कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र है और इसको जो भली प्रकार जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है। वह उसमें फँसा नहीं है बल्कि उसका संचालक है।
शरीर तो एक ही है, इसमें धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र ये दो क्षेत्र कैसे? वस्तुत: इस एक ही शरीर के अन्तराल में अन्त:करण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं। एक तो परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्ति दैवी सम्पद् है और दूसरी है आसुरी सम्पद् – दूषित दृष्टिकोण से जिसका गठन है, जो नश्वर संसार में विश्वास दिलाती है। जब आसुरी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो यही शरीर “कुरुक्षेत्र” बन जाता है और इसी शरीर के अन्तराल में जब दैवी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो यही शरीर “धर्मक्षेत्र” कहलाता है। यह चढ़ाव-उतार बराबर लगा रहता है; किन्तु तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य में जब कोई अनन्य भक्ति द्वारा आराधना में प्रवृत्त होता है तो इन दोनों प्रवृत्तियों में निर्णायक युद्ध का सूत्रपात हो जाता है। क्रमश: दैवी सम्पद् का उत्थान और आसुरी सम्पद् का शमन हो जाता है। आसुरी सम्पद् के सर्वथा शमन के उपरान्त परम के दिग्दर्शन की अवस्था आती है। दर्शन के साथ ही दैवी सम्पद् की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, अत: वह भी परमात्मा में स्वत: विलीन हो जाती है। भजनेवाला पुरुष परमात्मा में प्रवेश पा जाता है।
(गीता – अध्याय १३, श्लोक १)
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।।
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श्रीमद्भगवद्गीता – यथार्थ गीता – अध्याय १३ – त्रयोदश अध्याय – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
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