महाभारत के आलोक में ‘अहिंसा’
अहिंसाव्रती पाण्डव–
महाभारत, वनपर्व के स्वप्नोद्भव पर्व में है कि वनवासकाल में वन्य जीव-जन्तुओं को मारना ही पाण्डवों का प्रधान शौक था। एक दिन द्वैतवन के पशुओं ने कुंतीनन्दन युधिष्ठिर से स्वप्न में निवेदन किया कि शूरवीर पाण्डवों के आखेट से वन्य जीवों की वंश-परम्परा का मात्र एक-एक जन्तु शेष रह गया है, उनकी प्रजाति अब लुप्त होने के कगार पर है, इसलिये पाण्डव कृपया अपना निवास-स्थल अन्यत्र बनायें। युधिष्ठिर ने उनकी अभ्यर्थना स्वीकार की और काम्यक वन की ओर निकल गये। स्मृति-ग्रन्थों की व्यवस्था के आलोक में पाण्डवों का यह कृत्य जघन्य हिंसा थी परन्तु पाण्डवों को इसका पाप नहीं लगा। पापियों के लिये नरक का विधान है किन्तु पाण्डव परमधाम में पाये गये।
आदिपर्व के उपखण्ड खाण्डव-दाह का प्रसंग है। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन इन्द्रप्रस्थ के समीप यमुना तट पर विराजमान थे। उसी समय अग्निदेव एक ब्राह्मण के वेश में उनके समीप आये, भिक्षा की याचना की। अर्जुन ने पूछा- ‘‘विप्रवर! आप कैसी भिक्षा पसन्द करेंगे?’’ उन्होंने उत्तर दिया- ‘‘मैं साधारण ब्राह्मण नहीं हूँ। मैं अग्नि हूँ। मेरी जठराग्नि मन्द हो गई है। इस खाण्डव वन में वे वनस्पतियाँ हैं जिनसे मेरी जठराग्नि पुन: उद्दीप्त हो जायेगी।’’ अर्जुन ने पूछा- ‘‘आप वनप्रान्त को उदरस्थ कर लीजिए। किसी को कोई आपत्ति है क्या?’’
अग्निदेव ने कहा, ‘‘प्रयास तो मैंने कई बार किया किन्तु देवराज इन्द्र वर्षा की झड़ी लगाकर ज्वालाओं का शमन कर देते हैं।’’ अर्जुन ने जानना चाहा कि देवराज ऐसा क्यों करते हैं? अग्नि ने कहा, ‘‘उनका एक मित्र तक्षक इस वन में निवास करता है। उसी के स्नेह में इन्द्र ऐसा व्यवधान डालते हैं।’’ अर्जुन ने अग्नि को आश्वासन दिया। समस्त वनप्रान्त में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। वन्य जीव-जन्तु अग्नि से बचने के लिए यत्र-तत्र भागने लगे। अग्नि ने कहा, ‘‘अर्जुन! कोई पशु-पक्षी भागने न पाये।’’ (चटनी-अचार और सलाद के बिना भोजन कैसा?) अर्जुन भागते हुए पशु-पक्षियों को बाण से गिरा देते। बाण से एक नागिन की पूँछ कट गयी। आसन्नप्रसवा उस नागिन ने एक नाग को जन्म दिया जो किसी प्रकार बच निकला और कालान्तर में कर्ण के माध्यम से अर्जुन से प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। एक असुर ने भगवान श्रीकृष्ण से शरण की याचना की, श्रीकृष्ण ने उसे अभय दिलाया। इन्द्र ने वर्षा द्वारा अग्नि को शान्त करने का प्रयास किया; किन्तु अर्जुन ने दिव्य वाणों से देवराज को विफल मनोरथ कर दिया। यथेष्ठ भोजन से तृप्त अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन को दिव्य रथ, अक्षय तूणीर, दिव्य धनुष तथा भगवान श्रीकृष्ण को चक्र उपहार में प्रदान किया। विचारणीय है कि एक विस्तृत वनप्रान्त में कितने जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े, कितने कीटाणु होते हैं? भगवान के सामने ही अर्जुन ने जीव-संहार में सक्रिय सहयोग दिया। भगवान को उसे रोकना चाहिए था कि रुक जाओ अर्जुन! यह हिंसा है। किन्तु उन्होंने भी इस कार्य में अर्जुन का भरपूर सहयोग किया।
इतने जीवों का संहार करने वाले अर्जुन को तो नरक जाना चाहिए था; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण हर पल उनके रक्षक के रूप में थे, उनके सारथी बन गये। कहने लगे ‘निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्’- अर्जुन! तू निमित्त मात्र होकर खड़े भर रहो। मेरे द्वारा मारे हुए इन शत्रुओं को मारो। विजय तुम्हारी होगी। और हुई भी!
पाण्डव जब-जब संकट में पड़े, भगवान चतुर्दिक उनकी सुरक्षा-व्यवस्था में सन्नद्ध मिले। वनपर्व के अजगर पर्व में है कि शिकार के लिये गये भीम एक बार शाम तक नहीं लौटे। युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘मुझे अपशकुन हो रहा है। मेरी बायीं भुजा फड़क रही है। यहाँ सभी उपस्थित हैं, केवल अनुज भीम अनुपस्थित है। भीम संकटग्रस्त प्रतीत होता है। महर्षि धौम्य को साथ लेकर युधिष्ठिर भीम की खोज में निकल पड़े।
घोर जंगल में किसी व्यक्ति को ढूँढ़ निकालना कठिन कार्य है, वह भी ऐसे जंगल में जहाँ कभी कोई कुल्हाड़ी न चली हो, फिर भी भीम जैसे व्यक्ति को खोज लेना आसान था। जिस मार्ग से भीम गये थे, उनके प्रहार से आहत सैकड़ों भैंसे, शेर, गैण्डे, हाथी कराह रहे थे- कुछ दम तोड़ चुके थे। सैकड़ों वृक्ष उखड़े पड़े थे। इन्हीं पदचिह्नों का अनुसरण करते युधिष्ठिर वहाँ पहुँच गये जहाँ एक अजगर से लिपटा भीम निश्चेष्ट पड़ा था। अजगर वेशधारी महाराजा नहुष को ‘विप्र’ की वास्तविक व्याख्या सुनाकर युधिष्ठिर ने उन्हें शापमुक्त कराया। अस्तु, शिकार का शौकीन भीम! आखेटप्रेमी सभी पाण्डव! यदि जीव मारना हिंसा है, पाप है तो भगवान सदैव इनके रक्षक और सहायक क्यों हैं? पाण्डवों की असाध्य प्रतिज्ञाएँ भगवान के वरदहस्त के प्रभाव से पूर्ण हुईं। वरदान के कवच से संरक्षित जयद्रथ की सुरक्षा-व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए भगवान ने अर्जुन का प्रण पूरा किया।
एक समय भीम ने भीषण प्रतिज्ञा कर ली कि द्रौपदी को इंगित कर दुर्योधन ने अपनी जिस जाँघ को थपथपाया है, युद्धभूमि में गदा से मैं उसी जंघे को तोड़ूँगा। भीम ने जब प्रतिज्ञा की थी दुर्योधन हाड़-मांस का एक सामान्य सा व्यक्ति था; किन्तु जब प्रतिज्ञा पूर्ण होने का समय आया, गान्धारी की दिव्यदृष्टि से वज्रोपम हो चुका था। शरीर में कहीं कुछ पूर्ववत् रह गया तो उसकी जाँघ थी- उसका भी मार्ग भगवान श्रीकृष्ण ने ही प्रशस्त किया। सतत् अभ्यास के प्रभाव से दुर्योधन को जीत पाना असंभव था किन्तु अर्जुन को प्रेरित कर भगवान ने भीम की प्रतिज्ञा का स्मरण करा दिया जिससे भीम का प्रण पूरा हुआ। कदाचित् दुर्योधन पूर्णत: वज्र हो जाता तब क्या भीम की प्रतिज्ञा पूरी हो पाती? अस्तु यदि जीव-वध हिंसा है (जैसा की स्मृतियों में है), पाण्डव जीव-वध में निरन्तर प्रवृत्त हैं फिर उन्हें भगवान का संरक्षण क्यों प्राप्त है?
अभिमन्यु युद्धभूमि में मारा गया। पाण्डव-सेना आँसू बहाती हुई पीछे हटने लगी। सैनिकों को आश्वस्त करते हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘शूरवीरो! अभिमन्यु के लिये शोक मत करो। अभिमन्यु ने दस हजार मुकुटधारी महारथी राजकुमारों का वध किया है, उसने महान पुण्य अर्जित किया है। (विचार करें इन दसियों हजार जीवों (योद्धाओं) का वध पाप है या पुण्य?) सैकड़ों रथारूढ़ योद्धा अभिमन्यु का तेज सहन न कर पाने के कारण भागते दिखायी पड़े। उसके बाणों ने सहस्रों घुड़सवारों का वध किया है इसलिये वह पुण्य अर्जन करने वाले पुण्यवानों के लोकों में चला गया। वह स्वर्ग में बैठा है। उसके लिये शोक मत करो। पराक्रम प्रकट करो। चलो तुम भी स्वर्ग!’’ फौज लौट आयी और युद्ध होने लगा। जीव मारना पाप है जिसका परिणाम नरक है अथवा पुण्य है जिसका प्रतिफल स्वर्ग है? पुत्र के लिये शोकातुर अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण दिव्यलोकों में ले गये जहाँ अभिमन्यु दिव्य सिंहासन पर बैठा पाया गया।
इन कथानकों से यह भी स्पष्ट है कि स्वर्ग कहीं आकाश में नहीं है। धर्मराज युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गये थे। स्वर्ग के लिये आँख मूँदने या देवी-देवता पूजने की आवश्यकता नहीं है। युद्ध में वीरगति पाने वाले वीरों के लिये स्वर्ग अत्यन्त सुलभ है। उस समय उनके मन-मस्तिष्क में धरती और ऐश्वर्य का ही चिन्तन रहता है। ‘अंत मति सो गति’ के अनुरूप उन्हें स्वर्गिक ऐश्वर्य की प्राप्ति हो तो आश्चर्य ही क्या है? स्वर्गोपम सुख की उपलब्धि का दूसरा मार्ग नियत कर्म का अनुपालन है। गीता में भगवान कहते हैं मुझे पूजकर लोग स्वर्ग तक की कामना करते हैं, मैं उन्हें देता हूँ। भोग तो भोगने में आकर क्षीण हो जाते हैं किन्तु मुझसे जुड़े रहने के कारण मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। अत: लौकिक जीवन में समृद्धि और परमश्रेय की प्राप्ति के लिये भजन तो एक परमात्मा का ही करना चाहिए। भजन के उन्नत सोपानों में अहिंसा का स्तर आता है इसीलिये महाभारत में है ‘अहिंसा परमो धर्म:’– परमधर्म परमात्मा के परिवेश में ही अहिंसा का प्रावधान है।
(‘अहिंसा का स्वरूप’ से उद्धृत)