भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– यह योग मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा। ‘चक्षो: सूर्यो अजायत’– महापुरुष के दृष्टि-निक्षेप मात्र से योग के संस्कार सुरा में प्रसारित हो जाते हैं। स्वयंप्रकाश, स्ववश परमेश्वर का निवास सबके हृदय में है। सुरा (श्वास) के निरोध से ही उसकी प्राप्ति का विधान है। सुरा में संस्कारों का सृजन ही सूर्य के प्रति कहना है। समय आने पर यह संस्कार मन में स्फुरित होगा, यही सूर्य का मनु से कहना है। मन में स्फुरित होने पर महापुरुष के उस वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत हो जायेगी। यदि मन में कोई बात है तो उसे पाने की इच्छा अवश्य होगी, यही मनु का इक्ष्वाकु से कहना है। लालसा होगी कि वह नियत कर्म करें जो अविनाशी है, जो कर्म-बन्धन से मोक्ष दिलाता है।

आगे इसी सन्दर्भ स्वामी जी के प्रस्तुत भजन में देखें-

तू दैरे हरम का मालिक है, बस इतना करम मुझ पर कर दे।।
काबा की तरफ ये रुख न सही, तो रुख की तरफ काबा कर दे।।

मझधार में कश्ती छोड़ दिया, अब तेरे हवाले करता हूँ।।
कश्ती को डुबो दे दरिया में, या कश्ती लबे दरिया कर दे।।

बख्शिश की तेरे कोई शिकवा नहीं, पर इतनी गु़जारिश है बेशक।।
तू छीन ले दिल से दरद मेरा, या दरद भरी दुनिया कर दे।।

क्या हाल बयाँ मैं तुझसे करूँ, या हाल बयाँ है मुझसे तेरा।।
तू चाहे अगर तो अनहद की, आवा़ज भरी दुनिया कर दे।।

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