Answer
कच्छपावतार : सागर–मन्थन
दोहा – भव सागर मन्थन करि, रतन कह्यो सब देख।
तेरह बिष की बेलि हैं, अमिय पदारथ एक।।१।।
भावार्थ – चिन्तन की भावधारा में, एक समय की अनुभूति है, भवसागर-मन्थन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उपलब्ध तेरह रत्न विष की वृद्धि करनेवाली लता के सदृश हैं। केवल अमृत ही ऐसा विलक्षण पदार्थ है जिसमें अनेकता नहीं, जो सर्वथा अद्वितीय और अनुपमेय है।
दोहा – भवनिधि मन्थन कथा सुनि, सन्तन मन दुख चैन।
लखि तेरह दुख विपुल भे, एक अमिय लखि चैन।।२।।
भावार्थ – संसार-सागर-मन्थन की मानसिक उपलब्धि की इस कथा को सुनकर सन्त-महात्माओं के भाव-पटल पर सुख और दुःख का द्वन्द्वात्मक तनाव स्पष्ट होने लगा। तेरह रत्न सांसारिकता की भली-बुरी स्थितियों का ही चित्रण करते हैं। उनका प्रसार देखकर दुःखात्मक मनोमालिन्य का भाव बना रहा। चिन्मय आभ्यन्तरिक शान्ति उत्पन्न करनेवाले अमृत को देखकर सन्तों के मन में सुखात्मक अनुभूति तरंगित होने लगती है, जिसका सुपरिणाम परमकल्याण है।
दोहा – तेरह रत्न जग जीविका, विकसित भोग बिलास।
क्षण सुखकर परिणाम तन, जग जोनी की रास।।३।।
भावार्थ – तेरह रत्न संसार में जीव को अनेक योनियों में, विविध भोग-विलास के सुखों का विस्तार कर घुमाते रहते हैं। जहाँ तक मृगतृष्णा का विस्तार है, प्राणियों के विलासिता की सीमा है, उसके प्रोत्साहन में क्रियात्मक प्रभावशीलता इन्हीं तेरह रत्नों की क्षणिक चमत्कारिकता का दुष्परिणाम है। आकर्षण के विविध साधनों के बीच जीव जन्म और मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। सागर-मन्थन के तारतम्य में प्राप्त त्रयोदश रत्न अन्यान्य योनियों को समूर्त करनेवाले अक्षय भण्डार हैं, जिनके चकाचौंध में जीव आवागमन की पटरी में छटपटाता रहता है।
चौपाई – तेरह रत्न मिले दुःख मानी।
जतन प्रगट अमृत रस खानी।।१।।
भावार्थ – मन्थन की अविराम प्रयत्नशीलता का परिणाम यह हुआ कि एक, दो करके तेरह रत्न मिल गये किन्तु सुख का सान्निध्य नहीं हुआ, दुःख की क्लान्ति बनी रही। प्रयत्न चलता रहा। दृढ़ संकल्प और निष्ठा का सुपरिणाम यह हुआ कि मानस में अमृत का स्रोत फूट निकला। यह अक्षुण्ण प्रवाह चित्त की उस सूक्ष्मतम भूमिका से प्रगट हुआ है जहाँ इसकी अलौकिक खान अनादिकाल से है।
टिप्पणी- निष्ठापूर्वक यन्त्र की परिणति जो अमृत के रूप में प्रकट हुई, उससे स्पष्ट है कि साधक को पूर्तिपर्यन्त चिन्तन नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि चिन्तन-श्रृंखला की लड़ी टूट जाने पर पार्थिवता की धुरी में घुमानेवाले तेरह रत्न पुनः प्रभावशील होने लगते हैं। इस प्रकार जीव पूर्ववत् सांसारिकता के उत्थान-पतन में पड़ा हुआ देहाभिमान से आक्रान्त रहता है।
यह तन बिष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान।। (सन्त कबीर)
अनवरत प्रयत्नशील साधक मन्थन की प्रक्रिया के ही बीच अमिय पदार्थ के उद्भव की अलौकिकता का आभास प्राप्त करने लगता है।
चौपाई – अमिय बिलोकि सुखी पर काजा।
सकल लोक भव संशय भाजा।।२।।
भावार्थ – दिव्य पदार्थ अमृत का दिग्दर्शन होते ही मानव चिन्तन की अनन्यता में भाव-विभोर होकर पूर्णतः सुख के नीरधि में अवगाहन करने लगता है। भौतिकता से परे जीवनी शक्ति का संचार करनेवाले आत्मतत्त्व का सान्निध्य प्राप्त कर परमात्म-तत्त्व की ओर उन्मुख होनेवाली आशातीत सफलता साधक को उपलब्ध हो जाती है। मृत्युलोक, परलोक आदि अलौकिक आनन्द प्रदायक लोकों के प्रति जो दिव्य कल्पनाएँ रहती हैं उनका इस उपलब्धि के साथ ही अवसान हो जाता है।
नाना प्रकार की भ्रान्तिपूर्ण सन्देहास्पद विचारों का भी मानस पटल में निलय हो जाता है। एतद्रूपेण इस दिव्य पीयूष रस की आभ्यन्तरिक वृष्टि से पूर्ण स्थैर्य प्राप्त कर चित्तवृत्तियाँ चिरन्तन शान्ति के सागर में समाहित होकर परमात्म-तत्त्व में अभिन्नता की स्थिति पर लय हो जाती हैं-
जेहि जानें जग जाइ हेराई।
जागें जथा सपन भ्रम जाई।। (मानस, १/१११/२)
लगनशील पथिक जागृतिकाल में लक्ष्य पर लीन हो जाता है।
चौपाई – अमिय भोक्ताहू मिटि जाई।
तब पूरित परमारथ खाई।।३।।
भावार्थ – क्रमशील आभ्यन्तरिक उपलब्धि के परिणामकारक जब अमृत रस का पान करनेवाला भजनानन्दी भी शाश्वत सत्ता में समाहित हो जाय, तभी यथार्थ में परमार्थ पथ पर अवरोध उत्पन्न करनेवाली खाईं की गहराई भी परिपूर्ण हो जाती है।
टिप्पणी- यह साधक की आत्मिक उपलब्धि की वही चरम सीमा है, जिसका निरूपण कबीर ने इस प्रकार किया है-
अवधू बेगम देश है मेरा।
जहाँ पहुँच फिर हंस न आवे, भवसागर की धारा।
तहाँ न माया कृत प्रपंच यह, लोक कुटुम्ब परिवारा।।
यह वही स्थिति है जहाँ पहुँचकर नारद की वीणा को मधुर स्वर मिला है, जहाँ पर प्रलयंकर भगवान शंकर का डमरू निनादित हुआ है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को रावण पर विजय मिली है। कहाँ तक कहा जाय, गीता का दिव्यज्ञान इसी भाव-भूमि की उपज है, जहाँ खोजनेवाला लक्ष्य में खो जाता है।
चौपाई – आत्म दरश अमृत सुधि सोई।
अवर कहैं जन सुध बुध खोई।।४।।
भावार्थ – अन्वेषणकर्त्ता को जब आत्मानुभूति हो जाती है, तभी यह स्पष्ट हो जाता है कि पीयूषवर्षण की अलौकिक वेला का अभ्युदय हो गया है। यही अमृत रस का शोध है। यदि कोई पथिक इस आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया का वर्णन किसी भिन्न ढंग से करता है, तो उसके विषय में यह निर्णय ले लेना चाहिए कि या तो वह चिन्तन-पथ से भ्रमित होकर सुधबुध खो चुका है या अपने लक्ष्य से ही वंचित होकर किसी माया की चकाचौंध में ठगा गया है।
दोहा – अमिय पदारथ अपर नहिं, मृत सारा जप भोग।
भजन पूर्ती काल महँ, अमिय आत्म संयोग।।४।।
भावार्थ – आत्मानुभूति से पृथक् अमृत की कहीं उपलब्धि नहीं है। जब यौगिक चिन्तन से लेकर जहाँ तक भी समस्त भोगों का विस्तार है, सब नश्वरता के गुण से युक्त हैं, तो बाहर ढूँढ़ने पर वह अमिय रत्न मिलेगा कहाँ? जिस किसी ने भी उसकी रसानुभूति का आह्लाद प्राप्त किया है, वह आत्मसाक्षात्कार के रूप में ही। भजन के पूर्तिकाल में उस अमृत-तत्त्व का संयोग होता है।
चौपाई – तेहि प्रगटत सर मन्थन पूरा।
मिलहि तबै वितरित हरि रूरा।।५।।
भावार्थ – दिव्य अमृत रत्न में आत्मा और परमात्मा के विलयन पर मानव मृत्यु से पार हो जाता है। ठीक इसी अवस्था में सागर-मन्थन की यौगिक प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है और वह अलौकिक ब्रह्म इसी शरीर में अपनी व्यापक सचेतनता का प्रसार करता हुआ अन्तःकक्ष को आलोक से भर देता है। लेकिन उस रत्न की अनुभूति उसी क्षण होती है जब अमृतमय भगवान स्वतः सारथी बनकर उसका संचालन करते हुए पीयूष वितरण करें अर्थात् साधक में रथी बनकर खड़े हो जायँ।
टिप्पणी- तुलसीदासजी ने कहा है-
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनन्दन।
जानहिं भगत भगत उर चन्दन।। (मानस, २/१२६/३-४)
स्पष्ट है कि बिना उसकी कृपा के चिन्तन-प्रक्रिया में अधिक श्रम के उपरान्त भी वह आवागमन से मुक्त कर देनेवाला परम अमृत-तत्त्व उपलब्ध नहीं होता। हाँ, साधन कभी भी व्यर्थ नहीं जाता, समय की प्रतीक्षा करें।
चौपाई – यह रूपक परमारथ माहीं।
विषय भोग रत कर थिति नाहीं।।६।।
भावार्थ – परमार्थ पथ के भीतर ही यह सागर-मन्थन का रूपक है। ऐसे मानव जो विषयात्मक भोगों में आसक्त हैं या चिन्तन-पथ को समझकर कुछ करने के लिए भी प्रयत्न करते हैं परन्तु वासनाओं को प्राथमिकता देकर परमकल्याण को गौण कर देते हैं, उन हीन मनोबलवाले साधकों की बुद्धि सागर-मन्थन की इस आध्यात्मिक धारा में थक जाती है। ऐसे पुरुषों में अधिकार की कमी, क्षमता का अभाव समझना चाहिए।
चौपाई – विषय भोग तजि जो जन जागा।
उर अभिषेक हरी संग लागा।।७।।
भावार्थ – जो पुरुष मनसहित इन्द्रियों से विषय-वासनाओं का त्याग करके ‘या निशा सर्वभूतानाम्’ इस प्रकार की तिमिराच्छन्न रजनी में जाग्रत अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं, उनका हृदय से अभिषेक परमपिता परमेश्वर के साथ निर्धारित हो जाता है। लगन में लक्ष्य के अंकित हो जाने पर प्रयत्नशील साधक की आत्मा ब्रह्माभिषिक्त होकर कृपारूपी मोतियों को चुगती हुई मनरूपी मानसरोवर में निमग्न रहती है।
चौपाई – मन तन इन्द्रिय संयम होई।
कूर्म अंग इव हृदया गोई।।८।।
भावार्थ – मानव की बाह्य परिकल्पनाओं की जहाँ तक दौड़ है, उसे माया का अधोमुखी विस्तार ही समझना चाहिए। मायिक धरातल से ऊपर सुदूर अनन्त में उठकर परम लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए जिसका मन-विहंग विह्वल है, उसे मनसहित इन्द्रियों के बाह्य प्रसार को संयत करना पड़ता है। इस प्रकार इन्द्रियसहित मन को जो मायावी स्पर्शों से संयमित कर लेता है उसके आभ्यन्तरिक प्रकोष्ठ में कूर्मावतार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कच्छप अपने जीवन के प्रतिकूल आहट पाते ही मस्तिष्कसहित अपने पैरों को समेटकर जिस प्रकार छिपा लेता है, ठीक तदनुकूल एक साधक भी मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों को हृदय-देश में कच्छप की तरह समेट लेता है। उसी क्षण ईश्वर के अवतार का विधान है।
दोहा – ता क्षण प्रगटे परम प्रभु, परम प्रकाश पुनीत।
कूर्मा कृत इन्द्रिय मना, तब हरि राखी नीत।।५।।
भावार्थ – तत्क्षण वह परमप्रभु जो दिव्य प्रकाशस्वरूप और पूर्णतया पुनीत हैं, प्रगट हो जाते हैं। यह पीयूषप्लावन योगी के हृदय-देश में होता है। जब पथिक मनसहित इन्द्रियों को हृदय के अन्तराल में समाहित कर लेता है तब हरि उसके मानस में अनुभूति के रूप में जागृत होकर उस मन्थन चिन्तन की नीति का विस्तार करते, समझाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव भगवान कहा करें- ‘‘मुझे भगवान बताया करते हैं।’’
चौपाई – एहि विधि कूर्म अवतार बखाना।
बिनु संयम के कबहुँ न जाना।।९।।
भावार्थ – जो कछुए की तरह मनसहित इन्द्रियों को वासनाओं से पूर्णतया समेट लेता है, हरि उसी का साथ देते हैं। आत्मसंयम के अतिरिक्त इस गूढ़ रहस्यात्मक अवतार की कथा से अवगत होना असम्भव है।
चौपाई – मन इन्द्रिय कूर्माकृत जानी।
प्रगटहिं हरि अगणित गुणखानी।।१० क।।
कूर्माकार भई जब इन्द्री।
विश्ववास प्रगटे हरि जिन्द्री।।१० ख।।
भावार्थ – जब मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियाँ कूर्म के आकार में आ जाती हैं और बाह्य विषयों की दौड़ को रोककर अन्तर्मुखी प्रवाहित हो जाती हैं, उसी समय विश्व के कण-कण में निवास करनेवाले अपार गुणों से विभूषित प्रभु प्रगट होने लगते हैं।
टिप्पणी – परमात्मा निखिल अन्तर्देश को आलोकित कर देते हैं –
हुआ प्रकाश तमोमय मग में। मिला मुझे तत्क्षण तूँ जग में।।
तेरा हुआ बोध पग पग में। मिटा सकल अज्ञान।।
खोज में हुआ वृथा हैरान। यही पर था तू हे भगवान।।
गुरुदेव भगवान की वाणी में यही स्थिति देखें –
जलत जलत ऐसी जली, जाको आर न पार।
ईश्वर जीव ब्रह्म अरु माया, फूँक दियो संसार।।
करूँ अब किसकी तल्लासी? लावनी सुन बारहमासी।।
शब्दार्थ- जिन्द्री = जीवनदाता।
चौपाई – सोई कच्छप जन मन गहि राखा।
मन अविचल मन्दराचल शाखा।।११।।
भावार्थ – वे कच्छप, जिनकी इन्द्रियों के समाहित काल में उत्पत्ति है, वही परम प्रभु साधक के मन को पूर्णतः घेरकर रख लेते हैं। मन की इसी स्थिति-विशेष की निश्चलता का प्रतीकात्मक स्वरूप ‘मन्दराचल’ से अभिहित किया गया है। पर्वत शब्द के पर्याय भूधर से भी इसी अचलता का लक्षण परिलक्षित होता है।
चौपाई – अचल करत मन साधत जाहीं।
तिन पर सिन्धु सकल जरि जाहीं।।१२।।
