प्रश्न- भाविकों द्वारा प्रार्थना सहित यह प्रश्न किया गया कि, महाराजजी! हमारे कल्याण का कोई सरल उपाय बताने की दया की जाय?
उत्तर- इस पर पूज्य महाराजजी उनके प्रति अति मधुर वाणी में कहते हैं कि- क्या कहूँ, अब कहने की आवश्यकता नहीं है। सभी बातें सब कोई जानते हैं। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकता है। सब पढ़ते हैं और लिखते भी रहते हैं। बस साधन ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती बल्कि किसी अनुभवी महापुरुष के द्वारा हृदय में जागृत हो जाती है। बनावटी इधर-उधर भटकने से तो अच्छा है कि किसी महापुरुष की शरण अपनाओ। उन्हीं के सान्निध्य, सेवा और सत्संग से तुम्हारे कल्याण का पथ प्रशस्त होगा। जैसा कि-
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगति साधु की, कटै कोटि अपराध।।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)