सीता-परित्याग

सीतापरित्याग

महारानी सीता के परित्याग का लांछन भी भगवान श्रीराम पर आरोपित किया जाता है किन्तु वस्तुतः वह राम के राजनीतिक रंचमंच का एक परिदृश्य मात्र था। इसे हृदयंगम करने के लिए राजनीति विशारद रावण के जीवन की एक झाँकी प्रस्तुत है। युद्ध में आहत रावण की ओर संकेत कर भगवान राम ने कहा- लक्ष्मण! रावण महान राजनीतिज्ञ है, उससे तुम राजनीति की शिक्षा ग्रहण करो। लक्ष्मण ने कहा- भैया! रावण और राजनीतिज्ञ! एक नारी के व्यामोह में पड़कर उसने अपने वंश का मूलोच्छेद करा डाला, स्वर्णिम लंका को धूल में मिला दिया। यदि उसे राजनीति का कुछ भी भान होता तो इस सर्वनाश से बचने-बचाने का उपक्रम किया होता- अरध तजहिं बुध सरबस जाता। (मानस, 2/255/2)

राम ने कहा- नहीं लक्ष्मण! ऐसी बात नहीं है। तुम उसके पास जाओ। लक्ष्मण गये, रावण के सिर की ओर खड़े होकर बोले- महान सम्राट! मैं राम का अनुज लक्ष्मण आपसे राजनीति की शिक्षा लेना चाहता हूँ। रावण ने आँख ही नहीं खोली। लक्ष्मण लौट आये, बोले- भैया! अब वह अगले जन्म में ही कहीं बोल सकेगा। उसके मुँह में मक्खियाँ आ-जा रही हैं। उसे होश भी है कि राजनीति ही पढ़ायेगा। राम ने समझाया- नहीं लक्ष्मण! ऐसी बात नहीं है। तुम खड़े कहाँ थे? लक्ष्मण ने बताया- उसके शिर की ओर। राम ने कहा- शिक्षा लेने के लिए गुरु के श्रीचरणों में प्रणिपात करो, निवेदन करो। लक्ष्मण गये, सादर प्रणाम कर बोले- सम्राट! मैं राम का छोटा भाई लक्ष्मण आपसे राजनीति की शिक्षा लेने आया हूँ। इतना सुनते ही रावण एक झटके में उठा, लक्ष्मण का धनुष और तरकश छीन लिया। चकित लक्ष्मण कुछ कर पाते, इसके पूर्व ही रावण बाण का अनुसंधान कर, लक्ष्मण के गले का लक्ष्य लेकर, प्रत्यंचा खींचकर बोला- देख! राम का भाई है इसलिए जीवित छोड़ता हूँ। लक्ष्मण! राजनीति की पहली शिक्षा तो यह है कि शत्रु चाहे मरणासन्न हो अथवा मर ही क्यों न गया हो, उसके पास जाना है तो सदैव सावधान मुद्रा में जाओ। चमत्कृत लक्ष्मण ने व्यंग्य किया- उपदेश तो आप अच्छा कर लेते हैं किन्तु नीति का पालन आपसे नहीं हो सका। एक स्त्री के व्यामोह में अपने वंश का मूलोच्छेद करवा डाला।

रावण ने समाधान किया- नहीं लक्ष्मण! यह तुम्हारी भूल है। वंश की रक्षा के लिए ही मैंने विभीषण को राम की शरण में जाने को विवश कर दिया था। लक्ष्मण ने कहा- क्या लातों से मारकर भेजने का अच्छा तरीका था? रावण ने कहा- नहीं लक्ष्मण! यदि मैं प्रेम से भेजता तब यह रहस्य कुछ लोग जान जाते। मेरा अभीष्ट पूर्ण न होता। राजनीति का नियम है कि योजना किसी पर भी प्रकट न हो। वह न समझ में आये और उसके द्वारा जो सिद्ध होनेवाला कार्य है वह सामने दिखाई पड़े। इसीलिए मैंने विभीषण को प्रताड़ित कर निष्कासित किया। मैं उसे बन्दीगृह में भी तो डाल सकता था।

लक्ष्मण ने कहा- चलिये, मान भी लेते हैं कि वंश-सुरक्षा के लिए आपने अपनी योजनान्तर्गत ही भेजा था तो कल विभीषण पर मरणान्तक शक्ति का प्रहार क्यों किया? रावण ने कहा- लक्ष्मण! मुझे संदेह था कि राम मेरे वंश की रक्षा कर पायेंगे या नहीं, इसी की परीक्षा के लिए मैंने शक्ति का प्रहार किया। रामजी ने अपने वक्षस्थल पर उस शक्ति को झेल लिया। इससे मैं आश्वस्त हो गया कि अब मेरा वंश सुरक्षित है। लक्ष्मण! मेरे द्वारा पहले किये गये युद्ध तथा शक्ति-प्रहार के पश्चात् किये गये युद्ध-कौशल में अन्तर तो तुमने देखा होगा। लक्ष्मण ने कहा- हाँ राजन्! शक्ति-प्रहार के पश्चात् का संग्राम देखकर संदेह होने लगा था कि कदाचित् आप मरेंगे ही नहीं। रावण ने कहा- उसका यही कारण था कि मेरा वंश सुरक्षित हो गया था। इसीलिए जितने भी दिव्यास्त्र मैंने छिपा रखे थे, वह सब उलेड़ दिया। मैं जानता था कि रामजी का तो कुछ बिगड़नेवाला नहीं है। व्यर्थ ही इतने अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह क्या होगा? लोग देख तो लें कि रावण कितना पराक्रमी है, दिव्यास्त्रों का ज्ञाता है। राम से युद्ध का निर्णय तो मैंने शूर्पणखा की सूचना से ही कर लिया था-

खर दूषन मोहिं सम बलवन्ता।

तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।

सुर रंजन भंजन महि भारा।

जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।

तौ मैं जाइ बयरु हठि करऊँ।

प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।

(मानस, 3/22/2-4)

सुर, नर, असुर अथवा नागों में ऐसा कोई नहीं है जो मेरे सेवक से भी विरोध करने का साहस कर सके। फिर खर-दूषण तो मेरे समान ही बलवान थे। भगवान के अतिरिक्त उनका वध करने में कौन समर्थ है? देवताओं को आनन्द देनेवाले प्रभु ने ही यदि अवतार ले लिया है तो मैं हठपूर्वक उनसे बैर करूँगा और उन्हीं के बाणों से प्राणों का त्यागकर भवसागर से पार हो जाऊँगा। शाश्वत धाम पाने का अन्य साधन भजन है किन्तु भजन तो हमलोगों से होगा नहीं- होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा।।(मानस, 3/22/5) कार्य की गोपनीयता के लिए ही मैं अकेला मारीच के यहाँ गया। मारीच ने भी कहा कि वह भगवान हैं। इससे भी मेरे निश्चय को बल मिला, किन्तु मैंने अपना मनोभाव गुप्त ही रखा। उससे कहा, चलता है कि निकालूँ तलवार! हरण के समय सीता ने भी सावधान किया था-

जिमि हरिबुधहि छुद्र सस चाहा।

भएसि काल बस निसिचर नाहा।।

(मानस, 3/27/15)

एक छुद्र खरगोश सिंहनी की कामना करे; असुरेश! तुम्हारी भी कामना ऐसी ही है। लगता है तुम्हारी मौत आ गयी है। अभी मार डालेंगे भगवान। सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।। (मानस, 3/27/16)- यह वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया किन्तु मन में आनन्दित हो रहा था कि सीता भी मेरे निर्णय को पुष्ट कर रही हैं भगवान हैं। रावण को सबने समझाया; विभीषण ने कहा, कुम्भकर्ण ने कहा, माता कैकसी ने कहा, मंत्री माल्यवान ने कहा भगवान हैं। जब-जब किसी ने कहा ‘ये भगवान हैं’, रावण आगबबूला होने का सफल अभिनय करता था मानो वह उन्हें भगवान मानता ही नहीं।

लक्ष्मण! लंका के सभी निवासी मेरा अनुसरण करते थे। हमने पाप किया और सबसे कराया। मैंने सोचा- क्यों न प्रभु के धाम का मार्ग सबको सुलभ करा दूँ। इसलिए पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि सभी को मैंने राम के बाणों के समक्ष धकेल दिया। मैं ज्योतिष का भी आचार्य हूँ। मुझे ज्ञात था कि आयु के कितने दिन शेष हैं। जाना तो पड़ेगा ही। स्वर्णिम लंका कब तक हमारी रहेगी। इसको तो छूटना ही था। प्रश्न था कि भगवान के धाम जाऊँ या नरक? धाम के लिए हमने मार्ग प्रशस्त कर लिया। लक्ष्मण! तुम धाम आओगे तो वहाँ मैं तुमसे मिलूँगा। यह राजनीति थी लक्ष्मण। न हमने विभीषण का अपमान किया है न माताजी का अपहरण, हमें तो अपने लक्ष्य की सिद्धि करनी थी।

लक्ष्मण ने लौटकर यह वृत्तांत श्रीराम को सुनाया- भैया! वह तो महान् राजनीतिज्ञ निकला। उसने तो माता सीता का हरण किया ही नहीं। उसने तो अपना लक्ष्य पूर्ण कर लिया। भगवान इस रहस्य को जानते थे। उन्हें संदेहयुक्त अपने ऐसे सेवक का भी उद्धार करना ही था।

बाल्यकाल में गुरु वशिष्ठ ने राम को अस्त्र-शस्त्रों का अभ्यास कराया। महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये। महर्षि अगस्त्य ने उन्हें उन अस्त्रों को दिया जिससे रावण का वध हुआ था। सरभंगजी ने भी उन्हें तलवार प्रदान किया था किन्तु इन सबसे उन्नत स्तर के शस्त्रास्त्र महर्षि बाल्मीकि की संरक्षा में थे। वे महापुरुष किसी सत्पात्र को उन्हें सौंपना भी चाहते थे, कब तक उन दिव्यास्त्रों की सुरक्षा करते। राम इस रहस्य को जानते थे इसीलिए लंका-विजय के उपरान्त अयोध्या आने पर उन्होंने इन दिव्यास्त्रों को पाने की एक योजना बना ली।

राम ने सीता से कहा- सीते! कोई इच्छा हो तो बताओ। सीता ने एक बार पुनः वन देखने की लालसा व्यक्त की। वह शान्ति व सुख जो तपोधन महात्माओं के दर्शन और प्रवचनों में था, फुदकते हुए मृगशावकों एवं चिन्तनशील देवियों में था, वह राजप्रासादों में कहाँ। राम ने आश्वासन दिया कि वहाँ चलने की तैयारी करें।

प्रजाजनों का समाचार ज्ञात करने के लिए राम के राज्य में गुप्तचर नियुक्त थे। राम ने उनसे प्रजाजनों का सुख-दुःख ज्ञात किया, अपने शासन-प्रबन्ध की जिज्ञासा की। गुप्तचर बोले- सर्वत्र आपकी प्रशंसा हो रही है। लाखों वर्षों की अव्यवस्था को आपने सुशासन में परिवर्तित कर दिया है। संसार में सुख-शान्ति की लहर आ गयी है। राम ने जानना चाहा कि उनके विरोध में भी कहीं कुछ है तो बताया जाय। गुप्तचर ने बताया- एक रजक कह रहा था कि यद्यपि महारानी सीता महासती हैं, अग्नि-परीक्षा में भी उत्तीर्ण हैं फिर भी सिंहासन पर विराजने योग्य नहीं हैं क्योंकि उन्होंने रावण की लंका में निवास किया है। महाराज रघु को कई रानियाँ थी, चक्रवर्ती सम्राट दशरथ की भी कई रानियाँ थीं। सिंहासन की शोभा बढ़ाने के लिए रामजी को एक विवाह और कर लेना चाहिए।

रामजी ने किंचित् उदास होने का अभिनय किया। लक्ष्मण को उन्होंने आदेश दिया कि वह सीता को जंगल में छोड़ आयें। लक्ष्मण ने प्रतिवाद किया कि अग्नि-परीक्षिता जगज्जननी सीता का चरित्र निष्कलंक है। उन्हें जंगल में छोड़ आना मुझसे न होगा। राम ने कहा- यह राजाज्ञा है। आज्ञाकारी लक्ष्मण गंगा के किनारे सीता को रथ से उतार कर रोने लगे। सीता ने कहा- लक्ष्मण! भाई का वियोग सहन नहीं कर पा रहे हो, ऋषियों का दर्शन-पूजन कर हम दो-चार दिनों में लौट चलेंगे; किन्तु लक्ष्मण ने उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया। परित्यक्ता सीता ने बहुत विलाप किया। लक्ष्मण लौट गये। करुण-क्रंदन करती, नदी में प्राण देने को उद्यत सीता को महर्षि बाल्मीकि ने आश्रय दिया। उन्हें अपनी कुटिया में ले आये। आश्रम में अन्य देवियाँ भी थीं। उन सबकी देखरेख में सीता रहने लगीं। बाल्मीकि विचार में पड़ गये कि रामायण में अभी और क्या लिखना शेष है? सीता को पुनः वन भेजने में राम का उद्देश्य क्या है? वह इस गुत्थी को सुलझाने में लगे थे तब तक सूचना मिली कि सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया है। ऋषि प्रसन्न हो उठे। उन्होंने बच्चों का नामकरण लव और कुश के रूप में किया और कहा कि अब देख लूँगा लंका की विजयवाहिनी सेना को, देख लूँगा अवध की चतुरंगिणी सेना को। वे लगे लड़कों को पढ़ाने।

बच्चों को शस्त्राभ्यास करते ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये थे। इसी समय भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बाल्मीकि-आश्रम के समीप आया। बच्चों ने कहा- इस अश्व के गले में संदेश लिखा है। पढ़ने से उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अश्व को जो पकड़ेगा या बाँधेगा, उसे युद्ध करना पड़ेगा। लव और कुश बहुत प्रसन्न हुए। इतने दिनों तक हमने अभ्यास किया है, उसकी परीक्षा का अच्छा अवसर मिल गया।

शत्रुघ्न ने बच्चों को समझाया किन्तु बच्चे तो युद्ध के लिए तुले हुए थे। शत्रुघ्न युद्ध में मूर्छित हो गये। संदेश पाने पर भरत, सुग्रीव, विभीषण इत्यादि भी आ गये किन्तु वे लव और कुश को पराजित नहीं कर सके। लक्ष्मण अयोध्या से प्रस्थान कर रहे थे। राम ने कहा- कुछ सेना भी ले लो। लक्ष्मण ने कहा- दो बच्चों के लिए सेना लेकर जाना लक्ष्मण के पराक्रम का अपमान है। मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ। लक्ष्मण ने दिव्यास्त्रों का भण्डार उड़ेल दिया किन्तु उन बालकों ने उनके दिव्यास्त्र को कुण्ठित कर दिया। वह भी मूर्च्छित हो गये।

हनुमान ने भी युद्धक्षेत्र का दृश्य देखा। दोनों लड़कों की आकृति में उन्हें भगवान श्रीराम और माता सीता के दर्शन हुए। उन्होंने ध्यान में प्रभु से पूछा कि अप्रतिम तेजस्वी बालक कौन हैं? ध्यान में उन्हें प्रभु राम और सीता की गोद में खेलते हुए दोनों बच्चे दिखाई पड़े। हनुमान मुस्कराने लगे। बच्चों ने हनुमान से उनका परिचय पूछा। हनुमान ने उन्हें अपना नाम बताया। बालकों ने कहा- गुरुजी हमें रामकथा सुनाते हैं। उसमें आपका चरित्र हमलोगों को बहुत प्यारा लगता है; किन्तु यहाँ रावण, कुम्भकरण और मेघनाद से युद्ध नहीं है; लव, कुश से मुकाबला है। उठाइये अपनी गदा! हनुमान मुस्कराने लगे।

कुश ने लव से कहा- भैया! यह बन्दर शरारती लगता है, इसे बाँध दें। बच्चों ने उन्हें लताओं से बाँध दिया। बिना किसी विरोध के हनुमान बैठ गये। बच्चों ने मूँगफली, कन्दमूल फल लाकर रख दिया, बोले- भोग लगाइए। कोई हरकत मत करना। हनुमान ने कहा- निश्चिन्त रहो! थोड़ी मूँगफली और लाओ।

इतने में राम आ गये। उन्होंने कहा- हनुमान! कैसे दुबककर बैठे हो? हनुमान बोले- प्रभु! आज आपकी सहायता नहीं कर सकूँगा। मैं इनका बन्दी जो हूँ। क्यों बच्चो! कुछ कन्दमूल और ले आओ।

राम ने कहा- बच्चो! तुम्हें देखकर हमें दया लग रही है। चाहो तो यह रथ ले लो और उस घोड़े को छोड़ दो। लव ने कहा- कहाँ गया वह रामबाण! लव और कुश से मुकाबला है। उठाइये अपना रामबाण! कोई रास्ता नहीं रह गया। राम ने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई; तब तक महर्षि बाल्मीकि वहाँ आ पहुँचे, बोले- राम! बच्चों से मचलना आपको शोभा नहीं देता। माना कि राजहठ होता है किन्तु यदि उससे बालहठ टकराये तो राजहठ को पीछे हट जाना चाहिए।

राम ने कहा- आपकी आज्ञा शिरोधार्य है ऋषिप्रवर! किन्तु ये बालक उत्साहित प्रतीत होते हैं। हमें यज्ञ का अश्व दिला दें अन्यथा न यज्ञ पूर्ण हो सकेगा और न राम का यश ही रह पायेगा। महर्षि के कहने पर बालकों ने अश्व को मुक्त कर दिया। उन्होंने पूछा- यह अश्व तुमने क्यों निरुद्ध किया? कुश ने कहा- गुरुदेव! भैया लव को एक प्रश्न रामजी से पूछना था। हमने सोचा, त्रैलोक्य विजयी सम्राट से कैसे भेंट होगी? वहाँ हमें कौन जाने देगा? हमलोगों ने विचार किया कि अश्व बाँध लें। वे छुड़ाने आयेंगे तो उनसे पूछ लेंगे।

राम ने कहा- पूछो! लव ने कहा- जिस सीता ने स्वर्णिम लंका को तिनके के समान समझा, चक्रवर्ती सम्राट के राजसी ऐश्वर्य को तिलांजलि दे कंटकाकीर्ण पथ पर नंगे पाँव छाया की तरह आपकी अनुगामिनी रही, अग्नि-परीक्षिता सीता का परित्याग मात्र एक धोबी की छींटाकशी करने पर आपने कैसे किया? उनका अपराध क्या था?

राम ने समझाया- बच्चो! वह थी राजनीति। राजनीति के सूत्र अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं जिन्हें बड़े होने पर तुम समझोगे। सीता-परित्याग के माध्यम से उन्होंने महर्षि के दिव्यास्त्रों को प्राप्त कर लिया। चक्रवर्ती सम्राट उन शस्त्रों की भिक्षा तो माँग नहीं सकता था। वे दिव्यास्त्र ऋषि के लिए भारस्वरूप हो चुके थे। अकारण भजन छोड़कर उधर ही ध्यान दिया करते थे कि कोई उनका दुरुपयोग न कर ले। वे सारे दिव्यास्त्र उन्हें मिल गये। बच्चों के पालन-पोषण के लिए माँ से श्रेष्ठ संरक्षिका विधाता की सृष्टि में कोई आज तक है ही नहीं। उन्होंने सोचा, सिंहासन की अपेक्षा वन में बच्चों की देखरेख करना सीता के लिए भी अधिक श्रेयस्कर है। देखरेख सीता से हो रही थी और विद्याध्ययन गुरुदेव से। यह थी राम की सूक्ष्म राजनीति। परित्याग तो उन्होंने किया ही नहीं।

इसी प्रकार श्रीकृष्णकालीन एक आख्यान है जिससे भगवान श्रीकृष्ण के राजनीतिक कौशल का परिचय मिलता है। श्रीकृष्ण द्वारा कंस-वध से खिन्न मगध नरेश जरासंध ने पूरब से और कालयवन ने पश्चिम दिशा से मथुरा पर आक्रमण कर दिया। नारदजी ने सूचना दी- कालयवन मथुरा नगरी में प्रविष्ट हो गया है। हलधर ने आवेश में कहा- अभी देखता हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा- नहीं दाऊ! नानाश्री जरासंध दल-बल सहित आ रहे हैं, आप उनका स्वागत करें। कालयवन को मैं देख लेता हूँ।

दाऊ ने श्रीकृष्ण को बताया कि उसे शिवजी का वरदान प्राप्त है कि आमने-सामने युद्ध में कोई उसे पराजित नहीं कर सकता है। श्रीकृष्ण ने कहा- दाऊ! आप निश्चिन्त रहें। वह सीधे कालयवन के समक्ष पहुँच गये। कालयवन ने पूछा- यह कौन है? सेवकों ने कहा- ये श्रीकृष्ण हैं। कालयवन ने कहा- जैसा नाम सुना था, वैसा ही पाया। साक्षात् काल कालयवन के समक्ष आने का तुमने सराहनीय साहस का परिचय दिया है। जाओ, सेना लेकर आओ।

राजन्! जरा-सी ही तो बात है। कालयवन श्रेष्ठ योद्धा है या श्रीकृष्ण?- मात्र इतने निर्णय के लिए इस सेना की अकारण हत्या क्यों कराते हैं? हमदोनों परस्पर मल्लयुद्ध करें तो कैसा रहेगा? कालयवन क्रोधान्ध होकर रथ से कूछ पड़ा; वह बोला- तू मुझसे युद्ध करेगा? चल खड़ा हो सामने!

श्रीकृष्ण ने कहा- ऊँहूँ! मैं जब आपका गला दबाऊँगा, आप घिघियायेंगे तो आपके सैनिक आपकी सहायता के लिए आ सकते हैं इसलिए थोड़ा एकान्त में चलते हैं। तू और मेरा गला दबायेगा! चल एकान्त में! आगे श्रीकृष्ण अपना पीताम्बर हिलाते चल रहे थे, कालयवन उनका पीछा करने गला। उसने कहा- दौड़ क्यों रहा है? श्रीकृष्ण ने कहा- प्रातःकाल का समय है, दौड़ने से शरीर में कुछ गर्मी आ जायेगी तो युद्ध का आनन्द बढ़ जायेगा। एक गुफा दिखाई पड़ी। श्रीकृष्ण उसमें प्रवेश कर गये। कालयवन बहुत प्रसन्न हुआ। अब कहाँ जायेगा? फँस गया। गुफा में राजर्षि मुचुकुन्द योगनिद्रा में तपस्या कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपना पीताम्बर उनके ऊपर डाल दिया और ओट में खड़े हो गये। उन्हें ढूँढ़ता हुआ कालयवन पीताम्बर देख भ्रमवश उन्हें श्रीकृष्ण समझ बैठा, उन्हें पैर की ठोकर मारकर बोला- उठ! साक्षात् काल को निमन्त्रण देकर पीताम्बर ओढ़कर सोया है। ऋषि को एक लात मारा। ऋषि की दृष्टि पड़ते ही कालयवन भस्म हो गया।

ऋषि ने सोचा- यहाँ क्या हुआ? कौन मर गया? यहाँ कौन है? उन्होंने दाहिने-बायें दृष्टिपात किया। श्रीकृष्ण दिखाई पड़े। ऋषि ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और निवेदन किया- भगवन्! आपकी ही प्रतीक्षा में मैं यहाँ कन्दरा में पड़ा हुआ था। आज आपने कृपा की, दर्शन दिया। भगवन्! यह कौन मर गया? श्रीकृष्ण ने कहा- कोई नहीं ऋषिवर! यह कालयवन था। इसे वरदान था कि मल्लयुद्ध में, अस्त्र-शस्त्र से यह कभी किसी से नहीं मरेगा। प्रत्येक वरदान में उसकी समाप्ति के अंकुर भी तो छिपे रहते हैं। अस्त्र से नहीं तो आपके दृष्टिनिक्षेप मात्र से वह जल उठा। मुकाबला हुआ ही नहीं और यह मर गया। उसने आपको जगा दिया, आपने देख लिया, वह मर गया।

भगवान इस रहस्य को जानते थे कि कालयवन या ऋषि मुचुकुन्द को क्या वरदान प्राप्त है। यदि वह पहले ही घोषित कर देते कि मैं वहाँ ले जाऊँगा और वह ऐसे करेगा तो कालयवन क्या कभी गुफा में जाता? राजनीति में परिणाम दिखाई पड़ना चाहिए, योजना किसी पर प्रकट न होने पाये। योजना विदित होते ही सफलता संदिग्ध हो जाती है। परिणाम दिखाई पड़े, योजना नहीं। ऐसे मनोरथवाले संसार में कभी असफल नहीं होते।

सारांशतः भगवान श्रीकृष्ण की राजनीति, रावण की राजनीति या भगवान राम की राजनीति – सबके मूल में यही सूत्र था कि कार्यसिद्धि के पश्चात् ही लोगों को ज्ञात हो पाता था कि योजना क्या थी। इसलिए सीता-परित्याग मात्र इस योजना का क्रियान्वयन था कि एक महापुरुष के सिर का भार हल्का हो गया। दिव्यास्त्रों का संग्रह राजकीय उपयोग में आ गया और बच्चों की शिक्षा भी स्वतः सम्पन्न हो गयी।

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