भावार्थ – वे परमदयालु प्रभु प्रयत्नशील मन को साधना की सही जानकारी देते हुए, उसे विशिष्ट युक्ति के द्वारा साधते हुए अचल करते हैं। ऐसे साधकों के समक्ष संसार-सागर की समस्त बाह्य प्रवृत्तियाँ उत्तेजित हो जाया करती हैं। अचलता की ओर अग्रसर पथिक के प्रति माया ईर्ष्यालु होती है। अतः वह मायाविनी अनेक चमत्कारिक आकृतियों का प्रलोभात्मक प्रभाव डालकर लक्ष्योन्मुख साधक के पथ में अवरोध उपस्थित करती है।
चौपाई – स्वाँस सुरति संग बिषय डुबावत।
तब हरि कच्छ रूप बिधि पावत।।१३।।
भावार्थ – श्वास और सुरति की संगति करके जब विषयात्मक वेग साधक को संसार-सागर में डुबाने का प्रयत्न करते हैं तब व्याकुलता की भँवर में फँसा साधक कल्याण की पुकार करता है। ऐसी परिस्थिति में तत्क्षण वे प्रभु इन्द्रियों के निरोधकाल एवं कूर्माकार स्थिति में अन्तर्देश में प्राप्त होकर लीला-प्रसार करते हैं। वास्तव में कच्छप स्वरूप का प्रगटीकरण संयम की कसौटी पर बल देना है।
चौपाई – कर परसे मन गिरि सम गाढ़ा।
सिन्धु पैठ हरि परस प्रगाढ़ा।।१४।।
भावार्थ – सर्वप्रथम साधक के हृदय में वे हरि जागृत होकर मन का स्पर्श कर उसे पर्वत के समान स्थिर कर देते हैं, दूसरी ओर संसार-सागर में उसे सुरक्षित रखने के लिए अपनी आभा से योगक्षेम का आश्वासन देते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी ने प्रभु की सहज कृपा का दिग्दर्शन इन शब्दों में कराया है-
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस, ३/४२/५)
चौपाई – सो मन अचल हेतु सुर संगा।
स्वाँस वासुकी नाग सुरंगा।।१५।।
भावार्थ – भगवान का कृपापात्र, ऐसे साधक का मन विरह-वैराग्य व अनुराग के साथ दैवी सम्पदा का संग्रह कर मन के पूर्ण स्थैर्यरूपी मन्दराचल का आविर्भाव करता है। श्वास ही वासुकी नाग है। समुद्र-मन्थन से पूर्व यही श्वास सांसारिक योनियों का प्रसार करती है तथा मायिक विकारों का विष उगलती हुई निरन्तर जीवात्माओं को डसती रहती है, इसीलिए इसे सर्प की संज्ञा प्रदान की गई है। परन्तु चिन्तन की सूक्ष्म भावभूमि पर पहुँचते ही यही श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया निर्दोष एवं सम हो जाती है, तभी ईश्वर से स्वरूप की अविरामवाहिनी होने के कारण इसे वासुकी के अलंकरण से विभूषित किया जाता है। श्वास-प्रश्वास का निरन्तर चिन्तन निम्नलिखित पंक्तियों में देखें-
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सहजों एकरस ह्वै रहे, तार टूटि ना जाय।।
चौपाई – दैव निवास वासुकी स्वाँसा।
स्वर संग मथा सिन्धु हरि पासा।।१६।।
भावार्थ – परमदेव परमात्मा का निवास श्वास में है, इसलिए स्वर ही वासुकी है। इसी स्वर के माध्यम से संसार-सागर का मन्थन होता है; किन्तु यह मन्थन तभी सम्भव है जब हरि अन्तर्प्रेरक के रूप में साथ हों। तभी तो तुलसीदासजी ने भी कहा है- ‘सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।’ (मानस, २/१२६/३)
चौपाई – देवासुर मन की परमीती।
मन मरणोत्तर छाँड़त नीती।।१७।।
भावार्थ – दैवी एवं आसुरी प्रवृत्तियाँ ही मन की सीमाएँ हैं। मन के मिटते ही दोनों प्रवृत्तियाँ अपना कार्यकलाप बन्द कर देती हैं। जब तक मन में एक भी संकल्प की लहर तरंगित है तब तक ये जीवित रहती हैं।
चौपाई – मन संकल्प करत जग माहीं।
रूप मिलत जन दुविधा जाहीं।।१८।।
भावार्थ – मन का चांचल्य परिगणन से परे है। जहाँ तक संसृति विस्तार है वहाँ तक मन के संकल्पों का भी प्रसार है। गोस्वामीजी भी यही कहते हैं-
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, ३/१४/३)
सूरदासजी भी ऐसा ही मत व्यक्त करते हैं-
यह माया भ्रम जाल कहावै, सूर स्याम सिगरो।
अबकी बेर नाथ मोहि तारो, नहिं पन जात टरो।।
किन्तु मन की तरंगों में अचलता का आविर्भाव होते ही, परमप्रभु के स्वरूप की छँटा मिलते ही साधक की दुविधा सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाती है।
दोहा – दैवी सम्पत्ति राम की, आसुरि सम्पत्ति काम।
लक्ष्य विरोधी दुहुन का, स्वर संग आठो याम।।६।।
भावार्थ – दैवी सम्पत्ति राम की ओर एवं आसुरी सम्पत्ति काम की ओर उत्प्रेरित करती है। ये दोनों परस्पर विरोधी सम्पत्तियाँ प्रकृति की ही हैं। एक संसार-सागर में डुबानेवाली है, तो दूसरी संसार-सागर से पार करनेवाली है। दोनों अहर्निश श्वास के साथ संघर्षरत हैं।
चौपाई – मन्दराचल मन श्वास लपेटी।
खैंचत दुहुँ दिसि भव जल पैठी।।१९।।
भावार्थ – प्रवृत्तियों की अविचलता में यह मन ही मन्दराचल पर्वत है। जिसके अगल-बगल चेतनता का संचार करनेवाली श्वास नेती की भाँति लिपटी हुई है। अनन्त सागर के जल के मन्थनकाल में आसुरी सम्पत्ति अपनी ओर खींचती है, तो दैवी सम्पद् भी साँस को स्वाभिमुख करने का प्रयास करती है। दोनों दलों के संघर्ष का क्षेत्र साधक का अन्तःकरण ही है।
चौपाई – दैवी सम्पद् देव मिलाहीं।
उर प्रेरक संग निज बल नाहीं।।२०।।
भावार्थ – दैवी सम्पदा उस परमदेव परमात्मा से मिलाती है; परन्तु इस दैवी सम्पदा के साथ उस प्रेरक महापुरुष का रहना परम आवश्यक है। उर-प्रेरक के रूप में महापुरुष साधक के अन्तर्देश में प्रविष्ट होकर पथिक को गन्तव्य की ओर ले चलता है, वैसे प्रेरकशून्य दैवी सम्पदा का अपना कोई बल नहीं है। यह बात अवश्य है-
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।
सत संगति संसृति कर अन्ता।। (मानस, ७/४४/६)
उपर्युक्त दैवी सम्पत्ति जिस देव से मिलाती है उसी देव को यहाँ अमिय पदार्थ से सम्बोधित किया गया है-
चौपाई – अमिय पदारथ परम प्रकासा।
भक्त देव गति आसुर नासा।।२१।।
भावार्थ – मृत्यु से परे अमिय पदार्थ ही परमदेव है, जिसके दिव्यालोक से निखिल संसृति प्रकाशित हो रही है। इसी अमृत-तत्त्व की गरिमा से भक्त देवत्व की कोटि में पहुँच जाता है तथा उसके मानस-पटल से संसार के मिथ्या प्रपंचों में ढकेलनेवाली आसुरी सम्पदा का सदा-सदा के लिए विनाश हो जाता है।
कबीर की बानी में भी उक्त आशय द्रष्टव्य है-
पाहन फोरि गंग एक निकसी, चहुँ दिसि पानी पानी।
ओहि पानी दुइ पर्वत डूबे, दरिया लहर समानी।।
नोट- चौपाई २१ में इंगित ‘देव’ का तात्पर्य परमदेव परमात्मा है। अब आसुरी सम्पद् का कार्य-विस्तार देखें-
चौपाई – आसुरी सम्पद् भोग जगत के।
उर अन्तर नित साल भगत के।।२२।।
भावार्थ – आसुरी सम्पद् सांसारिक भोग-विलास के साधनों का विस्तार करती है। साधारण मनुष्यों की कौन कहे, यह भक्तों के हृदय प्रकोष्ठ में कील की तरह सदैव चुभती रहती है।
इसी प्रचण्ड सेना की ओर संतप्रवर तुलसीदासजी ने इस प्रकार इंगित किया है-
ब्यापि रहेउ संसार महुँ, माया कटक प्रचण्ड।
सेनापति कामादि भट, दम्भ कपट पाषण्ड।। (मानस, ७/७१ क)
ग्यानी तापस सूर कबि, कोबिद गुन आगार।
केहि कै लोभ बिडम्बना, कीन्हि न एहिं संसार।। (मानस, ७/७० क)
तात तीनि अति प्रबल खल, काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन, करहिं निमिष महुँ छोभ।। (मानस, ३/३८ क)
चौपाई – ऋद्धि सिद्धि लगि आसुरी बासा।
सदा नचावत देख तमासा।।२३।।
भावार्थ – ऋद्धि-सिद्धिपर्यन्त आसुरी सम्पत्ति का निवास है। यह अच्छे से अच्छे साधकों को भी प्रलोभन से चमत्कृत कर नचा देती है और स्वयं किनारे पर खड़ी मुस्कराती रहती है।
माया मायापति के वश में रहती है। उन्हीं की महती कृपा की आड़ में पड़ा रहनेवाला कोई बिरला ही इससे बचकर उन्हें समझ पाता है, और सभी तो माया के बच्चे हैं-
ज्ञान अखण्ड एक सीताबर।
माया बस्य जीव सचराचर।। (मानस, ७/७७/४)
चौपाई – दोउ प्रवृत्ति महँ माया बासा।
एक ईस बल एक उदासा।।२४।।
भावार्थ – दोनों प्रवृत्तियों में माया का निवास है। एक विद्या के क्षेत्र की है दैवी सम्पदा, जो ईश्वर से प्रेरित होती है। एक आसुरी सम्पत्ति है, जो अविद्या के क्षेत्र में विषयात्मक प्रसार करती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी का विचार उल्लेखनीय है-
एक दुष्ट अतिसय दुख रूपा।
जा बस जीव परा भव कूपा।।
एक रचइ जग गुन बस जाकें।
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। (मानस, ३/१४/५-६)
चौपाई – महा प्रबल आसुर बल संगा।
माया नाचत नाच अभंगा।।२५।।
भावार्थ – माया आसुरी शक्तियों से शक्तिमती होकर पूर्ण प्रवेग से साधक को लक्ष्य से विचलित कर देती है। चमत्कारिक आकर्षणों से असतर्क पथिकों को लुभाती और नचाती रहती है। यह मायावी प्रसार सहज ही नियन्त्रित नहीं किया जा सकता इसलिए इसे अभंग, अभेद्य तथा दुर्जय की संज्ञा प्रदान की गई है।
चौपाई – सो माया मिटती जिय संगा।
ईस मिले जिय रूप अभंगा।।२६।।
भावार्थ – यह दुर्जय माया जीवात्मा का पिण्ड तभी छोड़ती है जब उसके अन्तर्देश से जीवगत संस्कारों का पूर्णतः अवसान हो जाता है। आत्मा ईश्वर का ही विशुद्ध स्वरूप है। संसार में आते ही उसमें विषयात्मक संस्कारों का रंग इतना गाढ़ा हो जाता है कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच की दूरी अपरिमेय हो जाती है।
गोस्वामीजी ने लिखा है-
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
सो मायाबस भयउ गोसाईं।
बँध्यो कीर मरकट की नाईं।।
जड़ चेतनहि ग्रन्थि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।। (मानस, ७/११६/२-४)
किन्तु किसी अन्तर्प्रेरक की कृपा से माया का यह मैल संयम के साबुन से धुल जाय, तब यह जीवात्मा ईश्वर में स्वरूप का विलय करती हुई उसी के साथ अखण्ड स्थिति प्राप्त कर लेती है।
चौपाई – प्रथमहिं संयम सँग कर बासा।
तिमि तिमि दातव रूप प्रकासा।।२७।।
भावार्थ – उपर्युक्त उपलब्धि के लिए सर्वप्रथम सकलेन्द्रिय संयम अपरिहार्य है। संयम के साथ-साथ साधक में दातव प्रकाश निखर आता है।
शब्दार्थ- अदृश्य सत्ता द्वारा प्रदत्त वास्तविक प्रकाश, अलौकिक प्रकाश-पुंज को दातव की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है।
चौपाई – स्वाँस सुरत संग देव प्रकासा।
असुर अनी प्रथमहिं गहि स्वाँसा।।२८।।
भावार्थ – संयम का तात्पर्य मन और इन्द्रियों का श्वास और सुरत की प्रक्रिया से पूर्ण निरोधावस्था को प्राप्त करना है। श्वास और सुरत के संयोग से दैवी सम्पत्ति का मानस में प्रकाश होता है। यह भी ध्यानेय है कि आसुरी सम्पत्ति ने इस श्वास की क्रिया को पहले से ही अपने अधीन कर रखा है।
दोहा – एक संग दोउ दल चले, खींच भाव अनुरूप।
निज भावन में बिंध रहें, उर महँ कच्छ अनूप।।७।।
भावार्थ – श्वास-प्रश्वास के आरोह-अवरोह में दोनों दल अपनी-अपनी ओर खिंचाव डालते हैं। आसुरी सम्पत्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि अधोमुखी प्राकृतिक जड़ता की ओर खिंचती है, तो दैवी सम्पद् के शम, दम, नियम, संयम शाश्वत सत्ता की ओर आकृष्ट करते हैं। इन दोनों को कार्यक्षेत्र में प्रवृत्त करनेवाले आधार वही हरि हैं, जिनके आश्रय में संसार-सागर का मन्थन चलता रहता है।
चौपाई – प्रथम सिन्धु महँ शंख१ अनूपा।
करत निनाद विजय अनुरूपा।।२९।।
भावार्थ – चिन्तन-क्रम में धारावाही गति प्राप्त होने पर मन्थन का प्रथम परिणाम दिव्य शंख का आविर्भाव है, जिसका उद्घोष है कि अब पथिक देश, काल और परिस्थिति से अजेय होकर चिरन्तन शान्ति के अन्वेषण में सफल हो जायेगा। इस उपलब्धि से साधक में नवोत्साह, विश्वास और दृढ़ता का आविर्भाव होता है।
चौपाई – हय२ असवार विवेकी बाना।
मन हय रूप सो चढ़त सयाना।।३०।।
भावार्थ – विजय की घोषणा का सूत्रपात होते ही साधक विवेक को ही अपना बाना बना लेता है। निरन्तर भागनेवाले उसके अश्वरूपी मन पर आत्मज्ञान का स्थैर्य सवार हो जाता है।
कबीर ने भी अश्वासीन होने की क्रिया को एक विशेष उपलब्धि माना है-
एक बार हरि घोड़ा भये, ब्रह्मा भये लगाम।
चाँद सुरुज रबिका भये, चढ़ि गये चतुर सुजान।।
नोट- शास्त्रों में गति को अश्वशक्ति और स्थायी बल को हस्तिबल से मापने की प्रथा है। सूर्य के स्यन्दन में भी घोड़ों की कल्पना की गई है। इस प्रकार अश्व चंचलता एवं गतिशीलता का प्रतीक है। संसार-सागर-मन्थन की दूसरी उपलब्धि मन के अश्व पर ज्ञान का आसीन होना है।
चौपाई – अब जन मन सन चढ़ी खुमारी।
चढ़ि डोलत सुख सागर भारी।।३१।।
भावार्थ – जब साधक मन पर नियन्त्रण पा लेता है तब चिन्तन की खुमारी तथा भजन की मस्ती से उसका अन्तर्देश परिपूर्ण हो जाता है। इस अलौकिक नशे में आरूढ़ पथिक सुख में हिलोरें लेता रहता है, यद्यपि संसार-सागर का विस्तार समाप्त नहीं हुआ है।
कबीरदासजी ने ब्रह्मानन्द के प्रेम-रस की खुमारी का चित्रण इस प्रकार किया है-
हरि रस पीया जाणिये, कबहुँ न जाइ खुमारि।
मैं मंता घूमत रहै, नाहीं तन की सारि।।
कबिरा प्याला प्रेम का, अन्तर लिया लगाय।
रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय।।
हरिरस पान की पहचान है कि उसका नशा स्थायी रहे। ऐसा मनुष्य मदमस्त हाथी के समान खानपान की परवाह किये बिना, शरीर से उदासीन होकर घूमता रहता है।
चौपाई – धनुष३ बाण कर साधत ध्याना।
लखा न काहू असुर उताना।।३२।।
भावार्थ – ऐसी खुमारी से साधक को ध्यान की कसौटी तथा लक्ष्य में धारावाही लव लगाने की क्षमता प्राप्त होती है। ध्यान ही धनुष है। यह अन्तर्मन की स्थिति का प्रतीकात्मक स्वरूप है, जो बाह्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। ध्यान की स्थिरता का प्रभाव इतना प्रबल है कि उसके विवेकमयी तीक्ष्ण बाणों के प्रहार से आहत होकर आसुरी प्रवृत्तियाँ निष्प्राण हो जाती हैं।
चौपाई – चिद् विलास संसृति सर पूरा।
एहि भवनिधि कहँ मथहिं जे सूरा।।३३।।
भावार्थ – चिद्विलास जगत् ही आवागमन की लहरों से तरंगित परिपूर्ण सागर है। यौगिक प्रक्रिया से इसका मन्थन करके जो बिरले पथिक अन्तराल में पड़े हुए स्वात्मस्वरूप का अन्वेषण कर लेते हैं, वही सच्चे शूरवीर हैं।
टिप्पणी – लौकिक चक्षुओं से दृष्टिगोचर न होनेवाले संसार-सागर में असहनीय पीड़ा की असंख्य लहरियाँ तरंगित हो रही हैं। फेनमयी मायिक आकर्षणों के विष में जीव तिनके के समान छटपटा रहा है; किन्तु सशक्त आत्माएँ अपने अंशी की ओर निरन्तर प्रयत्नशील रहती हैं। जहाँ साधक की सूक्ष्म पकड़ प्रारम्भ होती है, भवसिन्धु सूखने लगता है। इसीलिए महर्षि पतंजलि और भगवान श्रीकृष्ण ने चित्त-निरोध पर ही विशेष बल दिया है। उस अवस्था का चित्रण कबीर की साखी में देखें-
मैं मन्ता अबिगत रता, अकलप आसातीत।
राम अमिल माता रहै, जीवत मुकति अतीत।।
भक्त जीवनकाल में ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। बौद्ध-दर्शन में भी ऐसी ही मान्यता है।
चौपाई – चिद् विलास जिन सागर साधा।
ते हरि रूप भये निरबाधा।।३४।।
भावार्थ – जिन्होंने चिद्विलास जगत् को साधकर, अनेक कामनाओं से तरंगित संसृति सागर का मन्थन कर लिया, वे ही व्यष्टि की सीमा से उपराम होकर हरिस्वरूप हो जाते हैं। अणु ही विभु हो जाता है। ऐसी स्थिति के लोग ही सदा-सदा के लिए मायिक बन्धनों से मुक्त हो पाते हैं। यदि रंचमात्र भी मन बहिर्मुख है, तो माया झकझोर डालती है।
चौपाई – नारद मन महँ माया त्यागी।
भये अवतार तो लाग अभागी।।३५।।
भावार्थ – देवर्षि नारद माया त्यागकर अवतार की कोटि में प्रवेश करने ही वाले थे कि एक ओर से अभागिनी माया की लहरें प्रवाहित हो गईं। तात्पर्य यह है कि इष्ट से रंचमात्र भी दूरी है तब तक खतरा है, माया सन्धि पाते ही आक्रमण कर बैठती है।
चौपाई – पतंजली स्वर सिन्धु सँभाला।
योग दरस समरथ सम शाला।।३६।।
भावार्थ – महर्षि पतंजलि ने स्वर में स्थिरता प्राप्त की और संसार-सागर का शोध कर योग प्रत्यक्षीकरण द्वारा परमात्मस्वरूप को प्रकट करने में समर्थ हुए। ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करके वे भविष्य में आनेवाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण तथा समत्व ज्ञान की पाठशाला के गुरु हो गये।
चौपाई – रामचरित मानस कर दाता।
नर हरि रूप राम सुखदाता।।३७।।
भावार्थ – भगवान राम के चरित्र जो मन में प्रसारित हैं, वह भी एक प्रकार का सागर-मन्थन है। उसको चरितार्थ करनेवाले भगवान राम की भी यही देन है कि मानस के अन्तराल में चिन्तन करके नर से हरि एवं स्वयं राम का स्वरूप प्राप्त किया जा सकता है। वह जिस किसी को मिला है आभ्यन्तरिक चिन्तन की प्रक्रिया से ही प्राप्त हुआ है।
चौपाई – जानत हरी हरी होइ जाई।
मन जीते बिनु लखा न भाई।।३८।।
भावार्थ – चिन्तनशील पथिक आध्यात्मिक उपलब्धि की पराकाष्ठा पर पहुँचकर जैसे ही अन्तर्देश में अलौकिक विभूति को प्रत्यक्ष कर लेता है, तत्क्षण वह उन्हीं का रूप हो जाता है। परन्तु मन के निरोध के बिना हरि की विश्वव्यापी सत्ता में प्रवेश असम्भव है।
‘गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।। (गीता, ६/३६)
मन को वश में न करनेवालों के लिए योग दुष्प्राप्य है। इसे निरन्तर अभ्यास एवं उत्कट वैराग्य से ही साधा जा सकता है-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। (गीता, ६/३५)
दोहा – सब सन्तन की जीत में, एक अनोखी बात।
मन सागर हरि में मिले, एक अमिय रस मात।।८।।
भावार्थ – समस्त सन्त-महात्माओं की जीत अर्थात् उपलब्धिकाल में प्रकृति का अन्त हो जाने पर एक ही परिणाम मिला है कि मन में संचारित संसार-सागर के विलीन होते ही एकमात्र रस अमृत का आविर्भाव हुआ, जो चिन्तनशील भाविकों का माता की तरह पालन-पोषण करता है। इतना ही नहीं, वह पीयूषप्रेमी स्वयं अमृतमय हो उठता है।
कबीर भी कहते हैं कि आत्मा परमात्मा को खोजते-खोजते स्वतः ही खो गई। नमक का पुतला सागर की गहराई मापते-मापते स्वयं सागर में विलीन हो गया-
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हेराय।
बूँद समानी समुद्र में, सो कत हेरि जाय।।
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गई लाल।।
चौपाई – कृष्ण निजानन्द लखि बाढ़ा।
जहँ सिन्धु तहँ हरि रस गाढ़ा।।३९।।
भावार्थ – योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जब आत्मानन्द में निमग्न होकर अपने स्वरूप का अवलोकन किया तो स्वयं समष्टि में समाहित हो सर्वव्यापक हो गये। परिणामस्वरूप जहाँ अपार भवसिन्धु था, वहाँ प्रगाढ़ ब्रह्मपीयूष का स्थान बन गया।
टिप्पणी- ठीक ऐसी ही स्थिति पूज्य परमहंसजी महाराज की भी है। लेखक को प्रारम्भ में इस पर विश्वास न होने पर एक दिन सवेरे के स्वप्न-संकेत में एक सुयोग विप्र के दर्शन हुए। हमने आगे बढ़ते हुए पूछा कि हमारे गुरु महाराज कैसे हैं? तब उन्होंने कहा कि महापुरुषों में जो लक्षण होते आये हैं और जो होने चाहिए वे सभी आपमें विद्यमान हैं। आपके गुरु महाराज यही हैं। उस दिन से श्री महाराजजी के प्रति पूर्ण विश्वास हुआ और सहसा पथ-संचालनरूपी प्रमाण भी मिलने लगा। मानस में उमा को भी स्वप्न में दो विप्रों द्वारा आशीर्वाद देने के प्रसंग को स्मरण कर साधना में नवोत्साह छा गया। दो एक अन्य अनुभवी सूत्रों के संकेत से उपर्युक्त प्रारम्भिक भ्रम निर्मूल हो गया।
परन्तु यह विधान रहा है कि सदैव अधिकारियों के समक्ष ही महापुरुष का वह स्वरूप आलोकित हुआ है। उदाहरणार्थ, अर्जुन इत्यादि ने ही उन्हें ‘शिष्यस्तेऽहं’ के रूप में देखा, शिशुपाल इत्यादि ने तो उन्हें गालियाँ ही दीं। इसी प्रकार पूज्य गुरुदेव को पहचाननेवालों की संख्या अधिक नहीं थी। जिसने भी उन्हें पहचाना, आन्तरिक अनुभवों से ही जाना था। द्रष्टव्य है अग्रलिखित चौपाई-
चौपाई – सोइ स्वरूप गुरुवर छबि राखी।
आज अनेक सन्त सुर साखी।।४०।।
भावार्थ – जैसा स्वरूप योगेश्वर श्रीकृष्ण का था, वही आभा परमपूज्य श्रीगुरुदेव भगवान की छवि में भी थी। वे भी दिव्य अपार्थिव लक्षणों से आलोकित पुण्योज्ज्वल विभूति थे और आज भी उसी प्रकार भाविक को अलौकिक छवि का दिग्दर्शन करा रहे हैं। प्रत्यक्षदर्शी सन्त आज भी इस तथ्य के सुस्पष्ट प्रमाण हैं।
टिप्पणी- गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि- ‘‘अर्जुन! मुझे कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्म के परिणाम में मेरी स्पृहा नहीं है। मुझे जिसमें स्थिति पाना था, मैं पा चुका हूँ और मुझे इस स्वरूप से जो जानता है उसको भी कर्म नहीं बाँधते।’ यही समझकर मुमुक्षु पुरुषों ने कर्म का आचरण प्रारम्भ किया कि उन्हें जानकर मैं भी वही हो जाऊँगा।’’ महापुरुषों की इस महती उपलब्धि को देखकर भाविक भी प्रार्थना करता है। ‘‘उस अवस्था को जानकर मैं भी उन्हीं का स्वरूप हो जाऊँगा’’- यही प्रार्थना करने का मूल कारण है।
चौपाई – हम बिलपत तेहिं बेरियाँ काली।
संस्कार गति काल कुचाली।।४१।।
भावार्थ – उपलब्धि की भावभूमि पर रिक्तता का अनुभव होने से आज हम भी उसी उपलब्धि के लिए विकल हैं; किन्तु कल वही क्षण आयेगा जब हम भी आनन्दघन होंगे। साक्षात्कार की दूरी बढ़ने का एकमात्र कारण कुसंस्कारों का कुचक्र ही समझना चाहिए। (विरह मिलन की अनुभूति का सशक्त कारण है। अतः साधक भी इसी आशा से चिरन्तन चिन्तन में मग्न होकर सिसकियाँ भरता है।)
कबीर की विरह-विदग्धता देखें-
जीभणियाँ छाले पड़े, नाम पुकारि पुकारि।
आँखणियाँ जाले पड़े, पथ निहारि निहारि।।
नैना नीझर लाइया, रहट बहै निसि जाम।
पपिहा ज्यौं पिव पिव करौं, कबहि मिलहुगे राम।।
विरह की साक्षात् प्रतिमूर्ति मीरा की विकलता कितनी मार्मिक है-
तुम देखा बिनु कल न पड़त है, तलफि तलफि जिय जासी।
चौपाई – आज मिले जग नाथ सराहा।
मन टूटे हरि कृपण कराहा।।४२।।
भावार्थ – विरह के अन्तराल में डुबकी लगाते-लगाते जब किसी पथिक को आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, तो समग्र संसृति में प्रभु-कृपा का प्रसार दृष्टिगोचर होने लगता है; किन्तु विपर्यय में यदि किसी दीन का हृदय निराशा में टूट ही जाय, तो वह परमोदार प्रभु को कृपण स्वभाव का समझने लगता है।
गोस्वामीजी भी तो कह पड़ते हैं-
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सों करौं ढिठाई।
तुलसिदास सीदत निसिदिन, देखत तुम्हारि निठुराई।। (विनय.,पद ११२)
चौपाई – बालक की गति एक अनोखी।
हरि तजि कतहुँ न मना मनोखी।।४३।।
भावार्थ – बालक की तरह साधक का समर्पण एकनिष्ठ होता है। वह अन्य किसी भी देवी-देवता से किसी प्रकार की कामना नहीं करता।
विशेष- एक ही इष्ट में निष्ठा भक्तवर सूरदासजी के शब्दों में देखें-
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै।।
कमल नयन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पिआसो, दुरमति कूप खनावै।।
जिन मधुकर अम्बुज रस चाख्यो, क्यों करील फल खावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरि कौन दुहावै।।
‘मानस’ में भगवती उमा और सप्तर्षियों का सम्वाद इस प्रसंग पर अच्छा प्रकाश डालता है। अपर्णा की निष्ठा देखें-
महादेव अवगुन भवन, बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मन रम जाहि सन, तेहि तेही सन काम।। (मानस, १/८०)
स्वयं गोस्वामीजी की एक इष्ट के प्रति निष्ठा देखें-
जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे।
मन-बच-करम नरक-सुरपुर, जहँ तहँ रघुबीर निहोरे।। (विनय., पद ११२)
मीरा की प्रतिज्ञा सुनें- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’
भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका गोपिकाएँ उद्धव को उपालम्भ देती हैं-
ऊधौ! मन नाहीं दस बीस।
रह्यो एक सो गयो स्याम संग, को आराधै ईस।।
लेखक भी ऐसा ही संकल्प सँजोकर भावनिधि गुरुदेव भगवान की गुरुता पर विश्वस्त है।
चौपाई – जन पूरण हरि रूप बिलोकी।
तो कत रोवत व्यर्थ बिसोकी।।४४।।
भावार्थ – लेखक के पास बहुत से भाविक ऐसे भी आते हैं, जो कहते हैं- आप तो पूर्ण हो गये। आप ब्रह्म की तरह प्रशान्त, आनन्दघन हैं। ऐसा मैंने अनुभव में देखा है। भाविक का यह कथन सुनकर लेखक की व्याकुलता और भी बढ़ जाती है कि यदि ‘अड़गड़’ ने हरि का रूप देख लिया, तो यह रोना-धोना, मानसिक अशान्ति क्यों बनी है?
गोस्वामीजी श्रीरामचरितमानस में उपलब्धि के पश्चात् की स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं-
राम भगति चिन्तामनि सुन्दर।
बसइ गरुड़ जाके उर अन्तर।।
परम प्रकास रूप दिन राती।
नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा।
लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।। (मानस, ७/११९/२-४)
ब्यापहिं मानस रोग न भारी।
जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।। (मानस, ७/११९/८)
ऐसी स्थिति अभी कहाँ आई? अतः अभी लेखक उपर्युक्त उपाधियों से और भी विकल हो जाता है।
नोट- जब कोई योगाभ्यासी साधक ब्रह्म की अनुभूति के बहुत समीप पहुँच जाता है, तो बहुत से पुण्यात्मा, श्रद्धासम्पन्न भाविकों को उनके स्वरूप में भगवान की अनुभूति होती है। यद्यपि उस साधक का चिन्मय ब्रह्म में प्रवेश कुछ काल बाद होगा; किन्तु ऐसी अवस्था के साधक में भी भक्तों, पथिकों के कल्याण-सृजन की पूर्ण क्षमता होती है।
चौपाई – अब तुम नाथ क्षमा कर राजा।
पूर मिले हरि परम अकाजा।।४५।।
भावार्थ – हे प्रभो! मुझ दीन भाविक के जन्मान्तरों के पाप-रहस्यों (राजों) को क्षमा कर दीजिए। शाश्वत और परिपूर्ण स्थितिवाले होकर और साधक को मिलने पर भी यदि आप कृपावृष्टि न करेंगे तो इस विलम्ब से साधक की व्याकुलता और बढ़ जायेगी।
चौपाई – एहि बिधि सोच रहा मन लाजा।
कपट किए तन परम अकाजा।।४६।।
भावार्थ – इसी प्रकार मन में व्यथा बनी रहती है। वाणी द्वारा व्यक्त करने में लज्जा आती है और यदि अभी तक प्राप्ति न होने का दौर्बल्य लोगों से छिपाया जाता है, तो मन कपट की हीनता से संकुचित होने लगता है; क्योंकि दुःख की रंचमात्र भी उपस्थिति परमप्रभु को अभिमत नहीं है। मानस में भगवान के श्रीमुख की वाणी देखें-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (मानस, ५/४३/४)
कपट की भावना सँजोने में तो महान् अकाज की सम्भावना है कि कहीं लक्ष्य से दूर ही न रह जायँ। अतः जो कुछ भी है सब तुम्हारा है, तुमसे भिन्न कुछ भी नहीं। इस दीन जन का अन्तर्कोष परम प्रभु को ही समर्पित है-
मेरा मुझमें कछु नहीं, जो कछु है सब तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।।
अन्तर्यामी श्री गुरुदेव भगवान से कुछ दुराव नहीं। विश्वास है कि भला-बुरा जो भी हूँ, उन्हीं का हूँ। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी यही निवेदन अपने इष्ट भगवान राम के प्रति किया था-
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि! जानत हौ गति जन की।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।। (विनय.,पद ९०)
चौपाई – जन सोचत हरि रूप बिसोका।
हरि मिले जग को केहि रोका।।४७।।
भावार्थ – विरहव्यथित जन के अन्दर जब लेशमात्र भी प्रकृति की लहर है, तब तक वह सोचता और चिन्तित रहता है। वस्तुतः जन ही चिन्तक है। हरि का स्वरूप तो चिन्तारहित, अशोक है। न आगे कोई चिन्ता रह जाती है जिसको सोचे और न पीछे कोई चिन्ता रह जाती है जिसके लिए शोक करे। आगे कोई सत्ता है ही नहीं, तो कौन किसको रोकेगा? किन्तु वह अदृश्य सत्ता परमात्मा रोकथाम लगाये है, यही इस दीन जन की विकलता का कारण है। वास्तव में अनुभव काल और कर्म की ही परिभाषा देते हैं।
चौपाई – तो कत अनुभव काल घिरा सा।
जन बिचलित कत देख तमासा।।४८।।
भावार्थ – यदि वही मिल गये हैं और दीन जन शाश्वत स्वरूप में समाहित हो गया है, तो अनुभव काल-कर्म से घिरे हुए क्यों होते हैं? जब जन विरह-वारिधि में विकलता की तरंगों से विचलित-सा हो रहा है, तो आप उसकी उपलब्धियों का परिहास देखते हुए क्यों आनन्द ले रहे हैं? आपकी लीला रंगस्थली में अभिनय करते-करते पात्र विह्वल हो रहा है। हे लीलाधर! सुखान्त नाटक की यवनिका कब गिरेगी?
दोहा – पत राखो पत रावरी, जो पत राखी हेत।
अबकी ऐसन रूप दे, पुनि दाता ना लेत।।९।।
भावार्थ – हे प्रभो! प्रार्थना है कि अब इस दीन जन की मर्यादा रख लीजिये। इससे आपकी मर्यादा का विस्तार होगा। हे अखिलेश्वर! मर्यादा के आप ही एकमात्र कारण हैं। अबकी बार इस दास को वही रूप प्रदान करें, जिसके बाद आप दाता के रूप में मुझसे विलग न रह सकें और मैं लेता के रूप में शेष न बचूँ।
श्री गुरुदेव भगवान की वाणी में इस स्थिति का प्रस्फुटन इस प्रकार हुआ है-
जलत जलत ऐसी जली, जाको आर न पार।
ईश्वर जीव ब्रह्म अरु माया, फूँक दियो संसार।।
करूँ अब किसकी तल्लासी।
लावनी सुन बारहमासी।।
ऐसी निर्विकल्प अभिन्नता के महापुरुष सहज समाधि में लीन रहते हैं-
संतो! सहज समाधि भली।
आँख न मूँदूँ कान न रुधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
उघरे नैना साहब देखूँ, सुन्दर बदन निहारूँ।। (सन्त कबीर)
दोहा – ऐसी दाता दात दे, मिट जावे तव मोर।
ईस अंस ना ब्रह्म की, सक्ती साधन छोर।।१०।।
भावार्थ – हे सर्वशक्तिमान्! ऐसी शीर्षांक उपलब्धि करा दो, जिससे मेरे और आप के बीच का अन्तर समाप्त हो जाय। न ईश अंश जीवात्मा ही रह जाय, न अंशी ब्रह्म ही विलग रहे। न योग रहे, न बन्धन रहे और न बन्धन छुड़ानेवाला ही विलग रहे।
चौपाई – अब लगि कहेउँ आपन कदराई।
बिकल ब्यथित बिलपत सुरराई।।४९ क।।
पुनि सागर मन्थन कर लीला।
प्रगटउँ सत्य शान्ति सुख सीला।।४९ ख।।
भावार्थ – अब तक अपनी विकलता एवं प्रभु की परमोदारता का चित्रण किया, अब पुनः सागर-मन्थन की लीला को क्रमशील किया जाता है जिसका परिणाम शाश्वत शान्ति और सुख है।
चौपाई – जिमि जिमि सागर मन्थन कीना।
रतन प्रगट पर शूल नवीना।।४९ ग।।
भावार्थ – ज्यों-ज्यों सागर का चिन्तन करता गया, त्यों-त्यों रत्न तो प्रगट होते गये। किन्तु नूतन परिवेश में कष्टदायी शूल भी उभरकर सामने आने लगे; क्योंकि मूल रत्न ‘अमृत-तत्त्व’ अभी प्रगट नहीं हुआ।
मन्थन का क्रम अविराम चलता रहा। शूल-निवृत्ति के साधन भी सुलभ होने लगे। फिर तो शूलों के साथ-साथ निदान करनेवाले धन्वन्तरि नामक रत्न का प्रगटीकरण हुआ-
चौपाई – प्रगट धन्वन्तरि४ हर बहु सूला।
करे करावत रोग अमूला।।५०।।
भावार्थ – आध्यात्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। धन्वन्तरि का तात्पर्य है कि धन और वन्तरि अर्थात् उस अलौकिक आध्यात्मिक सम्पत्ति के अन्तराल में प्रवेश मिलने लगा। इस रत्न के परिणामस्वरूप उत्तरोत्तर रोगों का शमन होता गया। अब विचारणीय प्रकरण है कि रोग का स्वरूप कैसा है? देखें-
चौपाई – जनम मरण भव रोग अपारा।
तेहिं जड़ काटत देत सहारा।।५१।।
भावार्थ – जन्म-मृत्यु की अपार शृंखला ही भवरोग है। उसको समूल विनष्ट करते हुए उक्त रत्न पथिक को सहारा देता है।
चौपाई – हरि प्रेरित संग निज बल नाहीं।
प्रेरि चलावहिं संग न जाहीं।।५२।।
भावार्थ – ‘धन्वन्तरि’ आत्मिक सम्पत्ति में प्रवेश दिलाने मात्र के लिये सहायक है। इसके सहयोग से साधक के भवरोग एवं विषयात्मक विस्तार का निरोध होता है परन्तु इससे पूर्णतया निवृत्ति नहीं मिलती। उर-प्रेरक के बल से ही यह रत्न पथिकों को भव-व्याधियों से बचा पाता है। पार होते-होते वह (धन्वन्तरि) भी अलग हो जाता है। न रोग रहेगा न निदान।
चौपाई – माया महँ गति रहनि अकासा।
अमित रोग माया कर नासा।।५३।।
भावार्थ – इस धन्वन्तरि की गति माया में है अर्थात् इसके प्रवेश के उपरान्त भी योगी की गति माया के अन्तर्गत ही है। यद्यपि वह सुलझी हुई है, उसकी पकड़ आकाशवत् है। अगणित रोगमयी माया का विनाश इसका कार्य है, जिसकी जानकारियाँ प्रेरक के आधारवाली हैं।
चौपाई – श्रुति शाखा अवतार अनूपा।
माया बल नहिं मति अनुरूपा।।५४।।
भावार्थ – श्रुति में वर्णित शाखा-अवतार अनुपम प्रभु की पावन लीला का ही विस्तार है जो चित्त-सागर में मन्थन से प्रगट होता है। इसमें न माया का बल है और न बुद्धि का ही। मायापति की प्रेरणा का स्फुरण होते ही माया अशक्त हो जाती है-
‘मायापति कहँ जे भजहिं माया चेरी होई।’
राम भगति निरुपम निरुपाधी।
बसइ जासु उर सदा अबाधी।।
तेहिं बिलोकि माया सकुचाई।
करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।। (मानस, ६/११५/७-८)
चौपाई – मानस रोग पीर जग रोगी।
हरि करुणा पर जागत जोगी।।५५।।
भावार्थ – यह मानस-रोग है, जिससे पीड़ित सारा संसार ही रोगी है। प्रभु की अनुकम्पा से ही योगी जागृत होता है अर्थात् उन्हीं की द्रवित करुणा से योगी जाग जाता है। (जागने से तात्पर्य जागतिक प्रपंच से सतर्क होना है।)
गोस्वामी तुलसीदासजी के ‘मानस’ में उपर्युक्त भाव देखें-
मानस रोग कछुक मैं गाये।
हहिं सब के लखि बिरलेन्ह पाये।। (मानस, ७/१२१/२)
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी।।
जानिअ तबहिं जीव जग जागा।
जब सब बिषय बिलास बिरागा।। (मानस, २/९२/२-४)
चौपाई – पूरे सतगुरु पुर बसि राखें।
ब्रह्म मिले ब्रह्महि गुण भाखें।।५६।।
भावार्थ – जो पूर्ण महापुरुष हैं, जो गुरुत्व की स्थितिवाले हैं, उन्हीं को हृदय में बसाकर पूर्णतया पकड़कर रखो। यही आन्तरिक पकड़ ब्रह्म की उपलब्धि का परिणाम बनती है। गुरु पर पूर्णावलम्बित शिष्य अपने भीतर धीरे-धीरे गुरु की गुरुता का विकास करते हुए ब्रह्म का ज्ञाता हो जाता है। ऐसे गुरुत्व की जानकारी करनेवाला पथिक ब्रह्म के गुणधर्मों को प्रत्यक्ष करता हुआ उसी स्वरूप में स्थिर हो जाता है।
चौपाई – सतगुरु खोज खबर नहिं पाहीं।
ते भटकहिं आनहिं भटकाहीं।।५७।।
