मूल श्लोक:
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरि:।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।११/९।।
संजय बोला – हे राजन्! महायोगेश्वर हरि ने इस प्रकार कहकर उसके उपरान्त पार्थ को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखाया। जो स्वयं योगी हो और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिसमें क्षमता हो, जो योग का स्वामी हो, उसे योगेश्वर कहते हैं। इसी प्रकार सर्वस्व का हरण करनेवाला हरि है। यदि केवल दु:खों का हरण किया और सुख छोड़ दिया तो दु:ख आयेगा। अत: सब पापों के नाश के साथ सर्वस्व का हरण करके अपना स्वरूप देने में जो सक्षम है, वह हरि है। उन्होंने पार्थ को अपना दिव्य स्वरूप दिखाया। सामने तो खड़े ही थे।
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।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।।
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