प्रश्न – कुछ धर्मावलम्बियों का कथन है कि जितना उनके धर्मग्रन्थ में लिखा है, उतना ही सत्य है। अब दुबारा ऐसा महापुरुष हो नहीं सकता। किसी महापुरुष के अनुयायी कहते हैं कि बिना उस महापुरुष पर विश्वास किये स्वर्ग नहीं मिल सकता। महापुरुष के पीछे ही मानव–समाज सम्प्रदायों में विभाजित है। क्या उन्होंने कई धर्म बताये? धर्म के नाम पर मत–मतान्तर एवं तरह–तरह की पूजा–पद्धतियाँ कहाँ से आयीं?
उत्तर :- परमात्मा यदि परमधाम है तो सद्गुरु भजन की जागृति है। जागृति से पूर्तिपर्यन्त आत्मा को रथी बनाकर (चलाने की ड्यूटी भी) चलाने का दायित्व भी सद्गुरु के द्वारा ही है। उनके संरक्षण में चलकर साधक मूल का स्पर्श कर लेता है। प्राप्ति के साथ ही गुरु का गुरुत्व मिल जाता है। वह गुरुत्व जितना गुरु महाराज में पूर्ण है उतना ही शिष्य में भी पूर्ण है, ऐसी दशा में प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्त नहीं रह जाती जिसके लिये वह आहें भरे और न कोई विकार ही शेष रहा जिससे वह भयभीत हो। यहाँ गुरु शिष्य से पृथक् नहीं। कबीर कहते हैं- ‘घट में ही गुरु हमारा।’ किन्तु साधनकाल में सद्गुरु की शरण, उनका सान्निध्य अनिवार्य है इसीलिये प्रत्येक महापुरुष ने सद्गुरु में दृढ़ श्रद्धा की आवश्यकता पर बल दिया है।
किन्तु सद्गुरु भी एक प्रश्न है। क्रमशः गुरु घराने बनते गये। प्रत्येक घराने का गद्दीनशीं गुरु परम्परायें और रूढ़ियाँ जोड़ता गया, जिनसे मतभेदों का सृजन हुआ। पुरुष को चाहिए कि सीधा एक परमात्मा में दृढ़ संकल्प हो और जो उस एक परमात्मा को सम्बोधित करता हो, ऐसे किसी दो-ढाई अक्षर के नाम का जप करे। आपका मूल धर्मशास्त्र गीता है, इसका भली प्रकार अध्ययन कर हृदय में ढालें। जहाँ चिन्तन किंचित् ऊपर उठा, हृदय का आवरण हटा, श्रद्धा से जहाँ डोर लगी, भगवान ही प्रेरणा करके उन सद्गुरु का परिचय दे देंगे।
पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता। (मानस, ७/४४/३)- जब तक पुण्य का पुंज वर्तमान में साथ नहीं देता, सद्गुरु नहीं मिलते। पुण्य उसे कहते हैं जो आपको पूर्ण कर दे, तत्त्व की ओर ले चले। जो पतन की ओर ले चले उसे पाप-कर्म कहते हैं। गीतोक्त नियत कर्म का एक नाम पुण्य-कर्म है-
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।। ७/२८
अर्जुन! मैं राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से ढँका हुआ सबके समक्ष विदित नहीं होता; किन्तु जिन पुण्य-कर्म करनेवाले, सतत् मुझे जपनेवाले, व्रत में दृढ़ रहकर भजनेवाले भक्तों के पाप नष्ट हो गये हैं, जिनका मोह से उत्पन्न आवरण नष्ट हो गया है, वे सम्पूर्ण ब्रह्म को जानते हैं, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं, सम्पूर्ण अध्यात्म को जानते हैं, अधियज्ञ सहित मुझे जानते हैं और मुझे जानकर मुझमें समाहित हो जाते हैं, इसके पश्चात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता। वे सदा रहनेवाला जीवन तथा सदा रहनेवाली शांति प्राप्त कर लेते हैं।
सद्गुरुओं की गद्दी से शिक्षा मिलती है। कहीं प्रवेशिका की शिक्षा है, तो कहीं माध्यमिक की। कुछ न कुछ अंतर से सभी शिक्षा देते हैं; किन्तु परस्पर विरोधी शिक्षा तब मिलने लगती है जब-
पूरा सद्गुरु ना मिला, मिली न साँची सीख।
भेष यति का बनाय के, घर घर माँगे भीख।।
आपका प्रश्न है कि धर्म के स्थान पर मत-मतान्तरों की बाढ़, तरह-तरह की पूजा-पद्धतियाँ कहाँ से आयीं? इसका कारण जन-समाज का एक धर्मशास्त्र से अनभिज्ञता या धर्मशास्त्र विस्मृत होने से ये विकृतियाँ आयीं। दूसरा कारण भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं, ‘‘अर्जुन! आत्मदर्शन की नियत विधि इस निष्काम कर्मयोग में निश्चयात्मक क्रिया एक है।’’ तो जो लोग बहुत-सी क्रियायें बताते हैं, क्या वे भजन नहीं करते? भगवान कहते हैं, ‘‘अर्जुन! अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओं वाली होती है इसलिए वे अनन्त क्रियाओं की संरचना कर डालते हैं। ‘स्वर्गापराः’- स्वर्ग ही श्रेष्ठ है, इसके आगे कुछ नहीं है, यहीं तक उनकी दृष्टि होती है। वे दिखाऊ शोभायुक्त वाणी में उन अनन्त क्रियाओं को व्यक्त भी करते हैं। शीर्षक तो सनातन शाश्वत का है, उसकी ओट में वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में नश्वर का उपदेश करते हैं। उनके वाणी की छाप जिन-जिन के हृदय पर पड़ती है उनकी बुद्धि भी नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। वे जन्म-मृत्युरूपी अनन्त फल भोगने में प्रवृत्त रहते हैं, अनन्त योनियों में भटकते ही रहते हैं।
अतः ईश्वर-पथ की साधना एक ही है। पहले मनसहित इन्द्रियाँ विषयोन्मुखी प्रवाहित थीं, अब इष्टोन्मुखी प्रवाहित हो जाती हैं। संयम जैसे-जैसे सधता जाता है, साधना का स्तर उठता जाता है। संयम का स्तर ऊँचा-नीचा हो सकता है किन्तु दूसरी-तीसरी कोई क्रिया नहीं हो सकती।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *