्त्र द्वारा निर्धारित कर्म कर! ‘गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।’ (महाभारत, भीष्मपर्व, 43/1) कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेयतर है क्योंकि करने से कुछ दूरी तय तो होगी। कर्म न करने से शरीर-यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी।
प्रश्न– महाराजजी! शरीर–यात्रा का क्या अर्थ है? क्या शरीर–निर्वाह नहीं होगा?
उत्तर– नहीं, आप शरीर तो हैं नहीं! यह जीवात्मा युग-युगान्तरों से शरीरों की यात्रा करता आया है। कीट-पतंग, देव-दानव-मानव इत्यादि योनियों को यह जीवात्मा बदलता रहता है। यह यात्रा तभी पूरी होती है जब यह शाश्वत ब्रह्म में समाहित हो जाय। यदि एक जन्म भी लेना पड़ा तो यात्रा अभी जारी है।
सिद्ध है कि कर्म ऐसी वस्तु है जो आत्मा की शरीर-यात्रा पूर्ण कराती है। यह आत्मा को वह अचल स्थिति दिलाती है, जिसके पश्चात् शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती।
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नियत कर्म है क्या? श्रीकृष्ण उस नियत कर्म पर प्रकाश डालते हैं-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। (गीता, 3/9)
यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है, जिससे यज्ञ पूरा होता है। ‘अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’- इस यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्यत्र जो कुछ भी किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है। कर्म तो ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (गीता, 4/16)- संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला है। कर्म तो शरीर-यात्रा पूर्ण करानेवाला है। इसीलिए अर्जुन! उसी यज्ञ की पूर्ति के लिए संगदोष से अलग रहकर कर्म का आचरण कर। कर्म एक ऐसी विधा है जिसका आचरण संग-दोष के रहते असम्भव है। इसलिए संग-दोष से अलग रहकर यज्ञ की पूर्ति के लिए भली प्रकार आचरण कर। अब एक नवीन प्रश्न उपस्थित होता है कि यज्ञ है क्या, जिसकी प्रक्रिया ही कर्म है? कर्म वही है जिससे यज्ञ सम्पन्न होता है, तो वह यज्ञ कौन-सा है, क्या है? उस यज्ञ में क्या करना पड़ेगा? यज्ञ की उत्पत्ति एवं विशेषताओं का सविस्तार निरूपण करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- इस यज्ञ से देवत्व की वृद्धि करो। दैवी सम्पद् ज्यों-ज्यों बलवती होगी त्यों-त्यों तुम्हारी प्रगति होगी। इस प्रकार परस्पर क्रमशः उत्थान करते-करते परमकल्याण को प्राप्त हो जाओ। यह यज्ञ ऐसा है कि जो परमकल्याण के नीचे की बात नहीं करता। अध्याय चार में श्रीकृष्ण बताते हैं कि बहुत से लोग देवयज्ञ करते हैं, दैवी सम्पत्ति को बलवती बनाते हैं। विवेक, वैराग्य, शम, दम, एकाग्रता, ध्यान, समाधि, चिन्तन की प्रवृति- यही सब दैवी सम्पत्ति है (सोलहवें अध्याय में जिसका विशद विवेचन है)। इसी को भली प्रकार स्थायित्व देने के लिए साधन करते हैं। दूसरे योगी इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं। बहुत से साधक शब्दादि विषयों को इन्द्रियों में हवन कर देते हैं अर्थात् विषयों के प्रति अपना भाव बदल लेते हैं। बहुत से योगी योग-यज्ञ अर्थात् निष्काम कर्मयोग द्वारा इसी यज्ञ को करते हैं, तो अनेक स्वाध्याय ज्ञान-यज्ञ द्वारा स्वयं को सामने रखकर अपनी भलाई-बुराई, हानि-लाभ का स्वयं निर्णय करके इस यज्ञ का आचरण करते हैं। ज्ञानयोगी स्वयं पर आश्रित रहता है, जब कि निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर उसी क्रिया को करता है। यज्ञ एक ही है; कर्त्ता दो शैलियों के हैं। बहुत से योगी प्राण को अपान में और अनेक अपान में प्राण को हवन करते हैं अर्थात् श्वास-प्रश्वास का चिन्तन करते हैं। बहुत से योगी प्राण-अपान की गति रोककर प्राणायाम-परायण हो जाते हैं। प्राणों की गति का याम हो जाता है, सर्वथा निरोध की अवस्था आ जाती है। न भीतर से संकल्प उठते हैं न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं। इस यज्ञ की प्रक्रिया में चराचर जगत् ही हवन-सामग्री है। जगत् है तो लम्बा-चौड़ा किन्तु मनुष्य के लिए उतना ही है जितना मन पर अंकित है। मन के निरोध के साथ ही जगत् पर विजय है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः’- उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही संसार जीत लिया गया जिनका मन समत्व में स्थित है। क्यों? मन की स्थिति और संसार जीतने से क्या सम्बन्ध? तो ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः’ (गीता, 5/19) ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर मन भी समत्व की स्थिति वाला हो गया इसलिए ब्रह्म में स्थित हो जाता है। उस रहनी में संसार होता ही नहीं। इस प्रकार जब प्राण-अपान की गति का निरोध हो गया, संकल्प शान्त हो गये, सिद्ध है वह मन की निरोधावस्था है। इस निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है, ‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।’ (गीता, 4/31) यज्ञ के परिणामस्वरूप उत्पन्न ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। इस यज्ञ की पूर्तिकाल में मन का सर्वथा निरोध और निरोध के साथ ही वह परमात्मा जो है, जिन विभूतियों और जिन गुणधर्मों वाला है; विदित हो जाता है। साक्षात्कार का ही नाम ज्ञान है। उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन, शाश्वत ब्रह्म में प्रविष्ट एवं स्थित हो जाता है। अर्जुन! यह सम्पूर्ण यज्ञ मन और इन्द्रियों की क्रिया द्वारा सिद्ध होनेवाले हैं। तो क्या उनमें चावल, तिल, घी नहीं लगता? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं! भौतिक वस्तुओं से सिद्ध होनेवाला यज्ञ अत्यन्त अल्प है। है वह भी यज्ञ, उपादेय भी है क्योंकि प्रारम्भ वहीं से होता है; किन्तु इन यज्ञों की तुलना में अत्यन्त अल्प है। जिन यज्ञों पर श्रीकृष्ण ने बल दिया, वे सभी उन्हीं के शब्दों में मन और इन्द्रियों की क्रिया से सम्पन्न होनेवाले हैं। (गीता, 4/32)
यह श्वास-प्रश्वास का हवन यदि फरसा चलाने से होता तो कीजिए। प्राण-अपान की गति का निरोध कपड़ा बेचने से होता है तो कीजिए। नौकरी या नेतागिरी से होता हो तो कीजिए। सिद्ध है कि दुनिया में जो कुछ किया-कराया जाता है, जिसमें लोग दिन-रात व्यस्त रहते हैं; कर्म नहीं है। वह तो इसी लोक का एक बन्धन है। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है अर्थात् कर्म का तात्पर्य आराधना है। इस आराधना में बहुत से योगी देवयज्ञ करते हैं। अनेक ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ करते हैं तो कोई प्राण का अपान में और अपान का प्राण में हवन करते हैं। लगता है यह अनेक प्रकार केे योगी हों; किन्तु नहीं, यह सभी एक ही साधना की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। प्रत्येक साधक को इन सभी भूमिकाओं से गुजरना पड़ता है। प्रारम्भ में प्रत्येक साधक दैवी सम्पद् को बलवती बनाता है। शनैः-शनैः वह संयमाग्नि पर पहुँचता है, तत्पश्चात् शब्दादि संग-दोषों से बचने की युक्ति में प्रवेश पाता है। क्रमशः श्वास-प्रश्वास में प्रवेश हो जाता है और श्वास-प्रश्वास का निरोध होते ही मन के लय की स्थिति में यज्ञ के परिणाम पर पहुँचता है। यह सभी एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। इस प्रकार जो भी जानते हैं, यज्ञ के भेद के जानकार हैं। ये सभी यज्ञ मन और इन्द्रियों की अन्तःक्रिया से सिद्ध होनेवाले हैं, भौतिक द्रव्यों का उपयोग नहीं है। इस प्रकार श्रीकृष्ण आराधना को ही कर्म मानते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! कर्म क्या है, अकर्म क्या है, विकर्म क्या है? इसमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् भी भ्रमित रहते हैं। इसलिए कर्म के उस तत्त्व को मैं तेरे लिए कहूँगा, जिसे जानकर तू संसार-बन्धन से सर्वथा छूट जायेगा-(गीता, 4/16)। कर्म ऐसी प्रक्रिया है जो संसार-बन्धन से छुड़ाती है। कर्म, अकर्म और विकर्म तीनों के स्वरूप को जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है। कर्म में अकर्म देखना चाहिए अर्थात् आराधना तो करें किन्तु यह न सोचें कि मैं आराधना करता हूँ। करानेवाली सत्ता तो कोई और है। बैल हल नहीं जोतते यद्यपि हल का सम्पूर्ण भार बैलों के कन्धे पर रहता है। हल तो वह हलवाहा जोतता है जो बैलों के पीछे रहकर दिशा-निर्देशन करता रहता है, अन्यथा बैल क्या जानें कि किधर जोतना है। इसी प्रकार सम्पूर्ण साधना साधक को ही करनी पड़ती है लेकिन उसके द्वारा जो पार लग जाता है, वह उसी प्रेरक की देन है, संचालक की देन है। भजन तो स्वयं हरि करते हैं। साधक तो मात्र यंत्र है। वह जिधर संकेत करें, उधर लुढ़कता भर रहे, यही भजन है। इस प्रकार कर्म में अकर्म देखने की क्षमता आ गयी उसी को कर्म जानें। कर्म में अकर्म देखें और अकर्म को (इष्ट के आदेशों को ही) कर्म जानें। इस प्रकार जो करता है वही मनुष्यों में बुद्धिमान् है, वही सम्पूर्ण कर्मों को करनेवाला है। केवल इष्ट के आदेशों पर चलनेवाला व्यक्ति ही सम्पूर्ण कर्म को करता है, जिससे किंचित् मात्र भी भूल होने की सम्भावना नहीं रहती। कर्म एवं अकर्म से उन्नत विकर्म की स्थिति है। विकर्म अर्थात् विशेष कर्म, अर्थात् जो प्राप्तिवाले महापुरुषों द्वारा लोकहितार्थ होता है। ‘वि’ उपसर्ग यहाँ पर विशिष्टता का द्योतक है, जैसे-जितेन्द्रिय में ‘वि’ उपसर्ग लगाने से विजितेन्द्रिय शब्द सृजित होता है, जिसका अर्थ है- विशेष रूप से जीती हुई इन्द्रियाँ। इस प्रकार विकर्म अर्थात् विशेष कर्म। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों द्वारा किया गया विशिष्ट कर्म ही विकर्म है।
प्रश्न उठता है कि साधक सदैव कर्म करता रहेगा या कभी छुटकारा भी मिलेगा? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, 4/19)
सम्पूर्णता से आरम्भ की हुई क्रिया, जिसमें लेशमात्र भी त्रुटि न हो, क्रमशः उत्थान होते-होते इतनी सूक्ष्म हो गयी, जहाँ काम और संकल्प नहीं हैं। काम और संकल्पों का निरोध होना मन की विजेतावस्था है। मन का प्रसार ही तो जगत् था। जब मन का निरोध हो गया तो वह अव्यक्त, शाश्वत, परमतत्त्व प्रत्यक्ष हो जाता है। इस प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’- उस जानकारी के साथ ही कर्म सदा के लिए जल जाते हैं। ऐसी स्थितिवालों को बोधस्वरूप महापुरुषों ने पण्डित एवं ज्ञाता कहकर सम्बोधित किया है। सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो मन को कामनाओं और संकल्पों से ऊपर उठा देती है। सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में कामनायें बढ़ती जाती हैं। अतः वास्तविक कर्म आराधना ही है जिसमें साक्षात् जानकारी के पश्चात् कुछ पाना शेष नहीं रहता। इसलिए कामनाएँ भी नहीं रह जातीं।
अध्याय सोलह में श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! संसार में मनुष्य दो प्रकार का होता है- एक देवताओं-जैसा; दूसरा असुरों-जैसा। किस प्रकार? श्रीकृष्ण कहते हैं- अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद्। आसुरी सम्पद् अधोगति एवं नीच योनियों में फेंकने के लिए है, जबकि दैवी सम्पद् परमकल्याण के लिए है। इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, एकाग्रता, सरलता, सही जानकारी, धारावाही चिन्तन, ध्यान, समाधि इस प्रकार दैवी सम्पद् के चौबीस लक्षण गिनाये जो सब-के-सब प्राप्ति के लिए समीपवाले महापुरुषों में सम्भव हैं; आंशिक रूप से हममें आप में भी हो सकते हैं। अर्जुन! तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है। शोक मत कर! तू मुझमें निवास करेगा। तदनन्तर, श्रीकृष्ण आसुरी सम्पद् का सविस्तार वर्णन करते हैं। काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर इत्यादि आसुरी सम्पद् हैं। आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष सोचता है कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति है, भविष्य में इतनी और होगी। मैं ही ईश्वर एवं ऐश्वर्य का भोक्ता हूँ। ईश्वर नाम की और कोई सत्ता नहीं है। स्त्री-पुरुष के संयोग से जो कुछ उत्पन्न है यही सत्य है। मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान करूँगा। मेरे द्वारा वह शत्रु मारा गया, भविष्य में मैं उसे मारूँगा।- अर्जुन! ऐसा सोचनेवाला दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को कृश करनेवाला है। वे शत्रुओं को नहीं मारते बल्कि मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं। अर्जुन! ऐसे मनुष्यों को मैं नीच योनियों में ही बार-बार गिराता हूँ। वे मेरे को प्राप्त न होकर, जो उन्हें प्राप्त है, उससे भी नीच योनि को प्राप्त होते हैं। तो क्या अर्जुन ने युद्ध किया? यदि वह प्रण करके किसी को मारता, सांसारिक कार्यों में अनुरक्त रहता तो श्रीकृष्ण में निवास कभी नहीं करता। कर्म तो संसार-बन्धन से छुड़ाता है, नीच योनियों में नहीं गिराता।
दैवी सम्पद् परमदेव परमात्मा को लक्ष्य बनाकर गठित होती है; किन्तु आसुरी सम्पत्ति का आधार क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘अर्जुन! काम, क्रोध तथा लोभ ही नरक के तीन द्वार हैं। इन्हीं पर आसुरी सम्पत्ति टिकी है। इन तीनों के त्याग देने पर ही कर्म का आरम्भ होता है जिससे परमगति, परम कल्याण की प्राप्ति होती है। (गीता, 16/22) कर्म वह प्रक्रिया है, काम-क्रोध-लोभ त्यागने पर ही जिसमें प्रवेश मिलता है।
प्रश्न– महाराजजी! जब काम, क्रोध, लोभ को त्यागने पर ही कर्म का आरम्भ होता है तब तो साधारण मनुष्यों के लिए कर्म का विधान नहीं होना चाहिए; क्योंकि आरम्भ में वे हमसे छूटते नहीं, केवल मान लेने से त्याग तो नहीं हो जाता?
उत्तर– हाँ! प्रारम्भ में छूटते तो नहीं किन्तु यही तो युद्ध है। इसी के लिए तो साधन किया जाता है। संसार इसी में अनुरक्त है और आप उसी को छोड़ना चाहते हैं, यही क्या कम है? ज्यों-ज्यों ये विकार अन्दर से घटते जायेंगे, त्यों-त्यों कर्म में प्रवेश मिलता जायेगा। विचारणीय तो यह है कि दुनिया में जो कुछ किया जाता है, जगत् जिसमें मोहित है, रात-दिन व्यस्त है, क्या कर्म है? उसमें जो जितनी सफलता पाता है काम, क्रोध और लोभ उसके भीतर उतने ही सजे-सजाये मिलते हैं, अधिक मात्रा में मिलते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन तीनों के त्याग देने पर ही उस कर्म का आरम्भ होता है। स्पष्ट है कि सांसारिक क्रिया-कलाप कर्म नहीं हैं। श्रीकृष्ण जिसे कर्म मानते हैं एकमात्र आराधना ही है। त्याग के बिना उसका आरम्भ ही नहीं होता।
प्रश्न– महाराजजी! घर त्याग देने से क्या कर्म आरम्भ हो जाता है? क्या काम, क्रोध, लोभ छूट जाते हैं?
उत्तर– छूटते तो नहीं; किन्तु प्रबल विरह-वैराग्य होने पर भगवान के लिए गृहत्याग से इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण करनेवाली प्रवृत्ति तो शान्त होती ही है। प्रत्येक विषय की दो सीमायें होती हैं- एक तो निम्नतम सीमा, जहाँ से आप उसमें प्रवेश करते हैं और दूसरी अधिकतम सीमा होती है, जिसे पराकाष्ठा कहते हैं। उदाहरण के लिए, भक्ति की निम्नतम सीमा वह है, जहाँ से समर्पण के साथ आप भजन आरम्भ करते हैं, किन्तु अधिकतम सीमा तो वह है जहाँ ‘भग इति सः भक्ति।’ प्रकृति की इति है। प्रकृति से परे पुरुषत्व में स्थिति दिला देनेवाली अवस्था भक्ति की चरम सीमा है। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु की दो सीमाएँ होती हैं। इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण करना बन्द करके कर्म अर्थात् आराधना में प्रवृत्त होना, काम-क्रोध-लोभ के त्याग की प्रवेशिका है और ज्यों-ज्यों मन निरुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों विकारों का भी निरोध होता जायेगा और अन्ततः वे सर्वथा मिट जायेंगे। कर्म में आपको प्रवेश मिल जायेगा। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है जिसमें काम, क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही प्रवेश मिलता है।
गीता (7/28-29) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्’- अर्जुन! पुण्य कर्म अर्थात् कार्यम् कर्म, नियत कर्म या यज्ञ की प्रक्रिया कहकर जिसे गीता में बार-बार समझाया गया है, उस कर्म को करनेवाले जिन भक्तों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि के द्वन्द्व से भली प्रकार मुक्त होकर व्रत में दृढ़ रहकर मुझे भजते हैं तथा जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं, मुझे जानकर मुझमें ही स्थित हो जाते हैं अर्थात् कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो इन सबसे परिचय कराता है। इसीलिए कर्म माने आराधना, कर्म माने चिन्तन। तब अर्जुन ने प्रश्न किया, ‘‘भगवन्! वह ब्रह्म क्या है? सम्पूर्ण अध्यात्म क्या है? कर्म कब सम्पूर्ण होता है?’’ इत्यादि सात प्रश्न अर्जुन ने किये। भगवान श्रीकृष्ण ने एक ही उत्तर दिया-
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।। (गीता, 8/3)
अक्षर- जिसका कभी नाश नहीं होता, वही परब्रह्म है। जिसे प्राप्त कर लेने पर भक्त का कभी क्षय नहीं होता। लोभ के भाव, पुत्र के भाव इत्यादि संसार के भाव सिमटकर ‘स्व’ में स्थिर हों, यही अध्यात्म की पराकाष्ठा है। ‘अधि आत्म’ अर्थात् आत्मा का आधिपत्य। जीवों पर माया का आधिपत्य है, उससे छूटकर आत्मा का आधिपत्य, आत्मा की स्थिति आ जाय इसी का नाम अध्यात्म है। ‘स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते’- स्वरूप में स्थिर भाव ही अध्यात्म है। ‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः’- भूतों के वे भाव जिनसे कुछ न कुछ संरचना हेाती है, उन पर विसर्ग लग जाना, सर्वथा निरोध हो जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। भूत प्राणियों को कहते हैं। इन प्राणियों की उत्पत्ति संकल्प पर आधारित है- ‘मन महँ तथा लीन नाना तनु प्रगटत अवसर पाये।’ (विनयपत्रिका, 124/4) अतः भूत का तात्पर्य संकल्प है। संकल्पों में उत्पन्न वे भाव, जिनके द्वारा शुभ अथवा अशुभ कुछ न कुछ संरचना होती रहती है, जो संसार है, उनका विसर्ग- सर्वथा निरोध हो जाना, विराम- रोक लग जाना ही कर्म की संज्ञा है, पूर्णता है। इसके उपरान्त कर्म करने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती। कर्म वह वस्तु है जो संकल्पों पर विसर्ग लगा देता है। दूसरे शब्दों में, कर्म का तात्पर्य आराधना ही है।
इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में सम्पूर्ण गीता में कर्म पर भरपूर प्रकाश डाला गया है और सब मिलाकर उसका शुद्ध अर्थ है- ‘आराधना’, जो शाश्वत तत्त्व परमात्मा की उपलब्धि कराती है। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। निर्धारित कर्म को ही कर, नहीं तो शरीर-यात्रा सिद्ध नहीं होगी। कर्म करके तू संसार-बन्धन से छूट जायेगा। यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्यत्र जो कुछ किया जाता है, इसी लोक का एक बन्धन है। यह श्वास-प्रश्वास का चिन्तन है। इन्द्रियों का संयम यज्ञ है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो काम और संकल्पों से ऊपर उठा देता है। काम-क्रोध-लोभ त्यागने पर ही कर्म का आरम्भ होता है। भूतों के वे भाव, जिनसे कुछ-न-कुछ संरचना होती है उनका निरोध हो जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। अतः योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में कर्म का शुद्ध अर्थ आराधना ही है, इसमें दो राय नहीं है। जिससे वे आराध्य देव सन्तुष्ट होते हैं, उस प्रक्रिया-विशेष का नाम कर्म है।
गीता पर सैकड़ों टीकाएँ मिलती हैं, जिनमें पचासों टीकाएँ तो अकेले संस्कृत में ही हैं। पचीसों मत, जिनकी आधारशिला गीता है, एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो कोई एक बात ही कही होगी, फिर इतना वैभिन्न्य क्यों? राजनीतिज्ञ के हाथ में गीता पड़ी, तो बोले- देशभक्ति ही कर्म है। व्यवसायी कहते हैं- गीता में लिखा है, ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ (गीता, 2/41)- व्यवसाय ही कर्म है। कपड़ा बेचो, कुछ धरम-करम कर लो, सवेरे शंकरजी पर जल चढ़ा दो, हो गया कर्म। नौकरीवाले कहते हैं- हम तो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, पूरी ड्यूटी देते हैं, यही निष्काम कर्म है। एक नायब तहसीलदार साहब कहते थे- बड़े साहब जो भी कहते हैं, उसी के अनुसार मैं कर्म करता हूँ। गीता मैंने अपने जीवन में ढाल ली। हमारी कोई कामना नहीं है। हम निष्काम कर्मयोगी हैं। वाह रे योगी! अतः आप किसी भी टीका पर न जायँ। योगेश्वर की मूल वाणी ग्रहण करें तो कोई सन्देह नहीं होगा।
प्रत्यक्ष दर्शनवाले अनेक महापुरुष पढ़े-लिखे नहीं थे। रामकृष्ण परमहंस पढ़े-लिखे नहीं थे। हमारे महाराज भी एकदम नहीं पढ़े थे। राम लिखना भी उन्हें ठीक से नहीं आता था। देखरेख करके येन-केन प्रकारेण राम की लकीर खींच लेते थे। जड़भरत पढ़े-लिखे नहीं थे। काकभुशुण्डि पढ़े-लिखे नहीं थे, ‘हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।’– पिता हताश हो गये परन्तु वे नहीं पढ़े। ठीक इसी प्रकार बहुत से महापुरुष ऐसे मिलेंगे जो पार्थिव शिक्षा-दीक्षा में शून्य थे लेकिन अपने युग के सर्वश्रेष्ठ विद्वान् थे। काकभुशुण्डि आश्रम में भगवान शंकर भी जाया करते थे। अतः यदि आप पढे़-लिखे हैं तो ठीक है अन्यथा कोई क्षति भी नहीं है। क्योंकि इष्ट से समत्व दिलानेवाली क्रिया जिसका नाम कर्म अथवा आराधना है, विरह-वैराग्य से सीेखने में आती है। लौकिक शिक्षा बुद्धि का प्रसार करती है, जबकि इष्ट-सम्बन्धी कर्म के लिए बुद्धि-मन का निरोध होना आवश्यक है। अतः किसी अनुभवी पुरुष की शरण में रहकर साधना करनी चाहिए। कहने में कुछ और आता है, लिखने में कुछ और आता है; किन्तु क्रियात्मक आचरण से उन महापुरुषों द्वारा, आत्मा की अन्तस्प्रेरणा से साधन-क्रम जागृत हो जाता है, वह और विलक्षण है। आरम्भ हो जाने के पश्चात् फिर वह कभी भी पिण्ड नहीं छोड़ता, कभी नष्ट नहीं होता, ध्रुव-कल्याण करता है। योग में आरम्भ का भी नाश नहीं है। थोड़ी भी साधना करें, आरम्भ तो करें।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)