सिद्ध है सोई अतीत कहावै

सिद्धपुरुष किसे कहते हैं और सिद्धि क्या होती है? संन्यास कब होता है, किस अवस्था का नाम है? परमहंस किसे कहते हैं? विजया हवन कब होता है? साधुता का प्रमाण-पत्र कौन देता है?– इसी आशय का सन्त कबीर का एक भजन है–

सिद्ध है सोई अतीत कहावै, जो करम की रेख मिटावै।

सिद्ध है सोई……

तिरगुन जटा बाँधि न्यारे करि, पाँचों पकड़ भगावै।

शब्दातीत की सनद लखे तब, तन पर खाक रमावै।।

सिद्ध है सोई……

स्वाँसा सुरुआ सत्य की वेदी ब्रह्म की अगिनि जलावै।

करम काट समुदय कर हीना विजया होम करावै।।

सिद्ध है सोई……

आसन मारि गगन पर बैठे अनहद नाद बजावै।

आतम तत्त्व तूमड़ी दरसे, तब संन्यास कहावै।।

सिद्ध है सोई……

सदगुरु कुंजी देह महल की मुक्ति किवाड़ खुलावै।

परमहंस पर पुरुषै चीन्हे, तब परलोक सिधावै।।

सिद्ध है सोई……

अक्षर माँहि निरक्षर दरसे सहज भाव मन लावै।

शिव शक्ति जब एक भई, तब कस परमपद पावै।।

सिद्ध है सोई……

मान बड़ाई एकौ रखाई, दुविधा दूर भगावै।

कह कबीर यहि गति के योगी, बहुरि भव जल आवै।।

सिद्ध है सोई……

वही सिद्ध है, वही अतीत, त्रिगुणातीत, प्रकृति से अतीत कहलाता है। कौन? जो कर्म की रेखा मिटा दे। सिद्धि को लेकर तरह-तरह की मान्यतायें हैं। इन अटकलों पर विराम लगाते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:

स्वकर्म निरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।। (गीता, १८/४५)

अर्जुन स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ पुरुष जिस विधि से परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मुझसे सुन। वह विधि है किस प्रकार?

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।। (गीता, १८/४६)

जिस परमात्मा से यावन्मात्र जीव जगत् की उत्पत्ति हुई है, जो कण-कण में जीवनी-शक्ति के रूप में प्रवाहित है, उस एक परमात्मा को स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

गीता योग-दर्शन है। परमात्मा से मिलन का नाम योग है। उस शाश्वत सत्य, तत्त्व से मिलन का नाम योग है। योगविधि यज्ञ है, वह एक साधना पद्धति है। उस विधि को कार्यरूप देना कर्म है। विधि निश्चित है इसलिए इसे नियत कर्म कहा गया। दुर्लभ मानव-तन मिला है तो यही आपका कर्त्तव्य-पथ है इसलिए इसे कार्यम् कर्म, इसी को तदर्थ कर्म अर्थात् उस प्रभु के निमित्त कर्म, यही है मदर्थ कर्म– जो सामने उपस्थित हैं उन सद्गुरु के लिये कर्म। कामना रखकर करेंगे तो भटकना पड़ेगा इसलिए करना चाहिए निष्काम कर्म। इस प्रकार कर्म के साथ अनेक विशेषण हैं किन्तु कर्म केवल एक! योगविधि यज्ञ है। उसे क्रियान्वित करना कर्म है। कर्म माने आराधना! कर्म माने चिन्तन!

अब तक तो हमने भजन किया नहीं था इसीलिए जब भजन करने बैठते हैं तो मन लगता ही नहीं। शरीर से आप बेशक दस घण्टे बैठ सकते हैं लेकिन जिस मन को भजन में लगना चाहिए वह पन्द्रह मिनट भी स्थिर नहीं रहता इसलिए व्यर्थ समय क्यों नष्ट करते हैं। भजन कैसे हो? इसके लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक ही कर्मपथ को चार भागों में बाँट दिया। जिसमें पहली श्रेणी शूद्र या क्षुद्र अल्पज्ञ साधक है जो संत सद्गुरु की सेवा करे, उनकी वाणी श्रवण कर टूटी-फूटी साधना में लगे।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्। (गीता, १८/४४)

महापुरुष की सेवा और सान्निध्य से साधना हृदय में जागृत हो गयी तो वही शूद्र वैश्य श्रेणी का हो जाता है। अब वह प्रकृति के द्वन्द्व से आध्यात्मिक सम्पद् शनै:-शनै: अर्जित करने लग जाता है, संयम बढ़ता जाता है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता आने पर वही साधक क्षत्रिय श्रेणी का हो जाता है। अब उसमें सब भावों पर स्वामिभाव, शौर्य, धैर्य, तेज और मन की लगाम भगवान के हाथ में हो जाती है। भगवान से जो निर्देश मिलता है, उसका पालन करने लगता है। धीरे-धीरे विकार समाप्त हो जाते हैं, ब्रह्म में विलय की योग्यता आने लगती है। धारणा, ध्यान, समाधि, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन– ये योग्यतायें स्वभाव में, आदत में ढल जाने पर वही साधक ब्राह्मण श्रेणी का कर्ता हो जाता है। यह ब्राह्मण श्रेणी भी है अधूरी। क्रमश: भगवान का दर्शन, उनका स्पर्श, उनमें प्रवेश और स्थिति मिल जाने पर कर्मपथ की चारों श्रेणियाँ समाप्त हो जाती हैं। उस समय स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार कण-कण में व्याप्त एक परमात्मा का अर्चन-पूजन कर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परम तत्त्व परमात्मा विदित हो जाय, उसमें स्थिति मिल जाय– इसका नाम है सिद्धि, परम सिद्धि! जो भजन नहीं करता वह तो शूद्र भी नहीं है। यह श्रेणी भी उतनी ही कीमती है मानो किसी उच्च पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल गया हो, जैसे कोई विदेश जाने के लिए वीजा (अनुमति-पत्र) हेतु परेशान हो और वीजा हाथ लग गया हो।

वस्तुत: या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ (गीता, २/६९)– जगत्-रूपी रात्रि में सबलोग अचेत पड़े हुए हैं, उनमें संयमी पुरुष जग जाता है। यदि कोई निश्चेष्ट पड़ा है, ऊपर से सर्प ही क्यों न निकल जाय, उसे भान भी नहीं होगा; कोई दुर्घटना ही घटित हो जाय, वह प्रतिकार भी नहीं कर सकता। जब संयम की प्रथम सीढ़ी पर वह आरूढ़ होता है उस दिन साधना की पहली किन्तु सौभाग्यशाली अवस्था है अल्पज्ञ शूद्र! विधि जागृत हो गयी तो वैश्य! संघर्षशील हो गया तो क्षत्रिय और ब्रह्म में विलय की योग्यता आने पर वही ब्राह्मण है। ब्रह्म में प्रवेश, विलय और स्थिति मिलने पर श्रेणियाँ समाप्त हो जाती हैं, साधना पूर्ण हो जाती है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि साधना में उन्नत अवस्थावालों की नकल न करें। स्वभाव से कर्म करने की जो क्षमता उपलब्ध है, उसी क्षमता से जिन परमात्मा से यावन्मात्र जीव-जगत् की उत्पत्ति हुई है, उनका भली प्रकार चिन्तन-अर्चन कर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है। ऐसा नहीं है कि शूद्र भूत-भवानी पूजे, वैश्य लक्ष्मी पूजे, क्षत्रिय दुर्गा और ब्राह्मण सरस्वती का पूजन करे। पूजा तो एक परमात्मा की ही करनी है। उस पूजन के चार क्रमोन्नत सोपान हैं जिनका नाम वर्ण है। यही शास्त्रविधि है और,

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:

सिद्धिमवाप्नोति सुखं परां गतिम्।। (गीता, १६/२३)

जो इस शास्त्रविधि को त्यागकर, कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य-अन्य विधियों से भजते हैं, उनके जीवन में न तो सुख है, न सिद्धि है और न परमगति है। अर्थात् गीतोक्त नियत कर्म का पालन शास्त्रविधि है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते’ (गीता, १६/२४) इसलिए तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। इसको भली प्रकार समझकर अर्जुन! आचरण कर। तू मुझे प्राप्त होगा। अत: गीता के अनुसार सिद्धि है कण-कण में व्याप्त परमात्मा का सध जाना। यही आशय सन्त कबीर का है–

सिद्ध है सोई अतीत कहावै

वह सिद्धपुरुष है, वह त्रिगुणातीत है। कौन?–

जो करम की रेख मिटावै…..सोई अतीत कहावै।

जो भाग्य की रेखा को मिटा दे। कर्म अवश्यंभावी होता है। इस सम्बन्ध में महाभारत का एक प्रसंग देखें। द्रौपदी का स्वयंवर हो गया। भीम और अर्जुन की प्रसन्नता का पारावार न था। वे उसे लेकर माता कुन्ती के पास गये और कहा– ‘‘माते! आज बड़ी उत्तम भिक्षा मिली है।’’ कुन्ती उस समय पूजन कर रही थी। उसने विचार किया, जब से मेरे बच्चे शकुनि–दुर्योधन के षड्यन्त्र में फँसे, लाक्षागृह में जलाये गये, वन-वन भटके, उन्हें कभी भरपेट अन्न नहीं मिला। कदाचित् आज उत्तम भोजन मिला है तो मैं क्यों हिस्सा बटाऊँ! बच्चे ही तृप्त हो लें। इसीलिए बिना उनकी ओर देखे ही वह बोल पड़ी– ‘‘बेटा! उसे पाँचों भाई आपस में बराबर-बराबर बाँट लो।’’ दोनों सन्न रह गये। उन्हें चुप पाकर कुन्ती ने अब उनकी ओर घूमकर देखा और पूछा– ‘‘यह देवी कौन है?’’ भीम ने कहा– ‘‘यह है काम्पिल्य की राजकुमारी द्रौपदी। अनुज अर्जुन ने इन्हें स्वयंवर में जीता है।’’ कुन्ती बोली– ‘‘ओह! इन्हें तुमलोगों ने भिक्षा बताया। तुमलोगों ने अपनी माता से भी विनोद किया? अब दिखाओ बाँटकर।’’

दोनों किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़े रह गये। इतने में वहाँ बड़े भ्राता युधिष्ठिर आ गये। दोनों बोले– ‘‘भैया! कोई उपाय करो। माताजी ने तो ऐसा आदेश दे दिया है।’’ युधिष्ठिर ने कहा– ‘‘पिताजी का सुख तो हमें नहीं मिला। हमलोगों ने तो माताजी को ही देखा है और उनकी आज्ञा तो हमने कभी टाली ही नहीं। उनका आदेश टाल पाना मेरे वश का नहीं है। पूर्वजों की यही संस्कृति थी कि,

मातु पिता गुरु प्रभु कै बानी।

बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।। (रामचरितमानस, १/७६/३)

माता-पिता, गुरु और भगवान की वाणी पर विचार करो ही मत कि यह गलत है या सही है, उसे कर डालो।

अनुचित उचित बिचारु तजि जो पालहिं पितु बैन।

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमर पुर ऐन।। (रामचरितमानस, २/१७४)

अनुचित और उचित का विचार त्यागकर पिता के आदेश का पालन करनेवाले लोक में सुख-सुयश के भागी होते हैं और अन्त में परमधाम में निवास करते हैं। इसलिये भाई! माताजी की आज्ञा तो हम नहीं टाल सकते।’’

इस बीच भगवान श्रीकृष्ण वहाँ पधारे। अर्जुन ने कहा– ‘‘प्रभो! हमलोगों की रक्षा कीजिए। इस विषम परिस्थिति को टालिए।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘हूँऽ, बुआ कुन्ती की बात तो टाली ही नहीं जा सकती।’’ भीम ने कहा– ‘‘अरे! आप भी वही कहते हैं।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘इसका उत्तर तो स्वयं द्रौपदी है। इसने पिछले जन्म में कठोर व्रत का पालन कर भगवान शिव की आराधना की। भोलेनाथ जब प्रसन्न हुए तो कहा, ‘बेटी, वर माँगो।’ इसने कहा– ‘प्रभो! ऐसा पति दें जो पूर्ण धर्मात्मा हो।’ शंकरजी ने कहा, ‘तथास्तु।’ पुन: इसने कहा, ‘प्रभु! वह सबसे बलशाली हो।’ भोलेनाथ ने कहा, ‘एवमस्तु।’ इसने पुन: कहा, ‘भगवन्! वह सबसे बड़ा धनुर्धर हो।’ भगवान शिव ने कहा, ‘ऐसा ही होगा।’ पुन: इसने कहा, ‘सबसे सुन्दर हो।’ भोलेनाथ बोले, ‘चलो यह भी स्वीकार है।’ इसने पुन: कहा, ‘प्रभु! वह विद्धान हो।’ शंकरजी ने उसे भी दिया और अन्तर्धान हो गये। बुआ कुन्ती का वचन तो द्रौपदी के कर्मों का परिणाम और शंकरजी का आशीर्वाद है।

इनमें पहला वरदान बड़े भ्राता युधिष्ठिर हैं सम्पूर्ण धर्मात्मा। दूसरे वरदान के रूप में हैं भीम; इस समय इनसे बलशाली कोई धरती पर नहीं है और न ही इनके जीवनकाल में कोई दूसरा होगा। तीसरा वरदान अर्जुन हैं, सबसे बड़े धनुर्धर। चौथे वरदान के रूप में हैं नकुल, सौन्दर्यसम्पन्न; और पाँचवें सहदेव हैं, विद्वान और विनयी। वर माँगते समय द्रौपदी को विचार करना चाहिये था कि जो मैं माँग रही हूँ किसी एक व्यक्ति में संभव है या नहीं! इसने बिना विचारे इतना कुछ माँग लिया। ये सभी गुण किसी एक व्यक्ति में हो भी नहीं सकते। द्रौपदी! कर्मों का बोझ तो ढोना ही पड़ता है,

