साइंस का भाषानुवाद ‘विज्ञान’
प्रश्न– महाराजजी! प्राचीनकाल की अपेक्षा आजकल विज्ञान अधिक प्रगति पर है। इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर– विद्यार्थियो! आप लोगों ने एम.एस-सी., डबल एम.ए. सब कुछ किया। बता सकते हो कि साइंस का नाम विज्ञान क्यों पड़ा? कब पड़ा? हिन्दी में साइंस को विज्ञान कहते हैं, क्या यह उचित है? आप कहते हैं कि आजकल साइंस बड़ी प्रगति पर है। आज से दो-ढाई सौ वर्ष पूर्व हवाई जहाज की इस रूप में कदाचित् कल्पना भी नहीं थी। लेकिन आज वह सर्वसुलभ होता जा रहा है। राकेट, बम, परमाणु, हाइड्रोजन, मिसाइल और न जाने क्या-क्या आविष्कार होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि घर बैठे-बैठे हजारों मील की दूरी तक विध्वंस करना सम्भव हो गया है। रोशनी, बिजली आप देख ही रहे हैं। चकाचौंध कर देनेवाले टेलीविजन भी आप देखते ही हैं, जिस पर हजारों मील दूर के दृश्य उभरते हैं। चन्द्रमा तक के दृश्यों को संसार ने देखा। मोटर, ट्रेन इत्यादि आविष्कार आप देख रहे हैं, जिसमें आये दिन परिवर्तन होते ही रहते हैं। अंग्रेजी माध्यम से इन सबका नाम साइंस ही है।
यह साइंस आज ही प्रगति पर है, ऐसी कोई बात नहीं है। आज से हजारों-लाखों वर्ष पूर्व इस पृथ्वी पर सैकड़ों बार आविष्कार हुए और आविष्कार जब पराकाष्ठा पर पहुँचा, तो इसका परिणाम क्या हुआ? सर्वनाश! सैकड़ों बार यह साइंस प्रगति पर आई, भौतिक आविष्कार हुए, शक्तियाँ परस्पर टकराईं और उसका परिणाम भयंकर संघर्ष निकला। देवासुर-संग्राम से शास्त्र भरे पड़े हैं, आज से लाखों वर्ष पूर्व की ऐतिहासिक घटना है। इतिहास तो आप जानते ही होंगे! पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं कि भारतवासी इतिहास लिखना नहीं जानते थे, यह गलत है। प्राचीन इतिहास पुराणों में अक्षुण्ण है। उनमें पुरानी घटनाएँ अंकित हैं इसलिए उन्हें पुराण कहा जाता है। कालान्तर में उसी का नाम इतिहास पड़ा, जिससे इति का आभास मिलता है।
लाखों वर्ष पूर्व सत्ययुग में हिरण्यकशिपु नामक एक क्षत्रिय नरेश हुआ। उसने अपनी वेधशाला में यहाँ तक आविष्कार कर लिया कि न दिन में मरें न रात में मरें, न अस्त्र से मरें न शस्त्र से, न पशु-पक्षी से मरें, न मानव से। जब उसने सोच लिया कि अब हमें मरना ही नहीं है तो वह इतना उन्मत्त हो गया कि भगवान क्या होता है? लगा अपनी पूजा करवाने।
हिरण्यकशिपु की इन सफलताओं के पीछे उनके गुरु शुक्राचार्य का हाथ था। असुरों की जितनी भी फौज मरती, आचार्य गुरु सबको संजीवनी विद्या से जीवनदान देते गये। यह आविष्कार देवगुरु बृहस्पति के पास नहीं था इसलिए देवता हार गये। हिरण्यकशिपु के प्रपौत्र महाराज बलि की फौज मारी गयी, स्वयं उनका गला कट गया फिर भी दैत्य-गुरु ने उनको पुनः जीवित कर दिया। अन्ततः देवता लोग भागकर भगवान विष्णु की शरण गये- ‘त्राहि माम्, शरणागतम्’। विष्णु ने कहा- मैं बलि को मार तो नहीं सकता, वह भी भक्त है मेरा! हाँ, मैं किसी उपाय से तुमलोगों को देवलोक पुनः दिला दूँगा। भगवान ने वामन रूप धारणकर देवताओं को उनका खोया राज्य दिला दिया, बलि को अपना लिया। बलि के कुछ पीढ़ी पश्चात् महाराज वृषपर्वा तक शुक्राचार्य का उल्लेख मिलता है। बृहस्पति पुत्र कच संजीवनी विद्या सीखने शुक्राचार्य के पाय गये किन्तु उनकी पुत्री देवयानी के कारण असफल रहे। उस समय यंत्रों का आविष्कार भी था किन्तु असुर शरीर-प्रधान होने के कारण शरीर में ही शक्तियाँ प्रसारित कर लेते थे।
इसके पश्चात् त्रेतायुग में रावण नामक एक नरेश हुआ। पहले वह नास्तिक नहीं था, भक्त था। जैसा कि अभी आपने देखा, साइंस जब प्रगति पर आती है, उसका परिणाम सर्वनाश निकलता है। किन्तु इसके पूर्व ही एक अन्य परिणाम होता है- नास्तिकता की अभिवृद्धि। रावण भी पहले भक्त था। क्रमशः उसने यहाँ तक आविष्कार किया कि सर कटने पर भी वह न मरे। ऐसे-ऐसे यन्त्र बनाये कि उसे कोई न देखे; किन्तु वह सबको देखे। उसका लड़का मेघनाद युद्ध में क्रुद्ध होकर जब आगे बढ़ा, तो अदृश्य होकर लड़ने लगा। वह रथ पर आरूढ़ था किन्तु अदृश्य था। वह सबको देख रहा था, निशाने साध रहा था लेकिन उसको कोई देख नहीं रहा था। क्या आज भी है कोई आविष्कार जो उससे आगे हो? सिद्ध है कि उस समय का साइंस आज की अपेक्षा अधिक प्रगति पर था। हनुमानजी ने लंका में आग लगा दी तो रावण के संकेत पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। वृष्टि पर रावण का अधिकार था। आजकल भी लोग पानी बरसाने का कृत्रिम उपाय सोच रहे हैं। परन्तु अभी सफल नहीं हो सके।
एक समय रावण अमरकण्टक में शिव की पूजा कर रहा था। उसी समय एक शक्तिशाली नरेश सहस्रार्जुन ने नर्वदा नदी का प्रवाह रोक दिया। रावण जहाँ पूजा कर रहा था, जल का स्तर बढ़ गया, फूल बह चले। पता चलने पर रावण के सेनापति प्रहस्त ने आक्रमण कर दिया। शत्रु सबल था अतः प्रहस्त ने सबल यन्त्र मूसल उठाया। मूसल जब चलने को हुआ तो उसके अग्र भाग से प्रलयकालीन लपटें निकलने लगीं। क्या वह धान कूँटनेवाला साधारण मूसल था? सिद्ध है कि वह यंत्र था। हाँ, उस समय की भाषा के अनुसार उसका नाम मूसल अवश्य था। धान कूटनेवाले मूसल से क्या प्रलयकालीन लपटें निकलती हैं। उस समय भी आविष्कार कितना आगे था।
इतने पर भी आविष्कार शान्त नहीं था। शोध जारी था। रावण ने निर्णय किया कि मैं स्वर्ग में सीढ़ियाँ लगवा दूँगा, काल का भय संसार से समाप्त कर दूँगा, अग्नि से धुआँ मिटा दूँगा- इत्यादि। आविष्कार पराकाष्ठा पर पहुँचा, तहाँ वह मदान्ध हो गया। पहले तो उसने भगवान को तिलांजलि दी, गालियाँ दी, कहने लगा- मैं ही ईश्वर हूँ। फिर उसने सर्वत्र आक्रमण करना, विध्वंस करना प्रारम्भ किया।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देश निकासइ जो कह बेद पुराना।। (मानस, 1/182/छन्द)
रावण ‘धर्म’ कानों से सुन भर लेता तो इतना बौखला उठता था कि स्वयं उसे नष्ट करने दौड़ पड़ता था, सेना भेज देता था।
आजकल भी लोग कहते हैं कि भगवान कुछ नहीं हैं। पूजा-पाठ व्यर्थ है। वस्तुतः मायिक क्षेत्र में खाने-जीने की सुख-सुविधा जब-जब मिली, मनुष्य ने भगवान को अनावश्यक और व्यर्थ की कल्पना माना; परन्तु भगवान ने मनुष्य का साथ तब भी नहीं छोड़ा। भगवान तब भी नष्ट नहीं हुए; क्योंकि वही तो एक ऐसी सत्ता है जो कभी नष्ट नहीं होती।
द्वापर में भी ऐसे आविष्कारों का बाहुल्य रहा। उग्रसेन को कोई पुत्र नहीं था। मन बहलाने के लिए उनकी पत्नी वन में विचरण करने गयीं। उसी जंगल में एक असुर रहता था। उसने सुना कि महाराज उग्रसेन की पत्नी घूमने आयी हैं जो अत्यन्त सुन्दरी भी हैं, उसने जंगल में तूफान खड़ा कर दिया। पेड़ गिरने लगे, बड़े-बड़े पत्थर लुढ़कने लगे, अव्यवस्था फैल गयी, घोड़े तितर-बितर हो गये। ऐसी विषम परिस्थिति में वह असुर पहुँचा। उग्रसेन का रूप बनाया और स्त्री से संयोग किया। जाते समय असुर ने अपना रूप दिखाया। उग्रसेन की पत्नी शाप देने को उद्यत हुई तो असुर ने कहा कि इस समागम से आपको अत्यन्त पराक्रमी पुत्र होगा। जिसे लड़का न हो, उसे लड़के की लालच पर्याप्त होती है। वह बेचारी मन मारकर लौट आई। कंस का जन्म हुआ। शास्त्रकार लिखते हैं कि उस अधम राक्षस ने आसुरी माया का प्रयोग किया। तूफान खड़ा कर देना, आग्नेयास्त्रों का संचालन, वृष्टि करा देना इत्यादि आसुरी माया की संज्ञा में था। द्वापर में ही एक अन्य असुर बाणासुर था। उसने भी अपनी वेधशाला में आश्चर्यजनक आविष्कार किये थे। बाणासुर की कन्या जब विवाह-योग्य हुई, तब बाणासुर ने उसे एक सुरक्षित महल में रख दिया। उसके चारों ओर तीन अक्षौहिणी सेना का पहरा बिठा दिया, जिससे कोई राजा-महाराजा उस अनिंद्य सुन्दरी कन्या का अपहरण न कर सके। उस बालिका ने देखा कि मेरे विवाह के लिए ही इतनी सतर्कता बरती जा रही है अतः उसे चिन्ता हुई। बार-बार चिन्तन करने पर स्वप्न में उसे पति का रूप दिखाई पड़े। उसने अपनी सखी चित्रलेखा को बुलवाया, जो मायावी चित्रकार थी। सपना सुनाकर चित्रलेखा से यह पता करने को कहा कि सपने में उसे कौन मिला था। चित्रलेखा अनेक महाराजाओं के चित्र दिखाती हुई अन्त में जब श्रीकृष्ण का चित्र बनाने लगी तो बाणासुर की कन्या ऊषा ने बताया, यह तो नहीं हैं; किन्तु इनसे बहुत मिलते-जुलते हैं। जब अनिरुद्ध का चित्र आया तो ऊषा ने कहा, बस यही हैं। और जब यही हमारे भावी पतिदेव हैं तो संकोच किस बात का? क्यों न अभी इन्हें किसी युक्ति से लाया जाय। चित्रलेखा गयी और पलंग समेत अनिरुद्ध को उठा लायी। लाखों का पहरा इधर लगा था और ऐसा ही पहरा श्रीकृष्ण के यहाँ भी था। किन्तु न इन्हें पता चला, न उन्हें भान हुआ। आप ही बताएँ कि उस समय साइंस कितना उन्नत थी?
वनवासकाल में पाण्डव अपना समय बिता रहे थे। उसी समय सिन्धुराज जयद्रथ स्त्री-रत्न की तलाश में निकल पड़ा। उस समय बहुविवाह की प्रथा थी। जब वह घोर जंगल से निकला तो एक कुटिया के सामने अतीव सुन्दरी दिखाई पड़ी। जयद्रथ ने कहा कि इतनी सुन्दर स्त्री तो हमने कभी देखी ही नहीं। मन्त्रियों से कहा-‘‘पता लगाओ यह कौन है? कोई मानवी है या देवी है? मनुष्यों के उपभोग योग्य है भी अथवा नहीं?’’ मन्त्रियों ने पता लगाकर बताया कि यह तो पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी है। जयद्रथ ने मन्त्रियों से उसे फुसलवाया और स्वयं भी गया। कहने लगा कि देखो, तुम सुखभोग करने योग्य हो। पाण्डव सुख-समृद्धि से हीन हो गये हैं। अतः तुम हमारे साथ चलो। मैं सिन्धुराज जयद्रथ हूँ। मेरे पास रत्न है, सेना है, तुम हमारे ही योग्य हो। द्रौपदी ने उसे बहुत फटकारा, किन्तु कामान्ध जयद्रथ उसे ले भागा। जब वह तीन-चार मील दूर पहाड़ों की ओट में पहुँच गया तब पाण्डवों को इसकी सूचना मिली। पाण्डव उस समय शिकार खेलने गये थे। अर्जुन ने वहीं से दिव्यास्त्र का सन्धान किया। जयद्रथ के घोड़े धराशायी हो गये, रथ चूर-चूर हो गया; किन्तु जयद्रथ और द्रौपदी को खरोंच तक नहीं आयी और भीम ने दौड़कर उसे पकड़ लिया। क्या आज भी ऐसा कोई अस्त्र है जो पचीस आदमियों में से जिसको चाहे मार दे और जिसे चाहे बचा ले, जबकि शत्रु भी अदृश्य हों? अभी तो नहीं है। सिद्ध है उस समय साइंस आज की अपेक्षा अधिक प्रगति पर था।
महाभारत युद्ध के समय दुर्योधन जब बहुत गिड़गिड़ाया तो भीष्म ने कहा- चलो मैं कल ही युद्ध का फैसला किये देता हूँ। एक ही बाण में सम्पूर्ण पाण्डव सेना को धराशायी कर दूँगा। दूसरे दिन भीष्म ने नारायण अस्त्र का सन्धान किया। वह भयंकर अस्त्र जब चला तब श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘देखो! इस अस्त्र का एक ही निवारण है कि पीठ दिखा दो। यह शूरवीर को ही मारता है। जो इसे पीठ दिखाता है उसे यह क्षमा कर देता है।’’ यह सुनते ही पाण्डव सेना ने पीठ दिखा दी लेकिन भीम ने पीठ नहीं दिखायी। वे तो ताल ठोंककर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने उन्हें सावधान भी किया कि इस तरह तुम मारे जाओगे, पीठ दिखा दो। भीम ने कहा- अपना उपदेश उसी अर्जुन को करो। मैं क्षत्रिय हूँ। मरना तो एक बार है ही। किन्तु मैं पीठ नहीं दिखा सकता। इधर वह अस्त्र सभी ओर से सिमटता हुआ समूचे वेग से भीम की ओर बढ़ने लगा, तो श्रीकृष्ण ने दौड़कर भीम को छाती से लगा लिया। इधर श्रीकृष्ण ने अपनी पीठ दिखायी, उधर भीम की पीठ तो थी ही। इस तरह श्रीकृष्ण ने उस भक्त की रक्षा की। ऐसे-ऐसे अस्त्र-शस्त्र थे जो हाथ से छूटने पर भी युद्धस्थल में यदि कोई उनसे क्षमा माँग ले तो तत्काल उन्हें छोड़ देते थे। क्या आज भी कुछ ऐसे आविष्कार हैं? क्या वे लोहे की साधारण कीलें थीं? विश्व में, विशेषतः भारत में यह साइंस पूर्व में आज की अपेक्षा हजारों गुना बढ़ा-चढ़ा था।
परन्तु जब-जब साइंस पराकाष्ठा पर पहुँचा, उसका परिणाम पहले तो नास्तिकता और तत्पश्चात् सर्वनाश ही हुआ। राम-रावण युद्ध, महाभारत युद्ध में असंख्य जनता मारी गयी। शक्तियाँ जब अधिक बढ़ जाती हैं तो ऐंठने लगती हैं। (जैसे आजकल रूस और अमेरिका ऐंठते रहते हैं।) एक-न-एक दिन उनमें टकराव हो जाता है, जिसका परिणाम सर्वनाश होता है। सर्वनाश का तात्पर्य यह नहीं है कि समूची सृष्टि ही समाप्त हो जाती है; अपितु बहुसंख्या समाप्त हो जाती है। अत्यल्प संख्या में लोग बचे रहते हैं। जैसे एकाध परिवार इस जिला में बचा तो दूसरा परिवार अगले जिले में। एक दीपक मिर्जापुर में जल रहा है तो दूसरा काशी में, तीसरा जौनपुर में। इस प्रकार पचीस-पचीस, पचास-पचास मील पर मनुष्य रहने लगा। जनसंख्या कम हो गयी। मनुष्य मनुष्य को देखने के लिए तरसने लगा। जहाँ घनी आबादी और लहलहाते खेत थे, वे स्थान घोर जंगल में परिणत हो गये। आज आप यहाँ बैठे हैं, यदि कोई पचास वर्ष तक यहाँ न आवे तो यहाँ के हरे-भरे खेतों में घनघोर जंगल पाया जायेगा। वनस्पतियाँ इतनी शीघ्र पनपती हैं कि यह स्थान जंगली जीव-जन्तुओं का एक निवास होगा। आपके पड़ोस में, यहाँ से दो मील पर ‘मदरहवा’ देखते-देखते जंगल बन गया जबकि वहाँ खेती होती थी।
अब मनुष्य उन आविष्कारों को घृणा की दृष्टि से देखने लगा। उसने विचार किया कि यह उन्हीं आविष्कारों की ही तो देन है कि आज हमारा कोई नहीं बचा। केवल हम एक अभागे थे जो बचे। ढूँढ़ने पर कोई साथी भी नहीं मिलता और कहीं मिलता भी है तो पचासों मील की दूरी पर कोई एक मिलता है। अतः वह उन सिद्धान्तों को घृणा की दृष्टि से देखने लगता है जिनको वह अपनी सर्वोपरि उपलब्धि समझता था।
धीरे-धीरे वे आविष्कार लुप्त होते गये और लोग साधारण तरीके से रहने लगे। विनाश और विकास तो सृष्टि का नियम है। जिस क्षेत्र के लोग पहले विकसित हुए, वे सभ्य कहलाने लगे और जहाँ कुछ देर से पनपे वे आदिवासी कहे जाने लगे। आदिवासी का तात्पर्य यह नहीं कि जब ब्रह्मा ने सृष्टि रची या आदम पैदा हुआ तभी से असभ्य बने हुए हैं। वस्तुतः वे कई बार सभ्य रह चुके हैं।
इस प्रकार आविष्कार तो बहुत उच्चकोटि के हुए लेकिन उनके आविष्कर्ताओं को किसी ने वैज्ञानिक नहीं कहा। उन्हें असुर कहा जाता था। सुर देवता को कहते हैं। परमदेव परमात्मा पर विश्वास करनेवाले और उसकी ओर चलनेवाले सुर कहलाते हैं। उसे केवल माननेवाले मानव कहलाते थे- जो हृदय में आस्था को सँजोये हैं किन्तु व्यस्तता के कारण ईश्वर-चिन्तन में समय नहीं दे पाते। असुर उन्हें कहते थे जो देवत्व से विलग थे। ‘देव’-भगवान अनावश्यक है, मैं ही ईश्वर हूँ, ऐश्वर्य का भोक्ता हूँ- इस विचारधारा के लोग असुर कहलाये। कम्युनिज्म भी तो यही कहता है। यही हिरण्यकशिपु ने किया, आविष्कारों के नशे में यही रावण और उसके परिवार ने किया। इसी मदान्धता में महाभारत का युद्ध हुआ, जिसमें लगभग आधे असुर थे। असुर का तात्पर्य ऐसा नहीं है कि दो सींग, बड़ी-बड़ी आँखोंवाले या हाथ-हाथ भर के दाँतोंवाले व्यक्ति रहे हों। श्रीकृष्ण की सगी बुआ का लड़का शिशुपाल असुर था। सगा मामा कंस राक्षस था। सगा समधी बाणासुर निशाचर था। श्रीकृष्ण स्वयं देवता थे, वसुदेव देव-श्रेणी में गिने जाते थे। इन्हीं के सगे-सम्बन्धी पाण्डव शुद्ध नर थे तो दुर्योधन इत्यादि मध्यम अवस्थावाले थे। उनके पक्ष में अधिकांशतः आसुरी प्रवृत्ति के लोग एकत्र थे। इस प्रकार एक सम्बन्धी मानव है तो दूसरा सम्बन्धी दानव है और उसी का सगा सम्बन्धी देव-श्रेणी का भी पाया जाता है।
राक्षसों का एक पर्याय निशाचर भी है। वस्तुतः ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’- गीता (2/69) के अनुसार जगत् ही रात्रि है। इस जगतरूपी रात्रि में विचरनेवाला ही निशाचर है। जगत् को ही सत्य माननेवाले, जगत् में ही विश्वास रखनेवाले, ‘खाओ पीओ मौज करो’ में ही आस्था रखनेवाले निशाचर कहलाए। ऐसे प्राणी भौतिक आविष्कारों को ही अपना गौरव समझते रहे। जिसमें देवत्व नहीं, बल्कि माया का बहाव है। इसीलिए उनके द्वारा जो आविष्कार होता रहा, उस आसुरी माया को आजकल साइंस कहा जाता है। इनके आविष्कर्ताओं को पूर्वकाल में असुर कहते थे।
अंग्रेज जब भारत आये, अंग्रेजी भाषा के शब्दों का हिन्दी रूपान्तरण प्रारम्भ हुआ। अंग्रेजी शब्द साइंस के हिन्दी पर्याय का प्रश्न खड़ा हुआ। साइकिल चली तो कहा गया कि यह साइंस की देन है। इतने में ‘पी’ करती कार आई! लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह निर्जीव लोहा चल कैसे लेता है। देखते-देखते ट्रेन के लिए पटरी बिछ गयी और भयंकर आकृतिवाली रेल हजारों लोगों को ढोने लगी। घोड़ा जहाँ दस घंटे में जाता था, कार एक घण्टे में जाने लगी। लोगों ने कहा कि यह साइंस है। दूर-दूर के समाचार यन्त्रों से आने लगे। तब भी लोगों ने साइंस का गुण गाया। भारतीयों ने देखा कि ऐसा विशेष चमत्कार तो योगदर्शन में पाया जाता है, जिसे हमारे मनीषियों ने विज्ञान की संज्ञा दी थी। इसलिए बंगाल के एक भाषाविद् ने साइंस का नाम झट से विज्ञान रख दिया। वस्तुतः यह विज्ञान नहीं है। विज्ञान तो उसे कहते हैं कि-
विज्ञान
बिनु बिग्यान कि समता आवइ।
कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।। (मानस, 7/89/3)
बिना विज्ञान के समता नहीं आती। जहाँ विज्ञान आ गया तहाँ विषमता सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाती है। विश्व में उसका कोई शत्रु नहीं रहता। उससे कोई द्वेष करता ही नहीं है। सर्वत्र एक समता की लहर व्याप्त हो जाती है। आज का सबसे बड़ा वैज्ञानिक अमेरिका को कहा जाता है, रूस को कहा जाता है; किन्तु उन्हें नींद नहीं आती। विषमता इतनी बढ़ गयी कि भारत को कैसे खरीदें, चीन को कैसे मिटा दें? क्या विज्ञान का यही गुणधर्म है? साइंस, जिसे भ्रमवश विज्ञान नाम दे दिया गया है, जहाँ-जहाँ बढ़ी है, वहाँ विषमता की बाढ़ आ गयी। राग, द्वेष और शोषण चरम सीमा तक जा पहुँचा। यह विज्ञान नहीं है। यह तो आसुरी माया का लक्षण है कि सब मरें और केवल हम जियें।
विज्ञान तो कोई ऐेसी वस्तु है जिससे एकता आ जाती है, समत्व आ जाता है और जिनके पास आया उसका समर्थन महापुरुषों ने इन शब्दों में किया-
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा।
नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।। (मानस, 7/122/4)
काकभुशुण्डिजी गरुड़ की पीठ ठोंकते हुए कहते हैं कि तुम विज्ञान स्वरूप हो, मोह तो तुम्हें हो ही नहीं सकता। अतः विज्ञान कोई ऐसी वस्तु है जिसके आ जाने पर मोह नहीं रह जाता। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः।। (गीता, 6/8)
ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार। प्रत्यक्ष दर्शन का नाम ही ज्ञान है। इसके पश्चात् विज्ञान आता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि, अर्जुन! ज्ञान और ज्ञान के पश्चात् कहीं विज्ञान आ जाय तो यह आत्मा तृप्त हो जाती है, परिपूर्ण हो जाती है। न तो आत्मा अन्य किसी सम्पत्ति से तृप्त होती है, न दस भाषाओं के ज्ञान से तृप्त होती है और न खान-पान, भोग-विलास से ही तृप्त हो सकती है। आत्मा तो अपने ही शाश्वत रूप परमात्मा के दिग्दर्शन और उसमें प्रवेश पाने पर ही तृप्त होती है। उस ब्रह्मपीयूष को प्रत्यक्ष पाकर ही आत्मा सन्तुष्ट होती है। इससे पहले आत्मा को तृप्त कर देनेवाली कोई सत्ता है ही नहीं।
अतः विज्ञान कोई ऐसी वस्तु है जो इस आत्मा को ब्रह्मपीयूष से भेंट कराती है और उसे पूर्ण तृप्ति प्रदान कर देती है। ऐसी आत्मा फिर कभी अतृप्त नहीं होती। विज्ञान उसे कूटस्थ, अचल और स्थिर कर देता है। फिर वह आत्मा कभी चलायमान नहीं होती। चलायमान होकर योनियों में जन्म नहीं लेती, शाश्वत स्थिति पा जाती है।
इस प्रकार विज्ञान का इतना बड़ा महत्त्व है कि आत्मा को पूर्ण तृप्ति प्रदान करता है, अचल स्थिति प्रदान करता है, विषमता को समाप्त करके समता प्रदान करता है। जहाँ विज्ञान रहता है वहाँ मोह नहीं रहता। किन्तु इस तथाकथित विज्ञान में तो जिनके पास जितने अधिक आविष्कार हैं, वह उतना ही अधिक इतराता है। उतना ही द्वेष और जलन की भावना उसमें अधिक पायी जाती है। संसार को गुलाम बनाकर अकेले वही जीने की कामना करने लग जाता है। जिनके पास और अधिक आविष्कार हैं, वे कहते हैं कि भगवान कुछ नहीं है, विषय ही सब कुछ है- ‘खाओ पीओ मौज करो’ ही सर्वस्व है। जब-जब आविष्कार बढ़े; हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, दुर्योधन सभी ने एक स्वर से यही कहा। देवासुर संग्राम की गाथाओं से पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं; वे पुराण जिनमें हमारे पुरातन इतिहास का संकलन है। देवासुर संग्राम बार-बार हुआ किन्तु उल्लेखनीय है कि दैवी सम्पत्तिवाले समूल नष्ट कभी नहीं हुए। क्योंकि वे भगवान पर आधारित थे और भगवान ही एक ऐसी सत्ता है जिसे न शस्त्र से काटा जा सकता है न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकता है। प्रकृति में पैदा होनेवाली कोई भी वस्तु उसका स्पर्श तक नहीं कर सकती। वह सर्वत्र संचालित है, वह अपरिवर्तनशील है और वही एक ऐसी सत्ता है जो शाश्वत है। इसीलिए दैवी सम्पत्ति के अनुयायी सदैव थे, आज भी हैं और नास्तिकता चाहे जितनी बढ़ जाय आस्तिकता का संचार बना ही रहेगा।
आज आप कहते हैं कि, ‘विदेशों में विज्ञान बहुत प्रगति कर रहा है। इस पृथ्वी से वैज्ञानिकों ने बहुत कुछ पैदा कर लिया है।’ परन्तु यथार्थ तो यह है कि इस पृथ्वी का वे एक कण भी उठा नहीं पाये हैं। उनके सभी आविष्कार मायिक परिधि तक ही सीमित हैं। और विदेश क्या! दुनिया ही एक देश है। हाँ, भारत से बाहर आविष्कारों के पीछे भाग-दौड़ अधिक दिखाई देती है। भारत इस बार पीछे दिखाई दे रहा है। लेकिन अतीत में आविष्कार भारत में ही हुए थे। हिरण्यकशिपु भारतीय था, रावण भारतीय था, देवासुर संग्राम भारतीयों के बीच ही हुआ था, पाण्डव भारतीय ही थे। आज की तुलना में उनके आविष्कार बढ़े-चढ़े थे; किन्तु परिणाम क्या निकला?- अपने ही स्वजनों की भयंकर क्षति! अतः यहाँ प्रलयकारी युद्धों में कल्याण न देखकर भारत शान्ति और परमात्मा की शोध की ओर अग्रसर हुआ। यही कारण है यह देश मायिक आविष्कारों में इस बार पीछे है। यही भारत की आध्यात्मिक विरासत है जिनके लिए वह सदैव जगद्गुरु रहा है, आज भी है और रहेगा। हमारे पूर्वजों में से क्षत्रिय नरेश विश्वामित्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। वे अपने युग के जाने-माने आविष्कर्ताओं में से थे। उन्होंने रज-वीर्य के संयोग के बिना ही मनुष्यों की सृष्टि का संकल्प किया। भौतिक वस्तुओं को जोड़कर मनुष्याकृति तैयार की, नारियल-जैसा मुँह बनाया, सीप-जैसी आँखें इत्यादि। जब उनमें प्राण-संचालन करने लगे तो सम्भावित पुरुषों ने आकर उनसे निवेदन किया कि आप यह क्या कर रहे हैं? विश्वामित्र ने कहा कि नयी सृष्टि रचने जा रहा हूँ। महर्षियों ने कहा कि आप समर्थ हैं, रच लेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है; किन्तु तनिक विचार करें कि दुःख भोगने के लिए तो दुनिया भर के जीव पड़े ही हैं, आप और पैदा करने जा रहे हैं। दुःख भोगने के लिए आत्माओं का सृजन आपको शोभा नहीं देता। संसार में इतने जीव दिन-रात हाय-हाय कर रहे हैं। आपको तो ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे इन दुःखों से छूटने का कोई मार्ग निकल आये। संसार को न रचकर संसार को पार करा देनेवाली कोई युक्ति रचें। ऐसा सुनकर विश्वामित्र ने अपने उस विचार को बदला। तपस्या में संलग्न हो गये और क्रमशः उस परब्रह्म परमात्मा का दिग्दर्शन कर उसी स्वरूप में परिपूरित हो गये। ब्रह्म से संयुक्त होते ही वे ब्रह्मर्षि कहलाने लगे। इस प्रकार मनीषियों ने मायिक चमत्कारों को कभी भी श्रेय नहीं माना।
विद्यार्थियो! अब तक आपने साइंस पढ़ा जो वस्तुतः आसुरी माया है, जो अधिक बढ़ जाने पर भगवान तक को तिलांजलि दे देता है; किन्तु अब आप वास्तविक विज्ञान की ओर बढ़ें, जिसे जान लेने पर और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता, जिसे पा लेने पर और कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता। केवल वही आपको पूर्ण आत्मिक तुष्टि प्रदान करने में सक्षम है।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)