भगवान बुद्ध की दृष्टि में ‘अहिंसा’
अहिंसा यौगिक शब्द है। जब साधक शान्त-एकान्त में भजन-चिन्तन में बैठते हैं, उनके अन्त:करण में आनेवाली एक अवस्था का नाम अहिंसा है। यह लोक-व्यवहार का शब्द नहीं है। समाज में दया का उपयोग है, सहिष्णुता है, परोपकार है किन्तु अहिंसा समाज में व्यवहृत शब्द नहीं है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह- सभी एक-जैसे यौगिक शब्द हैं। सामाजिक लोगों के लिये ब्रह्मचर्य का क्या उपयोग है? इसी प्रकार जब महापुरुष घोर जंगल स्थित कुटीर में चिन्तन में रत रहते थे, समाज से सम्बन्ध टूट चुका होता था, उस समय उनके हृदय में घटित होनेवाली एक अवस्था-विशेष का नाम अहिंसा है।
शरीर अनित्य है। जो है ही नहीं, उसकी रक्षा आप कैसे करेंगे? रक्षा उसकी होती है जिसका अस्तित्व है। अत: शरीर की रक्षा अहिंसा नहीं है।
आत्मिक अध्यवसाय में जो अवरोध उत्पन्न करें, आत्म-परिणाम से भटकाने वाले विकारों में प्रवृत्त होना हिंसा है तथा आत्म-परिणाम तक की दूरी तय कराने वाले संयमों का पालन अहिंसा-व्रत कहलाता है। आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाय- जहाँ से पुन: जन्म नहीं, मृत्यु नहीं, परिवर्तन नहीं- यह अहिंसा का विशुद्ध स्तर है। जब आत्मा स्वरूपस्थ हो जाती है, अहिंसा-व्रत पूर्ण हो जाता है।
कुछ वर्षों पूर्व हमें लद्दाख जाने का अवसर मिला। लेह-लद्दाख हिमालय की उपत्यका में है। वहाँ से १४ किमी. के पश्चात् तिब्बत की सीमा आरम्भ होती है। ठंडक अधिक पड़ती है। वहाँ हवा में आक्सीजन की मात्रा भी कम है। तेरह-चौदह हजार फीट की ऊँचाई पर वह क्षेत्र स्थित है। उस ऊँचाई पर दो श्वास नाक से तो तीसरी मुँह से लेनी पड़ रही थी। दो-चार दिन पश्चात् नाक से श्वास लेने का अभ्यास पड़ जाता है, नाक से ही श्वास की प्रचुर आपूर्ति होने लगती है। वहाँ भगवान बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना का आयोजन था।
प्रतिमा स्थापन के क्रम में सत्संग का भी आयोजन था। भगवान बुद्ध कौन थे? उन्होंने क्या उपदेश दिया?- इन्हीं बिन्दुओं पर चर्चा हो रही थी। मुझसे भी भगवान बुद्ध के सन्दर्भ में बताने के लिये कहा गया। घण्टा-सवा घण्टा हमने भी बताया कि गर्व का विषय है कि आप सभी भगवान बुद्ध के अनुयायी हैं और इस भव्य आयोजन के माध्यम से उन महापुरुष के शील का चिन्तन कर रहे हैं। काफी कुछ आप सबने बताया किन्तु सौभाग्य से हम तो उन्हीं के वंश-परम्परा में होने से उन्हें कुछ अधिक ही निकट से जानते हैं।
भगवान बुद्ध के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हमने उन्हें विधिवत् बताया और यह भी स्पष्ट किया कि जैन, बौद्ध और सनातन कोई अलग-अलग धर्म नहीं हैं। यह तो सद्गुरुओं का दरबार है, उनके पीछे सिमटा हुआ शिष्यों का समूह है। महापुरुषों ने विविध क्षेत्रीय भाषाओं में उपदेश दिये इसीलिये भिन्न प्रतीत होते हैं; किन्तु जिस सत्य को उन्होंने दृढ़ाया, वह एक ही है। धर्म दो-चार नहीं होता। सृष्टि में एक है तो धर्म! एक ही उस परमात्मा को धारण करने की विधि है।
