सनातन-धर्म

सनातनधर्म

धर्म के लिए झगड़े व्यर्थ हैं। विश्वभर में धर्म एक है, यदि दो है तो धोखा है। जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं। धर्म में सचाई नहीं है तो जीवन भी निरर्थक है।स्वामी अड़गड़ानन्द

बन्धुओ!

इस संसार में छोटे-से कीट से लेकर चक्रवर्ती सम्राट तक सभी किसी-न-किसी दुःख से निवृत्ति का यत्न करते हैं फिर भी दुःखों से छुटकारा नहीं मिलता। मृगतृष्णा के सदृश जिन विषयों के पीछे मनुष्य सुख समझकर दौड़ता है, प्राप्त होने पर वे भी दुःख ही सिद्ध होते हैं। लगता है, सुख कहीं इसके आगे है। इसीलिये आदिशास्त्र गीता में भगवान ने बताया- ‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।’ (गीता, ९/३३)- सुखरहित क्षणभंगुर शरीर पाकर मेरा भजन कर! इसी उपदेश पर चलकर पूर्व मनीषियों ने दुःख से परे सुख और नश्वर से परे शाश्वत की खोज आरम्भ की। उन्होंने शोध का परिणाम घोषित किया, श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः (श्वेताश्वतर उप०, २/५)- अमृत-अंश विश्वभर के लोग सुनें। वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्– मैंने उस परम पुरुष परमात्मा को भली प्रकार जान लिया है, जो आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्– प्रकाशस्वरूप और तम से परे है। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति– केवल उसी को जान लेने पर मृत्यु से छुटकारा मिल सकता है। नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वेताश्वतर उप०, ३/८; यजुर्वेद, ३१/१८)- इसके अतिरिक्त अन्य कोई शाश्वत सुख का मार्ग नहीं है।

अन्वेषण के इसी क्रम में याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी की कथा आती है। याज्ञवल्क्य का मन जब सांसारिक भोगों से तृप्त न हुआ तो ऋषियों से मिले, उनसे साधन-क्रम समझा और इसी परमात्मा की शोधहेतु जंगल में जाने लगे। अपनी भार्या मैत्रेयी को धन-दौलत देने लगे। मैत्रेयी ने पूछा- ‘‘क्या इस सम्पत्ति से मैं अमर हो जाऊँगी?’’ याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘‘नहीं, इससे इतना ही होगा कि जैसे धनी लोग जीवन-निर्वाह करते हैं, वैसे ही तुम भी करोगी।’’ मैत्रेयी ने कहा- ‘‘तो फिर यह सब लेकर भी क्या करूँगी, जिससे मृत्यु का भय बना रहे। वह वस्तु दीजिये जिससे मैं अमर हो जाऊँ, कोई शोक न रहे।’’ याज्ञवल्क्य ने उसे भी एक परमात्मा की प्राप्ति की विधि बतायी। आज भी वैदिक युग की महान् नारियों में मैत्रेयी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।

जीवन और मृत्यु के इसी रहस्य को जानने के लिए, दुःखों से बचने और समस्त प्राणियों को बचाने की विधि बताने के लिए ही गौतम बुद्ध ने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं इसे जान नहीं लूँगा, तब तक राजधानी कपिलवस्तु के भीतर पैर नहीं रखूँगा। महात्मा ईसा कहते हैं- (For what it is a man profited if he shall gain the whole world and lose his soul.) ‘‘इससे बड़ी हानि क्या होगी कि आदमी संसार भर का वैभव पा जाय; किन्तु अपनी आत्मा को ही खो दे। पहले ईश्वर के राज्य में प्रवेश पा लो, बाकी सभी चीजें तुम्हें अपने आप मिल जायेंगी।’’ मुहम्मद साहब भी कहते हैं- ‘‘बड़ा नुकसान उठाया उन्होंने, जिन्होंने अल्लाह को न जाना।’’ इस प्रकार सभी महापुरुषों का एक ही निर्णय रहा कि दुःखों से बचने के लिए, शाश्वत शान्ति और भौतिक समृद्धि के लिए भी परमात्मा को विदित कर लेना आवश्यक है।

स्मरणीय है कि सृष्टि के आदि में अविनाशी योग का उपदेश भगवान ने सूर्य को किया था। वह आदि धर्मशास्त्र था। सूर्य से उसी को मनु ने अपनी स्मृति में धारण किया। इस स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए महर्षि व्यास ने इसी आदिशास्त्र को सूत्र रूप में भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता और उसका विस्तार वेद के रूप में प्रस्तुत किया। वेदग्रन्थों की संख्या चार है, जिसे कालान्तर में समझने-समझाने के लिए आचार्यों ने उपवेद, वेदांग, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषदों की रचना की।

सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति (कठोपनिषद्, १/२/१५)- सभी वेद जिस एक परमात्मा का मनन करते हैं, उसी परमात्मा को देखने की विधि का वर्णन मुनियों ने सूत्ररूप में दर्शनशास्त्रों में किया। दृश्यते अनेन इति दर्शनम्– जिसके द्वारा उसे देखा जाय, ऐसे छः शास्त्र – सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं; किन्तु इसके अनुयायी ‘ईश्वर उपादान कारण है अथवा निमित्त कारण?, साधक अन्त में ईश्वर बन जाता है कि ईश्वर के समान?’- इन्हीं प्रश्नों में बाल की खाल निकालते-निकालते द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत इत्यादि साम्प्रदायिक संगठनों में संकुचित होते गये। शास्त्रार्थ प्रधान बन बैठा। हृदयस्थ परमपुरुष के शोध की क्रिया धूमिल पड़ गयी। एक धर्म के स्थान पर तान्त्रिक, पाशुपत, पांचरात्र, शाक्त, सौर, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, नागपंथी, जैन, बौद्ध, हीनयान, महायान, ब्रजयान, सौतांत्रिक, वैभाषिक, योगाचार, माध्यमिक, श्वेताम्बर, दिगम्बर, दक्षिणमार्गी, वाममार्गी- न जाने कितने सम्प्रदायों और परस्पर विरोधी पूजा-पद्धतियों का बाहुल्य हो चला। शाश्वत का पुजारी नश्वर के पीछे भटकने लगा।

आजकल संसार में प्रचलित प्रचार-प्रसार विरत सनातनी, हिन्दू, जैन, सिख, पारसी, यहूदी तथा प्रचार व संख्या-विस्तार में लगे बौद्ध, ईसाई और इस्लाम विचारधाराएँ धर्म नहीं हैं। महापुरुष प्रत्येक देश-काल में होते आये हैं। उनके उपदेशों को जीवित रखने के लिए संस्थाएँ बनायी जाती हैं, ग्रन्थ लिखे जाते हैं और उनकी मूर्ति भी बना ली जाती है- आदर्श पुरुष की स्मृति के लिए। किन्तु कालान्तर में संस्थाएँ, पूजन-स्थल, उनकी गद्दी पर बैठनेवाले आचार्य और उनके द्वारा परिवर्द्धित क्रियायें ही धर्म बन जाती हैं। महापुरुष गौण बना दिया जाता है। मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों में जाना ही धर्म बन गया है। राम, कृष्ण, ईसा और नानक के नाम धूमिल पड़ गये हैं। धर्म के स्थान पर प्रचलित ये विचारधाराएँ नाम तो लेती हैं आध्यात्मिकता का, जो उनमें से कब की विस्मृत हो चुकी है; उनमें रह गई है केवल असहिष्णु संगठन वृत्ति। हाँ, दूसरे सम्प्रदायों से लड़ने के लिए सभी एक हैं।

अपने को सनातन कहनेवाला हिन्दू-धर्म भी दो भागों में बँटा है- श्रौत-धर्म और स्मार्त-धर्म। श्रौत-धर्म में संस्कार और कृतियाँ आती हैं, जिनका उल्लेख वैदिक संहिताओं में है, जैसे- अग्नियों की प्रतिष्ठा, यज्ञ और सोमकृत्य, जिन्हें आज का समाज जानता भी नहीं। स्मार्त-धर्म में उन कर्तव्यों की चर्चा है जिनका वर्णन मनु तथा अन्य महापुरुषों के नाम से प्रचारित तथाकथित स्मृतिग्रन्थों में है, जिन्हें धर्मशास्त्र भी कहा जाता है।

इन तथाकथित धर्मशास्त्रों में धर्म के कई रूप मिलते हैं, जैसे- विशिष्ट धर्म वह है जिसका पालन वर्ण-विशेष अथवा आश्रम-विशेष के सदस्यों द्वारा आवश्यक ठहराया गया है, जैसे- अपनी जीविका के लिए ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ और दान का आश्रय ले। क्षत्रिय रक्षा-कार्य देखे। वैश्य कृषि, गो-रक्षा और व्यापार करे तथा शूद्र सेवा करे। आश्रम-धर्म में जीवन के प्रारम्भिक पचीस वर्षों तक विद्याध्ययन, पचास वर्षपर्यन्त शादी-विवाह और परिवार का पालन-पोषण, इसके उपरान्त वानप्रस्थ आश्रम में गृह त्यागकर विषयों के प्रलोभन से मुक्त होने का प्रयास तथा पचहत्तर वर्ष के बाद मोक्ष-साधन की योजना रखी गयी।

सामान्य धर्म वे हैं, जिनका पालन सभी को करना था, जैसे- किसी जीव को कष्ट न देना, सच बोलना, लेन-देन में ईमानदारी बरतना, दान-दया-क्षमा। इनके साथ ही चोरी, व्यभिचार, अभक्ष्य भोजन, ईर्ष्या, चुगलखोरी, मान-सम्मान, छल-कपट इत्यादि का त्याग तथा यज्ञ, दान और तप इत्यादि काम्यकर्मों को अपने स्वार्थ के लिए न करना धर्म बताया गया है।

निमित्त धर्म विशेष अवसरों पर किये जाते हैं। देश-धर्म और युग-धर्म की भाँति आपत्ति काल में इन नियमों में दी गई शिथिलता को आपद्-धर्म तथा राजकीय कर्तव्यों को राजधर्म कहा गया है। परधर्म उसको कहा गया, जिसके अनुयायी भिन्न हों। इसी प्रकार चल-धर्म कुछ काल तक ही रहनेवाले धर्म और धर्माभास को कहा जाता है। यह राजा का कर्तव्य है कि जो इन धर्मों से च्युत हो रहे हैं, उन्हें इनकी ओर बढ़ने के लिए नियन्त्रित करे।

आप विचार करें कि धर्म की इस अवधारणा में परमात्मा की खोज किस सीमा तक है? यह मात्र सामाजिक व्यवस्था है। चार वर्णों के रूप में यह समाज का स्तरीकरण और चार आश्रमों के रूप में मानव-आयु का स्तरीकरण मात्र है। समाजविरोधी कार्यों के उन्मूलन की जो व्यवस्था आज राज्य करता है, वही कार्य प्राचीनकाल में ये तथाकथित स्मृतियाँ धर्म के नाम पर कराती थीं – क्या यह धर्म है?

सनातन-धर्म के नाम पर रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ पूजी जा रही हैं। संसार भर में हिन्दू सबसे अधिक श्रद्धा से भजन करता है; किन्तु सबसे बड़ा अधार्मिक भी वही है। जाति, देवता और भ्रान्तियाँ – बस इतना ही तो सनातन-धर्म रह गया है।

यदि वर्ण और आश्रम-व्यवस्था ही सनातन-धर्म है, तब तो यह शूद्रों के लिए बेकार है। धर्म के एक भी वाक्य पर विचार करने मात्र से उनके लिए नरक आरक्षित है। उन्हें पढ़ने का अधिकार ही नहीं था। ब्रह्मचर्य आश्रम उनके लिए नहीं था फिर उन्हें संन्यास क्यों होता? जब बुनियाद ही समाप्त हो गई तो मकान कैसे बनेगा? उन्हें सिखाया ही कब गया कि वे वैराग्य के लिए तड़पें? यदि यही सनातन-धर्म है तब तो यह समाज के गिने-चुने विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का धर्म है।

आधुनिक सुधारवादी आचार्य देशसेवा, सदाचार और परस्पर मानव-प्रेम को ही सनातन-धर्म मान बैठे हैं। यदि यही सनातन-धर्म है तब तो आपको ये गुण विदेशों से सीखने होंगे; क्योंकि देशभक्ति, ईमानदारी के क्षेत्र में आपसे कहीं अच्छे कीर्तिमान् विदेशों में स्थापित हैं। फिर भारत विश्वगुरु कैसा? पचास करोड़ हिन्दुओं के बीच तैंतीस करोड़ से भी अधिक देवता, उनके हिस्से में पड़नेवाला डेढ़-डेढ़ हिन्दुओं का संगठन ही क्या सनातन-धर्म है?

वस्तुतः ये धर्म नहीं, बल्कि भयंकर भ्रम हैं। इन्हीं सबों ने देश को गुलाम बनाया – राजनीति ढंग से और वैचारिक ढंग से भी। जैसा समय रहा, परिस्थिति रही, उसी के अनुसार ये सामाजिक हथकण्डे धर्म के नाम पर अपनाये गये। किसी समय की सती-प्रथा की तरह आज भी जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, वेश्यावृत्ति, देवदासी-प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, नशाखोरी, विवाह-तलाक, शाकाहार-माँसाहार, पेशों का निर्धारण, जनसंख्या-नियोजन इत्यादि विशुद्ध सामाजिक समस्याएँ हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए समाज और समाज के बहुमत पर आधारित शासन-तन्त्र है। यह न तो धर्माचार्यों का क्षेत्र है और न उन्हें इसमें टाँग अड़ाना चाहिए।

मानव-समाज गतिशील है अतः सामाजिक व्यवस्था के सम्बन्ध में आज के उपयोगी नियम, प्रथाएँ, आचार-विचार, आहार-विहार इत्यादि भी कल की परिस्थिति में अनुपयोगी हो सकते हैं, इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि जिन रीति-रिवाजों और संस्थाओं को हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया, उन्हें हम उनकी धरोहर समझकर ज्यों-का-त्यों अपनाये रहें। धर्म के नाम पर प्रचारित इन रिवाजों में काव्य है, चरित्र संगठन है तथा सामाजिक व्यवस्था भी निःसन्देह है; किन्तु यह धर्म कैसे हो गया? एक समय वही आवश्यक था, आज बाधक है- यह पहचानकर हम आदर के साथ उसका विसर्जन कर सकते हैं और इनके विसर्जन के दिन आये भी हैं।

प्राचीनकाल की यज्ञ-प्रथा, बलि-प्रथा, दास-प्रथा, स्वयंवर-प्रथा समाप्त हो गयी। इन्द्र और वरुण की पूजा तिरोहित हो गई, उनके स्थान पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और नये-नये देवी-देवता स्थानासीन हुए। सोमयज्ञ के स्थान पर अखण्ड कीर्तन और अखण्ड रामायण हो रहा है। स्त्रियों और शूद्रों-सम्बन्धी निर्देश, भोजन, बर्तन, पहनावा, पेशा सभी कुछ तो बदलते जा रहे हैं। यदि यही सनातन-धर्म था तो बदल क्यों रहा है? जो बदल जाय, वह सनातन कैसा?

सनातन तो सदैव रहनेवाली सत्ता का नाम है। वह सत्ता है परमात्मा। एक ही परमात्मा सर्वत्र व्याप्त पहले भी था, आज भी है। यदि परमात्मा भी दो हैं तो उनके व्याप्त होने के लिए अलग-अलग सृष्टि चाहिए। वह एक ही है और रहेगा। उस एक को खोजना ही धर्म है, जैसा कि ऋषियों ने जाना था। सृष्टि में धर्म एक ही है- अमृत-तत्त्व की प्राप्ति, सदा रहनेवाले शाश्वत धाम की प्राप्ति। चराचर जगत् का धर्म एक ही है। यदि धर्म भी दो हैं तो एक में धोखा है, जरूर धोखा है।

‘धर्म’ शब्द आज केवल विशेषण बनकर रह गया है। स्थूल-धर्म, सूक्ष्म-धर्म, उप-धर्म, कुल-धर्म, गुण-धर्म, श्रौत-धर्म, वर्ण-धर्म, आश्रम-धर्म और भी बहुत से हैं। जो धर्म अभी कहे गये- इतने धर्मों के बीच वास्तविक धर्म अपनी पहचान खो चुका है। धर्म शब्द को उसके शुद्ध रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करने से व्रत-उपवास, तीर्थ-त्यौहार, शुद्धि-श्राद्ध, देवी-देवता, भूत-प्रेत, वृक्ष-पशु, नागपूजा तथा मूर्ति-मजारों की पूजा-जैसी कुरीतियाँ तो जल ही जायेंगी। सामाजिक नीति एवं अर्थ-व्यवस्था की उपयोगी बातों को भी धर्म कहना छोड़ना होगा। आज के परिवेश में यह स्पष्ट करना जरूरी हो गया है कि धर्म के अन्तर्गत केवल एक बात आती है- वह निर्धारित क्रिया, जिसे करने से आत्म-साक्षात्कार होता है।

धर्म का शुद्ध स्वरूप जानने के लिए धर्म जिनकी देन है, उन महापुरुषों द्वारा समझना होगा और उनकी शरण जाना होगा, अन्य कोई रास्ता नहीं है। पोथी को पढ़कर और पोथी के इर्द-गिर्द घेरा डालकर कोई धर्म को नहीं समझ सकता। वेद-शास्त्र सही तो हैं; लेकिन शास्त्र कोई विरला महापुरुष ही जानता है और उसके निर्देशन में कोई विरला पथिक ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं। वे महापुरुष ही शास्त्र को अक्षरशः जानने में सक्षम हैं, जिनके हृदय में वह शास्त्र उतर आया है।

वेद क्या है? उस परमात्मा की वाणी! परमात्मा तो बोलने आया नहीं। बोलनेवाले सौ-सवा सौ महापुरुष ही थे। कहीं नारायण ऋषि हैं तो कहीं कोई ऋषि। उन ऋषियों के अन्तःकरण में जो प्रस्फुटित हो रहा था, बुद्धि मात्र यन्त्र थी। उनके द्वारा जो व्यक्त होता था, परमात्मा अपना निर्देशन दे रहा था। उन महापुरुषों की वाणी का संकलन वेद है। आज भी जो इष्ट की परिधि में पहुँचेगा, उसके हृदय-देश में वह इष्ट अपनी वाणी, अपना निर्णय देगा कि सत्य क्या है, झूठ क्या है? जिसके हृदय में इष्ट जागृत है, जिसके हृदय में शास्त्र अवतरित हो रहा है, वही भली प्रकार जान पाता है कि पुराने शास्त्रों में क्या लिखा है? क्योंकि जो बात उनमें उतरी थी, वही इनमें उतर रही है। अस्तु, आइए देखें कि महापुरुषो ने ‘धर्म’ शब्द को किन अर्थों में लिया है? वैसे धर्म शब्द ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है- धारण करना। धारयतीति धर्मः। परमात्मा ही सबको धारण करने में सक्षम है, वही एकमात्र धर्म है। धर्म वह है कि जब हम उसकी ओर झुकाव लें तो वह हमें धारण कर ले, मार्ग बताने लगे, उँगली पकड़कर चलाने लगे, हृदय से रथी बन जाय, हृदय में ईश्वरीय आदेशों का सूत्रपात होने लगे।

यही मीमांसाकार जैमिनि कहते हैं कि चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः। (जैमिनी सूत्र, १/१/२) ईश्वरीय आदेशों का पालन ही धर्म का लक्षण है। अर्थात् जब तक हृदय से रथी होकर वह निर्देश न देने लगे और उसके अनुसार हम चलना आरम्भ न कर दें, तब तक सही मात्रा में धर्म के लक्षण प्रगट ही नहीं हुए।

‘वैशेषिक दर्शन’ में महर्षि कणाद कहते हैं- यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।– जिसके द्वारा जीवन की हर परिस्थिति में सर्वांगीण विकास हो तथा जो निःश्रेयस परमश्रेय की प्राप्ति करा दे, वही धर्म है।

न्यायशास्त्र के प्रणेता गौतम कहते हैं, विहित कर्मजन्यो धर्मः।– धर्म विहित कर्मजन्य है। विहित कर्म, नियत कर्म, कार्यं कर्म, पुण्य कर्म इत्यादि को गीता में एक ही ईश्वर-प्राप्ति की क्रिया कहकर सम्बोधित किया गया है जो यज्ञ की प्रक्रिया है, चिन्तन-विशेष है, आत्मदर्शन की पद्धति है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, अपने स्वभाव की क्षमता से नियत कर्म (यज्ञ की प्रक्रिया) का आचरण धर्माचरण है। आत्मा जिस विधि से विदित होती है, उस विधि को क्रियान्वित करते रहना धर्म का आचरण है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि तुम्हारी बुद्धि इसे क्रियान्वित करने में सक्षम न हो, तो सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाओ- यही है धर्म।

भगवान बुद्ध ने बताया कि सम्यक् वाणी, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् जीविका, सम्यक् कर्म, सम्यक् संकल्प, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि का जो भली प्रकार आचरण करता है, वह परिनिर्वाण को पा जाता है।

महाराज मनु के नाम से प्रचारित स्मृति-ग्रन्थ में यत्र-तत्र गीता के ही अंष हैं जिसमें धर्म के दस लक्षण बताये- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध (मनुस्मृति, ६/९२)। अध्याय २/१ में कहते हैं- विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः। हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत।। विद्वानों ने राग-द्वेषरहित हृदय से जिसे प्राप्त किया, उस नित्यपथ का सेवन धर्म है।

विद्वान् का अर्थ शिक्षाविद् नहीं होता। विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।– विद्या वह है कि जिसके पास आवे, उसे घसीटकर ब्रह्मगति प्रदान कर दे। वनवासकाल में भगवान राम ने लक्ष्मण से बताया कि विद्या और अविद्या माया के दो पहलू हैं। अविद्या अधोगति और भवकूप में डालनेवाली है। विद्या परमश्रेय को दिलानेवाली है, लेकिन वह है हरिप्रेरित। हम जिस सतह पर खड़े हैं, जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह हृदयदेश से जागृत हो जाय, हमें प्रेरित कर चलाने लगे।

यही कारण है कि योगपथ के जितने भी अच्छे विद्वान् हुए, पार्थिव शिक्षा-दीक्षा में शून्य थे। उग्र बुद्धिवाले काकभुशुण्डिजी उसे सुनते-समझते भी थे; किन्तु अच्छा नहीं लगा, नहीं पढ़े, फिर भी अपने युग के सर्वोपरि विद्वान् थे। जिस ज्ञानी गरुड़ का सन्देह ब्रह्मा भी दूर न कर सके, काकभुशुण्डि-आश्रम में जाते ही उनकी शंकायें दूर हो गयीं, समाधान निकल आया। तात्पर्य यह है कि भगवत्पथ में जिस विद्या का उपयोग है, उसे भगवान ही पढ़ाते हैं।

अतः जो व्यक्ति एक परमात्मा में अटूट श्रद्धा और ॐ अथवा राम (जो उस परमात्मा का परिचायक है) का स्मरण करता है, वह धर्म को न जानते हुए भी शुद्ध धार्मिक है।

इस प्रकार सभी महापुरुष एक ही परमात्मा को इंगित करते हैं, फिर भी लोग शाश्वत एकमात्र परमात्मा के स्थान पर नश्वर के पीछे भटक रहे हैं। धर्म के नाम पर आजकल जैसी कुरीतियाँ और रूढ़ियाँ फैली हैं, कुछ इसी प्रकार की रूढ़ियाँ श्रीकृष्णकाल में भी थीं। उनमें से कुछेक रूढ़ियों का शिकार अर्जुन भी था- कुल की रक्षा को सनातन-धर्म मानता था, पितरों को पिण्डा-पानी देना सनातन-धर्म मानता था। कहने लगा कि ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा, क्योंकि कुलधर्म ही सनातन-धर्म है; किन्तु योगेश्वर ने कहा- अर्जुन! इस विषम स्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? अर्जुन सनातन-धर्म की रक्षा के लिए आहें भर रहा था। तो क्या सनातन-धर्म की रक्षा भी अज्ञान है? श्रीकृष्ण ने बताया कि जिन बातों के लिए तू विकल है, न तो श्रेष्ठ पुरुषों ने इस पर कभी कदम रखा है, न यह कीर्ति बढ़ानेवाला है और न ही स्वर्ग देनेवाला है। कल्याण नहीं, कीर्ति नहीं, सम्भावित पुरुषों ने भूलकर भी कभी आचरण नहीं किया, तो सिद्ध है कि वह सब अज्ञान था।

तब अर्जुन ने विनीत भाव से पूछा- भगवन्! यदि यह धर्म नहीं है तो मैं धर्म नहीं जानता। धर्म के रास्ते में मैं विशेष रूप से मूढ़चित्त हूँ। अतः जो निश्चित रूप से कल्याणकारी है, वह आप मेरे प्रति कहिये।

भगवान ने बताया- अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है। वह सत्य क्या है? तब कहते हैं- अर्जुन! यह आत्मा ही सत्य है, आत्मा परम सत्य है, आत्मा ही सनातन है और ये सम्पूर्ण भूतादिकों के शरीर नाशवान् हैं। इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। शरीरों को रोका नहीं जा सकता। आत्मा ही शाश्वत है।

आप कौन हैं? सनातनधर्मी! सनातन क्या है? आत्मा! तो सनातनधर्मी कौन हुआ? आत्मा का पुजारी! यदि आत्मिक पथ की जानकारी नहीं है तो हम सनातनधर्मी कैसे हो गये? इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, वायु सुखा नहीं सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता, आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। पंचतत्त्वों से निर्मित कोई भी पदार्थ जब इस आत्मा का स्पर्श ही नहीं कर पाते, तब भला पंचतत्त्वों से निर्मित अन्न-जल इसका कैसे स्पर्श कर सकते हैं? फिर किसी के छूने से अथवा किसी के हाथ का दो ग्रास चावल खाने से, दो घूँट पानी पीने से हमारा शाश्वत, सनातन-धर्म नष्ट कैसे हो गया? सिद्ध है कि हमारे पूर्वज धर्म के नाम पर जिसका पालन करते थे, वह भूल थी तभी तो श्रीकृष्ण ने इसका खण्डन किया। यह भूल आज भी है जिसके कारण सगे भाइयों को हमने सनातन-धर्म से अलग होने के लिए विवश कर रखा है।

जब शरीर ही नाशवान् है, तब इसके जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था सनातन कैसे हो गई? शरीर-पोषण के लिए व्यवसाय पर आधारित वर्ण-व्यवस्था सनातन कैसे हो गई? अचलोऽयं सनातनः (गीता, २/२४)- यह सनातन आत्मा अचल है, शाश्वत है, अपरिवर्तनशील है, तो बदल कैसे गया? सनातनधर्मी का धर्म-परिवर्तन कैसे हो गया? क्या सनातन बदल गया? नहीं! और जिन्होंने इस प्रकार का परिवर्तन किया अथवा कर रहे हैं, वे केवल एक प्रकार की कुरीति छोड़कर दूसरी कुरीति में फँसते जा रहे हैं, न कि उन्हें कोई धर्म मिल रहा है। वे धर्म को जानते ही नहीं। यदि हम आत्मपथ को नहीं जानते, आत्मस्थिति दिला देनेवाली विधि-विशेष को नहीं जानते, तो सनातन-धर्म से हमारा कैसा सम्बन्ध? भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं। ब्रह्मा से उत्पन्न चराचर जगत् परिवर्तनशील, अशाश्वत और क्षणभंगुर है, फिर भी कोई पेड़ पूज रहा है तो कोई पत्थर – वह भी सनातन के नाम पर!

आत्मा अकाट्य, अशोष्य और अपरिवर्तनशील है। वह सर्वत्र, सब में सदा एकरस है। उसे खोजने और पाने की स्थली हृदय-देश है, बाहर नहीं- हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (गीता, १८/६१); किन्तु अकाट्य, अशोष्य, अजर-अमर जैसी कोई सत्ता भीतर दिखायी तो नहीं पड़ती, सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर शोक-सन्ताप, मृत्यु और मोह ही दिखायी पड़ता है। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यह आत्मा है तो ऐसा ही; किन्तु अचिन्त्य और अगोचर है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह अगोचर है, दिखाई नहीं देता। अगोचर का यह अर्थ नहीं कि भगवान इन्द्रियों के रहते दिखायी ही नहीं देंगे। वे दिखायी देंगे किन्तु संयम के पश्चात् उन प्रभु की दृष्टि से। एकादस अध्याय में उन्होंने स्वयं कहा कि अनन्य भक्ति से मुझे देखा जा सकता है और मुझमें प्रवेश पाया जा सकता है।

अब एक नवीन प्रश्न खड़ा हो गया कि चित्त का निरोध कैसे हो? इसके लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू कर्म कर। वह नियत कर्म है यज्ञ को कार्यरूप देना। आरम्भ में दैवी सम्पद् के गुणों को हृदय में भली प्रकार धारण करना यज्ञ है, आहार और इन्द्रियों का संयम यज्ञ है। साधना सूक्ष्म होने पर श्वास-प्रश्वास का जप यज्ञ है। यज्ञस्वरूप महापुरुष का ध्यान करना यज्ञ है। इस प्रकार चौदह अंगों से यज्ञ का चित्रण अध्याय चार में प्रस्तुत किया, जो सब मिलाकर चित्त के निरोध की विधि-विशेष हैं, जिनके आचरण से प्राणों का आयाम हो जाता है- न भीतर से संकल्प उठते हैं और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प अन्दर प्रवेश कर पाते हैं। यही चित्त की अचिन्त्य अवस्था है, मन की निरोधावस्था है, साम्यावस्था है।

प्राणों का व्यापार शान्त होते ही यज्ञ पूरा हो जाता है, परिणाम निकल आता है, जैसा कि अगले ही श्लोक में कहते हैं- यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। (गीता, ४/३१)- यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी संरचना करता है, वह अमृत है। उस ज्ञानामृत को प्राप्त करनेवाला योगी सनातन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। पहले कहा- आत्मा सनातन है, यहाँ कहते हैं- ब्रह्म सनातन है। वस्तुतः आत्मा, परमात्मा, तत्त्व, परमतत्त्व, ईश्वर, सच्चिदानन्द, भगवान, शाश्वत, ब्रह्म इत्यादि एक ही परमात्मा के विविध नाम हैं।

इस प्रकार चित्त की अचिन्त्यावस्था में, निरोधावस्था में वह अगोचर सनातन इन्हीं इन्द्रियों में प्रवाहित हो गया। प्रवाहित ही नहीं, प्राप्त हो गया; किन्तु इतने पर ही योगेश्वर श्रीकृष्ण नहीं रुकते। वे यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।; जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (मानस, २/१२६/३)। उन्हीं के शब्दों में देखें- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। (गीता, ५/१९)- उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। अब समत्व की स्थिति से और संसार को जीतने से क्या सम्बन्ध है? यदि संसार जीत ही लिया तो वह गया कहाँ? रुका कहाँ पर? इस पर कहते हैं कि ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी समत्व की स्थितिवाला हो गया। तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः– इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

यह स्थिति जिस यज्ञ से मिली है, उसी यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। इसलिए कर्म पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता, अध्याय २ के ३९वें श्लोक में बतलाया कि अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन को भली प्रकार नष्ट करेगा। अतः कर्म उसे कहते हैं जो कर्म-बन्धन से छुड़ा दे। इस नियत कर्म की दूसरी विशेषता बताते हैं- नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति– इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता। अगर कर्म आरम्भ भर कर दे तो उस पुरुष का और उस क्रिया का कभी नाश नहीं होता, कल्याण करके ही छोड़ेगा। अभी हुआ नहीं, किन्तु कल्याण का आरक्षण भली प्रकार हो चुका। इस जन्म में जहाँ से साधन छूटता है, अगले जन्म में वहीं से शुरू करता है। दो-चार जन्म के अन्तर से वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति है। इसी कर्म की तीसरी विशेषता बताते हैं कि प्रत्यवायो न विद्यते– इस कर्म को करने से विपरीत और सीमित फलरूपी दोष भी नहीं मिलता कि आपको स्वर्ग-बैकुण्ठ, ऋद्धियों-सिद्धियों, धर्मशाला-पाठशाला, आश्रम या लिप्सा में उलझाकर खड़ा कर दे। चौथी विशेषता है कि स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। (गीता, २/४०)- इस धर्म का थोड़ा-सा भी पालन जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है।

किस धर्म का? इसी नियत कर्म का आचरण ही धर्म है। यहीं से धर्म का आचरण शुरू होता है, जिसके परिणाम में सनातन विदित हो जाता है। जिस कर्म का आचरण ही धर्म है, उसी कर्म को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने साधकों की अन्तःदुर्बलता के आधार पर चार भागों में बाँटा। अध्याय ४ के १३वें श्लोक में वे कहते हैं कि चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं’- चार वर्णों की संरचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँटा? कहते हैं कि नहीं, गुणकर्मविभागशः (गीता, ४/१३)- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा।

गुण इस विभाजन का मापदण्ड है। जब अन्तःकरण में तामसी गुण का बाहुल्य है तब आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्त्तव्य-कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, अकर्त्तव्य-कार्यों को न पहचानने का स्वभाव होगा। मोहमयी प्रवृत्तियों का दबाव रहता है। दो घण्टे ध्यान लगाता है तो दस मिनट भी मन की स्थिरता अपने पक्ष में नहीं पाता- ऐसी परिस्थिति में धर्म का आचरण कहाँ से शुरू करे? इस पर कहते हैं, परिचर्यात्मकं कर्म (गीता, १८/४४)- इसी कर्म को सेवा से शुरू करो।

ठीक इसी प्रकार अर्द्ध-तामसी गुण समाप्त हो गये हैं तो वैश्य है। ध्यान में मन लगने लगेगा, इन्द्रिय-संयम की क्षमता होगी। तामसी गुण के साथ आधा राजसी गुण भी शान्त हो गया और आधा सात्त्विक गुण भी आ गया, तहाँ क्षत्रिय वर्ण की योग्यतावाला है। वह प्रकृति के द्वन्द्व में न घबड़ाने का स्वभाववाला, शौर्य-तेज से संयुक्त होगा और इसी निष्काम कर्म को भली प्रकार चरितार्थ करेगा। तामसी और राजसी गुण बिल्कुल शान्त हो गये हों, सात्त्विक गुण ही कार्य में हो, वहाँ उसके स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली योग्यता होती है। अतः वह ब्राह्मण श्रेणी का व्यक्तित्व है। इसमें मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, तप, धारणा, ईश्वरीय अनुभूति इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली योग्यता सहज ही स्वभाव में प्रवाहित है, इसलिए ब्राह्मण श्रेणी के कर्म का कर्त्ता है। यह सब स्वभावप्रभवैर्गुणैः (गीता, १८/४१)- स्वभाव में उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर बनते हैं और इसी के अनुसार कर्म करना इस व्यक्ति का धर्म है।

अध्याय १८ के ४५वें श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।– स्वभाव से उत्पन्न कर्म की क्षमता के अनुसार कर्माचरण करके मनुष्य भगवत्-प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को प्राप्त होता है। अर्जुन! जिस प्रकार स्वभाव में पायी जाने वाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मुझसे सुन। आप सब भी उस विधि पर ध्यान दें। (अध्याय १८, श्लोक ४६) विधि है कि जिस परमात्मा से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, उस परमात्मा को स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार अर्चन करके, भली प्रकार श्रद्धा से पूजकर (जिसका चित्रण समूची गीता में स्थान-स्थान पर है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है। इससे स्पष्ट है कि इस कर्म-पथ में एक परमात्मा का अर्चन, सर्वांगीण पूजन करना तथा क्रमागत सोपान से चलना ही मुख्य विधि है।

आगे इसी को धर्म कहकर सम्बोधित किया। (देखें- गीता, १८/४७) श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।– स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होना हमारा धर्म है, दायित्व है। वह शूद्र श्रेणी का ही क्यों न हो, सेवावृत्ति पर खड़ा हो, तब भी इसी स्तर से करे तो यह परमश्रेय को दिलानेवाला है। यदि अन्दर क्षमता नहीं है और क्षमतावालों की नकल करना चाहें, भली प्रकार अनुष्ठान की भी कोशिश करें तब भी भय को ही प्राप्त होंगे, परमश्रेय को नहीं। इसलिए स्वभाव से उत्पन्न कर्म की श्रेणी के अनुसार धर्माचरण करके आप सम्पूर्ण पापों से अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जायेंगे।

साथ ही, ब्राह्मण श्रेणी का कर्म भी दोषों से पूर्ण है; क्योंकि प्रकृति का अन्तिम सात्त्विक गुण अभी जीवित है। वहाँ भी पतन के लक्षण विद्यमान हैं, वह गिर भी सकता है। इसलिए गुण जब तक शान्त न हो जायँ, तब तक स्वभाव से उत्पन्न कर्म ही हमारा स्वधर्म है। इसका क्रमागत पालन करते हुए मनुष्य उस शाश्वत, अमृततत्त्व आत्मभाव को भली प्रकार विदित कर लेता है। दर्शन, स्पर्श और प्रवेश पा जाता है। इसलिए इस कर्म का पालन ही धर्म का पालन है।

गीता के अनुसार इस धर्माचरण का अधिकारी कौन है? कहीं आप यह तो नहीं मान बैठे हैं कि धर्म तो साधु-महात्माओं के लिए है, गृहस्थ इसे कर पायेगा या नहीं? इस पर कहते हैं (अध्याय ४/३६)- अर्जुन! तू सभी पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला ही क्यों न हो (अध्याय ९ का तीसवाँ श्लोक भी कि अपि चेत्सुदुराचारो– अर्जुन! अत्यन्त दुराचारी भी), यदि अनन्य अर्थात् अन्य न, मुझे छोड़कर किसी अन्य देवता को न भजते हुए केवल मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा (गीता, ९/३१)- वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है।

अतः आप अत्यन्त दुराचारी ही क्यों न हों और अन्य बहुत से दुराचारों की योजना भी क्यों न बनाते हों, यदि एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा और उसकी प्राप्ति की क्रिया – यज्ञ की प्रक्रिया कर्म में श्रद्धा के साथ लगते हैं तो आप सन्त हैं, शुद्ध धार्मिक हैं। हाँ, क्रिया के लिए तत्त्वदर्शी के प्रति श्रद्धा और सान्निध्य आवश्यक है। उस परमात्मा के अतिरिक्त सृष्टि में कुछ भी सत्य नहीं है, अन्य किसी के पूजन का विधान नहीं है।

