प्रश्न – धर्म का लक्ष्य क्या है?
उत्तर :- धर्म का लक्ष्य है लोक में समृद्धि और परमश्रेय की प्राप्ति। जीवन जन्म और मृत्यु के बीच एक पड़ाव है। मृत्यु के पश्चात् कोई पुनः लौटकर अपना घर या अपनी व्यवस्थाओं को नहीं देख पाता। गीता कहती है- ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‘ (गीता, १८/६२)- तुम उस निवास को पा जाओगे जो अजर-अमर है। तुम रहोगे, तुम्हारा जीवन रहेगा, तुम्हारा धाम हमेशा-हमेशा के लिए रहेगा। गीता सदा रहनेवाली समृद्धि, शान्ति और जिस परमात्मा के आप अंश हैं उस अंशी परमपिता परमात्मा का दर्शन, स्पर्श और उसमें विलय दिलाती है।
यह विडम्बना ही है कि हम उससे माँगते हैं जिसके पास नहीं है। जिसके पास है ही नहीं, वह कहाँ से दे देगा? हम किसी फलदार वृक्ष से मौसम में फल माँगेंगे तो वह अवश्य देगा; किन्तु हम उससे मुक्ति या भक्ति माँगें तो वह कहाँ से दे देगा?
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *