कामधेनु एवं कल्पवृक्ष की मान्यता

प्रश्नमहाराजजी! कामधेनु एवं कल्पवृक्ष की क्या मान्यता है? अब तक तो हमलोग इन्हें पशु एवं वृक्ष ही मानते आये हैं।

उत्तर प्राचीन शास्त्रों में ‘गो’ शब्द की महिमा विलक्षण ढंग से वर्णित है। गो ही लोक-परलोक एवं सब कुछ प्रदान करनेवाली है। कालान्तर में ‘गो’ शब्द ने धीरे-धीरे एक भ्रान्ति का रूप ले लिया। कतिपय लोगों में यह धारणा बनने लगी कि महर्षियों के यहाँ कोई ऐसी क्षमतावाली गाय रहती थी जो कि तत्काल इच्छित वस्तुओं को प्रदान कर देती थी। उदाहरण के लिए वशिष्ठ आदि महर्षियों के यहाँ नन्दिनी एवं कामधेनु आदि के रहने की मान्यता है। इसी प्रकार कल्पवृक्ष, शेषनाग, बैकुण्ठ इत्यादि बहुत से ऐसे शब्द हैं जिनके विषय में लगभग आठ या दस शताब्दी से लोगों में विभिन्न मान्यताओं की कल्पना हो गयी है किन्तु ये सभी यौगिक शब्द हैं। गोस्वामीजी इन्हीं भ्रान्तियों के शमन-हेतु यथार्थ स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुए स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि-

राम मनुज कस रे सठ बंगा।

धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।। (मानस, 6/25/5)

अंगद के माध्यम से रावण के प्रति इस प्रकार कहते हैं- रे बुद्धिहीन रावण! राम क्या कोई मनुष्य है, कामदेव क्या कोई धनुर्धारी है? वह तो एक विकार मात्र है।

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे।

सकल भुवन अपने बस कीन्हे।। (मानस, 1/256/1)

कुसुम कहते हैं फूल को। लतिका से जैसे विकसित पुष्प विलग होकर तत्काल मुरझा जाता है, उसी प्रकार काम भी फूल की तरह एक नाजुक विकार है, जो कि आया और तुरन्त मुरझा गया, परन्तु इतना सशक्त एवं प्रबल है कि सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकता है। इसीलिए महापुरुषों ने काम के भयंकर प्रवाह को सशक्त शूल समझकर एक धनुर्धारी की संज्ञा दी है। आगे कहते हैं- रे अभागे! गंगा क्या किसी नदी का नाम है?

पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा।

अन्न दान अरु रस पीयूषा।। (मानस, 6/25/6)

कामधेनु क्या किसी पशु का नाम है? कल्पवृक्ष क्या कोई पेड़ है? अन्न क्या कोई दान है? (अपने को सद्गुरु के प्रति समर्पण करना ही दान है) अमृत क्या कोई तरल पदार्थ है?

सुनु मतिमन्द लोक बैकुण्ठा।

लाभ कि रघुपति भगति अकुण्ठा।। (मानस, 6/25/8)

रे मतिमन्द! बैकुण्ठ क्या कोई नगरी है? भगवान की अगाध भक्ति क्या कोई लाभ है? वह तो एक सर्वोपरि स्थिति है, जिसमें लाभ-हानि का उतार-चढ़ाव नहीं है। बुरी स्थिति को देखकर भलाई का ज्ञान होता है अर्थात् बुरे चिन्हों को देखकर ही अच्छाई का भान किया जा सकता है; किन्तु भक्ति में लाभ-हानि का कोई प्रश्न ही नहीं। भग इति स भक्ति (भगति), भग कहते हैं गुण-दोषमयी प्रवृत्ति और इसका अन्त ही भक्ति कहलाती है। अतः स्पष्ट हो गया कि यह लाभ नहीं बल्कि स्थिति है।

बैनतेय खग अहि सहसानन।

चिन्तामनि पुनि उपल दसानन।। (मानस, 6/25/7)

