धर्म कहाँ से प्राप्त करें?

प्रश्नधर्म कहाँ से प्राप्त करें?

उत्तर :- भगवान श्रीकृष्ण से अर्जुन ने यही प्रश्न किया था कि ‘‘प्रभु! जिस साधना का परिणाम ज्ञानामृत है, ‘अमृत’ अर्थात् जहाँ मृत्यु का समावेश नहीं है, जो अजर-अमर-शाश्वत है उस परमात्मा का ज्ञान और तत्क्षण ब्रह्म में स्थिति- उस ज्ञान को मैं कैसे प्राप्त करूँ?’’

भगवान ने कहा-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। गीता, ४/३४

अर्जुन! किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर निष्कपट भाव से सेवा और प्रश्न कर तू उस ज्ञान को प्राप्त कर। वे तत्त्व के ज्ञाता तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे। यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव(गीता, ४/३५)- उसे जान लेने के पश्चात् तुम्हें जीवन में कभी सन्देह नहीं होगा और जब उसके अनुसार अभ्यास करोगे तो तुम उस ज्ञान को अपने हृदय-देश में प्राप्त करोगे। इस प्रकार धर्म की प्राप्ति के लिए भगवान ने तत्त्वदर्शी की शरण भेजा।

गीता के समापन पर भगवान ने इस पर पुनः प्रकाश डाला- ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। (१८/१८) परिज्ञाता अर्थात् पूर्णज्ञाता महापुरुष, उनके द्वारा बताया साधन अर्थात् ज्ञान और किसका भजन करें अर्थात् ज्ञेय- इन तीनों की जानकारी मिलने से कर्म की प्रेरणा मिलती है और करणं कर्म कर्तेति (१८/१८) इन तीनों के द्वारा कर्म का संग्रह होता है।

अतः प्रत्येक दशा में धर्म को प्राप्त करने के लिए किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण ही जाना होगा। अन्य कोई मार्ग नहीं है। उन्हीं से आप धर्म की विशुद्ध विधि प्राप्त करेंगे। किताबें पढ़ने से पुण्य-पुरुषार्थ की अभिवृद्धि हो सकती है, धर्म की जागृति नहीं हो सकती।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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