प्रश्न– महाराजजी! क्या अध्यात्म में युद्ध अनिवार्य है?
उत्तर– अध्यात्म ही एक ऐसा स्थल है जहाँ युद्ध अनिवार्य है, अन्यत्र कहीं नहीं। संसार में बड़े-बड़े संघर्ष होते हैं परन्तु इनका उद्देश्य इन्द्रिय-तृप्ति है न कि परमार्थ। मोह से पराधीन होकर सांसारिक शक्तियों के मद में इन्द्रिय-तृप्ति के लिए लोग विशाल जनसमूहों में लड़ते हैं, जिसे युद्ध की संज्ञा दी जाती है। ऐसे युद्ध में असंख्य लोग मर मिटते हैं; किन्तु जीत जीवित रहनेवालों की भी नहीं होती। अरे, यह प्रवृत्ति मार्ग है। जो जिसको जितना दबाता है, परिणाम में उसे भी उतना ही दबना पड़ता है। आज जो शरीर के अभिमान में पड़कर अपने को शेर समझता है, कल उसे गीदड़ भी बनना पड़ेगा। कारण कि बदले की भावना को हर हालत में भोगना ही पड़ता है। यह मानव- शरीर क्षणभंगुर है एवं कल के लिए कुछ भी निश्चित नहीं है तो फिर इसके लिए एकत्रित भोग्य-सामग्री कब सत्य हो सकती है? अतः ऐसी प्राप्ति पूर्णतया अप्राप्ति ही है। थोड़ा गीता पर विचार करें, श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रिय-सुख को चाहनेवाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है, अतः तू इनके वश में न हो। आगे जन्मान्तर में मिलनेवाली योनियों का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि, हे अर्जुन! मृत्युकाल में जो जिसका चिन्तन करते हुए शरीर का त्याग करता है, प्रायः वह उसी स्तर की योनि को प्राप्त करता है और जो मेरा चिन्तन करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त करता है। यदि ऐसा सरल उपाय है तो सभी मरणकाल में भगवान का चिन्तन कर लेंगे, परन्तु कहते हैं कि हे अर्जुन! उस प्रयाणकाल में बरबस आकर वही चिन्तन होने लगता है जिसका कि जीवन में अधिक अभ्यास हुआ रहता है। मरणकाल में बुद्धि भ्रमित रहने के कारण जीवन के भले-बुरे कार्यों का बरबस स्मरण होने लगता है। इसलिए तू निरन्तर मेरा ही चिन्तन कर, जिससे प्रयाणकाल में मेरा ही चिन्तन तुझमें प्रसारित हो सके। आजीवन जिसमें मारकाट, झगड़े-फँसाद एवं जीवों के सताने की भावना रही है प्रयाणकाल के बाद भी वह मरने और जीने की परिधि में जन्म लेता है। झगड़ने की प्रवृत्ति जीव-श्रेणी का स्वभाव है। अतः काम-क्रोध, मोह-लोभवश झगड़े अवश्य होते हैं, जिसका परिणाम अधोगति है। जहाँ इसकी उपलब्धि है वहाँ विजय का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अब एक दृष्टि मानस पर भी डालें। जब रावण युद्धस्थल में आया तो विभीषण को बड़ी चिन्ता हुई। उसके पराक्रम का स्मरण कर वह विचार करने लगा कि, ‘रावनु रथी बिरथ रघुबीरा।’ (मानस, 6/79/1)- रावण रथारूढ़ है, भगवान राम विरथ हैं, उनके पाँव में जूते भी नहीं हैं तो इस भयंकर शत्रु को कैसे जीतेंगे?
याद रखें, यहाँ गोस्वामीजी के शब्दों में राम एवं रथादि का चित्रण प्रतीकों के रूप में प्रत्यक्ष है। यहाँ पर मोह ही रावण एवं उसका रथ ही मोह का प्रसार है। हम मोहमयी दृष्टि से जिधर भी देखें वह वहीं से गति पकड़ने लगता है। बस यही वह रथ है जो मोह को अपने में आसीन कर घुमाता रहता है। ऐसा विचार कर विभीषण बोला-
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना।
केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। (मानस, 6/79/3)
भगवन्! न आपके पास रथ है और न पाँव में जूते ही हैं। इस महाभयंकर शत्रु को आप कैसे जीतेंगे? उसके बल से वह भलीभाँति परिचित था। इस पर भगवान राम उसके प्रेम को देखकर कहते हैं कि-
सुनहु सखा कह कृपानिधाना।
जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। (मानस, 6/79/4)
भगवान राम बोले, ‘‘जिससे विजय होती है वह रथ ही दूसरा है।’’ आखिर उसका स्वरूप क्या है?
सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। (मानस, 6/79/5)
शौर्य एवं धैर्य ही उस रथ को चलानेवाले चक्के हैं। सत्य (जो तीनों कालों में अबाधित है) एवं शील (सत्य का अनुसरण)- यही दोनों ध्वजा और पताका हैं। याद रखें, ध्वज सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतीक होता है। उसके खिलाफ कोई कार्य हो ही नहीं सकता। यदि उसके खिलाफ कोई कार्य होता है तो राष्ट्र समाप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार सत्य से विपरीत कोई कार्य नहीं हो सकता।
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे।। (मानस, 6/79/6)
शक्ति, विवेक, इन्द्रियों का दमन एवं परम वस्तु से हित ही घोड़े हैं जिनके द्वारा सही दिशा अर्थात् वास्तविक गति मिलती है। क्षमा, कृपा एवं समत्वरूपी रस्सियों में बँधकर ये घोड़े कार्य करते हैं।
ईस भजनु सारथी सुजाना।
बिरति चर्म संतोष कृपाना।। (मानस, 6/79/7)
ईश का भजन सुजान सारथी है। वैराग्य ही वह ढाल है, जिस पर विकारों का असर नहीं पड़ता। सन्तोष ही कृपाण है।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा।
बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। (मानस, 6/79/8)
दान ही परशु एवं बुद्धि ही प्रचण्ड शक्ति है। विशेष अनुभूतियों का संचार ही वह धनुष है जिसमें प्रकृति का पहलू एक बार जितना समाप्त हुआ, पुनः जीवित नहीं होता।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। (मानस, 6/79/10)
ब्रह्म में स्थित महापुरुष व उनमें जो सद्गुरु हैं, उनका मन-कर्म-वचन से पूजन ही अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का कोई दूसरा उपाय ही नहीं है।
महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़, सुनहु सखा मतिधीर।। (मानस, 6/80 क)
अत्यन्त दुर्जय संसाररूपी शत्रु को वही वीर जीत सकता है, जिसके पास उपरोक्त रथ की स्थिति दृढ़ता के साथ प्राप्त हो। राम ने रथ द्वारा विजय प्राप्त की थी और स्वयं कहते हैं कि दूसरे रथों से विजय कदापि नहीं हो सकती। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या उन्होंने किसी सोने या चाँदी के रथ में बैठकर विजय प्राप्त की थी?
यह मानस है। इसका बाह्य दृष्टिकोण से यथार्थ अर्थ नहीं मिल सकता। हाँ, भगवत्-पथ की एक निर्धारित सीमा पार की जा सकती है। एकाग्रता के बाद जो मन का स्वामित्व है, वही इन्द्र है। ऐसी एकाग्रता में ही उपरोक्त रथ का होना सम्भव है। जैसा कि शौर्य, धैर्य, सत्य, शील, ईश-भजन, निरन्तर चिन्तन, सद्गुरु का पूजन इत्यादि का संचार एवं उनमें स्थायित्व आने पर ही इन्द्र ने रथ को प्रदान किया था। वस्तुतः इन्द्रियों के निरोधकाल में वह दैविक सम्पत्ति, जिसके द्वारा परमदेव परमात्मा का साक्षात्कार होता है, ढल जाती है। इसी के द्वारा आवागमन से मुक्ति एवं इष्टोपलब्धि होती है। यहाँ मोह ही रावण है। जैसा कि-
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहि बहु सूला।। (मानस, 7/120/29)
सम्पूर्ण व्याधियों का मूल मोह (रावण) ही जब मिट जाता है तो ‘रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।’ (मानस, 6/103/10) अब कोई नहीं बचा अर्थात् संसाररूपी शत्रु पर विजय मिल गई। याद रखें, भगवान संसाररूपी शत्रु को जीतनेवाले रथ का वर्णन करते हैं। जब तक उपरोक्त रथ की योग्यता नहीं आती, तब तक विजय नहीं मिलती। भगवान राम की वास्तविक विजय से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि राम-रावण युद्ध किसी महापुरुष के अन्तःकरण की लड़ाई है। जो प्रायः सभी के अन्तःकरण में प्रसुप्तावस्था में विद्यमान है। वह किसी-किसी प्रयत्नशील पुरुष के अन्तःकरण में अनुभवी महापुरुष द्वारा जागृत कर दी जाती है। अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ हैं, पहली सजातीय एवं दूसरी विजातीय, दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद्। रावण अर्थात् आसुरी सम्पद् को निर्जीव बनाकर आध्यात्मिक युद्धहेतु कल्याण-क्षेत्र में उतर आओ। यदि थोड़ा भी करते बन गया तो संस्कार प्रबल हो जायेंगे।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)