भावार्थ – जिन पुरुषों ने ऐसे सद्गुरुओं का अन्वेषण नहीं किया, वे चिन्तन-पथ में व्यर्थ ही श्रम करते हैं। ऐसे लोग स्वयं तो भटके हुए हैं ही, दूसरों को भी चिन्तन-पथ से भ्रमित करने के लिए गुरुता का बाना पहने संसार में दौड़ रहे हैं।
टिप्पणी- कबीर साहब भी कहते हैं कि अन्धे को अन्धा क्या राह दिखायेगा-
जाको गुरु है आन्हरा, चेला खरा निरन्ध।
अन्धहिं अन्धन्ह ठेलिया, दोऊ कूप परन्त।।
बिन देखे वा देस की, बात कहै सो कूर।
आपै खारी खात है, बेचत फिरै कपूर।।
स्पष्ट है कि गुरु ही उस शाश्वत सत्ता की प्रत्यक्ष अनुभूति करानेवाले एकमात्र आधार हैं। अपनी साधनावस्था में गुरु के महत्त्व का निरूपण करते हुए कबीरदास जी भी कहते हैं-
मैं भी भागा जाइया, लोक बेद के साथ।
आगे से सतगुरु मिला, दीपक दीन्हा हाथ।।
दीपक दीन्हा तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
पूरा किया बेसाहुणाँ, बहुरि न आवौं हट्ट।।
गुरु की महती अनुकम्पा से ही वे आवागमन से मुक्त हुए हैं।
चौपाई – जप तप होम क्रिया कृत नाना।
करि जे मानत स्वयं सयाना।।५८ क।।
ते अल्पज्ञ भ्रमहिं युग नाना।
गुरु बिनु नाशत ज्ञान व ध्याना।।५८ ख।।
भावार्थ – जप, तप, होम, यज्ञ और नाना प्रकार की यौगिक क्रियाओं का चमत्कारपूर्ण अभ्यास करके जो साधक अपने को सयाना मानने लगते हैं, वे अल्पज्ञ और दम्भी हैं। इस तरह की जड़ता अन्य की कौन कहे, अच्छे साधक में भी जड़ जमा लेती है। वास्तव में जिसको सद्गुरु की अन्तस्प्रेरणा प्राप्त नहीं है, ऐसे साधक द्वारा सम्पादित ध्यान, ज्ञान लक्ष्य पर नहीं पहुँचता और अर्थशून्य रह जाता है।
साधारण मनुष्यों की क्या गणना, शंकर और ब्रह्मा की स्थिति पर पहुँचे हुए पथिकों के आगे भी तुलसीदासजी ने प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया है-
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होई।। (मानस, ७/९२/५)
कबीर ने स्पष्ट घोषणा की है कि हृदय की अज्ञानता को दूर कर दिव्य चक्षु प्रदान करनेवाले सद्गुरु ही हैं, जिनके आलोक में ब्रह्मदर्शन सम्भव है-
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावन हार।।
यह अकाट्य सत्य है कि सद्गुरु के बिना न किसी को आत्मानुभूति हुई है, न होगी।
दोहा – सतगुरु पूरा सूरमा, तहँ मन जूझ अनेक।
जनम कोटि की पोटली, पाप कटै हरि देख।।११।।
भावार्थ – वस्तुतः सद्गुरु ही प्रकृति के काल-कर्म का अन्त करनेवाले हैं, इसलिए वही पूरे शूरवीर हैं। सद्गुरु को मन से पकड़कर अनेक मानव जूझते रहते हैं। वे सबको सँभालते हुए उनके अन्तर्देश से जागृत होकर आत्मोत्कर्ष के अनुभवात्मक निर्देश देते रहते हैं। उन्हीं की कृपा से करोड़ों जन्म की पापभरी पोटली लुप्तप्राय हो जाती है। पापों की निर्विशेषता पर वे परमपावन प्रभु प्रकट हो जाते हैं, जिनकी अलौकिक कृपा से करोड़ों जन्मों के पापों का क्षय हो जाता है। उनकी वीर-वरेण्यता में सन्देह ही क्या है?
गोस्वामीजी भी उनकी कृपा का स्मरण करते हैं:-
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमन्द तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।। (मानस, ७/१२९ छन्द)
चौपाई – जिमि हरि साधि संयोग निवारा।
तिमि करुणा निधि उर बिस्तारा।।५९।।
भावार्थ – जैसे-जैसे हरि साध्यवस्तु को परमात्मा के संयोग के लिए सुलझाते हैं (प्रकृति के द्वन्द्व से इष्ट की ओर क्रमशः प्रवाहित करते हैं), वैसे-वैसे क्रमशः करुणा सागर प्रभु साधक के उर के अन्दर विस्तार करते हैं। जैसे-जैसे वे हरि अपने स्वरूप का विस्तार करते हैं, उसी अनुपात में कल्पवृक्ष के ठीक नीचे साधक को स्थान मिलता है। अब विचारणीय है कि कौन-सा सुपरिणाम प्रगतिशील पथिक के मानस में प्रगट होता है-
चौपाई – उर बिस्तारित जिमि जिमि काया।
तिमि तिमि कल्पवृक्ष५ तरु छाया।।६०।।
भावार्थ – इसी काया में ही कल्पवृक्ष का रहस्य है। साधन में ही साध्य और लगन में ही लक्ष्य का ऐश्वर्य निहित है। कल्पवृक्ष किसी पेड़ का नाम नहीं है, जिसके नीचे बैठने से काया का कल्प हो जाता हो।
टिप्पणी- ‘मानस’ में अंगद ने रावण की बुद्धि पर तरस खाते हुए पूछा था-
राम मनुज कस रे सठ बंगा।
धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा।
अन्न दान अरु रस पीयूषा।। (मानस, ६/२५/५-६)
वस्तुतः साधक के हृदय में ज्यों-ज्यों प्रभु का संचार होता है, त्यों-त्यों उस साधक को कल्पवृक्ष की छाया प्राप्त होती जाती है। क्रमशः आसक्तियों का प्राबल्य समाप्त होने लगता है और इस प्रकार काया के कक्ष में ही कल्पतरु का प्रस्फुटन हो जाता है। इसी दिव्य वृक्ष की चर्चा सन्त कबीर भी करते हैं:-
तरुवर तासु बिलम्बिए, बारह मास फलन्त।
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करन्त।।
दाता भी मिले तो ऐसा कि फिर किसी से माँगना न पड़े। कृपा भी मिले तो उस कृपानिधि की, जिसकी शीतल छाया के नीचे यह जीवात्मा चिर प्रशान्ति में निमग्न हो जाय।
चौपाई – कायाकल्प होत प्रति स्वाँसा।
जग जोनी कर होत बिनासा।।६१।।
भावार्थ – नश्वर संसार में चराचर प्रकृति में उत्पन्न काल, कर्म, स्वभाव, गुण से ग्रसित होने के कारण निर्बल तथा रोगी है। प्रकृति का श्रेष्ठतम प्राणी मानव भी इन्हीं से आक्रान्त है। वह भी विवश होकर मरता-जीता है; किन्तु जो इससे निकलकर काया का कल्प कर ले, वह मरण के गुणधर्मों से उपराम होकर अविनाशी हो सकेगा। ज्यों-ज्यों सुरत का स्वाँस सें टिकना प्रारम्भ हो जायगा, त्यों-त्यों काया का प्रतिक्षण कल्प होता रहेगा।
चौपाई – सत्य कल्पतरु हरि की धारा।
नित्य सुखद जीवन दातारा।।६२।।
भावार्थ – वस्तुतः कल्पवृक्ष हरि का प्रभाव ही है। उसकी कल्याणमयी शीतल छाया परम सुखद एवं मांगलिक फल प्रदान करनेवाली है। इसकी अनुभूति हो जाने पर व्याधियों का अन्त हो जाता है और चिरन्तन शान्ति का जीवन-स्रोत प्रवाहित होने लगता है। क्रमागत प्रगतिशीलता के अंक से साधक की कामनाओं को परिपूर्ण करनेवाली कामधेनु का आविर्भाव होता है।
चौपाई – कामधेनु६ बस पूरन कामा।
मन इच्छित फल प्रगटे ठामा।।६३।।
भावार्थ – उत्तरोत्तर विकासोन्मुख साधक के समक्ष एक ऐसी स्थिति आती है जब उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ सहसा सम्भव हो जाती हैं। मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली तात्कालिक क्षमता अन्तर्देश की ही एक विशिष्ट उपलब्धि है, कोई बहिर्कल्पना नहीं।
चौपाई – योगक्षेम भजनानन्दकारी।
गो गति संयम गो सुखकारी।।६४।।
भावार्थ – वह कामधेनु योग की रक्षा और भजन के आनन्द को प्रसारित करनेवाली है। इसकी उत्पत्ति गो-गति अर्थात् इन्द्रियों की गति के पूर्ण संयमित हो जाने पर होती है। पूर्ण निरोधावस्था पर पहुँचकर यही इन्द्रियाँ मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली कामधेनु बन जाती हैं। कामधेनु कोई गाय नहीं है जिसके थनों से कामनाओं की पूर्ति करनेवाली अस्वाभाविक दुग्ध-धारा का स्राव होता हो।
चौपाई – इन्द्रिय बिषय संग मिटि जाई।
तब कामेच्छित गो सुखदाई।।६५।।
भावार्थ – इन्द्रिय और उनके विषयों का संयोग जब पूर्णतया मिट जाता है, विषय ग्रहण की भावना का विलय हो जाता है, तब इच्छित कामनाओं की पूर्ति करनेवाली सदा सुखद गो, कामधेनु प्रगट होती है।
टिप्पणी – काकभुशुण्डिजी को भी ऐसा ही आशीर्वाद प्राप्त था, जिसका उल्लेख मानस में गोस्वामीजी ने भी किया है-
जो इच्छा करिहहु मन माहीं।
हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४)
जब इष्ट की कृपा हो ही गयी तो इच्छाओं की पूर्ति सहज ही होने लगती है। यह बात अलग है कि उस समय साधक की अपनी कोई इच्छा ही नहीं रह जाती है। वह तो प्रभु के हाथों में यन्त्रमात्र बन जाता है।
चौपाई – तेहिं प्रभाव आसा जग नाहीं।
हरि रँग पूर प्रगट मिल जाहीं।।६६।।
भावार्थ – उस कामधेनु का प्रभाव ही इतना विलक्षण है कि जगत् की जितनी भी कुत्सित कल्पनायें हैं, वे मानस-पटल में निर्दोष हो जाती हैं। केवल अभौतिक कामनाएँ ही प्रगट होकर पथिक को परमात्मा के स्वरूप की अनुभूति कराने लगती हैं और साधक का अन्तस्थल हरि के रंग में रंग जाता है।
चौपाई – कामधेनु संगत सुखकारी।
राम नाम मणि७ प्रगट पसारी।।६७।।
भावार्थ – कामधेनु की संगत मिल जाने पर राम-नाम मणि का प्रगट प्रसार होने लगता है।
इसी राम-नाम मणि का परिचय सन्त तुलसीदासजी की वाणी से भी मुखरित हुआ है-
राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर।। (मानस, १/२१)
मणि कहलानेवाले राम नाम का सम्बन्ध परावाणी के प्रवेशकाल में ही सम्भव है।
चौपाई – परा वाणी परसत परतीती।
मणि प्रगटे सत संसृति जीती।।६८।।
भावार्थ – चिन्तन के उत्कर्ष में, परावाणी के स्पर्शकाल में राम-नाम का प्रादुर्भाव होता है। उस विलक्षण ज्योतिर्मयी अपार्थिव मणि के प्रगट होते ही साधक को स्वरूप की अनुभूति होने लगती है। तदनन्तर आत्मोन्नति की इस चरम सीमा पर पहुँचनेवाले साधक के लिए यह एक बार नहीं; शतशः निश्चितता के साथ निर्विवादरूपेण कहा जा सकता है कि वह आवागमन के बन्धन से पार हो सकता है अर्थात् इस उपलब्धि के पश्चात् साधक का पार होना सुनिश्चित है, ऐसी कोई बाधा नहीं जो उसे पार होने से रोक सके। परावाणी के स्पर्शकाल में राम-नाम मणि का प्राकट्य निश्चय ही संसृति की सीमा का अवसान है। अब देखना है कि इस मणि की पकड़ कैसे हो?
दोहा – बैखरि चिन्तन मध्यमा, मिले न मणिक उदोत।
पश्यन्ती परसत कछुक, परावाणी मणि ज्योत।।१२।।
भावार्थ – बैखरी और मध्यमा के स्पर्शकाल तक उस मणि का प्रकाश परिलक्षित नहीं होता। पश्यन्ती के स्पर्श होते ही उसके प्रकाश का कुछ-कुछ आभास होने लगता है और परावाणी के प्रवेश के साथ ही वह मणि पूर्णतः प्रकाशित हो उठती है।
चौपाई – शब्द अनादि ईश रुख पाई।
प्रगट सुनत जग मति नसाई।।६९।।
शब्दार्थ – मति = त्रिगुणात्मिका माया।
भावार्थ – वह शब्द अनादि है और ईश्वर का संकेत पाकर ही प्रगट सुनने में आता है। उस शब्द से अन्तःकरण निनादित होते ही उसके जयघोष से वह त्रिगुणात्मिका माया विनष्ट हो जाती है, जो जगत् में जन्म देने का एकमात्र कारण है।
चौपाई – सो मणि जदपि सुप्त सब पाहीं।
बिनु प्रेरक उर प्रगटत नाहीं।।७०।।
भावार्थ – यद्यपि वह मणि प्रत्येक मानव के अन्तर्देश में प्रसुप्तावस्था में पड़ी है परन्तु उर-प्रेरक की कृपा के बिना उसका दृष्टिगोचर होना असम्भव है। सद्गुरु एवं परमात्मा एक दूसरे के पर्याय हैं।
गोस्वामीजी की वाणी से तुलना करें-
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई।
राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।(मानस, ७/११९/११)
चौपाई – प्रेरक हो परतीती बधावै।
तेहि प्रतीति मध मणि सुख पावै।।७१।।
भावार्थ – जब इष्ट प्रेरक होकर समझायें और हृदय से विश्वास जागृत करें तभी उस प्रतीति के माध्यम से पथिक उस पावन मणि का सुख प्राप्त कर सकता है। वास्तव में इस मणि का उतार-चढ़ाव श्वास पर ही केन्द्रित है, जिसे चिन्तन की शीर्षांक सफलता पर ही जाना जा सकता है।
चौपाई – अति सूक्ष्म जो मणि सुख पावै।
श्री८ विस्तारित असुर रिझावै।।७२।।
भावार्थ – मन अत्यन्त सूक्ष्म होकर श्वास में उठनेवाले शब्द को पकड़ लेता है, तभी इस मणि का सुख मिलता है। ऐसी अवस्था के प्रत्यक्ष होने पर ‘श्री’- लक्ष्मी आदि उपलब्धियों का भी निरोध हो जाता है, जिसमें आसुरी सम्पदावाले विश्वास करते हैं। साधक तो मौलिक रूप से इसका स्पर्श करके निर्लिप्त एवं अनासक्त रहते हैं। जिनके भीतर आसुरी तत्त्वों का रंचमात्र भी आवेग रहता है, वे इन चमत्कारिक उपलब्धियों से रीझ जाते हैं।
चौपाई – तत् सागर सुख समृद्धि ज्योती।
हरि प्रतिबिम्ब प्रभा सुख श्रोती।।७३।।
भावार्थ – वह लक्ष्मी चिन्तन-धारा के बीच उसी सागर के अन्तराल से सुख-समृद्धि सरसानेवाली प्रभा के रूप में प्रगट होती है। यह ईश्वर की प्रतिछाया ही है। यह चमत्कारिक छटा के रूप में आविर्भूत होकर सुखदायिनी स्रोत बनकर प्रवाहित होने लगती है।
चौपाई – तेहि लखि भक्तन मिटी निरासा।
अमृत बिन जग कौन निवासा।।७४।।
भावार्थ – लक्ष्मी का सूत्रपात ही भक्त के हृदय से निराशा को मिटा देता है। वह इस उपलब्धि के साथ ही विश्वस्त हो जाता है कि मृत्यु से परे सत्ता अमृत यदि अनुभूति के धरातल में अवतरित नहीं है, तो जग में ऐसा कौन निवास है जहाँ सुख प्राप्त हो सके? अतः लक्ष्मी की उपलब्धि से साधक में नूतन उत्साह का संचार हो जाता है।
चौपाई – श्री प्रभा आभा हरि केरी।
भक्त हृदय प्रभु राशि बिखेरी।।७५।।
भावार्थ – वह लक्ष्मी उन्हीं प्रभु की प्रभा, आभा एवं विभूति है। परमप्रभु के भीतर जो विशेष गुण पाये जाते हैं, यह आभा उन्हीं का प्रसार प्रगट करती है। यह भक्त के हृदय में प्रभु की चिरन्तन धनराशि बिखेरती रहती है।
चौपाई – प्रभु महिमा जो अजर अबाधी।
जन उर दर्शन पर सुख साधी।।७६।।
भावार्थ – उस परात्पर ब्रह्म की विशेष विभूतियों- अजरत्व, अमरत्व, सर्वशक्तिमता, सर्वज्ञता, चिन्मयता इत्यादि का प्रसार यह प्रभा भक्त के हृदयाकाश में करती रहती है। यह उनके परमकल्याणमयी पथ को सँभालती हुई प्रशस्त करती है।
चौपाई – आसुर सम्पत्ति सकल विभाजन।
क्षण प्रगटी रम्भा९ सुख छाजन।।७७।।
भावार्थ – उपर्युक्त साधन के प्रभावस्वरूप क्रमशील विकासोन्मुखी चिन्तन-पटल से नाशवान् आसुरी सम्पत्ति का पूर्ण विभाजन हो जाता है। आसुरी सम्पदा का विभाजन होते ही क्षणिक सुख प्रदायिनी रम्भा का प्रगट प्रभाव चकाचौंध करने लगता है। इस प्रखर ज्योति की स्नेहिल स्पन्दनशीलता का भाविक हृदय में स्फुरण व्यतिरेक उत्पन्न करनेवाला एक आवरण है। दुनिया में पर्दे सामने लगते हैं परन्तु ऊर्ध्वरेता साधक के लिए अन्दर ही पर्दा होता है। जिसकी चित्तवृत्ति में उस चमत्कारिक विक्षेप का आवरण पड़ जाता है, उसके भावी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
चौपाई – विषय वासना करत कामना।
ते जन पावत विषय वामना।।७८।।
भावार्थ – ऐसे भक्त जो भजन तो करते हैं परन्तु जिनके मन में सांसारिक विषयों की कामनायें छिपी रहती हैं, वे लोग रम्भा आदि बाह्य विषयों को पाकर उन्हीं से प्रभावित हो जाते हैं।
विचारणीय है कि भजन में भी सकामता पिण्ड नहीं छोड़ती। जो इससे बच जाता है वही पूर्णत्व को प्राप्त करता है।
दोहा – रत्न प्रगट दुइ सिन्धु में, छोड़ बन्ध अलगाव।
एक उबारे जगत सों, दूसर बन्धन ताव।।१३।।
भावार्थ – यथार्थतः दो पृथक्-पृथक् गुणधर्मवाले रत्न, अन्वेषिणी चिन्तन-धारा में, भव-सिन्धु के अन्तराल से प्रगट होकर साधक के सामने आते हैं, जिनमें से कुछ तो मायिक प्रवृत्तियों में बाँधनेवाले हैं और कुछ माया के बन्धनों को तोड़ते हुए ईश्वर में प्रवेश दिलानेवाले हैं। (एक प्रकार के रत्न जगत् से उबारनेवाले हैं, जिनमें कामधेनु, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, अमृत आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं और दूसरे वे हैं जिनमें सांसारिक प्रवृत्तियों में आबद्ध करने की तत्परता बनी रहती है, उदाहरणार्थ- गज, वारुणी, रम्भा, विष इत्यादि विचारणीय हैं। इनके आवरण से रहित साधक ही लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।)
चौपाई – विषय आस रत भजन सकामा।
ता उर रत्न बाम बिधि जामा।।७९।।
भावार्थ – ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ, मान-सम्मान इत्यादि की श्लाघापूर्ण भावनाएँ भी विषयात्मक आसक्ति की परिभाषा के अन्तर्गत निहित हैं। जो भक्त विषय-कामनाओं में आसक्त हैं, ऐसे पथिक के हृदय में विपरीत गुणधर्मवाले ये बाह्य रत्न उत्पन्न होते हैं तथा प्रसार पाते हैं, जो बाह्य प्रवृत्तियों के प्रति सम्मान जागृत करते हैं। यद्यपि उपर्युक्त भाव सबके हृदय में उत्पन्न होते हैं; परन्तु जो निष्काम हैं उनके अन्तर्देश में वे निष्क्रिय हो जाते हैं।
चौपाई – रम्भा सबल शत्रु गति बामा।
विषय आस धुत रत्न ललामा।।८०।।
भावार्थ – उक्ताभिव्यक्त सांसारिक प्रसार करनेवाली प्रवृत्तियों में रम्भा का आविर्भाव सशक्त शत्रु के रूप में होता है, जिसकी गति लक्ष्य के विपरीत सदैव बहिर्मुखी ही है। संसार में जो लोग विषय के नशे में होशहवास खो बैठते हैं, उनके लिए यह एक विस्मयकारी मनोहर रत्न है।
चौपाई – रम्भा उरबसि अतुल मैनका।
जन उर अँकुरे सुजस लैनका।।८१।।
भावार्थ – रम्भा समय-समय पर अनेक नामों से साधकों के जीवन में आयी है। उर्वशी, अतुला, मेनका सब इसी के विशेषण हैं, जो जन के अन्दर अंकुर उत्पन्न करनेवाली तथा सुयश का लोप करानेवाली हैं।
जिन पथिकों को इष्ट सँभाल लेते हैं वही इनसे बच पाते हैं, शेष माया के बाजार में लुट जाते हैं। गोस्वामीजी ने सच ही कहा है-
धरी न काहू धीर सब के मन मनसिज हरे।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।। (मानस, १/८५)
चौपाई – लोक दृष्टि महँ सुन्दर साजा।
भक्त फँसावन परम अकाजा।।८२।।
भावार्थ – लोकदृष्टि के अन्तर्गत यह सुन्दर साज-बाज है; किन्तु भक्ति-पथ में जो प्रवेश चाहते हैं उन साधकों के लिए यह सर्वथा पथ्यावरोध हैं। भोले भक्तों को फँसानेवाले ये जाल परमतत्त्व से विलग करानेवाले हैं। इनकी प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप पथिकों को अनिष्टकारी असम्भावनाओं का शिकार होना पड़ता है। उदाहरण के लिए श्रृंगी इत्यादि महर्षियों का कथानक द्रष्टव्य है-
चौपाई – श्रृंगी पराशर कर गहि मारा।
विश्वामित्र बिलखि विस्तारा।।८३।।
भावार्थ – श्रृंगी ऋषि, महर्षि पराशर इत्यादि को बरबस पकड़कर इस मायाविनी ने पथ से वंचित कर दिया। विश्वामित्र बड़े साहसी थे, जो कदाचित् बाधाओं की परवाह नहीं करते थे; परन्तु वे भी अन्ततोगत्वा मेनका से प्रभावित होकर ही रहे। बिलखते हुए उन्होंने इसके विस्तार की प्रबलता को स्वीकार किया। यद्यपि वे पुनः अथक परिश्रम करके इससे बचकर अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिये; परन्तु एक बार तो इस सबला ने उनकी चित्तवृत्तियों को झकझोरकर उन्हें बरबस पथ से वंचित कर ही डाला।
चौपाई – भजन प्रवेश करत विस्तारा।
धैर्यवन्त प्रभु केर सहारा।।८४।।
भावार्थ – मूलतः भजन-प्रवेश के साथ ही मायाविनी शक्तियों- रम्भा, मेनका इत्यादि का विस्तार होता है। यौगिक उपलब्धि में निश्चयात्मक पथ एक ही है, उसी एकता में अनेकता का सर्वथा लय कर देने के उपरान्त ही शाश्वत शान्ति और सुख का स्रोत खुल सकता है। जो स्वाभाविक धैर्यवान हैं, जो प्रभु के सहारे पर ही चलनेवाले हैं, वे सब प्रकार से बच जाते हैं।
चौपाई – जेहिं जन लगन लगी इक ओरा।
तेहिं चिन्तत मति कबहुँ न भोरा।।८५।।
भावार्थ – जिस जन की विश्वान्तर्यामी प्रभु पर एकनिष्ठ दृष्टि है, वह उन प्रभु के अतिरिक्त रम्भादि दूसरी वस्तुओं पर स्वप्न में भी दृष्टि नहीं डालता। ऐसे जन सर्वथा उसी सर्वेश्वर पर अवलम्बित रहते हुए भूलकर भी मायाविनी प्रलोभनों से प्रभावित नहीं होते।
चौपाई – तेहि संगत मन काम कुरूपा।
गज१० प्रगटा सोइ काम स्वरूपा।।८६।।
भावार्थ – रम्भा इत्यादि की संगति से मन में कामेच्छा का संचार होने लगता है। उससे संयुक्त होने पर साधक के सूक्ष्म शरीर में कुरूपता आ जाती है। हाथी काम का प्रतीक है।
समुद्र-मन्थन के पौराणिक कथानक में इसी हाथी को ऐरावत के नाम से संज्ञापित किया गया है।
चौपाई – गज प्रतीक कामातुर मनसा।
मन मदमत्त फिरइ गज तनसा।।८७।।
भावार्थ – वास्तव में गज का प्रगटीकरण मन का कामोन्मुखी प्रवाह है। मन जब काम के नशे में मदमत्त हो जाता है, तब वह भजन-चिन्तन के अंकुश को भी नहीं मानता। भगवत् अनुराग के बन्धन को भी मतवाला होकर तोड़ डालता है, सत्कर्मों के स्तम्भ को उखाड़ फेंकता है। सांसारिक वासनाओं में विचलित होनेवाले विलासी मन की स्थिति विकराल गजेन्द्र की ही भाँति होती है। इस वृत्ति के निष्ठुर प्रहार से साधक विकल होकर छटपटा जाता है। परन्तु ऐसे समय में भी इष्टदेव कृपामयी अवलम्ब प्रदान कर भोले पथिकों को कुकर्म काम-कीचड़ में कूदने से बचा लेते हैं।
परमप्रभु विष्णु ने अपने प्रिय भक्त नारद के लिये यही तो किया-
जेहि बिधि होइहि परम हित, नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु, बचन न मृषा हमार।। (मानस, १/१३२)
नारद की रक्षा तो हो गयी; किन्तु इसका पश्चाताप उन्हें बहुत दिनों तक रहा। जब प्रभु से पुनः भेंट हुई तो पूछ ही बैठे कि आपने मुझे विवाह करने से क्यों रोका? प्रभु ने समझाया-
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा।
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस, ३/४२/४-५)
दोहा – काम कला मन विह्वला, युक्ति न लागत एक।
क्षण सुख चित चंचल करे, बचे जे विमल विवेक।।१४।।
भावार्थ – कामप्रेरित मन विषयों से विकल हो जाता है। उसका पागलपन इतना बढ़ जाता है कि शम, दम, नियम, ज्ञान, वैराग्य इत्यादि एक भी युक्ति काम नहीं करती। चित्त इतना चंचल हो जाता है कि सुरति की डोरी भी डगमगा जाती है। ऐसी स्थिति में विशुद्ध विवेक के साथ ब्रह्म के आश्रित रहनेवाले पुरुष ही बच पाते हैं।
कबीर साहब ने उन्हीं को सुरक्षित घोषित किया, जो सर्वत्र रमण करनेवाले राम से स्नेहाभिषिक्त हैं-
नारी काली नागिनी, तीनों लोक मझार।
राम सनेही बचि गये, खाये सब संसार।।
चौपाई – विषयासक्त मन्द मति पापी।
अन्ध आयु सुख वारुणि११ व्यापी।।८८।।
भावार्थ – विषयों में आसक्त होकर जो मन्दमति मदान्ध हो जाते हैं, वे क्षणिक आयुपर्यन्त सुख-लिप्सा की वारुणी से आक्रान्त हो जाते हैं। इस वारुणी का नशा संयमपूर्ण पथ को अवरुद्ध कर लेता है।
सन्तप्रवर तुलसीदासजी भी इस तथ्य का प्रकाशन करते हैं-
मोह न अन्ध कीन्ह केहि केही।
को जग काम नचाव न जेही।। (मानस, ७/६९/७)
चौपाई – शुभ अरु अशुभ पुण्य दिन राती।
पाप कहे जे जग जनमाती।।८९।।
भावार्थ – शुभ और अशुभ, पाप और पुण्य, दिन और रात के द्वन्द्वात्मक चक्र पापों का प्रसार करते तथा जीव को संसार में ले आते हैं। इन्हीं में फँसा हुआ जीव संसार में अनेक योनियों में भटकता हुआ विकल रहता है।
चौपाई – सकल विश्व समृद्धि दुख भारा।
हेतु जनम जिय काल पसारा।।९०।।
भावार्थ – विश्व की सम्पूर्ण समृद्धियाँ दुःख के भार को ही बढ़ानेवाली हैं। इनमें प्रगति करने से भौतिकता के भार में रंचमात्र भी कमी आने की सम्भावना नहीं है। सांसारिक कामनाएँ ही जन्म-मरण का कारण हैं, जिनके प्रभाव से सर्वत्र सभी जीवों के लिए काल की विकरालता का व्यापक प्रसार हो रहा है।
चौपाई – सकल सृष्टि सुख दुख संसारा।
जहँ लगि जन्म विलय व्यवहारा।।९१।।
भावार्थ – जहाँ तक जन्म और मृत्यु की सीमा है, चराचर जीव इसी कालचक्र में पिसते हुए चीख रहे हैं। जन्म के उपरान्त जब तक कोई निरन्तर आत्म-चिन्तन करते हुए अपने को परमप्रभु में स्थित नहीं कर लेता, तब तक ‘जनमत मरत दुसह दुख होई’ की अनिवार्यता से मुक्त नहीं हो सकता। निखिल सृष्टि में सुख-दुःख का विस्तार करनेवाली समस्त सम्भावनाओं का केन्द्र यह संसार ही है।
चौपाई – यह विष१२ संसृति दैव चलाया।
विष काया शंकर गहि खाया।।९२।।
भावार्थ – यह संसृति ही विष है। दैव के आश्रित चलनेवाली समग्र संसृति ही विष का विस्तार है। इस काया में ही विषयरूपी विष प्रवाहित है, जिसको शंकरजी ने बरबस नियन्त्रित करके खा लिया।
चौपाई – शंक मिटे तब शंकर रूपा।
जहँ लगि संसृति शंक स्वरूपा।।९३।।
भावार्थ – समस्त शंकाओं का शमन होने पर शंकर-स्थिति की उपलब्धि होती है। जहाँ तक संसृति का विस्तार है वहाँ तक संदिग्ध तर्कनाओं का विस्तार ही समझना चाहिए।
अतः मन के पूर्ण संयमित, स्थिर और तर्कनाशून्य हो जाने पर ही ‘शिव’ स्वरूप की अनुभूति सम्भव है।
चौपाई – सो स्वरूप भजनानन्द आसा।
परसि परम सुख रूप उदासा।।९४।।
भावार्थ – भजनानन्द के माध्यम से ही उस शिव स्वरूप की आशा की जा सकती है। परमतत्त्व परमात्मा के दर्शन एवं स्पर्श के साथ ही उस सदा सुख परम उदासीन शंकर स्वरूप की उपलब्धि होती है।
चौपाई – तेहिं स्वरूप प्रगटे विष खोया।
विष पियूष मय सहजहि सोया।।९५।।
भावार्थ – उस शिव स्वरूप के प्रगट होते ही विष विलीन होकर अमृत में परिवर्तित हो जाता है और साधक सहज स्वाभाविक परात्पर सुख में निमग्न हो जाता है। अर्थात् इस स्थिति के उपरान्त आवागमन का क्रम सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है और आत्मा चिरन्तन सहजावस्था में लय हो जाती है। अब प्रश्न है कि उस अमृत की उत्पत्ति कैसे और कहाँ से है?
