पाप और पुण्य
जो जन्म–मरण का कारण है वह पापकर्म है और जो उससे उद्धार कर शाश्वत परमधाम दिला देता है वह पुण्यकर्म है। – स्वामी अड़गड़ानन्द
महाकुम्भ पर्व पर चण्डीद्वीप हरिद्वार में दिनांक २०–०४–१९८६ ई० की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी का प्रवचन।
बन्धुओ!
पाप क्या है और पुण्य क्या है?- इस विषय में समाज में अनेक भ्रान्तियाँ हैं। कोई कहता है- झूठ बोलना पाप है तो कोई कहता है- चोरी करना पाप है, हत्या और प्रत्येक मृत्यु पाप है, धोखा देना पाप है, खेत-खलिहान या मकान में आग लगाना पाप है। पाप करना तो पाप है ही, पापकर्म को समर्थन देना या उसे देखना भी पाप है। पापमुक्ति भी सरल है। माना जाता है कि दान से, तीर्थों में स्नान करने और वहाँ मुण्डन कराने से पाप कट जाते हैं क्योंकि पाप का निवास बालों में होता है। इस प्रकार पाप-पुण्य एक भ्रम बनकर रह गया है।
इधर हजारों वर्षों से हिन्दू-जनमानस पर छायीं बहुचर्चित स्मृतियों का कहना है कि कुछ जातियाँ तो जन्म से ही पापी होती हैं, इसलिए अस्पृश्य हैं। उन्हें वेद पढ़ने या सुन लेने मात्र से पाप लगता है। इतना ही नहीं, मछली मारनेवाला मछुआरा, पशु-पक्षी पकड़ने और मारनेवाला बहेलिया, तेल पेरनेवाला तेली जितना पाप वर्ष भर में करता है उतना ही पाप एक किसान हल जोतने से एक दिन में करता है। इस पाप से बचने के लिए उसे फसल का एक भाग दान देना चाहिये अन्यथा उसे ब्रह्महत्या का एक पाप और लग जाता है।
स्मृतिग्रन्थों में मनुष्यों के आपसी व्यवहार का निर्धारण है। निर्देश है कि इन सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़ना पाप है और इनका निर्वाह पुण्य है- जबकि वे व्यवस्थायें परिवर्तनशील हैं। एक समय था कि दस सन्तान उत्पन्न करनेवाला पुण्यात्मा माना जाता था, आज एक या दो भी पर्याप्त हैं- कालान्तर में इतने के लिये भी दण्ड मिल सकता है। कभी भ्रूण-हत्या से बड़ा पाप था ही नहीं, कभी वही क्षम्य था। कभी जौहर करने से स्त्रियाँ सीधे स्वर्ग जाती थीं, आज वही दण्डनीय अपराध है। ये तो मनुष्यों द्वारा निर्मित विधान हैं, समस्याओं के हल हैं। इनके उल्लंघन का दण्ड मनुष्य ले-दे सकता है। इनके निर्णय के लिए मनुष्य ही सक्षम है। अतः समाज में किसी समय प्रचलित कानून या दण्ड-विधान को पाप और पुण्य की सीमा निर्धारक रेखा नहीं बनाया जा सकता।
इसी प्रकार संसार भर के लिये धर्म भी एक ही है; किन्तु धर्म के नाम पर बहुत से सम्प्रदाय प्रचलन में हैं। हिन्दू गाय की रक्षा करके पुण्य अर्जित करता है, तो मुसलमान उसी को काटकर शबाब कमाता है। जैन अपने मन्दिर में तीर्थंकर के दर्शन को पुण्य मानते हैं तो हिन्दू के लिए जैन मन्दिर या बौद्ध विहार में जाना भी जघन्य पाप है। कभी कहा गया कि राजा का विरोध करना पाप है, क्योंकि राजा में सभी देवताओं का तेज रहता है; आज उन्हीं राजाओं का उन्मूलन हो गया। देवताओं का वह तेज, पाप-पुण्य की वे व्यवस्थायें अतीत में चली गयीं। कभी लकड़ी के हल में लोहे की फाल लगाकर धरती माता का पेट चीरना पाप था, आज ट्रैक्टर की नोंकों से हरित क्रान्ति के गीत लिखे जाते हैं। कहीं अण्डा मांसाहार है, तो कहीं वही शाकाहार माना जाता है। किसी जमाने में एलोपैथी दवाओं का सेवन पाप था, साबुन लगाना पाप था, समुद्र-यात्रा या विदेश गमन पाप था, आज इनके बिना काम ही नहीं चलता। कदाचित् कोई लड़का विदेश चला ही जाता है तो परिवार भर उसे अपना अहोभाग्य और परमपुण्य मानता है, पुरोहित भी स्वस्तिवाचन करके उसे विदा करते देखे जाते हैं।
शीतकाल में पचीस डिग्री सेल्सियस तापमान गर्मी कहलाता है और गर्मी में वही तापमान एयर कण्डीशन कहलाता है, तो किसे गर्मी कहे, किसे ठण्डक? ठीक इसी प्रकार, मानव की व्यवस्था में क्या पाप है और क्या पुण्य?- इसकी सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। परिवर्तनशील सामाजिक, साम्प्रदायिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा स्वास्थ्य-सम्बन्धी निर्देशों को सुगमतापूर्वक पालन कराने के लोभ में इन व्यवस्थाओं के साथ पाप-पुण्य जोड़ देने से पाप और पुण्य का वास्तविक आशय ही धूमिल हो गया है। अधिकांश समाज इस प्रश्न पर संशयग्रस्त है, लोग घण्टों परामर्श करने पर भी कोई एक उत्तर नहीं दे पाते। अतः विचारणीय है कि पाप क्या है और पुण्य क्या है?
वेद
पाप और पुण्य का संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट विवरण सर्वप्रथम वैदिक साहित्य में मिलता है। सामवेद की तलवकार शाखा के अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मण के प्रथम अध्याय में उल्लेख है कि ॐ परमात्मा का परिचायक है। ॐ के यजन द्वारा देवताओं ने असुरों को परास्त करना चाहा। उन्होंने वाणी, आँख, कान, नाक तथा मन द्वारा यह उपासना करना चाहा, तो असुरों ने इन सबको राग-द्वेषरूपी पाप से बिद्ध कर दिया। इन्द्रियाँ राग और द्वेष से युक्त हो गईं, इसीलिए मनुष्य उनके द्वारा अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कार्य करता है। तब देवताओं ने प्राण द्वारा ओंकार की उपासना की। असुरों ने प्राण को भी दूषित करना चाहा; किन्तु प्राण के समीप जाते ही असुर छिन्न-भिन्न हो गये। देवताओं का यज्ञ सफल हुआ। स्पष्ट है कि इन्द्रियों का वासना से बिद्ध होना पाप है और उससे मुक्त होना पुण्य है।
उपनिषद्
इस घटना का ज्यों-का-त्यों उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद् में भी है। इसी का विस्तार करते हुए ऋषि कहते हैं कि- ‘‘प्राण का आश्रय लेने से देवता मृत्यु से पार हो गये। वाणी अग्नि में बदल गयी, घ्राण वायु हो गया, श्रोत्र दिशा बन गया, चक्षु सूर्य हो गया और मन जब मृत्यु से पार हुआ तो चन्द्रमा बन गया।’’ तात्पर्य यह है कि प्राण-संयम के द्वारा अन्तःकरण ज्योंही ईश्वरीय गुण-धर्मों से रंग गया, आसुरी प्रवृत्तियाँ शान्त हो गयीं, वह सदा-सदा के लिए पापों से मुक्त हो गयीं। अतः प्राण-अपान की क्रिया जाननी चाहिये कि यह है क्या, कैसे होती है? कहाँ मिलती है? इस पर सबको ध्यान देना चाहिए।
इसी उपनिषद् में आगे कहते हैं कि वह महान् अजन्मा आत्मा हृदयाकाश में शयन करते हुए सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया के कारण ही वह प्राण है, बोलने के कारण वाक् है, देखने के कारण चक्षु है, सुनने के कारण श्रोत्र है और मनन करने के कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम हैं। अतः जो इनमें से एक-एक की उपासना करता है, सूर्य, चन्द्रमा या दिशाओं की उपासना करता है या दूसरे शब्दों में आँख, कान या नाक की उपासना करता है, आत्मा से भिन्न किसी की उपासना करता है, वह नहीं जानता। वह एक-एक देवताओं का पशु है। जैसे पशु मनुष्यों का पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसा मनुष्य देवताओं का पालन करता है। एक पशु का भी हरण किया जाना अच्छा नहीं लगता, इसीलिये देवताओं को प्रिय नहीं है कि मनुष्य आत्मतत्त्व को जाने। आत्मा को न जाननेवाला मनुष्य यदि इस लोक में महान् पुण्यकर्म भी करे, तो भी अन्त में उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है।
अतः आत्मा की ही उपासना करें। इसके लिए एक ही व्रत का आचरण, प्राण-अपान का चिंतन करें। आत्मभाव को प्राप्त हो जाने पर यह पुरुष पाप से असम्बद्ध तथा पुण्य से भी असम्बद्ध हो जाता है, हृदय के सम्पूर्ण शोकों को पार कर जाता है। तब पाप उसे ताप नहीं पहुँचाते बल्कि वही पापों को संतप्त करता है। वह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है। अर्थात् ‘ब्राह्मण’ उस परात्पर ब्रह्म को अन्तःकरण में विदित कर लेने पर मिलनेवाली स्थिति है। यही निर्णय मुण्डकोपनिषद् का भी है। यह स्थिति मिलती है केवल आत्मा की उपासना से और उपासना में भी करना होता है केवल प्राण-अपान द्वारा परमात्मा का चिन्तन। उपनिषदों के अनुसार पाप से बचने और पुण्य प्राप्त करने का यही एक तरीका है- प्राण-अपान का चिन्तन, इसके अतिरिक्त संसार में कुछ प्राप्त करने के लिए जो कुछ भी किया जाता है सभी नश्वर है।
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वाविशन्ति।। (मुण्डकोपनिषद्, १/२/१०)
‘इष्टापूर्त’- भिन्न-भिन्न देवताओं के लिये वेदी बनाकर जो यज्ञ-यागादि श्रौत कर्म किये जाते हैं उन्हें इष्ट कर्म तथा बावली, कुआँ खुदवाना, बगीचे लगवाना इत्यादि स्मृति-विहित कर्म को पूर्त कहते हैं। इन इष्ट और पूर्त कर्मों को ही श्रेष्ठ माननेवाले अत्यन्त मूढ़लोग उससे भिन्न वास्तविक श्रेय को नहीं जानते। इन पुण्यकर्मों के फलस्वरूप वे स्वर्ग के उच्चतम स्थान में वहाँ के भोगों का अनुभव करके इस मृत्युलोक की विभिन्न योनियों में प्रवेश करते हैं; किन्तु ‘स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति।’ (मुण्डकोपनिषद्, ३/२/९)- साधना की सही क्रिया द्वारा जो कोई भी उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। वह शोक से पार हो जाता है, पापों से तर जाता है और हृदय की गाँठ से सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है।
यह स्मरणीय है कि किताबों को रटनेवाला वेदज्ञ नहीं है। वेद किसी पुस्तक का नाम नहीं है, बल्कि इसी प्राण-अपान के चिन्तन की क्रिया से चलकर अविदित परमतत्त्व परमात्मा को विदित करने के साथ मिलनेवाली उस अनुभूति का नाम है वेद, उस अनुभूति का नाम है ज्ञान, इसीलिये गौतम बुद्ध पोथी को प्रमाण न मानते हुए भी अपने को सच्चा वेदज्ञ और अपने को सच्चा ब्राह्मण कहते थे।
परमात्मा की अनुभवपरक ऋचाओं का संकलन वेद है। भाषा और व्याकरण के बल पर इस वेद का रहस्य नहीं समझा जा सकता। वेद का रहस्य समझने के लिये प्राण-अपान का चिन्तन करके उस स्तर पर पहुँचना होता है, जिस स्तर पर पहुँचकर ऋषियों ने परमात्मा की वाणी को सुना था। बिना उस पर पहुँचे, बिना प्राण-अपान की साधना के यदि कोई वेदों का अर्थ केवल निसर्ग के और व्याकरण के बल पर करता है, तो उससे केवल भ्रान्तियाँ फैलेंगी। यही कारण है कि वेद की एक ही ऋचा का अर्थ सायण ने अलग, दयानन्द ने कुछ और तथा मैकडानल, कीथ, मैक्समूलर इत्यादि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा तीसरा अर्थ प्रस्तुत किया गया है। अतः वास्तविक वेदज्ञ वह है जिसके अन्दर वेद उतर रहा है। इसीलिए इस उपनिषद् में स्पष्ट किया गया है कि श्रोत्रिय वही है जो ब्रह्मनिष्ठ है, ब्रह्म में जिसे स्थिति मिल चुकी है।
अब पाप से तरने के लिए, उस ब्रह्म को जानने के लिये, प्राण-अपान की क्रिया की जानकारी के लिये क्या करें? इसी उपनिषद् के ऋषि कहते हैं, ‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्’- उस परमब्रह्म को जानने के लिए वह सद्गुरु की शरण में जाय। कैसे गुरु? ‘श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्’ (मुण्डकोपनिषद्, १/२/१२)- जो वेद के रहस्य को जाननेवाले और परमब्रह्म परमात्मा में स्थित हों।
इस प्रकार पाप और पुण्य के प्रश्न पर वेद और उपनिषद् दोनों एकमत हैं कि राग और द्वेष ही पाप के मूल हैं। इन्द्रियाँ और मन ही इनका निवास है। आत्मा या परमात्मा को विदित कर लेने पर ही पाप से छुटकारा है। प्राण और अपान का चिन्तन ही परमात्मा को विदित कर लेने का उपाय है और इन सबका माध्यम सद्गुरु है।
गीता
यही निर्णय योगेश्वर श्रीकृष्णोक्त गीता का भी है-
(क) इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।। (३/३४)
इन्द्रिय और इन्द्रियों के भोगों में राग और द्वेष स्थित हैं। इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए; क्योंकि यही दोनों इस आत्मपथ के लुटेरे हैं।
श्रीकृष्णकाल में भी धर्म-अधर्म तथा पाप-पुण्य को लेकर समाज में अनेकानेक रूढ़ियाँ प्रचलित थीं, जिनमें से कुछेक का शिकार अर्जुन भी था। उसने भी सुन रखा था कि कुल का क्षय करना पाप है, स्त्रियों का स्वैराचार पाप है, वर्णसंकर पाप है, पिण्डोदक-क्रिया का लुप्त होना पाप है, मित्रद्रोह पाप है, राज्य और सुख के लिए स्वजनों को मारना महापाप है; किन्तु उसकी इन तमाम मान्यताओं को योगेश्वर ने ‘क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं’ कहा, ‘कश्मल’ अर्थात् अज्ञान ठहराया। कहा कि न तो सम्भावित पुरुषों ने इसका कभी आचरण किया है, न यह स्वर्ग को ही देनेवाला और न यश ही बढ़ानेवाला है। अतः सिद्ध हुआ कि सामाजिक व्यवस्थाओं का पाप-पुण्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रीकृष्ण के अनुसार इन व्यवस्थाओं को पाप-पुण्य मान लेना अज्ञान है। वह सब अज्ञान ही था, फिर पाप है क्या?
(ख) इस पर कहते हैं (गीता, २/३८)- अर्जुन! सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध कर। यदि तू युद्ध नहीं करेगा तो पाप को प्राप्त होगा। यहाँ युद्ध न करना पाप है। अध्याय ३, श्लोक ३० में युद्ध की विधि भी बताते हैं-
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।
‘अध्यात्मचेतसा’– अन्तरात्मा में चित्त का निरोध करके अर्थात् ध्यानस्थ होकर, सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशा, ममता और सन्ताप से रहित होकर युद्ध कर। अर्जुन! जो कोई भी मनुष्य मेरे इस मत के अनुसार बरतता है वह सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाता है और जो दोष-दृष्टिवाले मेरे इस मत के अनुसार नहीं बरतते अर्थात् इस प्रकार का युद्ध नहीं करते, उन अचेत चित्तवालों को तू सम्पूर्ण ज्ञान से भ्रष्ट हुआ जान। उनका कर्म-बन्धन नहीं छूटता। कर्मों के बन्धन से छूट जाने का उपाय युद्ध है।
वस्तुतः यह अन्तःकरण की एक लड़ाई है। जिसका चित्त सब ओर से सिमटकर ध्यान में स्थिर है, इन्द्रियाँ सिमट गई हैं, एकान्त-देश का सेवन है- पास में कोई भी नहीं, तो कौन लड़ेगा और किससे लड़ेगा? आप सब चित्त को सब ओर से समेटकर ईश्वर में लगायेंगे, ध्यान में प्रवेश करना चाहेंगे तो काम, क्रोध, राग, द्वेष, आशा, तृष्णा इत्यादि विजातीय प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में खड़ी रहती हैं। इन प्रवृत्तियों का पार पाकर ध्यानस्थ होते जाना ही वास्तविक युद्ध है। यह युद्ध केवल अर्जुन का ही नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सबको इसी मत के अनुसार बरतना चाहिए।
(ग) इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया, भगवन्! जब पाप से बचने का यही एकमात्र उपाय है तो लोग करते क्यों नहीं? मनुष्य न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए के सदृश किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है? वह आपके मत के अनुसार इस युद्ध में प्रवृत्त क्यों नहीं होता? (३/३६) इस पर योगेश्वर ने बताया कि-
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (३/३७)
अर्जुन! रजोगुण से उत्पन्न यह काम और क्रोध अग्नि के सदृश भोगों से कभी न तृप्त होनेवाले महान् पापी हैं अर्थात् काम और क्रोध ही पाप के मूल हैं, जन्मदाता हैं। काम माने कामना!
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इनके वासस्थान कहे गये हैं, इसलिये अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को संयत करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करनेवाले इस कामरूपी पापी को ही मार। (३/४१) अर्थात् काम पापी है और इन्द्रियों को संयत करके इसे मारने का विधान है।
(घ) अध्याय २/५९ में कह आये हैं कि इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुषों के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे विषय ग्रहण ही नहीं करते, परन्तु विषयों में आसक्ति बनी रह जाती है; किन्तु परमात्मा के साक्षात्कार के साथ वह आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है। अतः परमात्मा के साक्षात्कार से पूर्व पाप का मूल राग समूल नष्ट नहीं होता।
(ङ) योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में इसी तथ्य को बार-बार दृढ़ाया। अध्याय ३, श्लोक १३ में कहते हैं कि यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खानेवाले सन्तजन सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं। योगेश्वर के अनुसार, यज्ञ चिन्तन की एक निर्धारित प्रक्रिया है जिसमें मन में स्थित चराचर जगत् के संस्कार ही हवन-सामग्री है। मन में ही तो राग और द्वेष भी हैं। मन के संस्कारों के स्वाहा होते ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है। ‘यज्ञशिष्टामृत भुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (४/३१)- यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी संरचना करता है उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी शाश्वत सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। यज्ञ से शेष परमात्मा ही बचता है; प्रकृति खो जाती है, पुरुष ही शेष बचता है। वह ब्रह्म ही अन्न है। उस ब्रह्म को प्राप्त होनेवाले सन्तजन सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं, और जो चिन्तन तो करते हैं किन्तु बदले में शरीरों के लिये कामना करते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं- वे पापी हैं, अर्थात् शरीरों के बारम्बार जन्म का जो कारण है वह पाप है और जो ब्रह्म को जना देता है वही पुण्यकर्म है।
(च) अध्याय १०, श्लोक ३ में कहते हैं कि जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित, सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कार के साथ विदित कर लेता है वही ज्ञानी है और वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। अतः ईश्वर के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है और साक्षात्कार के साथ ही पापों से पूर्ण निवृत्ति मिलती है, इससे पहले नहीं।
(छ) अध्याय ७, श्लोक २७-२८ में कहते हैं कि अर्जुन! राग और द्वेष से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अति अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं; किन्तु ‘पुण्यकर्म’ करनेवाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से मुक्त हुए व्रत में दृढ़ रहकर मेरे को भजते हैं। जो मेरी शरण होकर जरा-मरण से छूटने के लिये यत्न करते हैं वे उस ब्रह्म को जानते हैं, सम्पूर्ण कर्मोंसहित मुझको जानते हैं और मुझे जानकर तत्क्षण मुझमें सदा-सदा के लिये स्थित हो जाते हैं अर्थात् पुण्यकर्म वह है जो जरा-मरण से छुटकारा दिलाता है। ‘पुण्यकर्म’ वह है जो शाश्वत की जानकारी और उसी में स्थिति दिलाता है। इस पुण्यकर्म के आचरण के लिये शरण लेंगे श्रीकृष्ण की और जानेंगे ब्रह्म को, सदा-सदा के लिये स्थित होंगे श्रीकृष्ण में। तात्पर्य यह है कि इस पुण्यकर्म का माध्यम सद्गुरु है। ठीक वही बात, जैसा उपनिषद् के ऋषि कहते हैं।
(ज) इसी ‘पुण्यकर्म’ को योगेश्वर ने गीताशास्त्र में स्थान-स्थान पर ‘विहित कर्म’, ‘यज्ञार्थ कर्म’, ‘कार्यम् कर्म’, ‘नियत कर्म’ अथवा ‘निष्काम कर्म’ कहकर सम्बोधित किया है। जिसके अन्तर्गत तीन बातें आती हैं- (१) एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा, (२) उसी परमात्मा के नाम का जप और (३) समकालीन तत्त्वदर्शी महात्मा की सेवा और उसके प्रति समर्पण, जिसके लिए वे प्रोत्साहित करते हैं कि- ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’ (गीता, ४/३४)- तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण जाकर निष्कपट भाव से सेवा और प्रश्न कर तू उस ज्ञान को प्राप्त कर, जिसकी प्राप्ति से सभी पाप समूल नष्ट हो जाते हैं।
(झ) इसी पर पुनः बल देते हैं (अध्याय ८/१३) कि ‘ॐ’ यह अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका जप कर और ध्यान मेरा धर। (१८/६६) कि सम्पूर्ण धर्मों की चिन्ता छोड़कर तू एक मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा। पहले कहा- हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाने से पाप नष्ट होते हैं, फिर कहा- तत्त्वदर्शी की भी शरण में जाने से पाप नष्ट होते हैं और यहाँ कहते हैं- मेरी शरण में आ, मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा। अर्थात् श्रीकृष्ण एक योगी थे, परमात्म-भाव में स्थित योगेश्वर थे, सद्गुरु थे। अर्जुन ने कहा भी था कि ‘शिष्यस्तेऽहं’ (२/७)- भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ।
संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण भी पाप और पुण्य के निर्णय में आपको वेद, उपनिषद् के उसी धरातल पर खड़ा कर देते हैं कि राग और द्वेष अथवा काम और क्रोध ही पाप के मूल हैं। इन्द्रियाँ और मन ही इनका निवास है। पाप से मुक्ति का एक ही रास्ता है- परमात्मा को विदित कर लेना। वेद और उपनिषद् जिसे प्राण-अपान का चिन्तन कहते हैं, योगेश्वर उसी को ‘यज्ञार्थ कर्म’ कहते हैं और उसी से परमात्मा की प्राप्ति बताते हैं। उनके द्वारा नियत यज्ञ में प्राण-अपान के द्वारा नाम-जप ही मुख्य क्रिया है, साथ ही योगेश्वर दैवी सम्पद् के अर्जन और इन्द्रिय-संयम पर बल देते हैं तथा सद्गुरु की शरणागति और ध्यान पर भी- जिनकी पुष्टि उपनिषदों में स्थान-स्थान पर है। जैसे कठोपनिषद्, द्वितीय बल्ली में है कि जो दुश्चरित से विरत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं और जिसका मन चंचल है, उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। पाप से मुक्ति का तथा ‘पुण्यकर्म’ द्वारा आत्मानुभूति की क्रिया का एक ही स्थान पर जितना क्रमबद्ध, स्पष्ट, बोधगम्य एवं पूर्ण विवरण गीताशास्त्र में है उतना अन्य किसी धर्मग्रन्थ में नहीं है, इसीलिए गीता विश्वभर के मानवमात्र का एकमात्र विशुद्ध शास्त्र है। इतना ही नहीं बल्कि पाप और पुण्य के विश्लेषण में तो योगेश्वर श्रीकृष्ण उपनिषदों से भी अधिक गहराई में उतरकर बताते हैं कि पाप का मूल राग अथवा काम का भी मूल आसक्ति है और आसक्ति का भी मूल विषयों का चिन्तन है, अतः विषयों का चिन्तन ही न करें बल्कि मन को निरन्तर एक परमात्मा के नाम में, सद्गुरु के ध्यान में लगाये रखें तो आप पायेंगे कि पाप के मूल इन विकारों का अस्तित्व है ही नहीं। विकारों को उनके विरोधी विचारों द्वारा जीत पाना सम्भव नहीं है। वे जब भी मिटेंगे तो परमात्म-चिन्तन से ही मिटेंगे। लोग करते ही नहीं अन्यथा निरन्तर चिन्तन के द्वारा इन विकारों की निवासस्थली मन तक को मिटा दें। इतना सुगम है कि इससे सुगम अन्य कुछ है ही नहीं।
पाप का मूल काम है अतः सभी कामनायें त्याज्य हैं- केवल एक को छोड़कर कि ‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ’ (७/११)- धर्म से जो अविरोध रखता है, जो उसके अनुकूल है, जो परमधर्म परमात्मा के अनुकूल है, ऐसा काम अर्थात् ऐसी कामना मैं हूँ, मेरी प्राप्ति की कामना करनी चाहिये। यही एक कामना ऐसी है जो उचित ही नहीं, आवश्यक भी है- ‘मामिच्छाप्तुं धनंजय’ (१२/९)- मेरी प्राप्ति की इच्छा कर। इसके लिए ‘मत्कर्मपरमो भव’ (१२/१०)- मेरी प्राप्ति के लिये नियत कर्म को कर; क्योंकि यही एक ऐसा कर्म है जो अन्य सभी कर्मों के बन्धन को काट देता है और स्वयं भी जल जाता है और इस प्रकार जन्म-मरण के क्रम पर पूर्ण विराम लगा देता है।
सभी परिस्थितियों में शाश्वत एकमात्र परमात्मा की प्राप्ति के लिये नियत कर्म का आचरण ही पुण्य है और आत्मिक क्रिया में अवरोध उत्पन्न करना पाप है। सम्पूर्ण गीता में इसके अतिरिक्त पाप और पुण्य की अन्य किसी मान्यता को समर्थन नहीं मिलता। अतः परमात्मा में श्रद्धा और उसकी प्राप्ति के लिये निर्धारित यज्ञ, जैसा श्रीकृष्ण ने बताया, उसमें से जितना आपसे पार लगे, जितना समय आप दे सकें उतना चिन्तन करें। इस अभ्यास को क्रमशः बढ़ायें, जैसा कि निर्देश देते हुए अध्याय ६, श्लोक ३५ में कहा कि प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी अर्थात् परमात्मा से मिलन के लिये यत्नशील व्यक्ति सभी पापों से भली प्रकार शुद्ध होकर परमगति को पा लेता है।
‘श्रीरामचरितमानस’ में पाप और पुण्य
पाप और पुण्य के प्रकरण पर ज्यों-का-त्यों यही निर्णय गोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस का भी है। पाप के मूल राग या काम को सांख्यशास्त्र में मोह कहा गया है। गोस्वामीजी भी कहते हैं- ‘करहिं मोह बस नर अघ नाना।’ (७/४०/४)- मोह के वशीभूत होकर लोग जो नहीं करना चाहिये, ऐसा पाप भी करते हैं। ‘क्रोधु पाप कर मूल’ (१/२७७)- यहाँ क्रोध पाप का मूल है, जैसा ‘गीता’ कहती है-
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता, ३/३७)
काम और क्रोध यही पाप के मूल हैं। अब ये रहते कहाँ हैं? तो-
तात तीनि अति प्रबल खल, काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन, करहिं निमिष महुँ छोभ।। (मानस, ३/३८ क)
ये विज्ञान-धाम मुनियों के मन को भी पलभर में क्षुभित कर दिया करते हैं। अस्तु ये मन में रहते हैं और योगेश्वर श्रीकृष्ण का कहना है कि इनका निवास मन और इन्द्रियाँ हैं। ये दूर कैसे होंगे? तो-
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि।
संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।। (मानस, ७/१२९/६)
सदैव एक राम का ही चिन्तन करना चाहिए।
रामचरितमानस के अनुसार पाप का निवारण भगवान के सम्मुख होने से होता है- ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।’ (५/४३/२) एकमात्र राम, परमतत्त्व परमात्मा के प्रति श्रद्धावान् हो जायँ, लगनवान् हो जायँ तो करोड़ों जन्मों के पापों का शमन हो जायेगा। आप कुछ भी करें, कहीं भी रहें, केवल एक परमात्मा के प्रति अनन्य भाव से श्रद्धा हो। ‘पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।’ (४/२८/३)- पापी ही क्यों न हों, उस परमात्मा के परिचायक नाम का चिन्तन करें तो भवसागर का पार पा जायेंगे। ‘सरन गएँ मो से अघरासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।’ (७/१२३/८)- कोई पाप की राशि ही क्यों न हो, भगवान का आश्रय लेते ही शुद्ध हो जाता है।
मध्यकालीन भारत में यह विचार घर कर गया था कि कुछ जातियाँ जन्म से ही पापी होती हैं, जैसे- आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच, निषाद, तेली, कुम्हार, वैश्य, शूद्र और स्त्रियाँ; किन्तु प्राचीन आर्षग्रन्थों में न तो इसका समर्थन है और न महापुरुषों ने ही ऐसी किसी रूढ़ि को मान्यता दी। इनकी छायामात्र से सवर्ण भले ही स्नान करते रहे हों; किन्तु महापुरुषों ने इन्हें समान दृष्टि से ही देखा, सभी पवित्र थे। पाप से छूटने का जो उपाय सवर्णों के लिये था, तथाकथित अस्पृश्यों के लिये भी वही है।
स्वपच सबर खस जमन जड़, पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम, होत भुवन बिख्यात।। (२/१९४)
नाम लेते ही वह परम पवित्र है। संसार भर में यदि कोई निर्मल व्यक्ति है तो वह है। संसार भर के लिये एक ही पाप और एक ही पुण्य है जिसे प्राप्त करने के सभी समान अधिकारी हैं।
‘जासु नाम पावक अघ तूला।’ (२/२४७/२)- उनका नाम पापरूपी रूई के लिए अग्नि है, ‘गिरिजा जासु नाम जपि, मुनि काटहिं भव पास।’ (६/७३)- काल की फाँसी कट जाती है; किन्तु चार श्रेणियों से चलकर ही इस स्थिति को पाने का विधान है।
राम भगत जग चारि प्रकारा।
सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। (१/२१/६)
गोस्वामीजी की दृष्टि में पुण्य करनेवाले यही चार हैं, चारों निष्पाप हैं; किन्तु इस सुकृति का आधार क्या है? भगवान का नाम!
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा।
ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। (१/२१/७)
किन्तु ज्ञानी पाप और पुण्य दोनों से लगभग पार है, इसलिये विशेष प्रिय है।
इन्हीं चार सोपानों को गोस्वामीजी ने कहीं चार प्रकार के भक्त, तो कहीं चार प्रकार के भव (भवसिन्धु, भवसरिता, भवकूप और गोपद) कहकर सम्बोधित किया है। चिन्तन करके ही भगवान को पाने का विधान है; किन्तु अपनी क्षमता के अनुसार लोग क्रमशः इन चारों सोपानों से चलते नहीं, उच्च क्षमतावालों की नकल करने लग जाते हैं। जीवात्मा का अपने शुद्ध वर्ण परमात्मा की ओर अग्रसर होना रुक जाता है। व्यक्ति प्रकृति में मिश्रित होने लगता है। ऐसा करनेवाला पाप को प्राप्त होता है और यही वर्णसंकर का रूप है-
भये बरन संकर कलि, भिन्न सेतु सब लोग।
करहिं पाप पावहिं दुख, भय रुज सोक बियोग।। (७/१०० क)
अतः क्षमता के अनुसार चिन्तन करना चाहिये।
युग भी साधना के चार सोपान हैं, जिनमें कलियुग आरम्भिक सोपान है। कलियुगीन व्यक्ति को गोस्वामीजी एक महत्वपूर्ण आश्वासन भी देते हैं-
कलि कर एक पुनीत प्रतापा।
मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।। (७/१०२/८)
कलि भगवत्-पथ का आरम्भिक सोपान है। अचेत आत्मा के जागृत होते ही यह आत्म-पथ का पहला चरण है। तामसी गुणों के बाहुल्य के कारण ऐसा साधक सन्त सद्गुरु की सेवा तथा भगवान के गुण-गायन से ही कलि का पार पाकर द्वापर में प्रवेश पाता है। अभी वह मन को समझने की क्षमता नहीं रखता। अतः मन में कितने भी संकल्प आयें, यदि शरीर से भूल न हो, विकारों को कार्यरूप न दें तो पाप नहीं लगता; किन्तु मन से ही सही, यदि वह सत्पथ का संकल्प लेता है तो उसका पुण्य होगा; क्योंकि उसी पथ में तो लगा था। किन्तु जब यही साधक तीसरी और चौथी श्रेणी में पहुँच जायेगा तो संकल्प मात्र से पाप होने लगेगा और उसका प्रायश्चित करना पड़ता है।
पुण्य के एकमात्र उद्गम की घोषणा भगवान राम अयोध्या की जनसभा में करते हैं- ‘पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।’ (७/४४/७) संसार में यही एकमात्र पुण्य है, दूसरा कोई पुण्य है ही नहीं। कौन? यही कि मन, कर्म और वचन से विप्र के चरणों की पूजा करो। जैसा कि उपनिषद् का निर्णय है कि ब्राह्मण एक स्थिति है। जो ब्रह्म के परायण है, उससे पूरित है, वही विप्र है, उसी को सन्त कहते हैं। उनके चरणों का आश्रय लेना ही पुण्य है। गोस्वामीजी इंगित भी करते हैं- ‘बंदऊँ प्रथम महीसुर चरना।’ उनका लक्षण क्या है?, कहते हैं- ‘मोह जनित संसय सब हरना।’ (१/१/३)- वे मोह से उत्पन्न समस्त संशयों को दूर कर देते हैं और यही लक्षण सन्त का भी है। सन्त मिलने से संशय और भ्रमों का समुदाय ही मिट जाता है। यही हैं वे द्विज, जो द्वैत पर जय पाकर परमात्मा के एकीभूत हो चुके हैं। उन्हीं का आश्रय लेना पुण्य है, वही पूजनीय हैं।
आदि शंकराचार्य कहते हैं, ‘कः पूजनीयः शिवतत्त्वनिष्ठः।’- पूजनीय कौन है? जो शिवतत्त्व में स्थित महापुरुष है वही पूजनीय है। इसी की पुष्टि सन्त तुलसीदासजी भी करते हैं, मानस के बालकाण्ड का मंगलाचरण देखें- ‘वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्’- उन ज्ञानस्वरूप, नित्यस्वरूप, शिवस्वरूप गुरुदेव की मैं वन्दना करता हूँ, जिनका आश्रय लेने से टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दनीय हो जाता है। ‘मन ससि चित्त महान।’ (६/१५ क)- मन ही चन्द्रमा है। यह टेढ़ा स्वभाववाला है किन्तु सद्गुरु का आश्रय लेने पर यही वन्दनीय स्थिति को प्राप्त हो जाता है।
उपर्युक्त प्रकरण में तथा अन्यत्र भी भगवान राम कहते हैं कि विप्र की पूजा से केवल पुण्य ही नहीं मिलता बल्कि सभी देवी-देवताओं समेत मैं भी वश में हो जाता हूँ। ‘मन क्रम बचन कपट तजि, जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव, बस ताकें सब देव।।’ (३/३३); ‘संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि।’ (७/४५)- भक्ति मेरी मिलेगी लेकिन सेवा शंकर की, शिवस्वरूप गुरुदेव की! ‘मोतें संत अधिक करि लेखा।’ (३/३५/३)- मुझसे अधिक सन्त की सेवा। ‘तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।’ (२/१२८/८) श्रद्धा परमात्मा में; किन्तु पूजा सद्गुरु की। लक्ष्य परमात्मा; किन्तु माध्यम सद्गुरु। ‘हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई’ (७/१०८/११)- तुष्ट हरि को करना है; किन्तु सेवा द्विज की। ध्यान गुरु-पदनख का; किन्तु सूझेगा रामचरित! यही तो तरीका है।
मानस लिखने के साथ-साथ गोस्वामीजी ने कुछ मानस रोगों का भी वर्णन किया है, जैसे- ‘मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।’ (७/१२०/२९) मोह समस्त व्याधियों का मूल है जिससे बहुत से शूलों की सृष्टि होती है। काम वात है, कफ लोभ है, क्रोध पित्त है- जो छाती को जलाता है, अहंकार गाँठ का रोग है। इस प्रकार कुछ रोगों का चित्रण करते हुए अन्त में निर्णय दिया कि ये अपार हैं। ‘जाने ते छीजहिं कछु पापी।’ (७/१२१/३)- जान लेने पर ये पापी कुछ क्षीण हो जाते हैं अर्थात् यही पापी हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह यही पाप के उद्गम हैं।
ये भली प्रकार नष्ट कब होंगे? इस पर कहते हैं-
सद्गुर बेद बचन बिस्वासा।
संजम यह न बिषय कै आसा।।
रघुपति भगति सजीवन मूरी।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।। (मानस, ७/१२१/६-८)
भगवान राम की भक्ति ही संजीवनी जड़ी है, उनमें श्रद्धा ही अनुपान है अर्थात् एक परमात्मा में श्रद्धा। सद्गुरु ही वैद्य हैं; उनके प्रति अटूट विश्वास, उन्हीं के निर्देशन में चलना है। तीसरी बात है विषयों से विरक्ति। इस प्रकार पाप के उद्गम ये रोग भले ही नष्ट हो जायँ अन्यथा करोड़ों उपायों से भी नष्ट नहीं हो सकते। जब वे नष्ट नहीं होंगे, अन्य करोड़ों उपायों से भी नष्ट नहीं होंगे, तो पाप को नष्ट करने का आप कौन-सा उपाय कर रहे हैं?
इन्द्रिय-संयम ही हरि में श्रद्धा और हर की पूजा का आरम्भ है। ‘हरि हर निन्दा सुनइ जो काना।’ (६/३१/२) हरि और हर की निन्दा वही सुनेगा जिसकी इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं। फिर तो उसकी इन्द्रियों के सभी दरवाजे खुले हैं। निन्दा करना और सुनना ही उसके पास रह जाता है जो भयानक पाप है।
सन्त या सद्गुरु का दर्शन जितना बड़ा पुण्य है, असन्त का दर्शन और सान्निध्य- चाहे वह किसी भी वेश में हो, पाप का कारण बन जाता है, जैसा कि प्रतापभानु के साथ हुआ। मानस की एक घटना है कि प्रतापभानु नामक एक चक्रवर्ती नरेश थे। उनके द्वारा हराया हुआ एक राजा मुनि का वेश बनाकर घोर जंगल में अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। एक बार शिकार का पीछा करते वह नरेश भी मार्ग भूलकर उसी बीहड़ में जा निकले; किन्तु तपस्वी वेशधारी उस राजा को पहचान न सके। उसकी वाणी से प्रभावित नरेश ने अपने लिये एकछत्र, अकण्टक राज्य और सैकड़ों कल्पों तक उसके सुख को भोगने के लिए जरा, मरण और दुःख से रहित शरीर की कामना की, जबकि यह सब उस नरेश को उस समय प्राप्त था।
मुनि वेशधारी उस राजा ने इस कामना की पूर्ति का ऐसा उपाय बताया कि प्रतापभानु को राज्य और वैभव से भी हाथ धोना पड़ा। उनके वंश का समूलोच्छेद हो गया और ‘भए सकल अघरूप’ (१/१७६)- सब-के-सब पापस्वरूप हो गये जबकि जीवन भर उन्होंने पुण्य के लिए ही प्रयास किया था; किन्तु किन कार्यों द्वारा? उन्होंने गुरु, देवता, सन्त, पितर और ब्राह्मणों की सेवा की थी, राजधर्म का पालन किया था, दान दिया था। वेद, शास्त्र और पुराण सुनते थे। कुआँ, तालाब, ब्राह्मणों के लिए भवन तथा प्रत्येक तीर्थ में देवताओं के लिए मन्दिर बनवाया था। वेद-पुराणोक्त प्रत्येक यज्ञ को हजार-हजार बार किया था, इन सबके फल की कामना भी नहीं थी, फिर भी ‘भए सकल अघरूप’– एक भी पुण्य ने साथ नहीं दिया। गोस्वामीजी इस कथानक के माध्यम से कहना क्या चाहते हैं?
वास्तव में जैसा अभी आपने उपनिषदों का निर्णय सुना, गोस्वामीजी भी वही कहने जा रहे हैं कि आत्मदर्शन की निर्धारित क्रिया से रहित प्रत्येक कर्म का पुण्य सामाजिक है परम कल्याण के लिए नहीं। यह पुण्य अत्यल्प है। प्रतापभानु की कामना परमात्मा के लिए होती, तो ये संसार की सारी कामनायें स्वतः तृप्त होतीं। इन्हीं भौतिक इच्छाओं के लिये व्याकुल होकर ही तो लोग भगवान की शरण में जाते हैं और उन्हें मिलता भी है। ध्रुव को अचल स्थिति मिली, विभीषण को कल्पभर का राज्य मिला, काकभुशुण्डि कालजयी हो गये। जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि और दुःखों से मुक्ति पाने के लिये ही पूर्वजों ने परमात्मा की कामना की और प्रतापभानु की भी यही कामना थी।
कामना पाप का मूल है, जैसा श्रीकृष्ण कहते हैं, केवल एक को छोड़कर- परमात्मा की कामना और उसके लिए निर्धारित क्रिया अवश्य करनी चाहिये, जिसके पाने पर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता। पूज्य गुरुदेव (स्वामी श्री परमानन्दजी) कहते थे- ‘इच्छा राखे मोक्ष की, ताहि शिष्य पहिचान।’ जिसमें मोक्ष की इच्छा ही नहीं है वह कैसा शिष्य? इसी प्रकार जो शिष्य को मोक्ष की राह पर चला न दे, उसके हृदय से रथी होकर उसे बोध न दे दे वह कैसा सद्गुरु?
सद्गुरु का आश्रय महान् पुण्यों का फल और अक्षय पुण्य का स्रोत है; किन्तु जब तक ऐसे सद्गुरु नहीं मिल जाते तब तक आप सन्तों में श्रद्धा रखें, सेवा करें, उनसे परमकल्याण की ही कामना करें। एक परमात्मा में निष्ठा रखें, उनका नाम जपें। भूखे को भोजन और प्यासे को पानी दें, स्नेह दें। इन सबका पुण्य घनीभूत होकर आपको कल्याण के प्रेरक उन सन्तों या सद्गुरुओं की पहचान तक स्वतः पहुँचा देगा। मानस में इस बात पर बल दिया गया है कि ‘पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।’ (७/४४/६)
‘सन्त दरस जिमि पातक टरई।’ (४/१६/६)- सन्तों के दर्शन से पातक टल जाते हैं और भगवान के सम्मुख हो जाने से मिट जाते हैं; किन्तु एक और विशिष्ट धारणा भी पायी जाती है कि तीर्थों के सेवन से भी पाप की हानि और पुण्य की वृद्धि होती है और कदाचित् तीर्थों में कोई पाप ही कर बैठा तो वह पाप अनन्त गुना बढ़ जाता है- ‘जिमि तीरथ कर पाप’ (६/९७) अतः एक नवीन प्रश्नबिन्दु आ जाता है कि तीर्थ है क्या? इस पर विचार कर लेना अप्रासंगिक न होगा। महापुरुषों की वाणी-
साधूनां दर्शनम् तीर्थभूता हि साधवः।
काले पलन्ति तीर्थानि सद्यः साधु समागमः।।
सन्तों का दर्शन ही पुण्य है। भूतकाल का सन्त-स्थल ही आज का तीर्थ है। तीर्थ तो कालान्तर में फल देनेवाला होता है; किन्तु साधु-दर्शन तो तत्काल फल देनेवाला होता है। भारतीय जनमानस में ही नहीं अपितु विश्वभर में तीर्थस्थलों को पापनाशक और पुण्यदायक मानने की परम्परा रही है। वास्तव में सन्तों की तपस्थली ही तीर्थ हैं। संसार में जितने भी तीर्थ हैं चाहे जिस मज़हब के हों, विश्व के किसी कोने में हों, सब-के-सब सन्तों की क्रीड़ास्थली के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं। कहीं उनका जन्म है तो कहीं साधना, कहीं शिष्यों को उपदेश है तो कहीं महाप्रयाण। हाँ, यह बात अलग है कि समय का अन्तराल पड़ जाने के कारण हम उन स्थलियों और उनसे सम्बन्धित महापुरुषों को भी एक चमत्कारिक जामा पहना देते हैं।
तीर्थों के मूल में सन्त ही हैं। महापुरुष ने उस सत्य को कैसे पाया?- बस इस मार्गदर्शन, प्रेरणा और सामूहिक उपदेश केन्द्रों के रूप में ही उन स्थलियों का उपयोग है। वहाँ का वायुमण्डल शुद्ध है, उनकी मनन की हुई जगह है। चिन्तन की भावना से वहाँ जाने पर सहज ही भगवान में मन लगने लगता है। उन महापुरुषों को हम नमन करते हैं, उनसे शाश्वत सत्य को पाने और समृद्धि की कामना करते हैं। देखादेखी दान-पुण्य भी होता है और जो साधन द्वारा चलकर परमात्मा में खो गये हैं अथवा उस पथ के पथिक हैं ऐसे क्रियावान् पुरुष दान के अधिकारी भी हैं। पण्डे-पुजारियों को लेकर कुछ गन्दगी निःसन्देह आ जाती है; किन्तु समय स्वयं ही उसकी धुलाई कर देता है। साथ ही तीर्थों की पवित्रता बनाये रखना सभी का दायित्व है और इस परिप्रेक्ष्य में सबकी सतर्क दृष्टि रहनी चाहिये।
समाज के लगभग शत-प्रतिशत लोगों के लिये तीर्थों का उपयोग है। इन स्थलियों में आते-जाते जिसे आत्मिक पथ का बोध हो गया, जो इस पथ पर चलने लगे, मन के अन्तराल में ही चित्तवृत्तियों को प्रवाहित करने की क्षमता आ गई तो उसे मन में सिमटकर आत्मदर्शन की ओर चलना है। पार्वतीजी से भगवान शिव कहते हैं-
इदं तीर्थं इदं तीर्थं भ्रमन्ति तामसा जनाः।
आत्मतीर्थं न जानन्ति कुतः मोक्षः श्रृणु प्रिये।।
यह तीर्थ है! यह तीर्थ है!- ऐसा कहते हुए तामसी लोग भटकते रहते हैं। वे अपने भीतर आत्मतीर्थ को नहीं जानते। ऐसे लोगों के लिये मोक्ष कहाँ। वस्तुतः चिन्तनरत साधक के लिये तीर्थों का विधान नहीं है अपितु अधिक से अधिक समय चिन्तन में देने का विधान है, अविरल चिन्तन का विधान है; किन्तु ऐसे लोग हजार में एक होते हैं- ‘नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।’ (७/५३/१) शेष निन्यानबे दशमलव नौ प्रतिशत लोगों के लिए तीर्थ का पूर्ण महत्व है, मन्दिर ही आरम्भिक प्रेरणा-स्थल हैं।
तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ग्यान निपुनाई।। (७/१२५ ख/४)
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरि भगति भवानी।। (७/१२५ ख/७)
तीर्थाटन इत्यादि सभी साधन का एकमात्र फल है भगवान की भक्ति। अतः जहाँ जाने से श्रद्धा सब ओर से सिमटकर सर्वत्र व्याप्त एक परमात्मा में स्थिर न हो जाती हो, जहाँ आत्मदर्शन की विधि न बतायी जाती हो, लोग स्वयं क्रिया में चलकर आपको भी आत्मपथ पर चलने का आह्वान न करते हों, जहाँ जाने से विषयों से वैराग्य और इन्द्रिय-संयम की प्रेरणा-प्रोत्साहन न मिलता हो, वह तीर्थ तीर्थ नहीं है, वह मन्दिर मन्दिर नहीं है। वहाँ जाने से आपका नुकसान होगा, कल्याण कदापि नहीं।
जो स्वयं पवित्र हो गये हों और आपको भी पवित्र करने की क्षमता रखते हों वे तीर्थ हैं, इसीलिये जैन समाज में महापुरुषों को तीर्थंकर कहा जाता है और चिन्तन के इस पवित्र पथ में जो भी आ गया वह तीर्थ का निवासी है। पूज्य महाराजजी इसी को लक्ष्य करके कहते थे कि घर में रहकर भजन करो। यदि गलती करोगे तो भगवान क्षमा कर देंगे; किन्तु घर छोड़ने के बाद चिन्तन के इस पथ में यदि थोड़ी भी गलती हुई तो भगवान कभी क्षमा नहीं करेंगे, उसका इलाज करेंगे। ‘जिमि तीरथ कर पाप’- वह तीर्थ का पाप है।
प्रश्नोत्तरी में आदि शंकराचार्य कहते हैं, ‘तीर्थं परं किं?’– सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन है? ‘स्वमनो विशुद्धः’– विशेष रूप से शुद्ध किया हुआ अपना मन ही सर्वोपरि तीर्थ है। जिन महापुरुषों के अन्तःकरण में लोगों को पवित्र करने की क्षमता आ गई, बाहर उनकी निवासस्थलियों पर भी उनकी इस क्षमता का प्रभाव पड़ा, इसीलिये तीर्थों के दो स्वरूप हैं। रामचरितमानस में भी प्रयाग, चित्रकूट, काशी, कैलाश, अवध इत्यादि जिन तीर्थों और गंगा, यमुना, गोदावरी, सरयू और मंदाकिनी-प्रभृति जिन पवित्र नदियों का वर्णन है वे सभी बाह्य स्थलियों के साथ-साथ मानसिक तीर्थ भी हैं और जिन विशेषताओं का वर्णन मानस में है वह बाहर इन नामों के किसी स्थान पर ढूँढ़ने पर नहीं मिलेंगी।
उदाहरण के लिये प्रयाग को लें। जिन महापुरुषों के अन्तःकरण में प्रयाग की स्थिति आ गई, बाहर उनकी निवासस्थली भी प्रयाग बन गयी। स्वयं भगवान कहते हैं- ‘तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।।’ (६/११९/७) चौरासी लाख जन्मों के ही नहीं, करोड़ों जन्मों के पाप प्रयाग देखने से भाग जाते हैं; किन्तु देखनेवालों का शोक-सन्ताप बना ही रहता है, पाप का परिणाम भय, रूज, शोक, वियोग, जन्म-मरण लगा हुआ है तो कैसे मान लें कि पाप दूर हो गये? कहते हैं कि प्रयाग में ‘चारि पदारथ भरा भँडारू’ (२/१०४/४) किन्तु इस जन्म में मिलता दिखायी तो नहीं देता?
एक अन्य प्रयाग का भी वर्णन मानस में है-
मुद मंगलमय सन्त समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू।। (१/१/७)
सन्त समाज चलता-फिरता प्रयाग है। यह प्रयाग प्रेम का है, भक्ति का है, मंगल का है। इस प्रयाग में भगवान के चरण-कमलों में प्रीति का आविर्भाव होता है जिससे ‘लहहिं चारि फल अछत तनु, साधु समाज प्रयाग।’ (१/२) चारों फल मरने के बाद नहीं बल्कि इस शरीर के रहते प्राप्त हो जाते हैं। आखिर दो प्रयाग बताकर गोस्वामीजी कहना क्या चाहते हैं? यही कि मानस तीर्थ भी है और लोक में प्रचलित प्रयाग की अपेक्षा सन्त समागम से पैदा होनेवाला प्रयाग प्रत्यक्ष फलवाला और श्रेष्ठ है। अतः इस मानस तीर्थ को भी अपने में शोध करें, इस तीर्थ को अपने में ढालने का यत्न करें। भगवान स्वयं अनन्त कोटि तीर्थों से बढ़कर पवित्र हैं- ‘तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।।’ (७/९१/२) इधर तीर्थों से पवित्रता आती है, उधर नाम से पाप का निवारण है। नाम भी पवित्र करता है- ‘कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।’ (७/१२९/छन्द १) भगवान के ‘पावनं पावनानाम्’ नाम में तीर्थ के सृजन की क्षमता है।
इसी प्रकार की मानसिक नदी है मानस की मन्दाकिनी। लिखा है-
सुरसरि धार नाउँ मन्दाकिनि।
जो सब पातक पोतक डाकिनि।। (२/१३१/६)
यह मन्दाकिनी गंगाजी की धारा है। लगता है कि इन गोस्वामीजी को भूगोल का भी ज्ञान नहीं है। ऐसा ही वे सरयू के लिये भी लिखते हैं कि- ‘नदी पुनीत सुमानस नन्दिनि।’ (१/३८/१३); ‘मानस मूल मिली सुरसरिही।’ (१/३९/५) पवित्र सरयू मानसरोवर से निकली है और गंगा में मिल जाती है। गोस्वामीजी क्या इतना भी नहीं जानते थे कि मन्दाकिनी न तो गंगा से निकली है और न सरयू मानसरोवर से। इसी प्रकार न तो मंदाकिनी गंगा में मिलती है और न सरयू। किन्तु वास्तव में ऐसा ही है। गोस्वामीजी की मानस में रामभक्ति ही सुरसरि की धारा है और रामकथा ही मन्दाकिनी है। कथा भक्ति का ही एक अंग है, आरम्भिक स्तर है। मन्दगति से चलनेवालों की अवस्था का प्रतीक है मन्दाकिनी, इसीलिए पाप को नहीं ‘पातक पोतक’– पाप के बच्चों को ही खाने में सक्षम है। कुछ ऐसा ही सरयू का स्वरूप है तथा अन्य तीर्थों का भी।
बाह्य तीर्थ मानसिक तीर्थों की योग्यता प्रदान करते हैं। सहसा कोई मानसिक पवित्रता नहीं पा सकता। इसी का प्रतिपादन सन्त कबीर करते हैं-
तीरथ गये एक फल, सन्त मिले फल चारि।
सद्गुरु मिले अनन्त फल, कहै कबीर विचारि।।
‘तीरथ गये एक फल’– तीर्थों में जाने से एक फल यही है कि पुण्य-पुरुषार्थ बढ़ता है, जो आपको जागृत सन्त से मिला देता है। ‘सन्त मिले फल चारि’– सन्तों के मिलते ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष इन चारों का स्रोत खुल जाता है। इन्हीं सन्तों में सद्गुरु हैं, कहीं सद्गुरु मिल गये तो ‘अनन्त फल’– जो अनन्त है, असीम है, शाश्वत एवं एक है, वह परमतत्त्व परमात्मा सुलभ हो जाता है।
सांसारिक व्यवस्थाओं के लिये सामाजिक नियमों के साथ पाप और पुण्य की जो अवधारणा जुड़ गई है, गोस्वामीजी उसे जगत् के अन्तर्गत और विधाता का प्रपंच मानते हैं- ‘बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।’ (१/५/४) प्रपंच है क्या? ‘दुख सुख पाप पुन्य दिन राती।’ (१/५/५) पाप और पुण्य प्रपंच है। संसार में इन नियमों के पालन को पुण्य मानने की परम्परा है; किन्तु आत्मदर्शन की क्रिया से रहित होने के कारण उपनिषदों के ही स्वर में गोस्वामीजी इन्हें प्रपंच कहते हैं और कदाचित् ये आत्मदर्शन में बाधक हों तो गोस्वामीजी इन सबके जल जाने की कामना करते हैं- ‘सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।’ (२/२९०/१) सामाजिक मर्यादाएँ अपनी जगह हैं, उनकी उपादेयता भी है; किन्तु आत्मदर्शन के पथ पर इन मर्यादाओं का पाप-पुण्य से प्रयोजन नहीं रह जाता। भगवान कहते हैं- ‘गुरु पितु मातु बन्धु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा।।’ (३/१५/१०) वह मेरी ही सेवा करे। अन्य किसी के भी प्रति उसका कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। ‘पाप पुण्य की करे न आसा। सो पहुँचे रघुनायक पासा।।’
एक ओर वे कहते हैं- ‘नहिं असत्य सम पातक पुंजा।’ (२/२७/५) कि झूठ के बराबर कोई पाप नहीं है; किन्तु उसी मानस में कहते हैं- ‘समुझि न परइ झूठ का साचा।’ (३/१०/२४) एक दृष्टि से देखने पर जो वस्तु सत्य लगती है दूसरी दृष्टि से प्रतीत होता है कि इससे बड़ा झूठ तो कुछ हो ही नहीं सकता। आप कहते हैं- यह वस्त्र हमारा है, यह नाम है। अपनी समझ से तो आप सच ही बोल रहे हैं; किन्तु जब शरीर ही आपका नहीं है तो वस्त्र आपका कैसे हो गया? गर्भ में आप ही थे, क्या उस समय भी आपका यही नाम था? यही आगेे भी रहेगा? कब तक? जो आपका है उस पर तो आपका अधिकार होना चाहिये, फिर आपके स्वजन असमय में ही क्यों चले जाते हैं? इसलिये जब गोस्वामीजी कहते हैं- ‘नहिं असत्य सम पातक पुंजा।’ तो उनका अभिप्राय क्या है? वास्तव में परमात्मा ही एकमात्र सत्य है- ‘ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनन्द रासी।।’ (१/२२/६) वही सत्य है। परम चेतन, असीम और अनन्त आनन्द की राशि है, और कोई सत्य है ही नहीं। इनका पालन ही पुण्य है और इसके विपरीत होना, इस ‘सत्य’ को विस्मृत कर देना अर्थात् परमात्मा को विस्मृत कर देना ही पाप का पुंज है।
उपशम
हम अच्छे कार्य ही क्यों करें?- इस सम्बन्ध में गीता (१५/२) का निर्णय है कि मनुष्य कर्मों का रचयिता है- ‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’– इस शरीर में अच्छे-बुरे कर्म द्वारा दोनों प्रकार के संस्कार बनाने और नष्ट करने की क्षमता है। यदि मनुष्य राग और द्वेष से प्रेरित होकर ही कार्यों को करता रहेगा तो उसी प्रकार के संस्कार बनते रहेंगे, अन्तकाल में भी उन्हीं का चिन्तन रहेगा और इन संस्कारों के अनुरूप आगामी शरीर में भी वही करता रहेगा तो परमात्म-चिन्तन का मौका ही उसे कब मिला? इन कार्यों को करते रहने से वह अपने वास्तविक कल्याण से वंचित रह जायेगा। अतः पाप और पुण्य केवल संस्कार बनाते हैं, जबकि परमात्मा को विदित कराने की क्रिया इन संस्कारों का निरोध करती है।
मन एक भी क्षण शान्त नहीं रहता। संकल्प का नाम ही तो मन है। यह हमेशा कुछ-न-कुछ करता ही रहता है किन्तु एक समय में केवल एक काम करता है। नियत कर्म आराधना तथा माता-पिता एवं गुरुजनों की सेवा, देश-सेवा, समाज-सेवा और इसके विपरीत अविहित कर्म चोरी-बेईमानी तक जो कुछ भी आप करते हैं, अपने लिये संसार का एक संस्कार ही तो तैयार कर रहे हैं, जिसे आप ही को भोगना है और भोगने के लिये शरीर धारण करना है। अतः अधिक से अधिक समय चिन्तन में दें, जो जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाकर आपको अनन्त आनन्द में स्थिति प्रदान कर दे। यही पाप से बचने का और पुण्य अर्जित करने का एकमात्र स्रोत है। विकार मन में होते हैं तन में नहीं, रोएँ में नहीं, अतः शरीर धोने से वे कभी नष्ट नहीं होंगे। भजन इन मानसिक विकारों का मानसिक उपचार है।
सारांशतः पाप और पुण्य के प्रश्न पर वेद, उपनिषद्, गीता, रामचरितमानस और संसार भर के महापुरुषों का एक ही निष्कर्ष है। ईसाई, यहूदी और इस्लाम विचारधाराओं में भी इसी का अंश है। वे भी पाप का कारण शैतान को मानते हैं कि शैतान कोई अदृश्य जीव है जो मनुष्य-शरीर के बाहर रहकर भी उसे अल्लाह या गॉड की आज्ञा न मानने को उकसाता है, जबकि भारतीय मनीषी इस बिन्दु को अधिक स्पष्ट करते हुए देवता और असुरों को मानव में अन्तर्निहित गुणों के रूप में देखते हैं तथा मानव-शरीर में ही चराचर जगत् का बीज और उसके भी नियामक परमात्मा को जानते हैं। राग और द्वेष के जन्मदाता के रूप में असुरों तथा इसके विपरीत शम, दम, विवेक, वैराग्य, धारणा, ध्यान इत्यादि दैवी सम्पदा के गुणों की स्वाभाविक मान्यता विचारधारा को अधिक ग्राह्य बना देती है।
भारतीयेतर विचारधाराएँ भी पाप का परिणाम मृत्यु मानती हैं कि आदम का मूल पाप हमें भोगना पड़ रहा है जन्म लेकर! और अपने जीवन में जो पाप करेंगे, उसका परिणाम सदा-सदा के लिये दोज़ख – सुधरने का कोई अवसर नहीं, जबकि भारतीय मनीषी पुनर्जन्म में नारकीय जीवन से छुटकारा बताते हैं और बारम्बार जन्म एवं मृत्यु को इसी पाप का परिणाम, अपने कर्मों का परिणाम मानते हैं। आजकल विश्वस्तर पर प्रकाश में आनेवाली पुनर्जन्म की अगणित घटनाओं को छोड़ भी दें, यदि केवल इतना ही मान लें कि यह जीवन ही अन्तिम जीवन है, तब तो ईश्वर और सामाजिक नैतिकता के नियमों का भी औचित्य नहीं रह जाता। जिस सत्ता को हम देख नहीं रहे हैं और उसके विषय में कुछ दिखा भी नहीं रहे हैं, केवल यह कहकर उसे कैसे मनवाया जा सकता है कि उसे न मानने पर मरने के बाद यातनायें मिलेंगी, यदि वह है तो उसे जाना जा सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं- वही तो एकमात्र सत् है। उसे इसी शरीर में, इसी जीवन में न केवल जाना जा सकता है बल्कि वह आपके दर्शन, स्पर्श और प्रवेश के लिये भी सुलभ है। प्रत्येक भारतीय महापुरुषों की यही अनुभूति रही है। ‘जानें बिनु न होइ परतीती।’ (मानस, ७/८८/७)- बिना जाने कोई बात मान लेना विश्वास नहीं अन्धविश्वास कहलाता है।
इस्लाम विचारधारा में पुण्य का परिणाम सदा-सदा के लिये जन्नत- जिसमें शीतल जल के चश्में, शराब के झरनें, मेवें, हूरें और गुल्में हैं, सांसारिक दुर्लभ वस्तुओं से मिलती-जुलती वस्तुओं का प्रचुर मात्रा में भोग है, जबकि भारतीय मनीषियों की अनुभूति में पुण्य की परिणति उस परमात्मा की प्राप्ति में है जो अनन्त किन्तु अनिर्वचनीय आनन्द स्वरूप है। यह आनन्द भोग का नहीं अपितु आप्तकामता का है। इस सम्बन्ध में ईसा के विचार भारतीयों के निकट लगते हैं कि एक परमात्मा और ईसा में विश्वास का परिणाम अनन्त जीवन है, शब्दों में प्रचुर साम्य झलकता है। ईसा की कुछ अन्य उक्तियाँ भी इसी तरह की साम्य रखती हैं- ‘मैं प्रभु में हूँ और प्रभु मुझमें हैं।…’, ‘मैं तुम्हारे पिता और अपने पिता के पास जाता हूँ।…’, ‘जो मुझमें विश्वास रखेगा, वह मेरे जैसा ही कार्य कर सकेगा बल्कि मुझसे भी बड़ा कार्य करेगा।…’ किन्तु ईसाई उन्हें ईश्वर का इकलौता बेटा मानकर स्वयं ईश्वर का वैसा बेटा बनने का यत्न छोड़ बैठते हैं और इस्लाम के अनुयायी भी यह मानकर बैठ जाते हैं कि आदमी खुदा नहीं हो सकता। मुहम्मद अल्लाह के सन्देशवाहक मात्र थे, नबी थे। सभी नबियों पर ईमान लाओ लेकिन मानो इस्लाम को! ‘मुहम्मद साहब अन्तिम नबी हैं।’- इस प्रकार आगे किसी के वैसा होने का रास्ता ही बन्द हो जाता है। किन्तु जिन सूफियों ने मुहम्मद के आशय को समझा, उन्होंने उन जैसी साधना की तो पा गये- ‘देखते–देखते क्या से क्या हो गया। कतरा दरिया में गिरा तो फना हो गया।’ उनको न कयामत का इन्तजार करना पड़ा, न जन्नत जाना पड़ा और न दोज़ख का खतरा रहा। वे खुदा में प्रवेश पा गये। कुछ वैसी ही अनुभूति उन्हें भी हुई- जैसा भारतीय चिन्तन में है।
पाप-निवारण के प्रश्न पर ईसाई प्रार्थना पर विशेष बल देते हैं, धर्मगुरु (पोप) के समक्ष (Confession) पाप कबूल करके उनसे यही क्षमादान ले लेते हैं। कुरान शरीफ में भी है कि जो तौबा करता है, ईमान लाता है, नेकी का काम करता है, मैं उसके गुनाहों को क्षमा कर देता हूँ। पापों की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिये हार्दिक पश्चाताप का भारतीय दर्शन में भी महत्व है किन्तु इसके साथ ही भारतीय विचारधारा में पाप समूल नष्ट करने के लिए एक निर्धारित क्रिया द्वारा चलकर परमात्मा में प्रवेश पा लेने का विधान है। दोनों विचारधाराओं में अन्तर का मुख्य कारण यह नहीं है कि उन महापुरुषों को इन क्रियाओं को बताने और उस पर समाज को चलाने का अवसर ही नहीं मिला, गुमराह समाज को एक परमात्मा के प्रति झुकाने तक में ही उनका समय पूरा हो गया, जो आत्मिक पथ की प्रवेशिका है।
भारतीय विचारधारा में जैसा महत्त्व सद्गुरु का है कुछ वैसा ही स्थान इन विचारधाराओं में पैगम्बरों का है कि सद्गुरु या पैगम्बरों के बिना कोई भगवान से मिल नहीं सकता या स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता और न किसी के पाप माफ किये जायेंगे; किन्तु वे मानते हैं कि पैगम्बर इस मानवता के लिये अन्तिम व्यक्ति थे, अपने लोगों के बीच उन जैसा होना न केवल असम्भव है बल्कि उस स्थिति को प्राप्त करने की कामना भी गुस्ताखी है- जबकि भारतीय विचारधारा में गुरु शिष्य को अपने जैसा ही बनाकर छोड़ता है और प्रत्येक शिष्य गुरु का गुरुत्व पाने की दिशा में प्रयत्नशील भी रहता है। भारतीय चिन्तन में सद्गुरु को इष्ट के रूप में पूजने और उनके द्वारा अचेत आत्माओं की जागृति, हृदय में यौगिक क्रियाओं की उनके द्वारा जागृति का जो विधान है, इन विचारधाराओं में इसका सर्वथा अभाव है।
एक परमात्मा और एक गुरु में विश्वास आपको सत्य के द्वार तक ले जा सकता है; किन्तु उस सत्य की अनुभूति के लिये हृदय से सद्गुरु की जागृति और उनके द्वारा निर्दिष्ट क्रिया द्वारा परमात्मा में प्रवेश पा लेने का विधान है, जहाँ पहुँचकर पापों के शमन के साथ ही पुण्य भी अपना कार्य पूरा कर सदा-सदा के लिये शान्त हो जाता है, जैसा कि उपनिषद् के ऋषियों की अनुभूति है कि ऐसा व्यक्ति पाप और पुण्य से भी असम्बद्ध हो जाता है। गीता में अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के लोग भी योगेश्वर में समाहित होते जा रहे हैं, मुखों में चूर्ण होते जा रहे हैं। पुण्य का अर्जन किया जाता है; किन्तु पापों का शमन होने के पश्चात् पुण्य स्वतः शान्त हो जाता है। अतः एकमात्र पुण्य यह है कि निर्दिष्ट क्रिया का आचरण करें।
समाज के अन्तर्गत सदाचार और सद्व्यवहार भी पुण्य हैं जिनके अन्तर्गत सच बोलना पुण्य है, परोपकार पुण्य है, ईमानदारी पुण्य है- जैसा कि अधिकांश धर्मग्रन्थों तथा कन्फ्यूशियस, प्राचीन यूनानी विचारधाराओं में भी है; किन्तु इन छोटे-छोटे स्तरों से चलते-चलते जो एक परमात्मा के सम्मुख कर दे, उस आत्मदर्शन की क्रिया का पालन भली प्रकार पुण्य है, भले ही बीच में स्वर्ग की कामना हो गई। श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं वह भी देता हूँ। भगवान राम कहते हैं- ‘जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरे’ (मानस, ३/४१/५)। निःश्रेयस के साथ लौकिक समृद्धि स्वतः मिलती है- ‘तिमि सुख सम्पति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।’ (मानस, १/२९३/३) वह सब भी मिलती है; किन्तु सीधे एक परमात्मा से माँगने के कारण, साधना विधिसम्मत होने के कारण वह पुरुष शाश्वत धाम पा जाता है। फिर उसका पतन नहीं होने पाता।
अन्त में एक बार फिर से समझ लें। पाप वह है जो पतन की ओर ले जाय, नीचे गिराये- न केवल परलोक में अपितु इस लोक में भी जीवन दुःखमय बना दे और पुण्यकर्म वह है जो पूर्णत्व प्रदान करे- इस लोक में आपको भरा-पूरा रखे और परलोक में शाश्वत धाम दिला दे। जो जन्म-मरण का कारण बनता है वह पापकर्म है और जो उससे उबार कर शाश्वत परमधाम दिला दे वह पुण्यकर्म है। यह पुण्य एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करने और उसके लिये निर्धारित क्रिया के करने से मिलता है। आत्मदर्शन की निर्धारित क्रिया के आचरण से संसार के सारे भोग तो मिलते ही हैं- ‘सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अन्तकाल रघुपति पुर जाहीं।।’ (मानस, ७/१४/४) अन्त में शाश्वतधाम में प्रवेश भी मिल जाता है। इतने पर भी लोग दुःखी हैं तो हमारी दुःख, दैन्य और गरीबी का कारण मात्र एक परमात्मा में अश्रद्धा का होना ही है, अन्य कोई भी बाधक नहीं है।
सच्चाई, ईमानदारी, निष्कपट स्वभाव इत्यादि भी सचमुच ही पुण्य हैं; क्योंकि किसी व्यक्ति का ऐसा आचरण उसके स्वच्छ मन का प्रतिबिम्ब है। यदि दैनिक जीवन में कोई व्यक्ति सदाचारी है, रहन-सहन में सफाई है, चरित्र में गमक है तो आत्मिक पथ पर भी वह उसी सरलता से चल निकलेगा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (मानस, ५/४३/५)
अतः सन्त-सत्पुरुषों द्वारा अनुमोदित सदाचार, शिष्टाचार, सद्व्यवहार का पालन करते हुए आत्मदर्शन की नियत क्रिया में लगें। चिन्तन की नियत क्रिया में भी आपको केवल इतना ही तो करना है- एक परमात्मा में श्रद्धा, उसके नाम का जप और सद्गुरु का सान्निध्य। क्या आप इतना भी नहीं कर सकते? इतना ही तो धर्म है! जब इतना ही धर्म का मूल है तो इसके अतिरिक्त आप करते क्या हैं और क्यों करते हैं? अतः भली प्रकार गृहस्थी का निर्वाह करते हुए इसके लिये भी कुछ समय अवश्य दें। ‘जासु नाम पावक अघ तूला।’ (मानस, २/२४७/२) नाम-चिन्तन की अग्नि सुलगने भर की देर है फिर तो पाप की रूई लाख मन ही क्यों न हो, भस्म होते देर नहीं लगती। ‘राम नाम आधी रती, तुलसी पाप पहार।’– पाप का पहाड़ ही क्यों न हों, चिन्तन की सही प्रक्रिया पकड़ते ही वह भी स्वाहा हो जाता है। अस्तु सही विधि से चिन्तन में लगें।
विचार-विमर्श हेतु आपका एवं आपके सुझावों का सदैव स्वागत है।
।। ॐ।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)