प्रश्न – धर्म के नाम पर पारस्परिक फूट के कारण क्या हैं?
उत्तर :- धर्म एक ही है। कोई दूसरा भी धर्म है तो भ्रान्ति है। धर्म कभी फूट का कारण बन ही नहीं सकता। केवल धर्म ही मनुष्य को एक ईश्वर की सन्तान के रूप में जोड़ता है, अन्य व्यवस्थाएँ उसे तोड़ती हैं। धर्म में एक ही साधक के अवस्था-भेद हो सकते हैं, ऊँची-नीची कक्षाओं के भेद हो सकते हैं। जैसे शिशु कक्षा के बच्चे आपस में लड़ते हैं, कभी किसी की कलम तोड़ दी, कभी दाँत से काट लिया। उनकी अवस्था अभी हल्की है।
परमात्मा एक है। उसे प्राप्त करने की विधि भी एक ही है। उस विधि को आचरण में ढालना ही धर्माचरण है। साधना आरम्भिक अवस्था की हो सकती है। वही साधक मध्यम अवस्था का हो सकता है। कोई संघर्षशील क्षत्रिय श्रेणी का हो सकता है। विकार समाप्त हो गये, ब्रह्म में विलय की योग्यता वाले विप्र स्तर पर हो सकते हैं। अवस्था ऊँची-नीची हो सकती है किन्तु धर्म दो नहीं हो सकता।
धर्म के नाम पर फूट और संघर्ष कदाचित् गद्दी को लेकर होते होंगे। गद्दी मिल जाने पर वे शान्त भी हो जायेंगे। ऐसी वेशभूषा हो तब आपका धर्म सही है, ऐसा बाल रखोगे तब धर्म है- यह सब तभी तक रहता है जब तक साधना की जागृति नहीं है। जब धर्म की कमान आसुरी प्रवृत्तिवाले सँभाल लेते हैं तब ऐसे झगड़े बढ़ जाते हैं।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *