श्रीमद्भगवद्गीता (संस्कृत) – पञ्चदशोऽध्याय: – पुरुषोत्तमयोग:

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भगवान् श्रीकृष्णो यस्मिन् काले गीतायाः सदुपदेशं प्रादात्, तदानीं तस्य मनोभावाः कीदृशा आसन्? ते सर्वे मनोगता भावा वक्तुं न शक्यन्ते। केचन सन्ति भावा वर्णयितुं योग्याः केचन भावभङ्गिमयैव प्रकटयितुमर्हाः, अपरे शेषा भावाः क्रियात्मकाः सन्ति, तान् भावान् कोऽपि जनस्तत्पथमारुह्यैव ज्ञातुं शन्कोति। यस्मिन् स्तरे श्रीकृष्ण आसीत्, तदेव स्तरमात्मसात् कृत्वैव कश्चित् साधनाधनो महापुरुष एव जानाति, यत् गीता कीं कथयति? स महापुरुषो गीतायाः वाक्यमेव वारम्वारं नावत्र्तयति, प्रत्युत् गीतोक्तभावान् स्पष्टरूपेण दर्शयति। कुतोहि या स्थितिः कृष्णस्य समक्षमासीत् सैव स्थितिस्तस्य महापुरुषस्य पुरतश्चकास्ति। एतस्मादेव स महापुरुषः सन्निरीक्षते जनान् दर्शयिष्यति, जनेषु तत् सञ्जागरयिष्यति च तत्पथे चालयिष्यत्यपि।

पूज्यश्रीपरमहंसजी महाराजा अपि तत् स्तरस्यैव महापुरुषा आसन्। तेषां वाणीभिरन्तः प्रेरणाभिश्च गीतायाः, योऽर्थः सम्प्राप्तः, तस्यैव संकलनं ‘यथार्थगीता’ अस्ति। – स्वामी अड़गड़ानन्द:

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लेखक प्रति …
‘यथार्थगीतायाः लेखकोस्त्येकः सत्पुरुषः, यः शैक्षिकोपाधिभिरसम्बद्धोऽपि सद्गुरुकृपास्वरूपेश्वरीयादेशैः सञ्चालितोऽस्ति। सत्पुरुषोऽयं लेखनम्, साधनायां-भजने च व्यवधानं मन्यमान आसीत्; किन्तु गीताया भाष्येऽस्मिन्निर्देशनमेव निमित्तं बभूव। परमात्मा भवन्तमनुभव-माध्यमेनासूचयत्, यद्भवतः सर्वा वृत्तयोऽअभूवन् शान्ताः, केवलं लघुतमैका वृत्तिरस्ति शेषा, गीतायाः लेखनम्। आदौ तु स्वामिचरणा इमां वृत्तिं भजनेन छेत्तुं प्रयत्नं कृतवन्तः, किन्तु शेषायां वृत्तौ गीताभाष्यलेखनमभवदपरिहार्यं भगवदादेशेन। भाष्यं यत्रापि जाता त्रुटिः, भगवान् शोध्यते। स्वामिनः स्वान्तः सुखायेयं कृतिः सर्वान्तः सुखाय भूयात्, अनया शुभकामनया सह-

श्री हरी की वाणी वीतराग परमहंसो का आधार आदि शास्त्र गीता – संत मत – १०-२-२००७ – तृतीय विश्व हिन्दू परिषद् – विश्व हिन्दू सम्मेलन दिनाक १०-११-१२-१३ फरवरी २००७ के अवसर पर अर्ध कुम्ब २००७ प्रयाग भारत में प्रवासी एवं अप्रवासी भारतीयों के विश्व सम्मेलन के उद्गाटन के अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद् ने ग्यारहवी धर्म संसद में पारित गीता हमारा धर्म शास्त्र है प्रस्ताव के परिप्रेक्ष्य में गीता को सदेव से विधमान भारत का गुरु ग्रन्थ कहते हुए यथार्थ गीता को इसका शाश्वत भाष्य उद्घोषित किया तथा इसके अंतर्राष्ट्रीय मानव धर्म शास्त्र की उपयोगिता रखने वाला शास्त्र कहा | – अशोक सिंहल – अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष.

श्री काशीविद्व्त्परिषद – भारत के सर्वोच्च श्री काशी विद्व्त्परिषद ने १-३-२००४ को “श्रीमद भगवद्गीता” को अदि मनु स्मृति तथा वेदों को इसी का विस्तार मानते हुए विश्व मानव का धर्म शास्त्र और यथार्थ गीता को परिभाषा के रूप में स्वीकार किया और यह उद्घोषित किया की धर्म और धर्मशास्त्र अपरिवर्तनशील होने से आदिकाल से धर्मशास्त्र “श्रीमद भगवद्गीता” ही रही है | – गणेश दत्त शास्त्री – मंत्री और आचार्य केदारनाथ त्रिपाठी दर्शन रत्नम वाचस्पति – अध्यक्ष

विश्व धर्म संसद – World Religious Parliament
३-१-२००१ – विश्व धर्म संसद में विश्व मानव धर्मशास्त्र “श्रीमद भगवद्गीता” के भाष्य यथार्थ गीता पर परमपूज्य परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज जी को प्रयाग के परमपावन पर्व महाकुम्भ के अवसर पर विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित किया.

२-४-१९९७ – मानवमात्र का धर्मशास्त्र “श्रीमद भगवद्गीता” की विशुध्द व्याख्या यथार्थ गीता के लिए धर्मसंसद द्वारा हरिद्वार में महाकुम्ब के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में परमपूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज को भारत गौरव के सम्मान से विभूषित किया गया.

१-४-१९९८ – बीसवी शताब्दी के अंतिम महाकुम्भ के अवसर पर हरिद्वार के समस्त शक्रचार्यो महामंद्लेश्वारों ब्राह्मण महासभा और ४४ देशों के धर्मशील विद्वानों की उपस्थिति में विश्व धर्म संसद द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में पूज्य स्वामी जी को “श्रीमद भगवद्गीता” धर्मशास्त्र (भाष्य यथार्थ गीता) के द्वारा विश्व के विकास में अद्वितीय योगदान हेतु “विश्वगौरव” सम्मान प्रदान किया गया | – २६-०१-२००१ – आचार्य प्रभाकर मिश्रा – Chairman (Indian Region).

माननीय उच्च न्यायालय – इलाहाबाद का एतहासिक निर्णय
माननीय उच्चन्यायालय इलाहाबाद ने रिट याचिका संख्या ५६४४७ सन २००३ श्यामल रंजन मुख़र्जी वनाम निर्मल रंजन मुख़र्जी एवं अन्य के प्रकरण में अपने निर्णय दिनांक ३० अगस्त २००७ को “श्रीमद भगवद्गीता” को समस्त विश्व का धर्मशास्त्र मानते हुए राष्ट्रीय धर्म्शात्र की मान्यता देने की संस्तुति की है | अपने निर्णय के प्रस्तर ११५ से १२३ में माननीय न्यायालय में विभिन गीता भाष्यों पर विचार करते हुए धर्म, कर्म, यज्ञ, योग आदि को परिभाषा के आधार पर इसे जाति पाति मजहब संप्रदाय देश व काल से परे मानवमात्र का धर्मशास्त्र माना जिसके माध्यम से लौकिक व परलौकिक दोनों समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है |

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– प्रकाशक पक्षतः

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