जो कुछ हमने कहा, इंग्लैण्ड में बौद्ध साहित्य पढ़ानेवाले एक प्रोफेसर ने उसे अक्षरश: दुहरा दिया। यही सब तो वह पढ़ाते ही थे। अन्त में उन्होंने कहा- स्वामीजी ठीक कहते हैं। बौद्ध और हिन्दू-धर्म एक ही हैं किन्तु हमारे धर्म में एक घातक अंग है अहिंसा। इस अहिंसा की ही देन है कि चीन तिब्बत को खा गया और अरब भारत को। भारत को गुलाम बना डाला- यहाँ के लाखों-लाखों लोगों को, हिन्दुओं को उन्हीं के पशुओं की रस्सियों में बाँधकर ले गये, दो-दो रुपये में औरतें और ढाई-तीन रुपये में पुरुष बेच दिये गये। सुनने में कड़वा लगता है किन्तु घटनाएँ हुई हैं। लापरवाह होंगे तो भविष्य में भी होंगी। जहाँ फूट होती है वहाँ यही दुर्दशा हुआ करती है। उनके वक्तव्य का आशय था कि अहिंसा का रोग हमारे धर्म में कदाचित् न होता तो चीन तिब्बत पर कब्जा कभी नहीं कर सकता था।
उन दिनों चीन ने तिब्बत को अपने देश में मिला लिया था। परम पावन दलाई लामा ने भारत में शरण ली थी। वहाँ के बौद्धों में प्रबल आक्रोश था। उनका आक्षेप था कि अहिंसा ने भारतीयों के हाथ पीठ पीछे बाँध दिये। भारत में पाये जानेवाले प्रत्येक जीव की मृत्यु पर मृत्यु-कर लगा हुआ है। उसे न देने पर नरक की यातना का विधान है। हर जीव की मृत्यु पर भारतीयों को अपना नरक दिखायी देता है।
हमने उन्हें बताया कि अहिंसा को समझने में कहीं कोई भूल हुई है। भगवान ने क्या बताया और अनुयायियों ने क्या समझ लिया- इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और यही इन आयोजनों की सार्थकता है।
उदाहरण के लिये भगवान बुद्ध के अनुयायी मांस तो खाते हैं किन्तु पशुओं को काटते नहीं। भगवान ने कभी कहा था कि मूक पशुओं को मत काटो, इसलिये वे पशुओं को काटते नहीं, बकरों को बोरे में भरकर घर के दूसरी-तीसरी मंजिल से गिरा देते हैं, भैंस का मुँह बाँध देते हैं। दम घुटने से वह अपने से मर गई तो खा लेते हैं। बर्फ में वह माँस महीनों तक फ्रिज में रखा जैसा सुरक्षित रहता है। चीन, मलेशिया, मंगोलिया, तिब्बत, सिंगापुर, वियतनाम इत्यादि देशों में अनेकों मांस विक्रेता बौद्ध धर्मानुयायी हैं। उनके विज्ञापनों में है- अपने से मर गया, मारा नहीं गया – उनका मांस यहाँ मिलता है। काटने से जो पशु एक मिनट में मरता, मुँह बाँधने से तो आधे घंटे में तड़प कर मरेगा। जीव को सताया तो बहुत और कहते हैं अहिंसा है। भगवान बुद्ध ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया।
भगवान बुद्ध के समय में धर्म के नाम पर, योग-साधना के नाम पर असंख्य रीति-रिवाज प्रचलित थे जबकि उनका धर्म से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। कोई कुछ भी कर रहा था वह अपनी समझ से धर्म का ही आचरण, योग-साधना का अनुष्ठान ही कर रहा था। उसकी समझ में आत्म-दर्शन की वही विधि थी।
एक बार भगवान बुद्ध के समक्ष दो महात्मा एक कूकर-व्रतिक और दूसरे गो-व्रतिक पहुँचे। गो-व्रतिक ने कहा, ‘‘भन्ते! इस कूकर-व्रतिक ने लगभग बारह वर्षों तक कूकर वृत्ति से तपस्या की है। यह कुत्ते की तरह खुर-खुर चलना, बैठते समय दो-तीन बार घूमकर कुण्डली मारकर बैठना, प्रात:-सायं कुत्ते की तरह बोलना, जिह्वा से पानी पीना इत्यादि श्वानवत् रहकर कठोर तप किया है। यह किस स्तर तक पहुँचा हुआ सन्त है?’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘भाई! कुछ भी पूछ लो किन्तु केवल यह मत पूछो।’’ उसने कहा- नहीं भन्ते! केवल यही बतायें। बुद्ध ने तीन बार मना किया किन्तु वह विरत नहीं हुआ। बुद्ध ने कहा, ‘‘भाई! जिसकी चाल-ढाल, मन-मस्तिष्क और विचार कूकरमय है, वह अगला जन्म कुत्ते का अवश्य प्राप्त करेगा। जीवन के अन्तिम क्षणों में वही स्फुरित होता है जिसका जीवन में अधिक अभ्यास किया जाता है, वही कर्म अगली योनि का निर्धारक होता है।’’ यह सुनते ही कूकर-व्रतिक रोने लगा।
इस पर गो-व्रतिक ने कहा, ‘‘भन्ते! हमने भी लगभग साढ़े ग्यारह वर्षों तक कठोर तप किया है। गाय की तरह चलना, किसी से मिलने पर गाय की तरह पैरों से खुरचाली मार कर मिलना, गाय की तरह बाँ-बाँ बोलना, हाथों का प्रयोग न कर केवल मुख से खाना-पीना, गाय का प्रत्येक आचरण अपने में ढालने का अभ्यास किया है। तपस्या में मेरी क्या स्थिति है?’’ बुद्ध ने कहा- तुम भी यह न पूछते तो अच्छा होता। उसने सविनय कहा- भगवन्! कितना भी कटु क्यों न हो, आप अवश्य बतायें। जब तीसरी बार भी हठ करता रह गया तब भगवान ने कहा- यदि सचमुच गाय की तरह ही तुम्हारा रहन-सहन, चाल-ढाल और मनन-चिन्तन है तो अगला जन्म तुम गाय का अवश्य प्राप्त करोगे। कुछ भी कर डालना भजन नहीं होता। आप किसी कामी व्यक्ति का चिन्तन करें। जब भली प्रकार ध्यान पकड़ में आ जायगा, उसके अन्त:करण में जितना उद्वेग है, आपमें भी उतर आयेगा। इसीलिये ध्यान किसी वीतराग मुक्त महापुरुष का किया जाता है। गो-व्रतिक भी उदास हो गया। दोनों भगवान बुद्ध के शिष्य हो गये। (यहाँ भगवान बुद्ध ने गीता के अध्याय ८/५-७ श्लोक का ही अनुवाद किया है।)
सारनाथ में धर्मचक्र प्रवर्तन के उपरान्त विचरण क्रम में तथागत भगवान बुद्ध उरुवेला (बुद्ध गया) पुन: पधारे। उस क्षेत्र में परम प्रख्यात महान विद्वान काश्यप अपने पाँच सौ शिष्यों सहित एक विशाल यज्ञ कर रहे थे जिसमें अंग और मगध राज्य के सात सौ अनब्यायी सुपुष्ट गायें, ७०० भेंड़, ७०० बकरियाँ बलि हेतु एक पंक्ति में बाँधी गयी थीं। भीड़ के अनुपात में कभी गाय तो कभी भेड़-बकरों के कान-पैर इत्यादि के किञ्चित् अंशों को अग्नि में आहुति देकर प्रसाद स्वरूप शेष मांस यज्ञकर्ताओं में वितरित करने का महायज्ञ चल रहा था। यही उनकी योग-साधना थी, मोक्ष का मार्ग था। भगवान बुद्ध ने उन्हें समझाया- विकार मन के अन्दर हैं। जीव के आवागमन, जन्म-मृत्यु का कारण जन्म-जन्मान्तरों से संचित संस्कार हैं। इन मूक पशुओं को काटने से वे संस्कार कैसे मिट जायँगे? आत्मदर्शन में मन के उद्वेग का कारण ये संस्कार ही बाधक हैं जो इन्द्रिय संयम, ध्यान और समाधि द्वारा ही शमित होंगे। इन निरीह पशुओं को काटने से संस्कारों की शृंखला का शमन कैसे होगा?
काश्यप ने देखा कि तर्कों से भगवान को परास्त करना सम्भव नहीं है तो उसने भाव परिवर्तन कर कहा, ‘‘भन्ते! ठीक कहते हैं। शिष्यों! विशिष्ट अतिथि गृह में इनके स्वागत और निवास की व्यवस्था की जाय। उस यज्ञशाला में काश्यप ने नागराज तक्षक पाल रखा था। उसे मानव गन्ध से चिढ़ थी। जिसने भी उस कक्ष में रात्रि-विश्राम किया, प्रात: सर्पदंश से मृत मिलता। अन्य अतिथि कोमल शय्या, सत्कार पाकर निद्रा-लाभ लेने लगते किन्तु भगवान बुद्ध महात्मा ठहरे। वे भजन में बैठे रहे। उनमें कोई संकल्प-विकल्प न था, ध्यानस्थ हो गये। तक्षक आया, उनके शरीर पर दो बार चढ़ा और उतरा। बुद्ध के शरीर पर उसे भी शान्ति मिली। अन्तत: वह भिक्षा पात्र में कुण्डली मारकर बैठ गया।
प्रात: काश्यप ने यह कहते हुए अतिथि गृह का द्वार खोला कि बहुत ज्ञान बता रहा था, मूक पशुओं को काटने से मन के अन्तराल में संस्कारों की श्रृंखला कैसे शान्त होगी? फेंक दो इस मुर्दे को! किन्तु द्वार खोलने पर उसने देखा, भगवान बुद्ध शान्त बैठे थे। प्रकाश कक्ष के भीतर आया। वह आसन से उठे, भिक्षा पात्र उठाया, सर्प को बाहर झाड़ी में छोड़ दिया। काश्यप से उन्होंने कहा, ऐसा आचरण आप-जैसे कुलीन पुरुष को शोभा नहीं देता। किस कमी की पूर्ति के लिये इतना भयंकर कुकृत्य करने पर तुले हो? यह भजन का कोई तरीका नहीं है। जिससे संस्कारों का शमन होता है, भजन की वह विधि मैं बताऊँगा। अपने पाँच सौ शिष्यों के साथ काश्यप बुद्ध के अनुयायी हो गये और महाकाश्यप के रूप में प्रसिद्ध हुए।
एक आर्यत्व को प्राप्त करने के लिये भगवान बुद्ध ने चार आर्यसत्य बताया जिसमें प्रथम आर्यसत्य दु:ख है। जन्म दु:ख है, मृत्यु दु:ख है, व्याधि दु:ख है, जरा दु:ख है। भगवान बुद्ध गीता ही तो पढ़ रहे हैं- ‘जन्ममृत्युजराव्याधि दु:ख दोषानुदर्शनम्।’ (गीता, १३/८) अर्थात् जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि- इनमें दु:ख और दोषों का अनुभव करें। इन्हें अनित्य समझकर चिन्तन में लगें। दु:ख का कारण है अज्ञान और कल्पनाएँ। दु:ख का निवारण है- जब पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर ले। गीता भी यही कहती है कि कर्म किये बिना कोई पाया नहीं; किन्तु कर्मों के परिणाम में जिसकी आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है, उस महापुरुष के लिये किञ्चित् भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं है; वह सदा रहनेवाला जीवन और शान्ति प्राप्त कर लेता है। भगवान बुद्ध गीता का भाषानुवाद ही तो कर रहे हैं।
चौथे आर्य सत्य के रूप में भगवान बुद्ध ने निवारण विधि अष्टांग मार्ग बताया जिसके अन्तर्गत हैं- सम्यक् दृष्टि (जो समत्व प्रदान करे वह दृष्टि, अन्य दृष्टि न आये), सम्यक् संकल्प (विचार भी उठे तो वही विचार), सम्यक् स्मृति (हर समय याद बनी रहे कि चिन्तन में कितना रुकना चाहिए और कितना लग पा रहा हूँ), सम्यक् जीविका अर्थात् उचित खान-पान, सम्यक् व्यायाम-परिश्रम, युक्ताहार-विहार; सम्यक् कर्म (समत्व दिलाने वाला कर्म); सम्यक् समाधि- स्थिति प्रदान कर दे; इस प्रकार भगवान बुद्ध ने पाली भाषा में गीतोक्त ‘युक्ताहारविहार’ को ही समझाया है।
भगवान ने सदैव श्वसन क्रिया पर दृष्टि रखने अर्थात् श्वास द्वारा जप करने पर बल दिया है कि श्वास कब अन्दर आई, कितनी देर तक रूकी, कब लौटकर गयी? जब श्वास को देखने की क्षमता आ जाती है उस अवस्था में जिह्वा से ओम् शब्द जपने की आवश्यकता नहीं रह जाती। वह श्वास में ढला-ढलाया मिलता है।
बुद्ध के भी चिन्तन का नाम ओम् था। भारत से बाहर जितने भी बौद्ध देश हैं, सबके घरों पर आज भी ओम् लिखा मिलता है। चीन, सिंगापुर, मलाया, वियतनाम इत्यादि देशों में भाषा-भेद से कहीं आ ओ म, कहीं अ ऊ म, कहीं ओम् तो कहीं ॐ की वर्तनी अंकित है। वहाँ के बौद्ध नागरिक जहाँ भी ओम् लिखा हुआ देख लेते हैं अपनी चप्पल उतार देते हैं, जूते खोल देते हैं, वहाँ प्रणाम करके ही आगे बढ़ते हैं। भगवान बुद्ध ने स्थान-स्थान पर कहा- ‘एषो धम्म सनन्तनो।’– यही सनातन धर्म है। सनातन धर्म, गीतोक्त धर्म, हिन्दू-धर्म से इतर बुद्ध ने कुछ भी नहीं कहा।
भगवान बुद्ध का जब शरीर छूटा, महाकाश्यप ५०० भिक्षुओं के साथ बहुत दूर थे। उनकी प्रतीक्षा की गई। सातवें दिन जब वे आये तभी उनके अंत्येष्टि की क्रिया हुई। ५०० मीटर रेशमी वस्त्र में भगवान का पार्थिव शरीर आवेष्ठित कर चक्रवर्ती सम्राट की तरह उनका दाह-संस्कार हुआ। बुद्ध के महाप्रयाण के पश्चात् इन्हीं महाकाश्यप ने बौद्ध त्रिपिटकों का संकलन कराया। अस्तु, धर्म के नाम पर जो कुरीति प्रचलन में थी, भगवान बुद्ध ने उसका खण्डन किया, न कि जीव मारने को हिंसा कहा। वे योग-साधन या भक्ति के नाम पर उल्टा-सीधा कुछ कर रहे थे उससे काश्यप को विरत किया कि जीवों को काटने से मन के अन्तराल के संस्कार कैसे कटेंगे? न कि उसको उन्होंने अहिंसा कहा।
भगवान बुद्ध दयालु थे। अकारण जीवों को मरते नहीं देख सकते थे। कोई भी महात्मा नहीं देख सकता, अनुमोदन भी नहीं कर सकता- यह तो महात्माओं का सहज स्वभाव है। वह जैसा स्वयं है वैसा ही सबमें प्रभु का स्वरूप देखता है। हमने एक बार अपने गुरु महाराजजी से पूछा कि आपके दाँत इतनी कम आयु में खराब क्यों हो गये? उन्होंने बताया कि साधन-काल में उन्होंने दो वर्ष तक दातुन ही नहीं किया। वे सोचते थे कि जैसे रोम उखाड़ने से शरीर को कष्ट होता है उसी प्रकार वृक्ष भी सजीव हैं। टहनी तोड़ने से उन्हें भी कष्ट होगा। उन दिनों उन्हें सर्वत्र भगवान का ही रूप दिखायी पड़ता था। हमने पूछा- यह विश्वरूप दर्शन कैसा था? उन्होंने बताया- उन दिनों वही अवस्था थी, साधना का एक स्तर था। आज वह भी अज्ञान ही प्रतीत होता है। अत: दया सन्त का स्वभाव है। वह दयार्द्र तो होते ही हैं किन्तु जीवों पर दया अहिंसा नहीं है।
गौतम बुद्ध का चचेरा भाई देवदत्त भी उनका शिष्य था। एक बार उसने निवेदन किया कि भगवन्! आप जीव-वध पर कड़े प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाते? शास्ता ने कहा- वत्स! मैं कड़े प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता क्योंकि गरीब लोग अमीरों की तरह भोजन सामग्री की व्यवस्था नहीं कर पाते। कदाचित् मैं कड़े प्रतिबन्ध लगा दूँ तो गरीब लोग चिड़िया इत्यादि से जो जीवन-निर्वाह करते हैं, उसमें व्यवधान होगा। देवदत्त ने पूछा- भिक्षु क्या खायें? बुद्ध ने कहा, ‘‘गृहस्थ के घर में जो भी बना हो, उसी में से स्वल्प भिक्षुओं को भी दें। अलग से व्यवस्था करने पर यह भिक्षु गृहस्थों पर भारस्वरूप हो जायेंगे। उस समय भगवान बुद्ध के संरक्षण में दस हजार विरक्त भिक्षु थे। सबकी भिक्षाटन वृत्ति थी। किसी भी गाँव में दस हजार भिक्षु पहुँच जायँ तो भोजन की क्या व्यवस्था होगी? जिसके घर में जो बना है वही तो देगा। कहीं शाकाहार है तो कहीं मांसाहार भी हो सकता है। यदि बुद्ध का यही उपदेश होता कि मूक पशुओं को न काटें तो बिना काटे माँस की आपूर्ति कैसे होगी? भिक्षुओं को कैसे ज्ञात होता कि पशुओं को काटा गया था अथवा नहीं। इसलिए जो भोजन उन्हें मिलता, चारिका में वही ग्रहण करते थे।
भगवान बुद्ध ने नियम बना रखा था कि जो तुम्हें दो रोटी देते हों, उपदेश स्वरूप दो शब्द उन्हें अवश्य सुनाया जाय। इससे भिक्षु भोजन ऋण से मुक्त हो जायेंगे तथा देने वाले धर्म का सन्मार्ग प्राप्त कर लेंगे। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का यह भी एक प्रधान कारण था।
देवदत्त ईर्ष्यालु प्रकृति का था। वह सोचता था कि भैया का इतना नाम है, सम्मान है, मेरा नहीं हो पा रहा है। इनकी मृत्यु हो जाने पर मेरा सम्मान बढ़ जाता। भाई होने के कारण मैं ही उनका उत्तराधिकारी होता। उसने बुद्ध के एक शिष्य से बौद्ध संघ को निमन्त्रण दिलवाया, भोजन के लिए ‘शूकरमद्दव’ तैयार कराया, चुपके से उसमें जहर भी मिला दिया। भिक्षुओं को वह भोजन परसा गया। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा- यह भोजन कोई भिक्षु नहीं खायेगा। यह पिण्ड केवल तथागत के लिये है। तथागत के अतिरिक्त देवता, दानव या मानव, कोई भी इस आहार को पचा नहीं सकता। सभी भिक्षु गड्ढा खोदकर यह भोजन पृथ्वी में गाड़ दें, आज उपवास करें। सभी ने वैसा ही किया। केवल बुद्ध ने भोजन किया। कुत्तों को भोजन की गंध लगी। उन्होंने पंजों से कुरेद कर गड़ा भोजन खींचा और खा गये। कुछ कुत्ते मरने लगे। लोगों की समझ में आया कि भिक्षान्न में तो जहर मिला हुआ है।
भगवान बुद्ध ने सबको सांत्वना दी- इस भक्त की यही इच्छा थी। वैसे भी पृथ्वी पर इस शरीर का समय पूरा हो चुका है, हमें जाना ही होगा। यह सुनकर आनन्द नामक शिष्य, जो बुद्ध का कमण्डलु लेकर चलता था, श्रुतिधर था, एकान्त में जाकर रोने लगा। शिष्यों ने बताया कि आनन्द रो रहा है। भगवान ने कहा- आनन्द से कहो, शास्ता बुला रहे हैं। भिक्षुओं! आनन्द दर्शनीय है। वह एक प्रश्न को पाँच मिनट में पूरा कर देता है, श्रोताओं का समाधान हो जाता है। उसी प्रश्न को वह एक घण्टा भी बता सकता है और सुनने वालों की उत्कण्ठा कम नहीं होती। वे चाहते हैं कि आनन्द और भी कुछ कहे। आनन्द मेधावी है। उससे कहो कि शास्ता बुला रहे हैं।
आनन्द आये। सान्त्वना देते हुए शास्ता ने कहा- शरीर का समय तो पूरा हो गया किन्तु तुम लोग चाहो तो मैं इस शरीर को तीन महीने और रख सकता हूँ। शिष्यों ने कहा- तीन महीने ही रखिये। उसके पश्चात् तीन माह तक ही गौतम बुद्ध ने शरीर धारण रखा। ऐसी दशा में भी बुद्ध का विचरण चलता रहा। उन्हें आदेश था कि संसार में जो अल्प मलवाले हैं, उनका मार्गदर्शन करो। विचरण के ही क्रम में बुद्ध एक वृक्ष के नीचे लेट गये। आनन्द ने वहाँ एक झोपड़ी बना दी। इतने में भागता हुआ एक आदमी आया, बोला- भाई! तथागत का दर्शन करना है। आनन्द ने कहा- अब कोई दर्शन नहीं कर सकता। वे अस्वस्थ हैं। बुद्ध ने भीतर से कहा- वत्स! मैं इसी की प्रतीक्षा कर रहा था, प्राणों को रोके पड़ा था। इसको आने दो! बुद्ध ने उसे अन्तिम उपदेश दिया। बुद्ध जिस हाथ को तकिया की तरह लगाकर लेटे थे, लेटे ही रह गये। यह भी एक विचित्र संयोग ही था। उनका जन्म एक वृक्ष के नीचे हुआ था, पूर्णत्व की प्राप्ति पीपल के वृक्ष के नीचे और उनका महापरिनिर्वाण भी एक वृक्ष के नीचे ही हुआ।
एक बार राजा विम्बिसार का मंत्री भगवान बुद्ध के पास आकर बोला- राजा ने पूछा है कि लिच्छिवियों पर आक्रमण करना चाहता हूँ। भगवान की क्या आज्ञा है? भगवान बुद्ध ने आनन्द से पूछा, ‘‘क्यों आनन्द! हमलोग कल ही तो लिच्छिवि गणराज्य से आये हैं?’’ आनन्द ने कहा, ‘‘हाँ, भगवन्!’’ ‘‘उनमें एकता है?’’ आनन्द बोले, ‘‘हाँ प्रभु!’’ ‘‘वे बड़ों का आदर करते हैं? उनसे परामर्श लेते हैं?’’ आनन्द ने कहा, ‘‘हाँ, भगवन्!’’ ‘‘वे निरन्तर शस्त्र अभ्यास करते और सीमा पर चौकसी रखते हैं?’’ आनन्द ने सहमति दी। अन्त में बुद्ध ने कहा, ‘‘मंत्रिप्रवर! जो इतने सजग हैं, उन पर हमला तो किया जा सकता है, किन्तु उन पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती।’’ विम्बिसार ने आक्रमण किया किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। वहाँ से आम्रपाली नामक नगरवधू के साथ विम्बिसार लौटे जिससे जीवक जैसा पुत्र उत्पन्न हुआ जो विख्यात वैद्य हुआ। इस प्रकरण में भगवान बुद्ध को परामर्श देना चाहिए था कि युद्ध एक हिंसा है, जीवों की हत्या मत करो, पाप लगेगा। सिद्ध है कि बाहरी जीव-हत्या से अहिंसा का कोई सम्बन्ध नहीं है।
विम्बिसार की ही तरह कोशलराज प्रसेनजित की मृत्यु भी धार्मिक भावना के प्रवाह में हुई। बालसखा एवं सेनापति बंधुल की हत्या का प्रायश्चित करने प्रसेनजित भगवान बुद्ध के दर्शनों को आया। प्रसेनजित ने आश्रम में प्रवेश किया। उसके नये सेनापति दीर्घ कारायण ने प्रसेनजित के पुत्र विडूडभ को राजा घोषित कर रथ और सेना सहित राजधानी लौट गया। विहार से निकलने पर राजा को सेनापति के दुरभिसन्धि का ज्ञान हुआ। उन्हें दण्ड देने के लिए वह विम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु की सहायता लेने चल पड़ा। राजगृह पहुँचने में उसे पर्याप्त रात्रि हो गयी। वह सीमा द्वार की धर्मशाला में ही रुक गया जहाँ उसी रात्रि में प्रसेनजित की मृत्यु हो गयी। सूचना मिलने पर भगवान बुद्ध ने कहा- जो राजा समय पर शान्ति और समय पर क्रोध करना नहीं जानता, वह शासन नहीं कर पाता। क्रोध भी अनिवार्य है। बुद्ध को तो कहना चाहिए था ‘अहिंसा परमो धर्म:’– शान्ति बनाये रखो; किन्तु बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं कहा।
वरिष्ठ भिक्षु, चिन्तन में जिनकी अच्छी गति थी, धारणा-ध्यान-समाधि जिनके स्वभाव में ढल गया था, उन्हें वे ब्राह्मण कहते थे। एक ब्राह्मणवंशीय व्यक्ति भगवान बुद्ध के पास पहुँचा। उसने कहा, ‘‘भन्ते! मैंने उच्च कुल में जन्म लिया है, वेद-शास्त्रादि का अध्ययन भी कर लिया है, मंत्रोक्त विधि से पूजा-पाठ भी कर सकता हूँ। क्या आप मुझे ब्राह्मण नहीं कहेंगे?’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘वत्स! मैं ब्राह्मण उन्हें कहता हूँ जो सचमुच जितेन्द्रिय हैं, जिनकी जानकारी वास्तविक है, जो सदैव सचेतावस्था में रहते हैं कि चिन्तन में कितना लगना चाहिए और कितना लग पाता हूँ, ध्यान-धारणा-समाधि जिनके स्वभाव में हो।’’ धम्मपद के ‘ब्राह्मण वग्गो’ श्लोक ३९० में उन्होंने बताया कि ब्राह्मण के लिये यह कम कल्याणकारी नहीं है जो वह प्रिय पदार्थों से अपना मन हटा लेता है। जैसे-जैसे मन हिंसा से मुड़ता है, वैसे-वैसे दु:ख अवश्य शान्त होने लगता है। अर्थात् सांसारिक पदार्थों की आसक्ति हिंसा है और देखे-सुने उन्हीं पदार्थों में अनासक्ति अहिंसा है।
धम्मपद के ही ‘पकिण्णक वग्गो’ अर्थात् प्रकीर्ण खण्ड में भगवान ने बताया कि जिन्हें दिन-रात बुद्धानुस्मृति, नित्य धर्मानुस्मृति, नित्य संघानुस्मृति, कायगता स्मृति, नित्य भावना स्मृति और नित्य अहिंसा स्मृति रहती है, गौतम बुद्ध के वे शिष्य सदा स्मृति के साथ सोते और जागते हैं। सृष्टि अनित्य है, नश्वर है; नित्य है केवल आत्मा। जो भी भिक्षु साधना में प्रवृत्त हैं, उन्हें अहर्निशि स्मृति बनी रहे कि हम बुद्ध की शरण हैं, भगवान सद्गुरु की शरण में हैं। ऐसा न हो कि चार दिनों पश्चात् गुरु महाराज को ही भूल गये; क्योंकि परमात्मा यदि परमधाम है तो सद्गुरु ही प्रवेश द्वार हैं। उन्हीं से भजन की जागृति है, वही साधक के पतरक्षक, मार्गदर्शक, संरक्षक हैं। उन्हें भूलने पर साधक भटक जायगा। इसलिये नित्य बुद्धानुस्मृति आवश्यक है। उस साधना को धारण करना है जो निज स्वरूप आत्मपथ की ओर ले जाय। यही है धर्मानुस्मृति। इसी तरह संघानुस्मृति रहनी चाहिए कि मैं उस गुरु-परम्परा का हूँ। कायगता स्मृति बनी रहे कि बाहर दुनिया में वस्तुओं के आकर्षण में न पड़ें। वस्तु जब भी मिलेगी हृदय-देश में मिलेगी। अत: स्वाँस में अथवा चरणों के ध्यान में सुरत स्थिर रखना कायगता स्मृति है। भावना स्मृति अर्थात् भाव-श्रद्धा बनी रहे। बिना श्रद्धा के होमा हुआ हवन, दिया हुआ दान, किया हुआ कर्म, जपा हुआ जप और तपा हुआ तप सब व्यर्थ चला जाता है। इसी प्रकार नित्य अहिंसा स्मृति बनी रहे कि अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लूँ। वे अहर्निश चिन्तन में डूबे रहते हैं। उन विरक्त भिक्षुओं के हृदय में एक स्थिति है जिसका नाम अहिंसा है। मनोनिग्रह कर जो चिन्तनरत हो जाते हैं, उनके समक्ष अन्त:करण की एक अवस्था अहिंसा है। वाह्य जगत् की मार-काट तो आपस के बदले हैं, दैवी, आसुरी वृत्तियों की देन हैं जो समय पर आते ही रहते हैं। शास्त्र संतों की वस्तु है। असंयमी पुरुषों द्वारा बुद्धि-बल पर की गई उनकी व्याख्या भ्रान्तियों का सृजन करती है। ये भ्रान्तियाँ महापुरुषों के पीछे सभी समाजों में होती आयी हैं जिसका ज्वलन्त प्रमाण अहिंसा की सामाजिक अवधारणा है।
।। ॐ ।।
(‘अहिंसा का स्वरूप’ से उद्धृत)