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्म शुभाशुभम्।

कर्म शुभ हों अथवा अशुभ, उनका फल अवश्य भोगना पड़ता है। हाँ, यदि तुम शिव के वरदान को निष्फल कर सको तो प्रयत्न करके देख लो।’’ द्रौपदी ने कर्मों का फल स्वीकार कर लिया।

इसी प्रकार सुकरात यूनान के अच्छे सन्त हुए। एक बार वह अपने शिष्यों के बीच बैठे थे। किसी तत्त्व-चिन्तन की वार्ता चल रही थी। इतने में एक ज्योतिषाचार्य वहाँ पहुँच गये। उन्होंने कहा– ‘‘सम्मानित श्रोतागण! यह महात्मा, जो उच्च आसन पर विराजमान हैं, आप चाहें तो मैं इनकी भाग्यरेखा बता सकता हूँ।’’ गुरुजी की भाग्यरेखा जानने की लालसा सभी को थी। सबने कहा– ‘‘अवश्य बतायें।’’

ज्योतिषाचार्य ने कहा– ‘‘आप सब इनके खड़े-खड़े बाल देख रहे हैं, ये आसुरी प्रवृत्ति के पुरुष के लक्षण हैं। यह पुरुष आसुरी प्रवृत्ति का है। इनके बड़े और चौड़े दाँत बता रहे हैं कि यह किसी को चबा सकते हैं। इसके पाँव की बनावट कह रही है कि यह कुमार्ग पर जायेगा। इनके हाथों की बनावट, इसके अंगूठे किसी का गला दबा सकते हैं। इनकी गोल-गोल बाहर निकली हुई आँखें निशाचरी आँखें हैं। इनसे कुदृष्टि ही पड़ेगी।’’ सभा बौखला उठी किन्तु सुकरात उठे, उसे अपना अंगवस्त्र उढ़ाया, सम्मानित कर कहा– ‘‘हमारी सभा में आने का आपने कष्ट किया, हम कृतार्थ हुए। भविष्य में भी आप इसी प्रकार दर्शन देने की कृपा करते रहें।’’ उन्हें ससम्मान विदा कर दिया।

भक्त लोग बिगड़ पड़े– ‘‘गुरुजी! वह इतना बड़ा धूर्त! आपने उसे सम्मानित क्यों किया? आप ही तो एक ऐसे महात्मा हैं जिनके चरणों में बैठकर हमलोगों को जीवन में शान्ति मिली है।’’ सुकरात बोले– ‘‘नहीं भाई! वह धूर्त नहीं था। वह ठीक ही कह रहा था। वह जो कुछ कह रहा था, वह सब दुर्गुण मुझमें थे, हैं भी! वह बेचारा जरा-सी ज्योतिष भूल गया कि अनुरागपूरित हृदय से, एक परमात्मा के प्रति समर्पण से और सतत संयमपूर्वक अभ्यास करने से कुसंस्कार कट जाते हैं। इतना ही बताना वह भूल गया था। और तो ठीक ही कह रहा था। यह दोष मानव के पास होते ही हैं। यदि आपमें कमी न होती तो आप यहाँ आये ही किसलिये हैं? समर्पण, चिन्तन और संयम ज्यों-ज्यों दृढ़ होते जायेंगे, विकार कटते जायेंगे, ईश्वरीय आभा प्रस्फुटित होती जायेगी। संस्कार कटते हैं–

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।

मेटत कठिन कुअंक भाल के।। (रामचरितमानस, १/३१/९)

ललाट पर लिखे हुए कठिनाई से मिटनेवाले बुरे लेख भी मिट जायेंगे। कर्म में घोर नरक और यातना लिखी है तो कट जायेगी। उसका केवल एक उपचार है– मंत्र का जप! यह प्रश्न अलग है कि यह दो-ढाई अक्षर का नाम जपते-जपते कब किस प्रकार मंत्र बन जाता है जिससे संस्कार कटते हैं किन्तु कटते अवश्य हैं। माता पार्वती के जीवन में ऐसा ही हुआ।

हिमाचल नरेश का राजघराना! उन्हीं की कन्या थी पार्वती। एक बार उनके यहाँ देवर्षि नारदजी पधारे। माता मैना ने देवर्षि के चरणों में कन्या से प्रणाम कराया। राजा बोले– ‘‘भगवन्! इस कन्या की कुण्डली तो जरा देखिए।’’ नारदजी बड़े विनोदी थे। किसी बात को घुमा-फिराकर कहे बिना उनको चैन नहीं पड़ता था। जहाँ वह पहुँच जायँ और झगड़ा न हो तो नारद का जाना ही व्यर्थ गया। वह समझ गये कि यह कन्या तो भोलेनाथ की अर्द्धांगिनी है, फिर भी स्पष्ट न कहकर वे बोले– ‘‘ओह! कन्या है तो सुलक्षणा। यह सदैव अपने पति को प्रिय होगी। इसका सम्मान होगा। इससे आप सबके कीर्ति की अभिवृद्धि होगी किन्तु इसकी सौभाग्य रेखा में दो-चार अवगुण दिखायी दे रहे हैं।’’ और जब अवगुण गिनाने लगे तो दसियों अवगुण बता डाला–

अगुन अमान मातु पितु हीना।

उदासीन सब संसय छीना।। (रामचरितमानस, १/६६/८)

गुणों से रहित, मानहीन, माँ-बाप का पता नहीं, गृहस्थी के प्रति उदासीन, लापरवाह और,

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल वेष।

अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।। (रामचरितमानस, १/६६/८)

जोगी, जटाधारी, इच्छारहित, नंग-धड़ंग और अमंगल वेशभूषावाला स्वामी इसे मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी रेखा पड़ी है। माता मैना ऐसा सुनकर रोने लगी, सखियाँ रोने लगीं, हिमवान के नेत्र भर आये। धैर्य धारण कर उन्होंने देवर्षि से उपाय पूछा। नारदजी ने कहा– ‘‘हाँ, एक उपाय है। भगवान शिव इस दुर्भाग्य का शमन कर सकते हैं। उनमें भी लगभग यही गुण मिलते हैं। महादेवजी की आराधना कठिन है किन्तु तप करने से वह अत्यन्त शीघ्र सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसलिए,

जौं तपु करै कुमारी तुम्हारी।

भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।। (रामचरितमानस, १/६९/५)

तुम्हारी कन्या यदि तप करती है तो त्रिपुरारी शिव भावी को मिटा देंगे।’’ पार्वती लग गयीं चिंतन में। भावी मिट गयी, होनहार मिट गया। यह भावी कौन मिटायेगा? भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी’– सत-रज-तम त्रिगुणमयी प्रकृति है। इन तीनों गुणों से ऊपर जो त्रिगुणातीत स्थिति में है, ऐसा शिव-स्वरूप। शिवतत्त्वनिष्ठ स्थिति सद्गुरु की होती है और यही भगवान का भी सम्बोधन है। ऐसी ही स्थितिवाले महापुरुष मिल जायँ तो भावी, होनी, कर्म की रेखा भी मिट जाती है। यही कबीर कहते हैं कि सिद्ध वह है, अतीत वह है जो करम की रेखा मिटा दे। करम, प्रारब्ध, भाग्य की रेखा मिटती है चिन्तन से, सद्गुरु के शरण-सान्निध्य से, संयम से, अभ्यास से। जो कर्म की रेखा मिटा चुके होते हैं, उन महापुरुष की रहनी क्या होती है?

तिरगुन जटा बाँधि न्यारे करि पाँचों पकड़ि भगावै।

त्रिगुणमयी प्रकृति है। ब्रह्मलोक, देवलोक, मृत्युलोक इत्यादि सम्पूर्ण सृष्टि तीन गुणों के अन्दर एक गूँथा हुआ जाल जैसा है इसलिए इसे जटा की संज्ञा दी। इन तीनों गुणों की जटा को बाँध दें, न्यारे करि’ अलग कर दें और पाँचों पकड़ भगावै’। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन पाँचों का विषय है– शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। आँखें रूप देखती हैं, कान शब्द सुनते हैं, रसना रसास्वादन करती है…..इस तरह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की पाँच तन्मात्राएँ, पाँच कार्य हैं। आँखों ने कभी कुछ देख रखा था। जहाँ वह याद आया, सुरत तत्काल वहाँ पहुँच जायेगी। शरीर यहाँ बैठा है लेकिन मन इन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से दूर भागता ही रहता है। इसलिए इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को पकड़ भगावै’– इनका दमन करें, अपने पास रखें। इन्द्रियाँ बाहर जो रूप देखती हैं, हृदय में स्वरूप देखने लगें; वे बाहर जो शब्द सुनती थीं, प्रभु की पावन वाणी सुनने लगें तो ये सिमट जाती हैं फिर भी कोई साधु नहीं है। साधु वह तब है जब भगवान कह दें कि तू साधु है।

शब्दातीत की सनद लखे तब तन पर खाक रमावै।

शब्द के लिए सन्त कबीर कहते हैं–

शब्द हमारा आदि का सुनि मत जाओ सरक।

जो चाहो निज तत्व को शब्दहि लेओ परख।।

शब्द हमारा आदि का’– आदि अनादि तत्त्व है परमात्मा! ये शब्द उन परमात्मा से प्रसारित हैं। परमात्मा से कुछ शब्द मिला, भगवान ने कुछ आदेश दिया सुनि मत जाओ सरक’– उसे सुनकर कहीं खिसक मत जाना, अवहेलना मत करना, अनसुनी मत करना। जो चाहो निज तत्व को’– यदि तुम अपने तत्त्व, अपने निज स्वरूप को चाहते हो तो शब्द को परख लो।

पूज्य गुरु महाराज जी कहा करते थे– हो! भगवान ने आगरा में हमको पतित होने से बचा लिया, देहरादून में यह कहा, उज्जैन में भगवान ने हमको सर्टिफिकेट दिया। कुछ दिन तो हम इस वार्ता को सुनते रहे, अन्तत: हमने पूछा– ‘‘महाराजजी! क्या भगवान बातें करते हैं?’’ वह बोले– ‘‘हाँ हो! भगवान ऐसे ही बतियावा करत हैं जैसे हम-तुम बैठ के बतियाईं, घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटै।’’ यह सुनकर हम किञ्चित् उदास हो गये कि भजन तो जो बताया जायेगा, वही करने आये हैं, कर लेंगे किन्तु बात करने के लिए भगवान को कहाँ से पायें? लगभग पन्द्रह-बीस मिनट पश्चात् गुरु महाराज बोले– ‘‘काहे घबड़ात है, तोहूँ से बतिअइहैं।’’

आश्वासन मिल तो गया लेकिन भूखा तो तभी सन्तुष्ट होता है जब पाव-आध सेर पेट में जाय। लगभग पौने तीन माह व्यतीत हुए होंगे कि एड़ी से चोटी तक मेरा पूरा अंग फड़कने लगा– तड़–तड़-तड़-तड़ – आधा-आधा इञ्च पर! हमने सोचा, हमें कोई बीमारी हो गयी। हमने कहा– ‘‘गुरु महाराज! मेरे पाँव के तलवे से लेकर शिर के शीर्षस्थ भाग तक आधा-आधा इञ्च पर सम्पूर्ण शरीर कभी यहाँ कभी वहाँ फड़क रहा है और उसके अनुरूप कुछ दृश्य भी आ रहे हैं, यह कहीं कोई बीमारी तो नहीं है।’’ गुरु महाराज बोले– ‘‘बस बेटा! राम-रावण युद्ध शुरू हो गया। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई आरम्भ हो गयी। अब रावण मारा जायेगा, रामजी का राज्याभिषेक होगा, तभी छुट्टी है। बीच में कहीं विराम नहीं है। बेटा! भजन जागृत हो गया। अब भगवान तुम्हें बताने लगे, कहने-सुनने लगे हैं।’’ भगवान कैसे बात करते हैं?– वह विधि गुरु महाराज बताने लगे कि जैसी हमारी अवस्था है, उसी अवस्था से ही प्रभु बतायेंगे किन्तु स्तर उठते-उठते तीनों गुण बँध गये, त्रिगुणमयी प्रकृति अलग हो जाती है, मन में सात्विकी-राजसी-तामसी तरंगें शान्त हो जाती हैं, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को पकड़कर अन्तर्मुखी कर दिया तो जिन प्रभु से शब्द मिल रहे थे, वही कह देंगे कि तुम अतीत हुए। शब्दातीत की सनद लखै’– अपौरुषेय वाणी से यह सनद मिल जाय कि तुम अतीत हुए, ऐसा महापुरुष तन पर खाक रमावै’। संसार के संस्कार मिट गये, अन्तिम संस्कार भी मिट गया। अब जो कुछ है खाक है, श्मशान है। संसार के संस्कार शान्त हुए तो ईश्वरीय विभूति उतर आती है। वही अतीत होता है।

पूज्य गुरु महाराज कहते थे– ‘‘पूरा संसार तुम्हें साधु कहे, तुम कुछ भी नहीं पाओगे, रोने को आँसू नहीं मिलेगा। भगवान तुम्हें साधु कह दें, आत्मा तुम्हें साधु कह दे तो तुम साधु हो, दुनिया कहे चाहे कभी न कहे।’’ जब तक वह अपौरुषेय वाणी, परमात्मा के श्रीमुख से संचारित वाणी यह न कह दे कि तुम मुझमें समाहित हो, मैं तुझमें समाहित हूँ तब तक कुछ भी नहीं है। जहाँ उन्होंने कहा कि तुम अतीत हुए, अब तन में कोई संस्कार नहीं है, जो कुछ है खाक है, अब हृदय श्मशान है। इसी श्मशान में भगवान शिव निवास करते हैं। प्रकृति की सीमाओं से अतीत शिवतत्त्व में स्थित महापुरुष सद्गुरु होते हैं। प्रश्न उठता है– इन्द्रियाँ सिमट कैसे जायेंगी? भगवान ही प्रसन्न होकर तुम्हें क्यों कह देंगे कि जाओ बेटा, पूर्ण हुए। साधना किस प्रकार है?

स्वाँसा सुरवा सत्य की वेदी ब्रह्म की अगन जलावै।

श्वास ही स्रुवा है। स्रुवा वेदी बनाकर किये जानेवाले वाह्य यज्ञ का एक पात्र होता है, लकड़ी की कलछी जैसा, जिससे घी उठाकर अग्नि में हवन करते हैं। इस आन्तरिक यज्ञ में स्रुवा श्वास है। इसी के माध्यम से नाम जप की आहुति सत्य की वेदी में डाली जाती है।

सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार। (परमहंसजी की बारहमासी)

परम सत्य, ध्रुवसत्य तो केवल एक आत्मा है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं–

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनँद रासी।। (रामचरितमानस, १/२२/६)

जो कण-कण में व्याप्त है, एक है, ब्रह्म है वही परम सत्य है, आनन्द की राशि है। आहुति उसी परमात्मा को समर्पित करना है। आज हमारे श्वास की आहुति लोभ-मोह-राग-द्वेष इत्यादि में जाती है। यह सब ओर से सिमटकर श्वास की स्रुवा से सत्य एक परमात्मा के लिए अर्पित होना चाहिए।

स्वास स्वास पर राम कहु, वृथा स्वास जनि खोय।

ना जाने यहि स्वास का, आवन होय होय।।

हर श्वास में नाम कहें, एक भी श्वास व्यर्थ न जाने पाये। पता नहीं अगले ही पल इस श्वास का आना हो या न हो। भजन का उतार-चढ़ाव श्वास पर होता है। श्वास का चिन्तन जब जागृत हो जाता है, सत्य परमात्मा को ही अर्पित होता है। परमात्मा के प्रति समर्पण के साथ नाम के चिन्तन का अभ्यास इतना उन्नत हो गया कि ब्रह्म की अगिनि जलावै’। ब्रह्माग्नि, योगाग्नि, ज्ञानाग्नि– सभी पर्यायवाची हैं। गीता में इन अग्नियों का चित्रण है। योग कहते हैं परमात्मा से मिलन को! जहाँ मिले तहाँ उसकी अनुभूति होगी ज्ञानाग्नि; और जहाँ उसकी अनुभूति हुई, उसमें समाहित हो गये वह है ब्रह्माग्नि। तीनों स्थितियों में मात्र एक-एक पल का अंतर है, तीनों एक ही साथ घटित होते हैं।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! इस कर्म को किये बिना सृष्टि में न कोई मुझे प्राप्त कर सका है और न भविष्य में ही कोई कर सकेगा; किन्तु,

यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता:

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।। (गीता, ४/१९)

जिस पुरुष के द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ की हुई क्रिया इतनी उन्नत हो गयी कि कामसंकल्पवर्जिता:’– काम अर्थात् कामना, इच्छा– इच्छाओं से ऊपर उठ गयी। संकल्प का रुक जाना मन की निरोधावस्था है। संकल्प का ही दूसरा नाम मन है। जहाँ कर्म कामना और संकल्प से ऊपर उठा तो ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं’– जिसको वह जानना चाहता था, जिसके लिए यत्न करता था, उसकी अनुभूति मिल जाती है। जहाँ उसकी जानकारी मिली, दग्धकर्माणं’– कर्म सदा के लिए जल जाते हैं। जो पूर्व संस्कारों की रील थी और जो चिन्तन कर्म अनिवार्य था, दोनों जल गये। तमाहु: पण्डितं बुधा:’– इस स्थितिवालों को ही बोधस्वरूप महापुरुषों ने पण्डित कहकर सम्बोधित किया है। जानकारी के साथ ही ब्रह्म में प्रवेश, ब्रह्माग्नि में हवन करना है। यही है ब्रह्म की अगिनि जलावै।’ जहाँ ब्रह्म की अग्नि जली तो,

कर्म काट समुदय कर हीना, विजया होम करावै।

साधक की चाल-ढाल से जो संस्कार बनते हैं, संस्कारों के समूहों का उदय होता रहता है, महापुरुष उससे भी ऊपर उठ जाता है। ऐसी स्थिति में योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं। अब संस्कारों का निर्माण होता ही नहीं। इसी के लिये संत कबीर कहते हैं–

जहँ जहँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कछु करउँ सो पूजा।

भीतर बाहर एकहिं देखा, भाव मिटा सब दूजा।।

जो कर डालो वह पूजा; जहाँ चले जाओ परिक्रमा ही है। योगी की इस स्थिति के पश्चात्, ज्ञानाग्नि-ब्रह्माग्नि में हवन के पश्चात् योगी का हर कार्य दूसरों के कल्याण के लिए होता है। उनकी वाणी देशज या क्षेत्रीय ही क्यों न हो, वेदवाणी है, देववाणी है। वे चाहे कुछ भी करें, उनकी प्रत्येक क्रिया मंगलमयी है। लोकहित के लिये उनका जीवन है, स्वयं के लिये उसका कोई उपयोग ही नहीं रहा। अब उनके कार्यों से संस्कार-समूहों का उदय नहीं होता तभी वास्तविक विजया होम होता है। अब शाश्वत विजय हो गयी।

संन्यास धारण करते समय समाज में विजया होम करने का विधान है किन्तु कबीर कहते हैं– वेष धारण का नाम संन्यास नहीं है। संन्यासी विजया होम करता है किन्तु वास्तविक विजय तभी है जब संस्कार निर्मूल हो जायँ, ब्रह्म में स्थिति मिल जाय, इन्द्रियों पर सहज विजय की स्थिति आ जाय। ऐसे योगी की रहनी बताते हैं–

आसन मारि गगन पर बैठे, अनहद नाद बजावै।

गगन अर्थात् आकाश! आकाश कहते हैं पोल को। आकाश कहते हैं शून्य को। मन के अन्तराल में भले-बुरे संकल्पों की भीड़ लगी है। अभ्यास करते-करते, श्वास की स्रुवा से सत्य की वेदी में आहुति देते-देते न हृदय में कोई संकल्प उठे और न वाह्य वायुमण्डल के संकल्प मन में प्रवेश कर पायें– ऐसे योगी की सुरत (मन की दृष्टि) शून्य में टिक जाती है। मन चिदाकाश के शून्य में ठहर गया। अब भले-बुरे चिन्तन नहीं आते। आखिर उसके चिन्तन में कुछ है! कबीर कहते हैं– वह अनहद नाद बजावै’

