मन मतंग मानै नहीं, जब लगि खता न खाय।
जैसे विधवा नारि कोउ, गर्भ रहे पछताय।।
महापुरुषों ने मन को कामनाओं में लिप्त, पशुवत् आचरण में प्रवृत्त, महान् उन्मादी एवं कठिनता से वश में होनेवाला देखकर एक मदमत्त हाथी की संज्ञा दी है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी कहा है-
मन करि बिषय अनल बन जरई।
होइ सुखी जौं एहिं सर परई।। (मानस, १/३४/८)
मनरूपी हाथी निरन्तर विषयानल में जलता रहता है, यदि ब्रह्मरस से पूरित भक्ति के सर में पड़ जाय तो सुखी हो जाय। यह मदान्ध मन ही पुरुष के अन्तराल में हाथी है जो भवाटवी में पड़ा हुआ है, संसार-सागर में पड़ा हुआ है, प्रार्थना कर रहा है। असहनीय पीड़ा का रूप प्रत्यक्ष हो गया है, अब गज छुटकारा चाहता है। वह नाम-जप जानता है अतः नाम में रत है। यदि मान लिया जाय कि वह पशु था, तब तो योगेश्वर श्रीकृष्ण और गोस्वामी तुलसीदास इत्यादि सम्पूर्ण महात्माओं की वाणी ही गलत हो जायेगी। ‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’ (गीता, ५/२)- योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली अहंता और ममतारूपी जड़ें नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हैं। शेष सब योनियाँ केवल भोग भोगने की हैं। पशु इत्यादि योनियाँ पूर्ण निवृत्ति का भाजन नहीं होतीं। गोस्वामीजी ने कहा है –
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।
सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। (मानस, ७/४३/७)
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। (मानस, ७/४२/७-८)
सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।। (मानस, ७/४३)
इस प्रकार मानव-तन ही साधन के लिए उपयुक्त है।
मनुज देह सुर–साधु सराहत, सो सनेह सिय पी के। (विनय०, पद १७५)
मनुष्य देह की सुर-साधु सराहना करते हैं; क्योंकि कल्याणकारी प्रभु के चरणों में प्रेम इसी तन में सम्भव है। गिद्धराज, काकभुशुण्डि, वानर हनुमान, भालू जामवन्त यह सभी सन्तों के नाम हैं। इन अनन्य भक्तों ने भजन की पूर्ति या रक्षा के लिए कुवेष बना रखा था-
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू।
जिमि जग जामवन्त हनुमानू।। (मानस, १/६/७)
ये सन्त भक्ति की रक्षा के लिए ही वेश बनाकर रहते थे, पशु नहीं थे।
मगरमच्छ काल का प्रतीक है। संसार का स्वरूप दर्शाते हुए गोस्वामीजी कहते हैं-
रबिकर–नीर बसै अति दारुन, मकर रूप तेहि माहीं।
बदनहीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं।। (विनय०, पद १११)
संसार मृगतृष्णा का सागर है, जिसमें एक मगर रहता है। उस मगर का शरीर नहीं है फिर भी चराचर को ग्रसे हुए है। काल ही मगर है, जिसने चराचर को परोसी थाली बनाकर अनवरत ग्रसने का कार्य प्रारम्भ किया है। संसार-सागर के तल में फँसा एवं मगर से स्वाभाविक ग्रसा हुआ मन जब तक अपनी शक्ति से लड़ता है तब तक काल का बन्धन कटता नहीं; किन्तु जब वह मन-वचन-कर्म से अपने बल का भरोसा खोकर एक ईश्वर पर निर्भर हो जाता है और चिन्तन की पकड़, स्थिति का एक नाम मात्र शेष रह जाती है, मन नाम में समाहित हो जाता है, इस निरोध के साथ ही परमात्मा स्वयं उतर आते हैं और सर्वत्र प्रसारित उस मगर, काल का अन्त कर ऐसे भक्त का उद्धार कर देते हैं। इस भव-सरिता में बहते हुए मानव का वास्तव में यही इलाज है जो सृष्टि से उद्धार की सदैव प्रयोगात्मक विधि-विशेष एवं मानव के लिए सदैव कल्याण का प्रशस्त पथ है। सृष्टि में उत्पन्न पुरुष की मनःस्थिति उपर्युक्त परिवेश में गज की तरह होती है तथा त्राण पाने के लिए छटपटाहटें भी इसी तरह ही होंगी। मोक्ष भी प्रभु-दर्शन के साथ सम्भव है।
इस संघर्ष में एक विशेषता यह भी थी कि सहस्र वर्षपर्यन्त मन (गज) स्वयं लड़ा और अन्त में उसने प्रभु को पुकारा। वह जीवित कैसे था? पानी में चारा कहाँ से मिला?
वास्तव में यह मन के निरोध की एक युक्ति है। चित्त सहस्रों प्रवृत्तियों में प्रवाहित है, कोई न कोई ऊधम करता रहता है। ज्योंही हजारों प्रवृत्तियों का निरोध हुआ, चित्त एक चिन्तन में समाहित एवं तद्रूप होकर मिट गया, त्योंही विष्णु- विश्व में अणु सत्ता परमात्मा प्रकट होकर बन्धन काटकर समाहित कर लेता है, यही उद्धार है। प्रभु सर्वस्व का हरण कर अपने स्वरूप की स्थिति प्रदान कर देते हैं इसलिए उन अवतारों में से एक यह भी ‘हरि’ अवतार है।
।। ॐ।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)