धर्म के नाम पर हो रहे आतंकवाद, सामाजिक भेदभाव रोकने के लिए आपका क्या संदेश है?

प्रश्नधर्म के नाम पर हो रहे जेहाद, आतंकवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव व अलगाववाद रोकने के लिए आपका क्या संदेश है?

उत्तर :- इन सभी समस्याओं का समाधान गीता है इसलिए हमारा सन्देश भी गीता ही है। एक धर्मशास्त्र और साधना की एक प्रशस्त विधि पाते ही सभी एकता के स्नेह में बँध जायेंगे, फिर तो धर्म का साइन बोर्ड लगाकर कोई कभी नहीं लड़ेगा।

समाज में भाई-भाई के झगड़े होते आये हैं। एक पौराणिक कथानक है। दो असुर भाई थे। दोनों में अगाध प्रेम था। दोनों ने अत्यन्त उग्र तपस्या कर विधाता को प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने कहा, ‘वर माँगो।’ उन्होंने कहा, ‘हमें, अमर बना दें।’ ब्रह्मा ने कहा, ‘अमर तो मैं भी नहीं हूँ, इसके अतिरिक्त कुछ भी माँग लो।’ दोनों भाइयों ने परामर्श किया कि दादाजी अमरत्व देना नहीं चाहते। कुछ ऐसा माँग लें कि प्रकारान्तर से अमर ही हो जायँ। उन्होंने कहा, ‘हम दोनों भाई जब एक दूसरे को मारें तभी मरें।’ ब्रह्मा ने ‘तथास्तु’ कहा।

दोनों भाइयों ने स्वर्ग पर आक्रमण किया। इन्द्रासन पर दोनों ही बैठ गये। सर्वत्र उनकी विजय पताका फहराने लगी। जब मृत्यु का समय आया, एक सुन्दरी दोनों के मध्य आ गयी। दोनों आकर्षित हो गये। एक ने कहा, ‘इसने पहले मुझे देखा, इसलिए यह मेरी अंकशायिनी बनेगी। यह तुम्हारी भाभी है।’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, इसने मेरा वरण किया है, तुम्हारी अनुज वधू है। इसकी ओर कुदृष्टि से देखना भी पाप है।’ वे परस्पर इतना क्रोधित हो गये कि वरदान की शर्त भूल गये। आपस में लड़कर मर गये।

झगड़े सृष्टि में होते आये हैं। यह कलह धन-सम्पत्ति के लिए होते हैं, जीवनयापन के लिए झगड़े होते हैं। गौरव-गाथा को लेकर कहीं विवाद है, कहीं कीर्ति के लिए, कहीं क्षुद्र यश के लिए। कहीं जमीन के लिए, सुन्दर स्त्री के लिए झगड़े हैं। ये तो चलेंगे किन्तु धर्म का साइनबोर्ड लगाकर तभी तक लड़ रहे हैं जब तक अनभिज्ञ हैं। ईश्वर-पथ में कहीं भी अशान्ति या आतंक का कोई स्थान नहीं है। यह धर्मशास्त्र न समझने का दुष्परिणाम है। यह विभीषिका शान्त हो जायेगी, यदि एक धर्मशास्त्र गीता जन-जन तक विधिवत् सम्प्रेषित कर दी जाय। अपने बुद्धि के बल पर गीता में कुछ जोड़े-घटाये नहीं, न एक शब्द बढ़ायें न घटायें, ज्यों का त्यों दे दें। गीता में मात्र सात सौ श्लोक सुबोध संस्कृत में हैं उनका मनन करें और उसकी व्याख्या के रूप में धर्म क्या है? कर्म क्या है? वर्ण क्या है? यज्ञ क्या है? इसे आचरण में कैसे ढालें, पालन कैसे करें? इन प्रकरणों को विधिवत् समझने के लिए आपको गीता की व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ की चार आवृत्ति करनी पड़ेगी। तत्पश्चात् जिसकी जहाँ अभिरुचि हो, वहाँ देखे। फिर तो आप गीता के और गीता आपकी हो जायेगी। मानव मात्र के कल्याण के लिए गीता-अनुशीलन से बढ़कर अन्य कोई मार्ग ही नहीं है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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