चौपाई – शशि१३ पियूष संगत सुखकारी।
जन जानत पद परस भिखारी।।९६।।
भावार्थ – चन्द्रमा और अमृत की संगति सदा सुखदायी है। जिसके हृदय-प्रदेश से इस दशा का प्रकट संचार होता है वही भक्त जानता है और इस पद का स्पर्श करते ही तत्क्षण भिखारी अर्थात् शंकर हो जाता है।
शब्दार्थ- भिखारी = जिन महापुरुषों के सामने परमतत्त्व की माँग नहीं रह गयी, वे परम भिखारी हैं। यही स्वरूप शंकरजी का भी था और सद्गुरुदेव परमहंसजी का भी।
चौपाई – मन ही शशि थिर परसि अकाशा।
ब्रह्म पियूष१४ गहत भव नाशा।।९७।।
भावार्थ – आकाश का स्पर्श करके जब मन वही स्थिर हो जाता है, तो ऐसा शून्यानुगत मन ही चन्द्रमा है। श्रुति में भी ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ से यही तथ्य पुष्ट होता है। गोस्वामीजी भी ‘मन ससि चित्त महान’ (मानस, ६/१५ क) प्रमाणित करते हैं। ऐसा मन ही उस ब्रह्म स्वरूप अमृत का पान करनेवाला है। वह निरन्तर इस आन्तरिक भाव का रसास्वादन करता जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मायिक व्याधियों का जन्म-जन्मान्तरों से चला आ रहा बन्धन टूटने लगता है। इस प्रकार क्रमशः कूटस्थ अमृतमय मन, काल और कर्म की सीमा से उपराम हो जाता है।
चौपाई – जे काया नश्वर गति त्यागी।
चरत अकास स्वाँस सँग लागी।।९८।।
भावार्थ – ‘कोइ अवकास कि नभ बिनु पावइ’ (मानस, ७/८९/३)- आकाश कहते हैं पोल को, शून्य को। तात्पर्य यह है कि उस शून्य का स्पर्श करके चंचल मन अवकाश पा जाता है। जब यह शरीर का सम्बन्ध छोड़कर आकाश में स्थायित्च ले लेता है और ईश्वराभिमुख होकर श्वास-प्रश्वास के माध्यम से उस शून्य में प्रवाहित रहता है।
दोहा – ईश संग जग भास ना, शून्य सुरा दरसात।
ते चित चंदा अमर संग, निसि दिन पिय बरसात।।१५।।
भावार्थ – तब ईश्वर की ऐसी संगति हो जाती है जहाँ जगत् का आभास नहीं होता, सुरा की गति आकाश में प्रवाहित होने लगती है। ऐसा आकाशवत् चित्त ही चन्द्रमा कहलाता है। ऐसा मन देवत्व प्रदायिनी अमर प्रवाह से संयुक्त रहता है, जिसका परिणाम अहर्निशि धारावाही रूप में परम प्रियतम परमात्मा को दरसाता एवं बरसाता रहता है अर्थात् परमात्म-सम्बन्धी शोध देता रहता है।
इसी तथ्य का निरूपण संत कबीरदास की वाणी में इस प्रकार हुआ है –
रस गगन गुफा से अजर झरै।
बिनु बाजा झंकार उठे तहँ, समुझि परै जब ध्यान धरै।।
बिना ताल तहाँ कमल फुलाने, तेहिं चढ़ि हंसा केलि करै।
बिना चाँद उजिआरि छिटकी, जहँ जहँ हंसा नजर परै।।
चौपाई – अजर अमर प्रभु पिय पहिचाना।
दैवी संग बिनु काहु न जाना।।९९।।
भावार्थ – जो प्रभु अजर-अमर और शाश्वत हैं, वही मेरे जीवनाधार प्रियतम हैं, यह दृढ़ विश्वास चेतन चित्त में प्रविष्ट हो जाता है; किन्तु इस पहचान के लिए दैवी सम्पत्ति का संग्रह अपेक्षित है। यदि उसका साहचर्य न मिला, तो वह शाश्वत प्रत्यक्ष दर्शन में नहीं आता। अतः इस दैवी सम्पत्ति के लिए प्रयास करें।
चौपाई – मथा सिन्धु जग हरि की छाया।
शुभाशुभम् जग रतन निकाया।।१००।।
भावार्थ – जब कोई पथिक प्रभु का कृपापात्र बन जाता है, तो उन्हीं की छत्रछाया में समुद्र का मन्थन करता है। इस भवसिन्धु का मन्थन करने और उसके अन्तराल से अमिय उपलब्धि की कोई दूसरी पद्धति नहीं है। इस मन्थन-क्रिया के प्रारम्भ हो जाने पर क्रमशः शुभाशुभ रत्नों की उत्पत्ति होने लगती है, जिनमें कुछ ऐसे विलक्षण हैं जिन्हें सामान्य चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता और न बुद्धि से परखा ही जा सकता है। उन अलौकिक उपलब्धियों की सीमा काया की पकड़ के बाहर है। वह तो केवल ईश्वरीय आदेशों और ईश्वरीय आवाजों की पकड़ से ही सम्भव है।
चौपाई – सब संयोग देखि मन छोभा।
अमिय परस रत्नाकर सोभा।।१०१।।
भावार्थ – इस प्रकार बहुत से रत्नों के संयोग पर भी मन में क्षोभ और चिन्ता की वृद्धि ही होती रही; क्योंकि अमृत की उपलब्धि का अभाव है। अमृत का स्पर्श प्राप्त होते ही रत्नाकर की शोभा बढ़ जाती है। चित्त निरन्तर शान्ति में समाहित हो जाता है। वस्तुतः अमृत के बिना रत्नाकर की शोभा कहाँ? अतः अन्यान्य उपलब्धियों के उपरान्त भी हलचल बनी ही रहती है। इस पर द्रष्टव्य है अगली चौपाई-
चौपाई – पुनि सागर महँ हलचल रारी।
अमृत बिन भव दुःखद सुरारी।।१०२।।
भावार्थ – अमृत के अभाव में पुनः सागर में हलचल तथावत् रहा, क्योंकि बिना अमिय उपलब्धि के स्थैर्य कहाँ? इसके अभाव में अन्य उपलब्धियों में भी आवागमन में डालने एवं देवत्व-प्रदायिनी दैवी सम्पत्ति का ह्रास करनेवाली आसुरी सम्पदा की विद्यमानता है। प्रश्न उठता है कि अमृत है क्या?