जैसा कि क्रमिक प्रसंग में कहते आ रहे हैं ठीक उसी प्रकार यहाँ भी कहते हैं कि- रे मतिमंद! गरुड़ क्या कोई पक्षी है? और शेषनाग क्या कोई सर्प है, जो पृथ्वी का भार वहन करता है? आज के युग में आये दिन राकेट पृथ्वी का चक्कर लगाया करते हैं परन्तु कहीं भी शेषनाग दिखाई नहीं पड़ता। अरे विंशति चक्षुओं के होते हुए भी अंधे दशानन! चिन्तामणि क्या कोई पत्थर है? जब दावे के साथ बुद्धिहीन, नीच, अन्धे आदि शब्दों से सम्बोधित करके अंगद के द्वारा स्पष्ट किया गया है तो वस्तुतः ये हैं क्या? यह सबके सब आजकल निरन्तर खटकनेवाले शब्द हैं। अरे! यह तो आध्यात्मिक शब्दकोश हैं, जिनके द्वारा महापुरुषों ने योग में आनेवाली विशेष स्थितियों को समझाया था। अब प्रश्न के प्रारम्भ पर विचार करें कि कामधेनु और कल्पवृक्ष क्या हैं? जब साधन के सही संचालन में पड़कर यह हमारा अयुक्त मन प्रवृत्तियों सहित सर्वथा निरोध की स्थिति में प्रवेश पा जाता है तत्क्षण अधोन्मुखी प्रकृतिजन्य सम्पूर्ण विकारों का क्रियात्मक क्रम परिवर्तित होकर भगवत्-स्थिति को प्रदान करनेवाले सद्गुणों में प्रवाहित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप चेतन को प्राप्त कर उसी रूप में साधक परिवर्तित हो जाता है, जिसे कायाकल्प कहते हैं। इस प्रकार कायाकल्प की स्थितिवालों के लिए इच्छा ही सबकुछ है। हृदय से किसी के कल्याण की इच्छा प्रगट कर दें अथवा स्वयं के लिए किसी इच्छा का अभ्युदय हो जाय तो तत्काल स्वयं ही पूरी होने लगती है। मनोवांछित फल प्रदान करना ही कल्पवृक्ष का गुणधर्म माना जाता है।

कामधेनु ‘गो’ नाम इन्द्रियों का है। यही मनसहित इन्द्रियाँ साधना से निरोधावस्था प्राप्त कर ब्रह्म-पीयूष रस को फैलाने लगती हैं। उस समय योगी को मिलनेवाला आनन्द ही नन्दिनी है। यही स्थिति महर्षि वशिष्ठ की थी। यही गो योगी के स्वरूपस्थ होने पर कामधेनु बन जाती है। शरीर के रहते हुए उस स्वरूप की स्थिति मिल गयी, इसलिए उसकी समस्त कामनायें पूर्ण हो चुकीं। कारण कि आगे ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसके लिए कामना करे। उस परम कामना की पूर्ति स्थितिप्राप्त महापुरुषों से ही सम्भव है। देखने में इन्द्रियों का खोखा वही है जो अन्दर-ही-अन्दर उस परमतत्त्व की पूर्ति हो जाने से कामधेनु के विशेषण से अलंकृत हो जाती है। यदि हमारी इन्द्रियाँ विषयोन्मुख हो गईं तो पशुता में बदल जाती हैं और यदि साधन में प्रवृत्त हो गयीं तो ब्रह्मरस का संचार करने के कारण नन्दिनी कहलाती हैं। नन्दिनी अर्थात् आनन्द देनेवाली स्थिति। यही पराकाष्ठा दिलाने पर कामधेनु कहलाती हैं। यही इन्द्रियाँ ब्रह्म की स्थितिवाली हैं जहाँ समस्त कामनाओं की पूर्ति है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या गाय को न माना जाय? मानने को कुछ भी मानो, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। चाहे गाय मानो या पीपल, कोई मदीना की मिट्टी माने तो कोई ईसा की फाँसी का दृश्य। इसी प्रकार यहूदी इत्यादि प्रत्येक समाज की भिन्न-भिन्न मान्यताएँ होंगी। यह द्वन्द्व में रहनेवाले प्राणियों को ईश्वरोन्मुख करने का उपाय है। इससे हृदय में श्रद्धा का वेग बढ़ता है व धर्म में अभिरुचि जागृत होती है। शनैः-शनैः प्रकृति से ऊबकर सत्य-प्राप्ति की जिज्ञासा प्रबल हो जाती है; किन्तु वास्तविक क्रिया जो परम चेतन से मिलानेवाली है, उसमें प्रवेश मिल जाने पर उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। जब तक हमारी योग्यता उस क्रिया को पकड़ने में सक्षम नहीं हो जाती, तब तक इसका पालन नितान्त आवश्यक है। भगवत्-पथ की प्रवेशिकापर्यन्त कुछ ऐसे ही माध्यम अपनाये गये हैं।

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवताओं के स्थान पर देवता नाम की कोई वस्तु नहीं है; किन्तु मनुष्य की श्रद्धा जब किसी स्थान पर झुक जाती है, तब मैं स्वयं ही उस स्थान पर खड़ा होकर फल देता हूँ परन्तु वह फल सीमित है। उनको मेरे अव्यक्त स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती। अतः मेरी प्राप्ति के लिए उन्हें उस क्रिया को करना पड़ेगा, जो मेरे द्वारा निर्दिष्ट की गयी है। जब तक भगवत्-स्वरूप को दिलानेवाली क्रिया न मिले तब तक यह प्रयास करना परमावश्यक है।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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