हद कहते हैं सीमा को। अनहद कहते हैं असीम को। असीम, अनन्त, व्यापक– ये परमात्मा के विशेषण हैं। उस समय वह हद से परे जो परमात्मा है, उसकी धुन मात्र शेष है। केवल परमात्मा के नाम में ही सुरत प्रवाहित हो गयी, उसी क्षण वह परमात्मा विदित हो जाता है।

आतम तत्व तुम्बड़ी दरसै, तब संन्यास कहावै।

आतम तत्व’ अर्थात् जिसकी हमें चाह थी, वह परमात्म-तत्व तुम्बड़ी दरसै’। महापुरुषों ने इस शरीर की तुलना कच्चे घड़े से की है–

यह तन काचा कुम्भ है लिये फिरे तू साथ।

ढबका लागा फूट गया, कछू आवै हाथ।।

शरीर एक कच्चा घड़ा है जिसे लेकर तू घूम रहा है। थोड़ा-सा धक्का लगते ही यह घड़ा फूट जाता है, दुबारा वह नहीं जुड़ता, कुछ भी हाथ नहीं लगता। कहीं कबीर इस शरीर को ओस की बूँद की तरह मानते हैं। उषाकाल में फसल की नोंक पर रखी ओस की बूँद मोती की तरह चमकती है किन्तु सूरज की पहली किरण पड़ते ही जमीन पर गिर पड़ती है, थोड़ी ही देर में भाप बनकर उड़ जाती है, शरीर इतना क्षणभंगुर है। इस शरीर को सन्त कबीर ने तुमड़ी की संज्ञा भी दी है–

तितलौकी की बनी तुमड़िया, सब तीरथ फिरि आई।

सन्त पारखी चाखन लागे, तउ गई करुआई।

नाथ मोरी बिगड़ी कौन बनाई।।

तितलौकी की ही तरह इस शरीर में भी राग-द्वेष, इच्छा-वासना की अनन्त कड़वाहट भरी पड़ी है। यह कड़वाहट ही लोगों को दु:ख देती है। हर मनुष्य इससे परेशान है। कड़वाहट छुड़ाने के लिए ही वह तीर्थों में जाता है। कोई ब्रदीनाथ, रामेश्वरम्; कोई मक्का-मदीना तो कोई येरूशलम– जो जिसका तीर्थ हो, जिसकी श्रद्धा जहाँ टिक गयी हो। किन्तु पारखी सन्तों ने देखा तउ गई करुआई’– तब भी इसकी कड़वाहट ज्यों-की-त्यों है। जब तक साधना जागृत न हो, उस साधना में श्वास की स्रुवा से सुमिरण न हो, तब तक संस्कारों की रील में प्रवाहित कड़वाहट दूर नहीं होती, वे संस्कार कटते नहीं। इसलिए आसन आकाश में, सुरत शान्त शून्य में प्रवाहित, केवल एक परमात्मा की धुन अनहद अनवरत प्रवाहित होने पर आतम तत्व तुम्बड़ी दरसै’– कड़वाहट समाप्त होते ही आत्म-तत्त्व, परमात्म-तत्त्व इसी घट के अन्दर, इसी तुमड़ीरूपी शरीर में दिखायी पड़ेगा। और जहाँ स्वरूप दिखायी पड़ा–

तब संन्यास कहावै।

परमात्मा में स्थिति का नाम संन्यास है। केवल वेश धारण कर लेने से संन्यास नहीं आता। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं–

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:

संन्यासी योगी निरग्निर्न चाक्रिय:।। (गीता, ६/१)

अर्जुन! फल के आश्रय से रहित होकर जो ‘कार्यं कर्म’ करने योग्य प्रक्रिया विशेष (नियत कर्म) को करता है, वही संन्यासी होता है और वही योगी होता है। केवल अग्नि और क्रिया को त्यागनेवाला न संन्यासी है और न ही योगी है।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।

ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।। (गीता, ६/२)

अर्जुन! जिसे संन्यास कहते हैं उसी को तू योग जान। किन्तु संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष न संन्यासी होता है और न योगी ही होता है। कोई कह दे कि हम संकल्प नहीं करते तो क्या हो गया संकल्प का त्याग? नहीं, कहने से क्या होता है! संकल्प तो एक लहर है। यह अन्त:करण में तूफान की तरह चलता है। संकल्प तो इतने भयंकर होते हैं कि लोगों को कभी-कभी नींद ही नहीं आती। किसी के कहने मात्र से संकल्प क्या पिण्ड छोड़ते हैं? संकल्प कैसे नष्ट हों? इस पर योगेश्वर कहते हैं–

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं योगं कर्म कारणमुच्यते।

योगारुढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते।। (गीता, ६/३)

अर्जुन! योग में आरूढ़ होने की इच्छावाले पुरुष को चाहिए कि कर्म करे। कर्म में भी नियत कर्म। नियत कर्म है आराधना। इसलिए कर्म का आशय चिन्तन है। कर्म करते-करते योग में आरूढ़ता आ जाय तो उस आरूढ़ता में शम: कारणमुच्यते’– मन सम और स्थिर हो जाता है, वहीं सर्वसंकल्पों का त्याग है। बिना चिन्तन के संकल्प दूर नहीं होंगे। अन्त में भगवान कहते हैं–

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु कर्मस्वनुषज्जते।

सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।। (गीता, ६/४)

योगारूढ़ता के पश्चात् जिस काल में वह न तो इन्द्रियों के भोगों में और न चिन्तन कर्म में ही आसक्त होता है, वहाँ सर्वसंकल्पों का त्याग है, उसी का नाम संन्यास है। संकल्प जहाँ शान्त हुए, विपरीत संकल्प नहीं रह गये तो फिर आत्मतत्त्व ही शेष बचता है। यही कबीर का भी कहना है कि आतम तत्व तुम्बड़ी दरसै’– हृदय में वह आत्मतत्त्व विदित हो गया, तब संन्यास कहावै’– तभी संन्यास की स्थिति आती है। पहले आसन शून्य में टिका, परमात्मा की धुन मात्र शेष रही, परमतत्त्व हृदय में विदित हो गया, उस अवस्था का नाम संन्यास है। संन्यास के बारे में जो निर्णय योगेश्वर श्रीकृष्ण का है, वही सन्त कबीर का भी है।

भगवत्पथ एक ऐसा पथ है जिस पर चलने के लिए आप पढ़े-लिखे हैं तब भी ठीक है, और न पढ़े-लिखे हों तब भी कोई क्षति नहीं; क्योंकि इस पढ़ाई का साधन-भजन में उपयोग ही नहीं है। भगवत्पथ की पढ़ाई भगवान स्वयं पढ़ाते हैं। सन्त कबीर इस पद की अग्रेतर पंक्ति में कहते हैं कि यह साधना कहाँ मिलेगी? भजन जागृत कहाँ से होगा?

सदगुरु कुंजी देइ महल की मुक्ति किवाड़ खुलावै।

सद्गुरु ने महल की कुंजी प्रदान कर दी। किस महल की? स्वयं तो वृक्ष के नीचे घास-फूस की टपरी में बैठे हैं, उन्होंने कौन-से महल की कुंजी प्रदान कर दी? वास्तव में शरीर एक मकान है–

या घट भीतर वन अरु बस्ती, या में झाड़ पहाड़ा।

या घट भीतर आय लेते हैं, राम कृष्ण अवतारा।

कहत कबीर सुनो भाई सन्तो! अलख पुरुष इक न्यारा।

सन्तो! घट में ही उजियारा।।

घट के अन्दर काम की खिड़की खुली है, लोभ-मोह-राग-द्वेष सबकी खिड़की है। एक मुक्ति की भी खिड़की है जिसे सब नहीं खोल पाते। महल में सब कुछ भरा हुआ है। मुक्ति किवाड़ खुलावै’– जिससे मोक्ष प्राप्त होता है, सद्गुरु ने वह दरवाजा खोल दिया अर्थात् भजन जागृत कर दिया। आवागमन से मुक्ति मिल जाय, कैवल्य पद मिल जाय, वह किवाड़ खुलवा दिया।

भजन की जागृति जब भी होती है, सद्गुरु से ही होती है। पूज्य गुरु महाराजजी कहा करते थे– सब बात सब कोई जानत हैं, दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है (उन दिनों गीता प्रेस गोरखपुर से गीता दो पैसे में मिलती थी), लोग पढ़त हैं और लिखत भी जात हैं। पता नहीं का पढ़त हैं, का लिखत हैं किन्तु भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो न तो लिखने में आती है और न ही वाणी से कहने में आती है। वह तो किसी अनुभवी सद्गुरु द्वारा किसी-किसी अधिकारी के हृदय में जागृत हो जाया करती है।

यही तथ्य रामचरितमानस के परिशीलन से मिलता है। भगवान राम जब पंचवटी में विराजमान थे, अनुज लक्ष्मण ने उनके समक्ष छलहीन शब्दों में साधनापरक प्रश्न रखे कि प्रभो! विद्या क्या होती है? अविद्या क्या होती है? माया क्या है? ब्रह्म क्या है? ईश्वर किसे कहते हैं और सुख का स्रोत क्या है? क्रम-क्रम से सबका उत्तर देते हुए भगवान ने कहा– भगति तात अनुपम सुख मूला।’– हे लक्ष्मण! अनुपम सुख’ जिसकी कोई तुलना नहीं है, ऐसे सहज सुख की मूल है भक्ति। लक्ष्मण ने कहा– प्रभु! उसे प्रदान करें। भगवान ने कहा– उसे सीधा तो मैं भी नहीं दे सकता। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।’ (रामचरितमानस, ३/१५/४)– वह मिलेगी तभी जब सन्त अनुकूल हों। सन्त मिलना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें अनुकूल भी करना चाहिए। इसीलिए भजन की जागृति न तो वाणी से, न लिखने-पढ़ने से आती है। वह तो अनुभवी सद्गुरु के द्वारा हृदय में जागृत हो जाया करती है।

ग्यान दया दम तीरथ मज्जन।

जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।। (रामचरितमानस, ७/४८/२)

ज्ञान प्राप्त करो, दया करो, इन्द्रियों का दमन करो, मन का शमन करो, तीर्थों में अवगाहन करो– धर्म के ये साधन श्रुतियाँ कहती आ रही हैं, सत्पुरुष कहते आ रहे हैं।

सब कर फल हरि भगति सुहाई।

सो बिनु संत काहू पाई।। (रामचरितमानस, ७/११९/१८)

सभी साधनों का फल है– एक हरि की भक्ति! किन्तु वह भक्ति बिना सन्त के आज तक किसी ने पायी ही नहीं। यही कबीर भी कहते हैं कि सद्गुरु ने वह खिड़की खोल दी जिससे मोक्ष प्राप्त होता है, आवागमन से छुटकारा मिल जाता है।

परमहंस परपुरुषहिं चीन्है, तब परलोक सिधावै।

सिद्ध है सोइ अतीत कहावै।।

मुक्ति का दरवाजा खुला। अब उस मुक्ति-मार्ग पर चलते-चलते व्यक्ति परमहंस कब होता है? जब वह परपुरुष को पहचान ले–

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।

ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।। (रामचरितमानस)

भगवान प्रकृति से परे हैं इसीलिए पर हैं, पुरुष हैं। पहले उस परपुरुष को पहचान लें ‘तब परलोक सिधावै’– पहले परम पुरुष की अनुभूति, तब परलोक में प्रवेश होता है; क्योंकि,

बिनु देखे वहि देस की बात कहै सो कूर।

आपहिं खारी खात है, बेचत फिरै कपूर।।

यदि किसी ने देखा नहीं और कहता है कि ‘ब्रह्म ऐसा, माया ऐसी’ वह व्यर्थ का बकवाद कर रहा है अर्थात् भजन अनिवार्य है। उसे करके ही परपुरुष की पहचान होती है। साधना के किस स्तर पर यह पहचान होती है?

अक्षर माहिं निरक्षर दरसे, सहज भाव मन लावै।

आदिशास्त्र गीता में है–

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।। (गीता, १५/१६)

अर्जुन! संसार में पुरुष दो प्रकार का होता है– क्षर और अक्षर! कैसे पहचानें कि कौन क्षर पुरुष है, कौन अक्षर? तो क्षर: सर्वाणि भूतानि’– भूत माने जीवित प्राणी, प्राणिमात्र का शरीर क्षर पुरुष है। ये क्षरणशील हैं, परिवर्तनशील हैं, अंजलि में जल की तरह हैं कि कितना भी कसकर अंजलि बांधे, पानी बूँद-बूँद रिसते-रिसते थोड़ी देर में समाप्त हो जाता है। शरीर क्षर पुरुष है। शरीर होने के कारण वासनाओं में जब तक जीवन है तब तक व्यक्ति क्षर पुरुष है और कूटस्थोऽक्षर उच्यते’– मनसहित इन्द्रियाँ जब कूटस्थ हो जाती हैं, अचल स्थिर ठहर जाती हैं फिर वही अक्षर पुरुष हो जाता है। उसका संसार में कभी विनाश नहीं होता। संसार में बस दो ही प्रकार के मनुष्य होते हैं। यदि कोई इन्द्रिय स्तर पर जी रहा है तो क्षर पुरुष और इन्द्रिय संयम की कसौटी पर है तो अक्षर पुरुष है। आप स्त्री हों चाहे पुरुष, शरीर तो एक वस्त्र है। यह आपके अन्त:करण की योग्यता का चित्रण मात्र है। संसार में पुरुष की यह दो ही श्रेणियाँ हैं। पुरुष की सर्वोच्च श्रेणी, तीसरी श्रेणी संसार से परे है–

उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:।। (गीता, १५/१७)

अर्जुन! उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, अनिर्वचनीय है, निरक्षर है, शब्दों से उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण के शब्दों में अन्य ही है जो यावन्मात्र जगत् को धारण करके स्थित है। परमात्मा, ईश्वर– ऐसा कहा भर जाता है; वैसे है अनिर्वचनीय, निरक्षर। अक्षर माहिं निरक्षर दरसे’– मनसहित इन्द्रियाँ कूटस्थ हो गयीं, वह अक्षर पुरुष है। अब उसका विनाश नहीं होना है। पाना ही पाना है, देर चाहे जो लगे। इस अक्षर की अवस्था से जहाँ साधक आगे बढ़ा, निरक्षर दिखायी पड़ा तो अक्षर माहिं निरक्षर दरसे, सहज भाव मन लावै।’ सहज भाव से परमात्मा मन में समा गया, परिश्रम नहीं करना पड़ता। सहज का अर्थ होता है– ‘विधि न बनाये हरि आप बनि आये।’– जैसे ऐसा था ही, परमात्मा ही शेष बचा। अब भगवान मार्गदर्शन किसका करें?

शिव शक्ति जब एक भई तब कस परम पद पावै।

शिव? प्रकृति की सीमाओं से अतीत, असीम तत्त्व, कल्याण तत्त्व शिव हैं। ज्योंही कोई भजन में प्रवृत्त होता है वह कल्याण तत्त्व वहीं से मार्गदर्शन शुरू कर देता है। वह है उस शिव की शक्ति जिसके माध्यम से वह साधक को जगाते, उठाते-बैठाते, भजन पढ़ाते, खतरों से अवगत कराते ले चलते हैं और बहुत ही संकट आया तो भक्त को बचाकर अलग खड़ा कर देते हैं। जिसके द्वारा भगवान योगक्षेम करते हैं वह है शिव की शक्ति। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। (गीता, ९/२२)

अर्जुन! अनन्याश्चिन्तयन्तो मां’– अनन्य माने अन्य न, मुझे छोड़कर अन्य किसी देवी-देवता को न भजते हुए जो केवल मेरा सतत चिन्तन करता है, ऐसे समर्पित भक्त के योगक्षेम का भार मैं वहन करता हूँ। परमात्मा जिस प्रशक्ति से भार वहन करते हैं, उसका नाम है शक्ति। किन्तु अक्षर अवस्था, कूटस्थ अवस्था से निरक्षर, अनिर्वचनीय की पकड़ आ गयी, परमात्मा सहज भाव से मन में समाहित हो गया, परमात्मा में स्थिति मिल गयी, अब आगे कुछ पाना शेष नहीं है तो शक्ति द्वारा किसको बतायें? ऐसी दशा में भगवान ही सिमटकर अपनी शक्ति को अपने में ही समाहित कर लेते हैं। भगवान बोलना-बताना बन्द कर देते हैं तो कस परम पद पावै’– अब उसे परम पद पाना ही पाना है। अन्त में कहते हैं, उस महापुरुष की रहनी कैसी है?,

मान बड़ाई एको रखाई, दुविधा दूर भगावै।

उन महापुरुष के यहाँ मान, बड़ाई रंचमात्र भी नहीं टिकती। उनका सम्मान करें या अपमान, उनकी प्रशंसा करें कि आपकी कुटिया अच्छी है, आपका ज्ञान बहुत अच्छा है– उन पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। संसार की दी हुई उपाधियों का उनकी दृष्टि में कोई महत्व नहीं रहता। क्षुद्र दुनिया के रहन-सहन की बड़ाई का उनकी दृष्टि में अस्तित्व ही नहीं है। यह तो श्रद्धालु वहाँ सेवा-सुमन प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसे महापुरुष हर आगन्तुक की दुविधा को दूर कर देते हैं कि भजन यह सही, वह मार्ग सत्य है। उस इष्ट को भजें या इनको? दुविधा, संशय दूर करना उनकी सहज अवस्था होती है।

कह कबीर एहि गति के योगी, बहुरि भवजल आवै।

सिद्ध है सोई अतीत कहावै।

सन्त कबीर कहते हैं कि इस उन्नत अवस्थावाले योगी बहुरि भव जल आवै’– पुन: भव अर्थात् आवागमन के, भवसागर के जल में कभी नहीं आते। भव अर्थात् संसार के कई रूपों का चित्रण रामचरितमानस में है–

भवसिंधु अगाध परे नर ते।

पद पंकज प्रेम जे करते।। (रामचरितमानस, ७/१३, छंद १०)

जो उन परम प्रभु के चरण-कमलों में प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसिंधु में डुबकियाँ लगाते रहते हैं। भगवान की कथा में अवगाहन करने से यही सिन्धु सरिता बनकर रह जाता है–

निज संदेह मोह भ्रम हरनी।

करउँ कथा भव सरिता तरनी।। (रामचरितमानस, १/३०/४)

प्रभुपर्यन्त दूरी तय करने की कथा, गुणानुवाद से अथाह भवसागर सरिता हो जाता है। कथा के आते ही प्रभु के चरित्र का चिन्तन करना होता है।

यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते परहिं भव कूपा।। (रामचरितमानस, १/१९१, छन्द ६)

चरित्र-चिंतन, मनन करनेवाले हरिपद प्राप्त कर लेते हैं, वे कभी भवकूप में नहीं गिरते। भवसमुद्र से भवसरिता और पुन: भवकूप में सिमट गया किन्तु भगवान का वरदहस्त मिल जाने पर,

गरल सुधा रिपु करइ मिताई।

गोपद सिंधु अनल सितलाई।। (रामचरितमानस, ५/४/२)

भगवान की कृपा होते ही विष अमृत में बदल जाता है। माता मीरा और भक्त प्रह्लाद को विष ही तो दिया गया था। भवसिंधु उतना ही रह गया जितना गाय के खुर से बने गड्ढे में जल आता है। जितना आपके इन्द्रियों का आयतन है, उतना ही आपके लिये संसार है। मंत्र जप की परिपक्व अवस्था में,

नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।

करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। (रामचरितमानस, १/२४/४)

नाम के प्रभाव से अथाह भवसिंधु भी सूख जाता है। इसलिए भजन की जहाँ तक परम्परा है, चाहे अंगूठा छाप महापुरुषों की वाणी हो या महायोगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की वाणी हो, सद्गुरु की कृपा से जब भजन जागृत हो गया तो उनका आराध्य एक, साधना-पद्धति एक, रास्ते में मिलनेवाली सुविधायें एक, विघ्न एक, निवारण एक और अन्तत: परिणाम भी एक ही होता है।

।। श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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