चौपाई – अमृतमय प्रभु परम आतमा।
चिदाकाश परतीति आतमा।।१०३।।
भावार्थ – अमृत में स्वयं व्याप्त परम प्रभु ही अमृत हैं। चित्त जब आकाशवत् हो जाता है तभी उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार सम्भव होता है। चित्त का निरोध करनेवाली यह अंतस् साधना-पद्धति ही उसके प्राप्ति का माध्यम है।
चौपाई – सो अमृत रस दूसर नाहीं।
परस प्रभात सिन्धु भरि जाहीं।।१०४।।
भावार्थ – वही अमृतरस आत्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। आत्मतत्त्व का स्पर्श करते ही वह जीवात्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप हो जाता है। जब पथिक के अन्तर्देश में वह आत्मतत्व प्रकाशित हो जाता है तब भवसिंधु का विस्तार सूख जाता है। त्रिगुणात्मिका ‘प्रकृति’ का प्रभाव भी समस्त मायिक अनर्थों के साथ ‘पुरुष’ में विलीन हो जाता है।
चौपाई – जन हरि परसत हरि के रूपा।
अमृत मय जन परसि स्वरूपा।।१०५।।
भावार्थ – उस अमृतमय परमात्मा का स्पर्श पाते ही भक्त हरिस्वरूप हो जाते हैं। अतः जीवात्मा स्वतः परमात्मा में बदल जाती है। उस स्वरूप में विलीन होने की क्रमशील क्षमता प्राप्त करनेवाली आत्मा, दूसरों को अमरता प्रदान करनेवाली हो जाती है। अमिय और आत्मा का संयोग ही पुण्यात्मा पथिकों को परमात्मा के परमस्वरूप में लीन कर देता है। संत कबीर इस स्थिति का भान कराते हुए कहते हैं-
अवधू बेगम देश हमारा।
जहाँ पहुँच फिर हंस न आवै, भवसागर की धारा।।
चौपाई – तेहिं क्षण अन्तर ध्यान हरीशा।
को बिलगाव जीव अरु ईशा।।१०६।।
भावार्थ – इस विलय के साथ ही वह आत्म-प्रेरक जो साधक के साथ पूर्तिपर्यन्त चलता रहता है, अन्तर्धान हो जाता है। साधक को सहज स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। ऐसी स्थिति में जीव और ईश्वर का बिलगाव कौन करे। अंश अंशी में लीन होकर पूर्ण हो गया। अब उसका पृथक्करण सम्भव नहीं है। यह स्थिति अनिर्वचनीय है। यही अवतार की देन और पराकाष्ठा है। पुनः क्रिया के मूल की ओर संकेत किया गया है-
चौपाई – गुरुवर रूप धरा उर माहीं।
दीर्घकाल नित जतन कराहीं।।१०७।।
भावार्थ – जो सत्य स्वरूपस्थ सर्वत्र व्यापक सद्गुरु हैं, उन्हीं के स्वरूप को सुरति से पकड़कर हृदय में धारण करना उसकी प्राप्ति का मूल साधन है। वह स्वरूप सरलता से पकड़ में नहीं आता, इसलिए इस दिशा में निरन्तर यत्न करते रहना चाहिए।
चौपाई – परसत पद उर प्रेरक जागा।
तब सागर सिधि सब दुख भागा।।१०८।।
भावार्थ – हृदय में सुप्त प्रभु प्रेरक होकर जब जागृत हो जाते हैं और साधक की बागडोर को अपने हाथों में ले लेते हैं, तभी भवसिन्धु मन्थन-क्रिया की जागृति एवं पूर्ण सफलता मिलती है। चतुर्दिक सफलता की अनुभूति होने पर संसार-सिन्धु से समस्त रत्नों का आविर्भाव होता है, साथ ही सम्पूर्ण दुःखों का अन्त हो जाता है। ईश्वर की प्रेम-वृष्टि से आत्मा भींग जाती है।
दोहा – सागर मन्थन जोग जन, जन जीवन आभास।
गुरुवर की सुधि ना मिली, पुनि जग नरक निवास।।१६।।
भावार्थ – उपर्युक्त सद्गुरु को मन से पकड़ने से ही भक्तजन सागर-मन्थन की योग्यता प्राप्त करते हैं। तत्क्षण भक्त और भगवान की अनन्यता का आभास प्रदर्शित होने लगता है। यदि ऐसे साधक को किसी सद्गुरु की कृपा प्राप्त नहीं है, तो पुनः इसी नारकीय जगत् के बन्धन में निवास करना पड़ता है।
गुरु की इसी पावन महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कबीर ने गोविन्द से भी आगे गुरु-कृपा को निरूपित किया है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
चौपाई – योग प्रभाव ईश अवतारा।
विषय प्रभावित तन विस्तारा।।१०९।।
भावार्थ – योग के प्रभाव से ही उस ईश्वर एवं अन्तर्प्रेरक कच्छप का अवतार होता है। विषयासक्त पुरुष भी श्रद्धातिरेक एवं हृदयपरक भावों से उन्हें देख सकता है। हाँ, यह प्रसंग अलग है कि उस अवतरण के आद्योपान्त मूल माध्यम सद्गुरु ही हैं। योग की सूक्ष्म जागृति के एकमात्र माध्यम सद्गुरु ही हैं, यह सदैव से ही अकाट्य सिद्धान्त के रूप में अवस्थित है।
इसके उद्गम के लिए सद्गुरु की कृपा अपेक्षित है। उदाहरणार्थ ‘मानस’ में धनुष-भंग का प्रकरण उल्लेखनीय है। यज्ञशाला में उपस्थित देश-देशान्तर के प्रबल पराक्रमी राजा अपने-अपने इष्टदेवों का स्मरण करके धनुष उठाने में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं; परन्तु उठाना-तोड़ना तो दूर रहा, वे धनुष को तिलमात्र भी हिला-डुला नहीं पाते-
परिकर बाँधि उठे अकुलाई।
चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।। (मानस, १/२४९/६)
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई।
तिलु भरि भूमि न सके छोड़ाई।। (मानस, १/२५१/२)
वे छुड़ाते भी तो कैसे? उनका प्रयास तो कामनाओं से भरा हुआ था-
डगइ न संभु सरासनु कैसें।
कामी बचन सती मनु जैसें।।
सब नृप भये जोगु उपहासी।
जैसें बिनु बिराग संन्यासी।। (मानस, १/२५०/२-३)
परन्तु सद्गुरु की पावन आज्ञा के अधीन रहनेवाले भगवान राम ने सहज ही भवचाप का खण्डन कर दिया-
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा।
अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।। (मानस, १/२६०/५)
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।
भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। (मानस, १/२६०/८)
चित्त के टूटते ही चेतना का स्वरूप निखरकर व्यष्टि को समष्टि में लय कर देता है।
सम्बन्ध – विषयी लोग भी भावों की उच्चता से उस ऊँचाई को पार कर सकते हैं; किन्तु पराभक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष स्थिति के रूप में एक ज्ञानी भक्त ही परख पाता है। पराभक्ति की पराकाष्ठा पर उस ज्ञान-गरिमा प्रदायक, चरमोत्कृष्ट स्थिति का विधान है। इसके लिए देखें-
चौपाई – कच्छप हरि अवतार कहानी।
भक्ति प्रभाव लखत विज्ञानी।।११०।।
भावार्थ – कच्छपावतार समस्त सृष्टि में चेतना का संचार करनेवाले उन हरि की ही अपनी कहानी है। पराभक्ति की अवस्था में ज्ञानीजन उस स्वरूप का आभास पाते हैं। ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। जो भक्तिमयी विमल बुद्धि से प्रेरित हैं, वही उस ज्ञान की कसौटी में खरे उतरते हैं।
जब तक पूर्वजन्म के पुण्य और पुरुषार्थ जागृत नहीं होते, हृदय-देश में सद्गुरु का सम्बल प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक परम पावन कच्छपावतार सम्भव नहीं है। गोस्वामीजी की अर्द्धाली देखें-
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।
सत संगति संसृति कर अन्ता।। (मानस, ७/४४/६)
चौपाई – सब दिन सबहिं काल विधि पूरी।
योग युक्ति अनुराग न दूरी।।१११।।
भावार्थ – हर देश, काल और परिस्थिति में इस अवतार की विधि सदैव एकरस एवं पूर्ण है; क्योंकि एकमात्र इष्ट के अनुरूप राग ही अनुराग कहलाता है। युगधर्म का कोई भी प्रभाव इसके समक्ष क्रियाशील नहीं है। योगयुक्ति और अनुराग की त्रिवेणी यदि अन्तःकरण में प्रवाहित है तो उन परमप्रभु के प्रत्यक्षीकरण का विधान है; किन्तु युक्ति तभी काम करती है जब अनुरागपूर्ण हृदय में किसी अनुभवी गुरु से निर्देश प्राप्त होता रहे।
चौपाई – समरथ सम करि जग हरि राखा।
ईस अनीस न जीवन भाखा।।११२।।
भावार्थ – यह सफलता स्वरूपस्थ महापुरुष की कृपा पर ही केन्द्रित है, जब उनका चरण-रज ध्यान की पकड़ में आ जाय तभी यह उपलब्धि सुकर है। हरि के नामों में समत्व स्थापित करानेवाले यही सद्गुरु हैं जिनकी ज्ञान-रश्मि से द्वैत का अन्धकार मिट जाता है। सद्गुरु के आलोक-दर्शन पर ही ईश्वर, अनीश्वर, माया, ब्रह्मादि का द्वन्द्व दूर हो जाता है और साधक को वही अनिर्वचनीय स्थिति प्राप्त हो जाती है।
चौपाई – तिन प्रगटा भव हरण सहारा।
अनायास गहि बाँह उबारा।।११३।।
भावार्थ – ब्रह्मवेत्ता समर्थ सद्गुरु ही भव-भय को दूर करनेवाले हैं। परम कृपालु, उर-प्रेरक ही अधिकारी की बाँह पकड़ लेते हैं। उनके इसी सहारे पर अवलम्बित पथिक इस अथाह भवसागर से शनैः-शनैः पार हो जाते हैं।
चौपाई – जन उर सम्भव विमल कहानी।
दरस परस जे आज्ञा मानी।।११४।।
भावार्थ – जो हरि को समर्पित होकर केवल उन्हीं की प्राप्ति के लिए आर्त हैं, ऐसे भक्तजनों के हृदय में ही अवतार का सूत्रपात होता है। यह अन्तर्देश में होनेवाली विवेकमयी विमल कथा है। उस स्वरूप का दर्शन एवं आदेश उन्हीं पुरुषों के लिए है, जो आज्ञाकारी हैं और सतत प्रयत्नशील हैं।
चौपाई – आज्ञा की विधि दूसर नाहीं।
उर अन्दर हरि सर्व सुनाहीं।।११५।।
भावार्थ – पथिक की आत्मा में प्रभु जागृत होकर वहीं से शब्द-संचार करते हुए, उसे समझाते-बुझाते चलते हैं। इसी प्रकार क्रमशः स्थितियों से अवगत कराते हुए पथिक को वे अपने स्वरूप में खड़ा कर देते हैं। जब वे आत्मा से अभिन्न हो जाते हैं तब प्रकृति की प्रत्येक वस्तु के माध्यम से बोलने लगते हैं।
इन्हीं चर्चाओं को सुनकर मैंने पूज्य गुरुदेव भगवान से पूछा कि क्या भगवान बातें करते हैं? श्री गुरुदेवजी ने बताया कि ‘‘हाँ हो, भगवान तो घण्टों बतियावत हैं। ध्यान धरे रह, तोहूँ से बोलिहैं।’’
वास्तव में इसके अतिरिक्त आज्ञापालन का कोई दूसरा विधान नहीं है। केवल अन्तर्देश में हरि की जागृति के उपरान्त यह आदेश साधक को मिलने लगता है।
चौपाई – ऐसे हरि जो बोलत नाहीं।
साधन श्रम सुख उर महँ नाहीं।।११६।।
भावार्थ – यदि ऐसे गुरुत्व वाले प्रभु अन्तराल में प्रगट होकर मार्गदर्शन नहीं करते, तो भोले पथिकों का मन हताश होने लगता है। जब तक साधना का मूल्यांकन परमेश्वर के दिग्दर्शन के रूप में नहीं हो जाता, तब तक साधक को वह साधना भार मात्र प्रतीत होती है और उसके दिन सुख-संयुत नहीं बीतते।
चौपाई – सतगुरु छबि राखहु उर अन्तर।
अनुभव गम्य ज्ञान गुण मन्तर।।११७।।
भावार्थ – परम कृपालु सद्गुरु के तत्त्वदर्शी स्वरूप को हृदय-देश में आसीन कर लो; अनुभव में उनके द्वारा प्रदत्त निर्देशों को आधार मानकर चलो। कुछ दिनों की आन्तरिक शुद्धि का सुपरिणाम यह होगा कि स्वयं पथिक की सत्यान्वेषणी बुद्धि ज्ञान और गुणों का मन्त्र देनेवाले समर्थ पुरुषों की अनुभवगम्य श्रेणी में उसे लाकर खड़ा कर देगी।
चौपाई – प्रथम प्रवेश मिलहिं गुरु माहीं।
जे अनुभव पर राह धराहीं।।११८।।
भावार्थ – इस परम प्राप्तिवाले चिन्तन-पथ में सर्वप्रथम सद्गुरु का ही सम्बल प्राप्त होता है, जो प्रारम्भ से पूर्तिपर्यन्त पथिक के अन्तस्तल में प्रविष्ट होकर पथ-संचालन करते हैं। वे अनुभव के द्वारा साधक के मन में ही प्रेरणा का उपदेश देकर उसे परम पथ पर चलाते हैं। परमार्थ-पथ को प्रशस्त करनेवाले एकमात्र गुरु ही मूल आधार हैं।
गुरु की कृपा का प्रभाव ही इतना विलक्षण है कि शिष्य कृपापात्र बनते ही आत्मोन्नति के शिखर पर जा पहुँचता है। इन्हीं चरणों की पावन रज विवेक-चक्षुओं को विमल करने के लिए अपरिहार्य है। संत तुलसीदास के शब्दों में देखें-
गुर पद रज मृदु मंजुल अंजन।
नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन।
बरनऊँ राम चरित भव मोचन।। (मानस, १/१/१-२)
गुर के बचन प्रतीति न जेही।
सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।। (मानस, १/७९/८)
दोहा – गुरु रूठे पर हरि नहीं, गुरु नहीं रूठन योग।
गहि राखे उर बीच में, उर अवतरिया भोग।।१७।।
भावार्थ – यदि ऐसे सद्गुरु मन की जड़ता के कारण पथिक से सँभालते न बने, रूठ गये तो हरि भी इस दशावाले असतर्क साधकों को सहारा नहीं देते और यदि कदाचित् गुरु सम्बल देना ही समाप्त कर दें तो ऐसी अवस्था में हरि रहते ही नहीं; किन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरु कभी रूठते ही नहीं। वे प्रायः दीनों की त्रुटियों को समाहित करते रहते हैं। वे पथिक के मानसिक प्रवाह को हृदय में रोककर रखते हैं। इतना ही नहीं, उसके हृदय-देश में उस अवतार के कार्य-कलापों का विस्तार करते हुए प्रेम-प्रसाद वितरित करते हैं।
दोहा – विमल विवेक विरति मति, जे सतगुरु आधीन।
जे जन पावन आतमा, परमानन्द प्रवीन।।१८ क।।
वहाँ न जनमे ना मरे, ना वहिं कलि विस्तार।
व्यापक ब्रह्म स्वरूप सोइ, स्वात्म सृष्टि निस्तार।।१८ ख।।
भावार्थ – जो पवित्र बुद्धिवाले विरक्त साधक अपने सुरति की डोरी को सद्गुरु के चरणों में बाँधे रहते हैं वही प्रवीणजन स्वात्म को परमात्मा में लीन परमानन्द में सदा-सदा के लिए निमग्न हो जाते हैं। वहाँ न जन्म है न मृत्यु, न सुख है न दुःख। उस देश में न यमराज की पहुँच है और न कलियुग का विस्तार है। ऐसी अवस्था में पहुँचा हुआ साधक स्वात्म-सृष्टि को परमात्मा के रंग में रँगकर व्यापक ब्रह्म के शाश्वत रूप में स्वयं स्थिर हो जाता है।
सोरठा – विमल भोग अवतार, तहँ यम कलि कर गम नहीं।
सपदि उतारे पार, विपद पुकारे नर हरी।।१।।
भावार्थ – वे अवतार के भोग सर्वदा निर्दोष एवं निर्मल हैं। वहाँ पर कलियुग और यमराज की गति मिट जाती है। उपर्युक्त जागृति यदि है तो वह अवतरित सत्ता (भगवान) शीघ्र एवं निश्चित पार उतारते हैं। सांसारिक विषयों में जिन्हें विपत्ति का ज्ञान हो जाय और जो असह्य विपदाओं से संत्रस्त होकर उन प्रभु को पुकारते हैं, ऐसे भाग्यशाली नरों के लिए उन हरि के प्राकट्य का विधान है।
सोरठा – संस्कार दे साथ, तब गुरु की महिमा बनी।
सबके समरथ राम, तेहि बल सब जीवन धनी।।२।।
भावार्थ – बहुत से जन्मों के शुभ संस्कार जब प्रगट में साथ देते हैं तभी हम उन परम दयालु गुरु के हो जाते हैं। वास्तव में सबकी आत्मा में उन परम समर्थ राम का स्वरूप छिपा है। उन्हीं राम का आभ्यन्तरिक प्रश्रय प्राप्त करनेवाली आत्माएँ इस जगत् में होते हुए भी धनवान हैं। प्रत्येक मानव उसे प्रत्यक्ष करने के लिए प्राधिकृत है। यदि गुरु का रंचमात्र भी सम्बल उसे प्राप्त हो जाता है तो कतिपय जन्मों के हेरफेर से निर्बल पथिक भी साधन-क्रम में संयुक्त होकर स्व-स्वरूप में प्रवेश पा जाते हैं।
नोट – सागर-मन्थन की उपलब्धि चौदह रत्न- १. शंख, २. हय, ३. धनुष, ४. धन्वन्तरि, ५. कल्पवृक्ष, ६. कामधेनु, ७. मणि, ८. श्री, ९. रम्भा, १०. गज, ११. वारुणि, १२. विष, १३. शशि, १४. पीयूष।
।। ॐ।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)