भजन की पराकाष्ठा क्या है?

प्रश्न- महाराजजी! भजन की पराकाष्ठा क्या है?

उत्तर- ‘यथा नाम तथा गुण’। भजन का अर्थ होता है- भज न। तात्पर्य यह हुआ कि भागो मत। चिन्तन में वृत्ति का अचल होना ही भजन की पराकाष्ठा है। चित्त की गति का सर्वथा रुक जाना ही भजन की परिपक्वावस्था है। चित्त की यह स्थिति जहाँ पैदा हुई कि भगवान स्वयं ही उठा लेते हैं। बनने की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष होकर अपने में समाहित कर स्थिति प्रदान कर देते हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हें स्पष्ट हो जायेगा कि मैं क्या हूँ और मेरा स्वरूप क्या है?

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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