नोट इतना स्पष्ट निर्देश होते हुए भी लोग पत्थर-पानी पूजते ही रहते हैं। कहते हैं- ‘क्या पत्थर में भगवान नहीं हैं? मूर्तिपूजा सगुणोपासना है। हृदय में ध्यान लगाना तो ज्ञानमार्ग है। वस्तुतः यह सब भ्रान्तियाँ हैं। आइये, गीता के ही आलोक में इस प्रश्न पर भी विचार कर लिया जाय।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा अकाट्य है, अशोष्य है, सनातन है, अमृतस्वरूप है, सदा और सर्वत्र रहनेवाला यही एक शाश्वत है। प्रश्न उठता है कि- क्या आप भगवान होने के नाते ऐसा कहते हैं? श्रीकृष्ण ने समाधान किया कि- नहीं, अर्जुन! अजर-अमर-शाश्वत-सनातन-सर्वव्यापी-अमृतस्वरूप इत्यादि गुणधर्मों से युक्त आत्मा को तत्त्वदर्शियों ने भली प्रकार देखा है। किसने देखा? तत्त्वदर्शियों ने! न दस भाषा के विद्वान् ने देखा, न व्याकरण रटनेवाले ने और न किसी समृद्धिशाली ने देखा, बल्कि तत्त्वदर्शियों ने देखा। श्रीकृष्ण भी उसी सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसको तत्त्वदर्शियों ने कभी देख लिया था। वह सत्य सदैव एक ही जैसा रहा। समय-समय पर उस सत्य के नाम पर भ्रान्तियाँ आती ही रही हैं। जितने भी महापुरुष संसार में हुए हैं, सबने इन भ्रान्तियों का निराकरण करके समाज को पुनः सत्य के उसी प्रशस्त पथ पर खड़ा किया है। श्रीकृष्ण ने भी वही कहा, जो ऋषिभिर्बहुधा गीतम् (गीता, १३/४)।

अब एक नवीन प्रश्न खड़ा हो गया कि वह तत्त्वदर्शन क्या है? तत्त्वदर्शी कौन है? क्या हम भी तत्त्वदर्शी हैं? इस पर अध्याय १८, श्लोक ५१-५३ में कहते हैं कि अर्जुन! तत्त्वदर्शन की चाहवाले पुरुष को चाहिए कि एकान्त-देश का सेवन करे। इन्द्रियों को विषयों से भली प्रकार समेटकर मन को ध्यान में लगावे। वैराग्य में रहते हुए (वैरागी का वेश बनाकर नहीं) सतत ध्यान में लगते-लगते काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर- ये बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ जब भली प्रकार शान्त हो जायँ तथा विवेक, वैराग्य, शम, दम, धारणा, ध्यान और समाधि भी परिपुष्ट हो जायँ, इनमें स्थिति आ जाय तो उस समय वह ब्रह्म को जानने योग्य होता है।

आवश्यकता तो थी तत्त्व की! एक नयी बात बीच में आ गई कि वह व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है। वस्तुतः तत्त्व, ब्रह्म, भगवान, आत्मा, ईश्वर सब एक ही हैं।

जिन योग्यताओं की सम्पूर्ण दक्षता में व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है, श्रीकृष्ण के शब्दों में उस योग्यता का नाम पराभक्ति है अर्थात् भक्ति पराकाष्ठा पर है, अपना परिणाम देने की अवस्था में है। इस पराभक्ति की अवस्था में वह पुरुष तत्त्व को जानता है।

वह तत्त्व को जानता तो है किन्तु वह तत्त्व है क्या? पाँच तत्त्व या पचीस तत्त्व, जैसा कि लोग गणना बैठाते रहते हैं। यह तत्त्व प्रकृतिजन्य है। इस पर श्रीकृष्ण बताते हैं- नहीं, मैं जो हूँ, अजर-अमर-शाश्वत-अलौकिक जिन गुणधर्मोंवाला हूँ, मुझको जानता है और मुझे जानकर तत्क्षण वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है। तत्त्व माने वह परमात्मा। प्राप्तिकाल में साधक पहले भगवान को देखता है; किन्तु दूसरे ही क्षण वह स्वयं में ही अजर, अमर, शाश्वत, सनातन इत्यादि गुणधर्मों से ओतप्रोत अपनी आत्मा को देखता है। वह है तत्त्वदर्शी। उन तत्त्वदर्शियों ने देखा कि आत्मा या परमात्मा शाश्वत है, सनातन है। यह उनकी अनुभूति है कि वह कण-कण में व्याप्त है- ईशावास्यमिदं सर्वम् (ईशावास्य उप०, १); सीय राम मय सब जग जानी (मानस, १/७/२); वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः। (गीता, ७/१९) अब वह महान् आत्मा है। पत्थर-पानी पूजकर वह तत्त्वदर्शी तो हुआ नहीं; किन्तु आरम्भिक साधना के प्रवेश वे ही हैं।

हमारे आपके लिए जैसा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अपने स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार नियत कर्म (यज्ञ की प्रक्रिया) का आचरण ही धर्म है, जिसकी विधि वे गीता में बता आये हैं, जिससे कि विधि के नाम पर भी पाखण्ड करने की कोई गुंजाइश न रहे। परमात्मा के शोध की स्थली हृदय-देश है। तमेव शरणं गच्छ (गीता, १८/६२)- उसी हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाने का योगेश्वर स्पष्ट निर्देश देते हैं। उसकी अनुभूति की स्थली भी हृदय ही है, आत्मनि विन्दति; बाहर कहीं नहीं। अतः जो लोग बाहर तत्त्वप्राप्ति की आशा लगाये बैठे हैं, भ्रम में हैं। भले ही भगवान सर्वत्र हों किन्तु प्राप्त होते हैं हृदय में ध्यान करने से ही। हृदि अयम्– यह हृदय में है, यही हृदय शब्द की निष्पत्ति भी है।

सारांशतः योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही सनातन है, वही अविनाशी अमृततत्त्व है। उस परमतत्त्व को पाना हमारा-आपका, मानव मात्र का दायित्व है। इसी दायित्व को योगेश्वर श्रीकृष्ण आपका धर्म कहकर सम्बोधित करते हैं। यही सनातन-धर्म है। सनातन-धर्म क्या है? सनातन तक की दूरी को तय करानेवाली क्रिया का आचरण !

अब यदि आप आत्मदर्शनवाली विधि-विशेष को, आत्मदर्शनवाली प्रक्रिया को नहीं जानते तो धर्म नाम की कोई वस्तु आपके पास नहीं है। यदि धर्म के लिए आहें भरते हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं किन्तु धार्मिक नहीं। उसके लिए हृदय में छटपटाहट भले हो किन्तु वस्तु तो तभी सम्भव होगी जब क्रिया उपलब्ध हो, एक परमात्मा में श्रद्धा हो।

एक परमात्मा की भक्ति सृष्टि का एकमात्र धर्म है। उसी एक धर्म को गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में चार प्रकार से समझाया है कि (१) धरमु न दूसर सत्य समाना, (२) परहित सरिस धर्म नहिं भाई, (३) परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा, और (४) एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। चारों का अर्थ एक है, क्रिया एक है और परिणाम भी एक ही है। इनमें से प्रस्तुत है सर्वप्रथम-

धरमु न दूसर सत्य समाना।

आगम निगम पुरान बखाना।। (मानस, २/९४/५)

अर्थात् सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है- जिसकी प्रशंसा वेद, पुराण तथा शास्त्रों में है। प्रश्न उठता है- सत्य क्या है? कोई कहता है- मैं सच बोलता हूँ, झूठ मत बोलो। कोई कहता है कि पृथ्वी डोलती है- यह सच है, तो कोई कुछ कहता है। लोगों ने नश्वर प्रकृति में सच और झूठ की सीमाएँ बना रखी हैं। कोई उन सीमाओं में कहता है तो सत्य और इस परिधि से बाहर बोलता है तो झूठ। विनयपत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं- कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै। कोई इस सृष्टि को सत्य कहता है तो कोई इस संसार को मिथ्या कहता है, तो कोई ब्रह्म और संसार दोनों को ही सत्य मानता है। किन्तु तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै। तुलसीदासजी कहते हैं कि ये तीनों विचार भ्रामक हैं। इन तीनों भ्रमों का परित्याग करने पर ही आत्मानुभूति सम्भव है। अर्थात् सृष्टि में कहीं सत्य है ही नहीं- झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। (मानस, ७/३८/७) जगत् का व्यवहार सब झूठा है। भगवान शिव का निर्णय है, जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई। (मानस, १/१११/२)- जिसे जान लेने पर जगत् ही खो जाता है, जिस प्रकार जग जाने पर स्वप्न का भ्रम समाप्त हो जाता है। अर्थात् जगत् एक भ्रम है जो खो जाता है। उन प्रभु को जान लेने के पश्चात् यह जगत् सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। जो समाप्त हो जाय, उसमें सत्य ही क्या है? जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वह सत्य कैसा? सृष्टि सत्य या असत्य अथवा दोनों ही है- ऐसे विचार भ्रामक हैं। इन तीनों ही विचारों को जो त्याग देता है, वही अपने स्वरूप को पहचानता है। अस्तु, सृष्टि में सत्य है ही नहीं। तो सत्य है क्या? इस पर उन महापुरुष ने स्वयं निर्णय दिया-

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनन्द रासी।।

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।

सकल जीव जग दीन दुखारी।। (मानस, १/२२/६-७)

वह प्रभु कण-कण में व्याप्त है। एक है, आज तक एक के सिवाय दो कभी हुआ नहीं। वह बृहत् है इसलिए ब्रह्म कहा जाता है। वह अविनाशी है जिसका कभी विनाश नहीं होता। वह सत्, चेतन और आनन्द की राशि है। वही परम सत्य है। ऐसा प्रभु सबके हृदय में वास करता है। वह अविकारी है। कोई कुत्ता, बिल्ली कुछ भी खाता हो, उन विकारों से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह द्रष्टा के रूप में हृदय-देश में विद्यमान है। ऐसा परमात्मा जो हृदय-देश में है, उसे विदित कैसे किया जाय? नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।। (मानस, १/२२/८) पहले तो नाम का निरूपण करना चाहिए कि नाम है क्या और जब समझ में आ जाय तो दिन-रात उसके लिए यत्न करें जिससे वह प्रकट जो जाय। एक ही नाम को जपने के लिए कई श्रेणियाँ पार करनी पड़ती हैं। राम नाम में अन्तर है, कहीं हीरा है कहीं पत्थर है। नाम वही है, किसी ने चौबीस घण्टे जपा, कुछ कंकड़ हाथ लगा। उसी नाम को किसी ने उतना ही जपा, हीरे हाथ लग गये। नाम जपने की विधि महापुरुषों के द्वारा जागृत होती है। उनके निर्देशानुसार चलना ही धर्म है। केवल श्रद्धा समर्पित कर नाम-जप के द्वारा उस परमात्मा को, जो आपके हृदय-देश में है, जगाना भर है। उस परमात्मा के प्रति समर्पण, श्रद्धा स्थिर करना धर्माचरण है।

एक स्थल पर धर्म को इंगित करते हुए गोस्वामीजी कहते हें- पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। (मानस, ७/४०/१) जितना कुछ जीव-जगत् में दिखायी-सुनायी पड़ता है, वह सब प्रकृति के अन्तर्गत है। इससे परे केवल आत्मा है- प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। (मानस, ७/७१/७)

वह प्रकृति से परे है इसलिए पर कहलाता है। इस आत्मा के हित के समान कोई धर्म नहीं और इस आत्मा को पीड़ा पहुँचाने के समान कोई अधम कृत्य नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि अर्जुन! आत्मा ही शत्रु और आत्मा ही मित्र है। जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती गई हैं उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है और परमकल्याण करनेवाली होती है; किन्तु जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गई हैं उसके लिए उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, अधोगति और नीच योनियों में फेंकती है। इसलिए अर्जुन! तू अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर। इसको अधोगति में न फेंक। वास्तव में यही परहित है। आत्मा प्रकृति पार है इसलिए पर कहलाता है, लेकिन सो माया बस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।। (मानस, ७/११६/३) यह बँधा हुआ है। इसे बन्धन से छुड़ाकर अपने सहज स्वरूप में स्थिति दिलाना- इसके समान कोई अन्य धर्म नहीं है।

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। (मानस, ७/१२०/२२) श्रुति अर्थात् वेद भजन में निमग्न महात्माओं को प्रभु द्वारा समय-समय पर दी गई जानकारियों का संकलन है। उसमें उन महापुरुषों की अनुभूतियों का संग्रह है जो ईश्वर के तद्रूप थे, समीप पहुँचे हुए थे। प्राप्ति के पश्चात् ईश्वर किसे पढ़ायेगा और कौन पढ़ेगा? जब तक कुछ दूरी रहती है तभी तक भगवान कुछ समझाते हैं। उन अनुभूतियों को कुछ काल तक शिष्य-परम्परा में रटा गया। वेदव्यास ने उसे पुस्तकाकार प्रदान किया; किन्तु आप भजन करेंगे तो वेद आपके लिए नये सिरे से उतरेगा। वह पुस्तक काम नहीं करेगी; क्योंकि ईश्वर सदा बोलता है, सदैव समझाता है, जड़-चेतन सर्वत्र से बोलता है। उन निर्देशों को पकड़नेवाला साधक ही उसकी अनुभूति पाता है। शनैः-शनैः साधक में दृष्टि जागृत हो जाती है। उस दृष्टि से प्रभु की विभूतियाँ देखने, सुनने और समझने में आती हैं; किन्तु पुस्तक हमें दृष्टि नहीं दे सकती। वह केवल इतना बोध कराती है कि हम प्रयास करें तो किस दिशा में करें।

निर्देशों के अनुसार प्रयास करने से आत्मा जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगती है। परमात्मा में सुरत लगाने पर जितना कुछ विदित हो जाय, उसी के अनुसार आचरण करना परमधर्म है। धर्म की यह परिभाषा प्रयोगात्मक है। ईश्वरप्रदत्त निर्देशों का पालन अहिंसा है और यदि साधक इन आदेशों में कटौती करता है, इनकी अवहेलना करता है तो हिंसा है, वह हत्यारा है। अहिंसा का शुद्ध अर्थ है एक परमात्मा का चिन्तन।

भगवान राम ने एक बार सभा बुलाई। एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया कि मनुष्य-शरीर भवसागर से पार होने के लिए एक जहाज के तुल्य है, मेरी अनुकूलता ही अनुकूल वायु है, सद्गुरु कर्णधार अर्थात् केवट हैं। यह दुर्लभ संयोग यदि उपलब्ध है, फिर भी कोई भवसागर से पार नहीं हो जाता, भजन नहीं करता तो वह कृतनिन्दक है, कल पर टालता रहता है, कतराता है, मन्दबुद्धि है और अपनी आत्मा का हत्यारा है। यह है हिंसा। लेकिन ज्यों-ज्यों सुरत को लगायेंगे, प्रभु की स्मृति मिलती जायेगी। उसके अनुसार आचरण अहिंसा है, यही धर्माचरण है।

–  एकइ धर्म एक ब्रत नेमा।

कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।। (मानस, ३/४/१०)

सृष्टि में एक ही धर्म है- मन, कर्म व वचन से पति के चरण-कमलों में प्रीति। माताएँ तो पति के चरणों की सेवा कर लेंगी; किन्तु लगता है पुरुष वर्ग इस धर्म से वंचित रह जायेगा। वस्तुतः ऐसा है नहीं। आध्यात्मिक परिवेश में महापुरुषों ने परमात्मा को ही पति इत्यादि शब्दों से सम्बोधित किया है। किष्किन्धा-काण्ड का प्रकरण है कि हनुमान भगवान राम से मिले, तो अपना दैन्य निवेदन किया, उलाहना दिया कि प्रभु ने सेवक को क्यों विस्मृत कर दिया। भगवान ने आश्वस्त किया कि कपि तुम अपने मन में लेशमात्र भी ग्लानि न करो, तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।। (मानस, ४/३/१)- हनुमान ने पति को अनुकूल देखा तो उनका हृदय हर्ष से प्रफुल्लित हो गया, सारा दुःख दूर हो गया। हनुमान क्या नारी थे? वानर जातीय पुरुष थे! पत अर्थात् इज्जत की रक्षा करनेवाला पति है। पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम् की दयनीय दशा से उबारकर जो सहज स्वरूप की स्थिति दिलाने में समर्थ है, ऐसा मात्र परमात्मा है, वही समस्त जीवों का वास्तविक पति है। इसीलिए हनुमान ने भगवान श्रीराम को पति कहकर सम्बोधित किया। सन्तों ने निवेदन किया है कि-

अस अभिमान जाइ जनि भोरे।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे।। (मानस, ३/१०/२१)

अस्तु यदि हमें नियम का पालन करना है, व्रत लेना है, धर्माचरण करना है तो मन, कर्म, वचन से पत रखनेवाले एकमात्र परमात्मा के चरण-कमलों में प्रीति करनी चाहिए, यही पातिव्रत्य है। एक परमात्मा के प्रति समर्पण तथा सत्पुरुषों की सेवा – इसके अतिरिक्त सृष्टि में कोई धर्म है ही नहीं।

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।

सोइ महिमण्डित पण्डित दाता।।

धर्म परायन सोइ कुल त्राता।

राम चरन जा कर मन राता।। (मानस, ७/१२६/१-२)

वही सर्वज्ञ है, धर्म का विशेषज्ञ है, वही गुणी है, ज्ञाता है – सब कुछ जानता है, पृथ्वी में वही सम्मानित पुरुष है, वही पण्डित है- उसके पाण्डित्य में कोई कमी नहीं है, वही दाता है अर्थात् उसके पास देने योग्य कोई वस्तु है, वह कुल ही पूर्ण धार्मिक है जिसका मन राम-चरण में- एक परमात्मा के चरणों में अनुरक्त है। एक परमात्मा की प्राप्ति की क्रिया धर्म है। राम-चरण में मन का रंग जाना धर्म है। गोस्वामीजी के अनुसार एक परमात्मा के प्रति समर्पण ही सनातन-धर्म है।

सनातन-धर्म केवल हिन्दू कहे जानेवाले कबीले का धर्म नहीं, केवल भारत का धर्म नहीं, बल्कि सार्वभौम है। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक सर्वत्र मनुष्यमात्र में एक जैसी धारणा, वही दस इन्द्रियाँ और एक मन, प्रकृति की लिप्सा और शान्ति की खोज विद्यमान है। प्रकृति के थपेड़ों से घबड़ाकर जब भी वह सुख और शान्ति की खोज में निकलेगा, उसे इसी शाश्वत-सनातन की शरण आना होगा। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं। (मानस, २/२५५/१)- राम से विमुख रहनेवालों के लिए स्वप्न में भी सुख-सिद्धि है ही नहीं, तो पायेगा कहाँ से? उसे इस आत्मदर्शन के क्रियात्मक पथ पर आना ही होगा और विश्व में जो भी इस आत्मपथ की ओर, शाश्वत शान्ति की ओर बढ़ता है, वह शुद्ध सनातनधर्मी है।

आत्मा को विदित करा देनेवाली क्रिया का आविष्कार विश्व में कहीं भी हो सकता था, किन्तु सौभाग्य से भारत में हुआ। भारत ने ही सबको यह देन दी, इसीलिए भारत विश्वगुरु कहलाया। भारत के ही महापुरुष बुद्ध हुए। उनका अनुयायी आधा संसार था। उन्हीं की अनुयायी-परम्परा में ईसा हुए। एक परमात्मा की पूजा का उपदेश वे कर ही रहे थे कि यहूदियों ने शूली पर चढ़ा दिया। ऐसी ही परिस्थिति मुहम्मद साहब के समक्ष भी थी। आत्मा को विदित करा देनेवाली क्रिया का क्रमबद्ध वर्णन करने का अवसर उन्हें भी नहीं मिला। इसीलिए धर्म के विषय में अधिकांश समाज गुमराह है। कोई इसे पोंगापंथी मानता है तो कोई इसे निठल्लापन कहता है, कोई इसे डरे लोगों का सुरक्षा-कवच तो कोई परोपजीवियों का स्वर्ग कहता है। दोष कहनेवालों का नहीं है। धर्म उन्हें बताया ही कब गया था?

देखिये, धर्म के नाम पर कुछ भी करने या बाह्य विचारों को बौद्धिक मान्यता दे देने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता। धार्मिक वह है जो आत्मदर्शन के नियमों की स्फूर्ति से अनुप्राणित रहता है। उसका आत्मानुशासन, एकाग्रता, युक्ताहार-विहार, इन्द्रिय-संयम इत्यादि गुण देश और मानव-समाज को उन्नति के शिखर पर ले जाने में उपयोगी हैं। धर्म की सही निष्ठा आ जाने पर मनुष्य को स्नायुरोग या घातक रोग कभी नहीं होते; क्योंकि विनय और श्रद्धा से उसका हृदय द्रवीभूत रहता है। उसे भरोसा रहता है कि वह प्रभु देख लेंगे। मानसिक तनावों से भी वह मुक्त रहता है। समृद्धि को भी ईश्वर की देन मानकर अहंकार से बच जाता है। एक परमात्म-पथ पर यदि आप अग्रसर और सामूहिक जानकारी रखते हैं तो आप एक संगठन और एक सूत्र मे बँध जायेंगे और जो समाज एक सूत्र में बँधा है, उसके पास दुःख नहीं रहता।

बन्धुओ! धर्म की जानकारी के लिए आप तीर्थों में जाते हैं। धर्म में यदि सचाई न हो तो जीवन व्यर्थ चला जाता है। यह मनुष्य-शरीर सृष्टि में सर्वोत्कृष्ट है- न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्।; क्योंकि सृष्टि में एकमात्र वही विचारशील प्राणी है, उसमें परमात्मा तक के शोध की क्षमता देखी गई है। मानव-तन का सबसे बड़ा उपयोग भी यही है कि शरीर रहते परमात्मा की अनुभूति कर ली जाय।

मानव जब भी इस दिशा में चलता है तो कुछ पूजा-पद्धतियाँ, कोई पन्थ उसे विरासत में मिल ही जाता है। हमें भी मिला था; किन्तु पन्थ, सम्प्रदाय, पूजा-पद्धति, वेष, अखाड़ा या दुआरा लक्ष्य तो है नहीं। इनका समर्थन करने के लिए हम सबको नर-तन नहीं मिला है। श्रीकृष्ण के अनुसार यह सब अविवेकियों और मूढ़बुद्धिवालों की देन है। भगवत्-पथ में निर्धारित क्रिया तो एक ही है; किन्तु अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिए वे एक ही निर्धारित क्रिया के स्थान पर अनेक क्रियाओं की संरचना कर लेते हैं। इतना ही नहीं, वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे भजन करते हैं। फिर उन्हें सही बात बतायी जाय तो सुनते नहीं, शीघ्र पकड़ते नहीं; क्योंकि वे पूर्वाग्रह छोड़ नहीं पाते। रूढ़ि से चिपककर बैठ जाते हैं कि ‘सभी तो ऐसा कर रहे हैं, मैं नहीं करूँगा तो लोग क्या कहेंगे?’ वास्तव में किसी मज़हब के अनुयायियों की संख्या धर्म की कोई कसौटी नहीं है। इसी को लक्ष्य कर सन्त कबीर कहते हैं-

मैं भी भागा जाइयां, लोक बेद के साथ।

आगे ते सतगुरु मिल्या, दीपक दीन्हा हाथ।।

दीपक दीन्हा तेल भरि, बाती दई अघट्ट।

पूरा किया बेसाहुणा, बहुरि ने आवौं हट्ट।।

धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं। जैसे रोटी मनुष्य के लिए है, मनुष्य रोटी के लिए नहीं। अतः व्यक्ति के निज कल्याण के लिए तथा समष्टि के कल्याण के लिए भी यह बोध कराना जरूरी है कि हर आदमी के भीतर कहीं कोई परमात्मा है, जिसे ढूँढ़ना प्रत्येक का दायित्व है। शाश्वत परमात्मा की प्राप्ति की नियत क्रिया ही धर्म है। जिसमें केवल उस परमात्मा की ही प्राप्ति का विधान हो, लोकरीति का जिसमें रंचमात्र भी समावेश न हो, वही हमारा-आपका, मानवमात्र का विशुद्ध धर्मशास्त्र है और वह है भगवान श्रीकृष्णोक्त ‘गीता’, जिसमें स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार केवल एक परमात्मा के चिन्तन को ही नियत कर्म कहा गया है और इसी नियत कर्म के अन्तर्गत उसी परमात्मा का परिचायक दो-ढाई अक्षर का नाम ‘ॐ’ अथवा ‘राम’ का जप तथा समकालीन किसी तत्त्वदर्शी की शरण में जाने का विधान है।

सभी महापुरुषों ने तत्त्वदर्शी महात्माओं की शरण और सान्निध्य पर बल दिया है; क्योंकि धर्म उन्हीं की अनुभूति है। एक बार अनुसुइया आश्रम में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर आये। उन लोगों ने पूज्य गुरुदेवजी से एक प्रश्न पूछा कि- ‘‘भगवन्! हमलोग दर्शनशास्त्र पढ़ते हैं, कबीर को पढ़ते हैं, यही सब पढ़ाते भी हैं; किन्तु साधन समझ में नहीं आता।’’ पूज्य महाराजजी ने कहा- ‘‘हो! का कहीं, दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है। (उन दिनों गीता प्रेस, गोरखपुर की गीता दो पैसे में मिलती थी।) लोग पढ़त जात हैं और न जाने क्या लिखत भी जात हैं।’’ साधना एक ऐसी चीज है जो लिखने में नहीं आती, वह तो किसी पहुँचे हुए महापुरुष के द्वारा किसी लगनशील अधिकारी साधक के हृदय में जागृत कर दी जाती है। ऐसे महापुरुषों की टूटी-फूटी सेवा से, दो-चार महीने के ही सान्निध्य से आत्मदर्शन की क्रिया हृदय में जागृत हो जाती है। वह इष्ट निर्देशन, संकेत और अनुभव प्रदान करने लगता है, रास्ता बताने लगता है और धारण कर लेता है।

इसीलिए भगवान राम ने कहा- भगति मोरि (मानस, ७/४४/२)। श्रीकृष्ण ने कहा, मामेकं शरणं व्रज (गीता, १८/६६)- एक मेरी शरण में आ जाओ, बल्कि धर्म की चिन्ता छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। पहले कहा- हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाओ, फिर कहा- तत्त्वदर्शी की शरण में जाओ। किसलिए? इसी धर्माचरण को सीखने के लिए! यहाँ कहते हैं- धर्म को भी छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। आखिर भगवान कहना क्या चाहते हैं?

वस्तुतः समर्पण के साथ लगनेवाले साधक का धर्म, कर्म, भगवान सब कुछ वही तत्त्वद्रष्टा महापुरुष है। वह धर्म की प्रत्यक्ष अनुभूतिवाला है। धर्मस्वरूप, कर्मस्वरूप और उस धर्म-कर्म पर चलनेवाला सभी कुछ है। पूज्य महाराजजी कहते थे- तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।। (मानस, ५/३/८) ‘‘हो! हम भगवान के दूत हैं। हमसे मिले बिना कोई भगवान तक पहुँच ही नहीं सकता।’’ भगवान हैं, किन्तु तत्त्वदर्शी सद्गुरु के बिना वे हमारे दर्शन और प्रवेश के लिए नहीं हैं। चूँकि उनकी अनुभूति अन्तःकरण में होती है, इसलिए हृदय से योगक्रिया जागृत करनेवाले तत्त्वदर्शी महापुरुष के अभाव में उस परमात्मा का कोई उपयोग हमारे लिए नहीं रह जाता। किन्तु एक परमात्मा में श्रद्धा और उस प्रभु का परिचायक दो या ढाई अक्षर के नाम का जप – यह धर्मनिष्ठा का ही अंग है।

बौद्ध कहते हैं- बुद्धं शरणं गच्छामि, जैन कहते हैं- सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्राणि मोक्षमार्गः’ अर्थात् तीर्थंकरों का दर्शन, उनका बताया ज्ञान और उनकी तरह चरित्र बनाने से मोक्ष मिलेगा। इस्लाम के अनुयायी कहते हैं कि मुहम्मद ही अल्लाह के रसूल हैं, सन्देशवाहक हैं, दूत हैं। सिख कहते हैं, ‘वाहे गुरु’। ईसा कहते हैं- ‘सांसारिक बोझ से दबे हुए लोगो! मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। जो मेरे पीछे आयेगा, उसे अपने आपको भूलना होगा और मेरा अनुसरण करना होगा।’ (Come to me, all that are weary and heavy ladden and I will give you rest. If any man will come after me let him deny himself and follow me.)

सभी महापुरुष अपनी ओर बुलाते हैं। लगता है सभी अपनी-अपनी दुकान लगाये बैठे हैं; किन्तु ऐसा कुछ नहीं है। अपने-पराये की भावना तो हमारे-आपके भीतर है, इसलिए ऐसा दिखाई देता है। महापुरुषों का आशय केवल इतना है कि जो महापुरुष साधन द्वारा चलकर उस हृदयस्थ परमात्मा में स्थिति पा चुका है, अपने समकालीन उस तत्त्वदर्शी की शरण में जाओ।

किन्तु तत्त्वदर्शी को हम-आप कैसे पहचानें? धूर्तों ने भी इस वेश से लाभ उठाया है। राजा प्रतापभानु और भगवती सीता इसी वेश से छले गये, हनुमान बाल-बाल बच गये। सभी तत्त्वदर्शी होने का दावा करने लगें तो?

वस्तुतः यह कोई समस्या है ही नहीं। हृदय से क्रिया जागृत कर देने की क्षमतावाला तत्त्वदर्शी यदि दृष्टि में नहीं है तो इसका कारण अपने पुण्य-पुरुषार्थ में ही कमी है- पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। (मानस, ७/४४/६) तब तक आप एक परमात्मा में निष्ठा और उस परमात्मा का परिचायक कोई दो-ढाई अक्षर का नाम-जप करते हुए पुण्य अर्जित करें। जिस दिन यह पुण्य काँटे पर खड़ा हो जायेगा, तो सन्त-सद्गुरु जिस सिंहासन पर होंगे अथवा जिस कीचड़ में लोटते होंगे, आप वहाँ तक अपने आप पहुँच जायेंगे अथवा वे ही आपसे मिल लेंगे। आप उनको समझ जायेंगे, अनुभवी सूत्रपातों द्वारा वे आपको समझा लेंगे।

आत्मा को विदित कर लेनेवाले इस पथ पर जो कोई लगन और श्रद्धा के साथ लग जाता है, मार्गदर्शन की आवश्यकता का समय आने पर उसका पुण्य-पुरुषार्थ सद्गुरु से टकराने लगता है। ऐसे पथिक का मार्गदर्शन करना महापुरुषों ने अपना दायित्व माना है। पूज्य महाराजजी प्रायः बताया करते थे- ‘‘इस नाम का, इस रंग-रूप का साधक आयेगा, जिसका मुझे मार्गदर्शन करना है।’’ कुछ साधकों के बारे में तो ये संकेत एक-दो वर्ष पहले से ही मिलने लग जाते थे और वे बाद में आये भी।

अतः सद्गुरु खोजने कहीं जाने और देखा-देखी किसी को सद्गुरु मान लेने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें जिस दृष्टि से पहचाना जाता है, वह दृष्टि ही पुण्यमयी है। संत-सद्गुरु ही नहीं, स्वयं भगवान ही सामने खड़े हो जायँ, किन्तु जिनके पास पुण्य-सहयोग नहीं है, उन्हें पागल समझ सकते हैं। कहेंगे, कैसा रूप बनाया है! पूज्य महाराजजी के गुरुदेव को उनके क्षेत्रीय लोग आजीवन पागल ही समझते रहे; किन्तु महाराजजी के लिए वे ही सद्गुरु थे। उन्हीं के निर्देशन में चलकर महाराजजी महाराज हो गये, प्राप्तिवाले महापुरुष हो गये। हाँ! पुण्य-पुरुषार्थ की कमी से जब तक सभी संशयों का अन्त करनेवाले सद्गुरु नहीं मिल जाते, तब तक सन्तों में श्रद्धा ही पर्याप्त है; क्योंकि श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् (गीता, ४/३९)- वह पा जायेगा।

प्रश्नोत्तर

महाकुम्भ (हरिद्वार) में इन विचारों को सुनकर कतिपय विचारकों ने धर्म को अधिक स्पष्ट करने का आग्रह किया। उन्होंने महाराजजी से यह भी पूछा कि आप हिन्दूधर्म मानते हैं या नहीं? आप कौनसा धर्म मानते हैं? आपके धर्म का नाम क्या है? धर्म में कौनकौन सी बातें आती हैं? आपके धर्म की तालिका क्या है?- इत्यादि।

इन्हीं कुछेक महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार व्यक्त करते हुए महाराजजी ने कहा कि- ‘‘देखिये, धर्म पर हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी, हमारा अथवा आपका – किसी का भी एकाधिकार या विशेषाधिकार नहीं है। सृष्टि भर में धर्म एक ही है। आदिशास्त्र गीता में है- जो शाश्वत है वह धर्म है, वही शाश्वत धाम देगा। जो नश्वर है वह अधर्म है, वह मृत्यु देगा। ऋग्वेद में है, अतो धर्माणि धारयन्। (१/२२/१८)- जो सबको धारण करता है (वह है परमात्मा) वही धर्म है, न कि हिन्दू या मुसलमान।

यह अवश्य है कि भारत में धर्म का जो नाम प्रचलित है, वह है हिन्दू। हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद् इत्यादि अनेक संगठन ‘हिन्दू’ शब्द को लेकर चलते हैं। बौद्ध, जैन, सिख सब इसी की शाखा माने जाते हैं; किन्तु इन सबका झगड़ा है तो हिन्दुओं से ही है। बौद्ध अलग होना चाहता है तो हिन्दू से, सिख अलग पहचान बनाना चाहता है तो हिन्दू से, आतंकवादियों का आक्रोश है तो हिन्दू से, क्योंकि हिन्दू की परिभाषा ये जानते ही नहीं।

कुछ लोगों का कहना है कि हिन्दू एक क्षेत्रीय विशेषण है जो अरब आक्रान्ताओं की देन है। गजनी के लुटेरों को भारतीय मन्दिरों में संचित धन-भण्डार लूटने का चस्का लगा तो उन्होंने सीमावर्ती सिन्धु नदी के तटवासियों से इस देश की जानकारी ली। क्षेत्रीय लोगों ने ‘सिन्ध’ दरिया को ‘हिन्द’ दरिया बताया। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर से आर्यों के ही निवास ईरान तक आज भी ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है। लिखेंगे ‘स’ किन्तु उसको पढ़ेंगे ‘ह’। वे लिखते हैं शेर सिंह, किन्तु उसको पढ़ते हैं हेर हिंग। वेद में ‘सरितो’ को ‘हरितो’ पढ़ना, ‘सरस्वत्यो’ को ‘हरःवत्यो’ पढ़ना, बोलचाल में मास को माह कहना, सप्ताह को हफ्ता और केसरी को केहरी कहना उस क्षेत्र में अरबवालों के आने से बहुत पहले वैदिक काल से ही बोला जाता रहा है। अतः हिन्दू शब्द अरबवालों की देन नहीं है।

पूज्य गुरु महाराज के समक्ष भी यह प्रश्न आया था कि क्या हिन्दू शब्द अरबवालों द्वारा प्रयुक्त एक घृणात्मक सम्बोधन है?, तो उन्होंने बताया था- ‘‘हो! यह नाम अरब आक्रमणकारियों की देन नहीं बल्कि उनसे भी प्राचीन है क्योंकि भारत के सुदूर वनप्रान्तों, असम और ब्रह्मा (वर्मा) इत्यादि क्षेत्रों जहाँ इस्लाम का प्रचार-प्रसार और प्रशासन व्यवस्था नहीं थी, वहाँ भी यह शब्द पूर्ण श्रद्धा से स्वीकृत है।’’ यही उनकी पहचान है। हिन्द के नाम पर महासागर का नामकरण, गणित को हिन्दसा कहना इस शब्द के प्रति लोगों का आदर ही व्यक्त करता है।

जहाँ तक हिन्दू शब्द का प्रश्न है, अरबवालों द्वारा भारत पर आक्रमण से भी पहले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने महाराजा हर्षवर्धन के समय में भारत की यात्रा की थी। उन्होंने अपने यात्रा विवरण सी.यू.की. (जिसका अंग्रेजी अनुवाद सैमुअल बील ने किया है) के पृष्ठ ६९ पर भारत के नामों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि यहाँ के निवासियों को हिन्दू कहते हैं। यह चीनी भाषा के शब्द ‘इन्तु’ से मिलता-जुलता है जिसका शुद्ध उच्चारण इन्दु है जिसका अर्थ चन्द्रमा होता है। जिस प्रकार सूर्य के अस्त हो जाने पर घने अँधेरे में चन्द्रमा मार्गदर्शन करता है, उसी प्रकार यहाँ के सन्त महात्मा अज्ञान से आच्छादित विश्व को अपने ज्ञान का प्रकाश देते हैं।

ह्वेनसांग ने कोई नयी बात नहीं कहा। उन्होंने वही कहा जो आदिशास्त्र गीता में है- हि = हिय अर्थात् हृदय; और इन्दु अर्थात् चन्द्रमा। गीता में है कि इस जगतरूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत पड़े हैं। इन सबके हृदय में परमात्मा क्षीण प्रकाश के रूप में विद्यमान है। गीता (१३/१७) में है कि वह ज्योतिर्मय प्रभु हृदि सर्वस्य विष्ठितम्सबके हृदय में रहता है। गीता (१५/१५) में भगवान कहते हैं- सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो– मैं सबके हृदय में समाविष्ट हूँ। गीता (१८/६१) में भगवान ने बताया- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देषेऽर्जुन तिष्ठति– अर्जुन! वह ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय देश में निवास करता है। अतः सृष्टि में जो भी उस ईश्वर को ढूँढ़ता है, यत्र-तत्र प्रयत्न कर जब भी पायेगा तो हृदय देश में ही पायेगा। इसीलिए मानवमात्र जो भी हृदयस्थ ईश्वर के आराधक हैं, सब हिन्दू ही हैं। गीतोक्त साधना के अनुसार महापुरुष के शरण-सान्निध्य से संयम और चिन्तन होते ही वह हृदयस्थ परमात्मा जागृत हो उठता है, अविद्या की रात्रि का अवसान होने लगता है, ईश्वरीय प्रकाश फैलने लगता है, इन्दुवत क्षीण प्रकाश ज्योतिर्मय परमात्मा के रूप में परिवर्तित हो जाता है जिसे न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही- न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। (गीता, १५/६)

इस प्रकार हिन्दू शब्द परमात्मा के निवास-स्थान का परिचायक है और आदिशास्त्र गीतासम्मत है किन्तु दो-ढाई हजार वर्षों से भारत में पठन-पाठन पर प्रतिबन्ध लग जाने, आदिशास्त्र गीता और इतिहास-संस्कृति ग्रन्थ महाभारत पर प्रतिबन्ध होने से हिन्दू शब्द विवादों के घेरे में आ गया। इसीलिए बहुत से कवियों, मनीषियों ने सनातन और हिन्दू शब्दों का प्रयोग अपनी रचनाओं में नहीं किया जबकि संत कबीर इत्यादि महापुरुषों ने उद्बोधन के रूप में इस शब्द को लिया। अतः हिन्दू शब्द हृदय में ईश्वर के निवास-स्थान का वाचक है, बाहर किसी स्थान के निवासियों तक ही इसे सीमित मात्र मान लेना उचित नहीं है। प्राचीन काल में देश का नाम धर्म के आधार पर होता था, जैसे- हिन्दुस्थान, आर्यावर्त; किन्तु कालान्तर में वरिष्ठ महापुरुषों के नाम पर देश का नाम होने लगा, जैसे- महाराजा भरत के नाम पर भारतवर्ष, महाराजा कुरु के नाम पर कुरु देश, महाराजा गज के नाम पर गजनी, समरसेन के नाम पर समरकंद, महाराज जैसल के नाम पर जैसलमेर इत्यादि।

विचारणीय है कि चीन में रहनेवाला चाइनीज कहलाता है तो क्या चीनी कोई धर्म है? अमेरिका का निवासी अमेरिकन कहलाता है तो क्या अमेरिकन कोई धर्म है? इसी प्रकार यदि हिन्दुस्तान में रहनेवालों को ही हिन्दू कहें तो जमीन के टुकड़े का नाम धर्म कैसे हो गया? किसी देश का नाम पृथ्वी के ही एक हिस्से का नाम है, धर्म नहीं।

धर्म तो सर्वदेशीय, सर्वकालिक और सबके लिए होता है, और ऐसा है केवल एक परमात्मा। उस अव्यक्त, मन-वाणी से परे सत्ता का क्या नाम होगा? वह तो अनिर्वचनीय है। फिर भी ईश्वर के संकेतक हजारों नामों में से कुछेक नामों का चयन समय-समय पर किया गया। धर्म के तीन विशेषण आर्य, सनातन और हिन्दू ‘गीता’ शास्त्र के अनुसार हैं। अस्तित्व केवल एक परमात्मा के प्रति आस्थावान आर्य है। वह परमात्मा ही शाश्वत और सनातन है। उसकी शोध में प्रयत्नशील होना सनातन धर्म है और हृदयस्थ ईश्वर के प्रति समर्पित व्यक्ति हिन्दू है। यह विविध दृष्टियों से ईश्वर की प्राप्ति के उपायों का नामकरण मात्र है। वैदिक वाङ्मय में इसे ही ध्रुव, सत् और सनताधर्माणि अर्थात् सनातन धर्म कहा गया। परवर्ती भारत में उसी का नाम था ब्राह्मण धर्म। यहाँ ब्राह्मण का अर्थ कोई सामाजिक वर्ग नहीं, गोपथ-शतपथ-एतरेय या ताण्ड्य नामक ब्राह्मण-ग्रन्थ नहीं; बल्कि ब्रह्म की प्राप्तिवाली क्रिया से गुजरनेवाला प्रत्येक व्यक्ति ब्राह्मण है। इन्हीं क्रियाओं का अनुसरण करनेवाले आर्य कहलाये।

आर्य और अनार्य शब्दों के प्रयोग से हमारे प्राचीन आर्ष-ग्रन्थ भरे पड़े हैं। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, सुग्रीव का परिवार, वानर-भालू जातियाँ सब आर्य थीं। रावण जितना अनार्य था उसके पूर्वज पुलस्त्य, विश्रवा तथा उसका सहोदर विभीषण उतना ही आर्य था। रणक्षेत्र में विशालकाय कुम्भकर्ण को देखकर वानरी सेना विचलित होने लगी तो अंगद ने उन्हें साहस दिया- ‘‘शूरवीरो! हम उन आर्यों की सन्तान हैं, जिन्होंने युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखायी। आज पीठ दिखाकर हम अनार्य कहलायेंगे।’’ अतः आर्य उसे कहते हैं जो लक्ष्य पर दृढ़तापूर्वक डटा रहे। गीता में है, अनार्यजुष्टम् (गीता, २/१२)- अर्जुन! तूने यह अनार्यों का आचरण कहाँ से सीख लिया? आलस्य छोड़कर युद्ध कर!

आर्य और अनार्य शब्दों पर भगवान बुद्ध के विचार मज्झिम निकाय के पाशराशि सुत्त में संकलित हैं। उन्होंने समझाया कि, ‘‘भिक्षुओ! इस संसार में दो प्रकार की खोज (पर्येषण) है- आर्य और अनार्य। अनार्य-खोज उसे कहते हैं, जो स्वयं जात-धर्मा (जन्मनेवाला) होते हुए भी जात-धर्म का पर्येषण करता है। स्वयं जरा-धर्मा (बूढ़ा होने का स्वभाव) होते हुए भी जरा-धर्म का ही आह्वान करता है, व्याधि-मरण-शोक और संक्लेश-धर्मा होते हुए भी इन्हीं की खोज करता है। पुत्र और भार्या जात-धर्मा हैं। सोना-चाँदी तथा सृष्टि की सारी भोग-सामग्री जात-धर्मा है। इन्हीं में यह पुरुष ग्रसित, मूर्च्छित और आसक्त हो स्वयं जात-धर्मा होकर दूसरे जात-धर्मा अर्थात् नश्वर पदार्थों की खोज करता है- यह अनार्य खोज है। किन्तु भिक्षुओ! कोई-कोई पुरुष स्वयं जात-धर्मा होते हुए जात-धर्म में दुष्परिणाम देख अजात (जन्मरहित), सर्वोत्तम, मंगलमय निर्वाण की खोज करता है। स्वयं व्याधि-धर्मा होते हुए भी व्याधिरहित, मरण-धर्मा होते हुए भी अ-मृत, शोक-धर्मा होते हुए भी शोकरहित, स्वयं संक्लेश-धर्मा होते हुए भी मलरहित, अति उत्तम योगक्षेम निर्वाण की खोज करता है- वह आर्य-पथ पर है।’’

स्पष्ट है कि आर्य एक पथ है, मन की एक रुझान है, एक निर्धारित दिशा है। आपका एक सगा भाई आर्य और दूसरा अनार्य हो सकता है। एक ही व्यक्ति जीवन के किन्हीं क्षणों में आर्य और दूसरे क्षण अनार्य हो सकता है। कोई कभी आस्तिक तो कभी नास्तिक हो सकता है। जो उस अस्तित्व का उपासक है, आस्तिक है, वह आर्य है। निष्ठा के साथ उस परमात्मा को पाने की विधि का आचरण आर्य-शोध है और इसके विपरीत जो अस्तित्वविहीन, नश्वर, क्षणभंगुर कलेवरों की कामना करता हुआ भटक रहा है, वह अनार्य है। इसी को महापुरुषों ने कभी विद्या और अविद्या कहा, तो किसी ने इसी को अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी, सजातीय-विजातीय, दैवी सम्पद्-आसुरी सम्पद् कहा। यह वृत्ति है, एक प्रवृत्ति है। सत्य की प्रवृत्ति आर्य है। असत्य की प्रवृत्ति अनार्य है। इसीलिए पूरा संसार आर्य है और पूरा संसार अनार्य है। वेद में है कि कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अर्थात् विश्व को आर्य बनायें। आर्य बनाये जाते हैं, न कि जन्म या स्थान से कोई आर्य होता है।

सृष्टि का आदिषास्त्र गीता, उसी का विस्तार वेद और वेद से गौतम बुद्ध तक सबने आर्य का आशय इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति माना, गुणवाचक माना, न कि भारत के बाहर से आनेवाली कोई जाति! हाँ, भारत में उस परमात्मा की शोध करनेवाले बहुसंख्या में थे, इसीलिये भारत को कभी आर्यावर्त भी कहा जाता था। यहाँ हृदयस्थ परमात्मा की षोध करनेवाले बहुसंख्या में थे इसलिए हिन्दुस्तान भी कहलाया। जिस समाज का बहुमत एक परमात्मा के लिये संकल्पवान् था, जो अपना प्रत्येक कार्य परमात्मा का नाम लेकर आरम्भ करते थे, इन्द्रिय-संयम और मन के निरोध के लिए जो प्रतिबद्ध थे उनका रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शादी-विवाह, नियम-कानून सब कुछ सुसंस्कृत था, जो आर्य- संस्कृति कहलायी; लेकिन आर्यों की जो मूल क्रिया है उस पर भारतीयों का ही वर्चस्व नहीं है। वह तो विश्व के मनुष्यमात्र की है। अपने को ईसाई माननेवाला भी यदि उस अविनाशी परमात्मा की खोज में तत्पर है, जिसमें अनन्त जीवन है तो वह आर्य है, सनातनी है, हिन्दू है; अन्य कुछ भी नहीं। मुसलमान ही क्यों न हो (सूफी सन्तों की तरह), एक परमात्मा के लिये जो हृदय-मन से प्रयत्नशील है, वह आर्यशोध पर है, आर्य ही है। आर्यत्व की मुख्य पहचान खानपान, वेशभूषा, रहने का ढंग या सामाजिक व्यवस्था नहीं बल्कि वह योग-क्रिया है, जिस पर चलकर यह जीवात्मा अपने मूल परमात्मा तक की दूरी तय करता है। सनातन साध्य है आर्यों का। जो दैवी सम्पद् से युक्त है, वह आर्य है। जो आसुरी सम्पद् से युक्त है, वह अनार्य है।

धर्म के लिए गीता और वेद में प्रयुक्त ‘सनातन’ शब्द का आशय है- जो सदा से था, है और रहेगा। ऐसा है एकमात्र परमात्मा। उसी के अंशमात्र से सृष्टि का संचार है। हर कण में वह विद्यमान है। हर आत्मा के लिये उसमें प्रवेश की व्यवस्था है। सभी को वह अविनाशी तत्त्व पाना है। वही सनातन है, वही सत्य है। वह प्रभु सर्वत्र वास करता है और सुमिरण से वह जागृत हो जाता है। जागृत होकर अपने स्वरूप तक की दूरी तय करा लेता है। यह सनातन सत्य है, इसीलिये धर्म का नाम सनातन है।

सत्यान्वेषी महापुरुषों के पश्चात् क्रमशः क्रियाहीन लोग उनका स्थान ग्रहण करने लग जाते हैं तो धर्म के ऊपर आवरण आ जाता है। अनेकों कल्पित पूजा-पद्धतियाँ, विकृतियाँ, आडम्बर तथा रीति-रिवाज धर्म को आच्छादित कर लेते हैं। ऐसे ही तिमिराच्छन्न परिवेश में कोई महापुरुष आलोक-पुंज बनकर उभरता है। उसके आविर्भाव के लिये किसी शिष्य-परम्परा या गद्दी-परम्परा की आवश्यकता नहीं है। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्। (गीता, ६/४५)- अनेक जन्मों से चला हुआ पथिक कहीं भी जन्म ले सकता है। पूर्वजन्मों के अभ्यास से वह उस योग्यता को अर्जित कर चुका होता है, जहाँ पहुँचकर उसे किसी के सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती। कई सौ जन्मों से बुद्ध साधु थे। श्रीकृष्ण के दस जन्मों का उल्लेख महाभारत में है। अतः अनेक जन्मों से चलनेवाले पथिक का जो प्राप्तिवाला अन्तिम जन्म है, योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह ज्ञानी साक्षात् मेरा ही स्वरूप है। ऐसा पुण्यात्मा कहीं भी जन्म ले सकता है। जन्म लेकर वह उस क्रिया को पुनः करेगा और शीघ्र ही अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा। लक्ष्य विदित कर जब वह समाज को सम्बोधित करेगा तो वही सत्य उसके मुख से भी प्रस्फुटित होगा; क्योंकि उसमें बोलता तो ईश्वर है। उस महात्मा की बुद्धि मात्र यन्त्र है। मूल सत्य ही उसके मुख से निकलेगा- जो शाश्वत है, सनातन है। इसीलिये विश्व के किसी भी कोने में या किसी भी कबीले में जन्मा हुआ कोई भी सन्त निन्दा का पात्र नहीं है। सन्त सब एक हैं और समान भाव से ही पूज्य हैं।

उन महापुरुषों ने किसी नये धर्म का आविष्कार किया हो, कोई नवीन मार्ग चलाया हो, ऐसी कोई बात नहीं है। जो सत्य है, शाश्वत है, सदा एकरस है, उसमें कोई अलगाव या आविष्कार हो ही नहीं सकता। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो यहाँ तक कह दिया कि ऐसा यह आत्मा अन्य कुछ होनेवाला भी नहीं है। जब अन्य कुछ होनेवाला ही नहीं तो आप कौन-सा आविष्कार कर लेंगे? हमारा भी अलग से कोई धर्म या पन्थ नहीं है। कोई भी महापुरुष नया धर्म नहीं चलाता फिर भी धर्म का जो पुरातन नाम है, उसमें किंचित् परिवर्तन प्रतीत होता है; क्योंकि ईश्वर के हजारों नामों में से किसी एक नाम का प्रयोग वह महापुरुष अधिक करता है। जैसे महात्मा बुद्ध को लें। उन्होंने कोई नया धर्म नहीं चलाया बल्कि साधना में अथक परिश्रम करके जब उन्होंने भगवान की कृपा का अनुभव किया, तो बताया कि रात्रि के अन्तिम प्रहर में मैंने उस अविनाशी पद को पाया, उस सर्वज्ञता को प्राप्त किया, जो मुझसे पूर्व महापुरुषों ने प्राप्त किया था। (अश्वघोषकृत बुद्धचरित, सर्ग १४, श्लोक ८५-८६)

विचारणीय है कि बुद्ध से पूर्व बौद्ध-धर्म नहीं था तो बुद्ध के पूर्वज कौन थे? वही, जो हमारे-आपके थे। बुद्ध हमारे-आपके बीच से ही थे। क्षत्रिय कुल में जन्म हुआ, इन्हीं रीति-रिवाजों में पले। भजन करके क्या पाया? वही अविनाशी परमपद जो उनके पूर्व मनीषियों ने प्राप्त किया था। महात्मा बुद्ध से पूर्व कौन-से महर्षि थे? वही भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि इत्यादि।

गीता कहती है कि सत् का तीनों कालों में कभी अभाव नहीं है। शरीर नाशवान् है, मरणधर्मा है और आत्मा ही परमसत्य है, सनातन है, शाश्वत है। यद्यपि स्वयं में ईश्वर का कोई नाम नहीं है किन्तु विविध दृष्टियों से ये उसके सम्बोधन हैं। इनमें से एक सम्बोधन अविनाशी भी है। बुद्ध ने कहा- हमने उस अविनाशी को पाया। उसी परमात्मा का एक दूसरा सम्बोधन है- सर्वज्ञ। बुद्ध ने कहा कि हमने उस सर्वज्ञता को पाया। स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध ने उसी शाश्वत सत्य को दुहराया जो आदिसत्य था, जो मूलसत्य है। उन्होंने अविनाशी, सनातन, अमृततत्त्व, परमात्मा या उस सर्वज्ञ को ही दृढ़ाया, जैसा कि गीता में है।

तथागत के मुख से ‘बोध’ शब्द का अधिक प्रयोग हुआ। बोध का अर्थ है- ज्ञान। आदिशंकराचार्य कहते हैं, बोधो हि को यस्तु विमुक्तिहेतुः– बोध क्या है? जो मुक्ति का साधन है। गीता में इसी बोध को ज्ञान कहा गया-

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, ४/१९)

वेद में भी है कि ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः– ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है। इस प्रकार यह बोध शब्द भी उस परमात्मा का ही एक सम्बोधन है, एक विभूति है। गौतम द्वारा व्यवहृत शब्द के आधार पर पीछेवालों ने एक नारा बना लिया कि- बुद्धं शरणं गच्छामि’, ‘संघं शरणं गच्छामि’, ‘धम्मं शरणं गच्छामि– धर्म की शरण जाओ। कौन-सा धर्म? वही शाश्वत, सनातन, जो हमारा-आपका सबका धर्म है। यह बोध (ज्ञान) शब्द भी सनातन का ही क्रिया-पक्ष है। ठीक इसी प्रकार हमारे चौबीस अवतारों में एक ऋषभदेव की शिष्य-परम्परा में महावीर स्वामी हुए जिनकी तपश्चर्या, सहनशीलता विख्यात है। राजपरिवार के होते हुए भी इन्होंने अयाचित भिक्षावृत्ति से निर्वाह किया। कुछ ने इन्हें पागल घोषित कर पत्थरों से मारा, किसी ने कान में कील ठोंक दिया किन्तु इन्हें न क्रोध आया, न क्षोभ; भजन में लगे ही रहे। उन्होंने जब उस स्थिति को पाया तो निर्णय दिया कि आत्मा ही सत्य है, शाश्वत है। कठोर तपस्या के द्वारा, इन्द्रिय-संयम के द्वारा, तीर्थस्वरूप महापुरुषों अर्थात् तीर्थङ्करों की सेवा द्वारा – इसी कर्म द्वारा उसे प्राप्त किया जाता है, उसे खोजो। उनकी विचारधारा को ‘जैन’ कहकर पृथक् धर्म माना जाता है, जबकि आत्मा और कर्म का ठीक यही सिद्धान्त गीता में है कि आत्मा ही सत्य है, सनातन है और उसे जानने के लिये किसी तत्त्वदर्शी की शरण में जाओ।

जीव अयन स जैन।अयन कहते हैं घर को। इस जीवात्मा को अपना घर, अपना शाश्वत स्वरूप प्रदान करने का व्रत जैन विचारधारा है। यह मिलता है जिन बनने से – जितेन्द्रिय बनने से; केवली बनने से – कैवल्य (परमपद) प्राप्त करने से। यही भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि हृदय में स्थित ईश्वर की शरण में जाओ। तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। (गीता, १८/६२)- उसकी कृपा से तुम उस स्थान को प्राप्त कर लोगे जो शाश्वत है। यही घोषणा महावीर स्वामी की है कि जीवात्मा को उसका अयन दूँगा। इन्द्रिय-संयम द्वारा साधन-पथ पर चलकर उस मूल का स्पर्श, आत्मा का साक्षात्कार, प्रवेश और स्थिति – यही तो उनकी घोषणा है; फिर उनका धर्म नया कैसे हो गया? सनातन से भिन्न कहाँ रहा? जो श्रीकृष्ण ने कहा, वही महावीर स्वामी भी तो कह रहे हैं। अतः कोई भी महापुरुष किसी नवीन धर्म का सृजन नहीं करता बल्कि शाश्वत के नाम पर जो अवरोध रीति-रिवाज के रूप में पनप जाते हैं, धर्म लुप्त-सा हो जाता है तो ऐसे युगान्तकारी महापुरुषों द्वारा वह आवरण धुल जाता है और जो मूलबिन्दु है, महापुरुष समाज को उस सत्य बिन्दु पर खड़ा कर देता है। इसी प्रयास में सनातन का ही एक नाम ‘जैन’ पड़ा। गौतम बुद्ध भी अपने को जिन्, केवली और वेदगू कहते थे।

ठीक इसी प्रकार सिखसमुदाय सनातन से अलग अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्षरत है। सिख का अर्थ होता है शिष्य- जो सीख प्राप्त करे। सद्गुरु की सीख पर चलनेवाला हर व्यक्ति सिख है। यह भी सनातन का ही एक नाम है, जिसमें सनातन की ओर ले चलनेवाले माध्यम (सद्गुरु) पर अधिक बल दिया गया। किसी ने लक्ष्य पर बल दिया तो किसी ने साधन पर – बात सबकी एक ही है।

सच कहा जाय तो यह सनातन-धर्म, आर्य-धर्म या हिन्दू-धर्म सद्गुरुओं की शिक्षा पर चलनेवाले शिष्यों की परम्परा का ही नाम है। गीता शुद्ध धर्मशास्त्र है; किन्तु यह भी गुरु-शिष्य संवाद के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। गुरु-शिष्य परम्परा का नाम ही धर्म है। भारत ही नहीं, अपितु समस्त संसार में धर्म के नाम पर जो कुछ भी है, गुरुओं के पीछे सिमटा हुआ समाज ही है। अस्तु, भारत में कोई दो-चार प्रकार के धर्म नहीं हैं। वास्तव में धर्म एक ही है। जो काल से परे पुरुष है, जो अविनाशी है- हमारा धर्म है। इस जीव को अपना धाम देने को उद्यत जैन हमारा धर्म है। परमात्मा का सहज बोध करना-कराना हमारा धर्म है। सद्गुरु के पदचिह्नों का अनुसरण करके उस सत्य में प्रवेश पाना हमारा धर्म है। यही गुरुनानक ने कहा कि एक परमप्रभु ही सत्य है। इसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ भी है, सब अस्तित्वविहीन है, नश्वर है। अतः एक परमात्मा का ही सुमिरन करना चाहिए।

सिमिरहु सिमरि सिमरि सुख पावहु।

कलि कलेस तन माहिं मिटावहु।।

अर्थात् सुमिरन करो; क्योंकि सुमिरन करके ही सुख पाने और क्लेश मिटाने का विधान है। तो किसका स्मरण करें? ‘सुखमनी साहेब’ में नानक कहते हैं-

सिमिरहु जासु बिसम्भर एके।

नाम जपत अनगनत अनेके।।

उसका स्मरण करो, जो विश्वभर का अकेला ही भरण-पोषण करनेवाला है। वह एक ही है, यद्यपि उसके नाम अनन्त हैं, अनेक हैं। तो उसे क्या कहकर पुकारें? कितने नाम जपें? कहते हैं-

वेद पुरान सिमृति सुधाख्यर।

कीन्हे राम नाम इक आख्यर।।

वेद, पुराण, स्मृति इत्यादि सभी एक राम-नाम की देन हैं।

किनका एक जिसु जिय बसावे।

ताकी महिमा गनी न आवे।।

इस राम-नाम का एक कण जिसके हृदय में बस जाता है, उसकी महिमा गिनने में नहीं आती।

राम नाम उर में गह्यो, ताके सम नहीं कोय।

जा सुमिरत संकट कटे, दरस तुम्हारो होय।।

राम-नाम जिसके हृदय में बस गया, उसके समान कुछ भी नहीं है। इस नाम के स्मरण से संकट मिट जाता है और प्रभु आपका दर्शन हो जाता है। अब आप ही बताइये कि नानक कौन-सी कुल्हाड़ी मार रहे हैं? वह भी तो ठीक वही बात कह रहे हैं जो गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी और गीता का सन्देश है। नानक को आप सनातन से अलग कैसे करेंगे; क्योंकि उन्होंने कहा- एक ओंकार सत्गुरु प्रसादि। सत्य एक ओंकार है, और सनातन है क्या?

अतः इन महापुरुषों को यदि हम त्याग देते हैं कि ये हमारे नहीं अथवा हमारे धर्म के विपरीत हैं, तो हमने अपने ही पूर्वजों की शोध को खो दिया। उन्होंने जिस सत्य को सबके कल्याण के लिये प्रस्तुत किया, हमने उसका रिकार्ड (लेखा-जोखा) ही खो दिया। यह हमारी अपनी क्षति है, अन्य कुछ भी नहीं है। सत्य को उद्घाटित करनेवाला प्रत्येक महापुरुष समर्चनीय है।

सबके लिए धर्म का शुद्ध नाम आर्य, सनातन या हिन्दू है। ‘भोजन ऐसे करो’, ‘वस्त्र ऐसा पहनो’- इन बातों का धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह सनातन नहीं है। सनातन तो एकमात्र परमात्मा है। वही शाश्वत है, अविनाशी है। उसे शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, आकाश उसे अपने में समाहित नहीं कर सकता, न हन्यते हन्यमाने शरीरे (गीता, २/२०)- शरीर के मरने पर भी वह मरता नहीं है। वह सदा रहनेवाला अमृत तत्त्व है, वही एकमात्र धर्म है, वही सनातन है। उसके अतिरिक्त सारी सृष्टि, कश्यप और अदिति की सन्तानें, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, पाताल सब कुछ पुनरावर्ती स्वभाववाले हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है। केवल एक वह परमात्मा ही शाश्वत और सत्य है। यदि उस परमात्मा को हमने जीवन का उद्देश्य नहीं बनाया, उसकी सर्वव्यापकता पर हृदय में विश्वास अर्जित नहीं किया, तो हम सनातनी या धार्मिक कैसे?

फिर धार्मिक कौन है? धर्मशास्त्र गीता का निर्णय है कि सृष्टि में जन्म लेनेवाला कोई भी प्राणी यदि अनन्य भाव से एक परमात्मा को भजता है, तो क्षिप्रं भवति धर्मात्मा (गीता, ९/३१)- वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है। अतः गीता के अनुसार धार्मिक होने की केवल एक ही शर्त है, धर्मात्मा की केवल एक ही पहचान है कि भजते मामनन्यभाक् (गीता, ९/३०)- अनन्य अर्थात् अन्य न – केवल एक परमात्मा का जो चिन्तन करता है, वही धार्मिक है। अध्याय १८/६१ में है कि वह ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति– सभी प्राणियों के हृदय में रहता है, अतः उसमें प्रवेश का अधिकार भी सभी प्राणियों को है। वह अमीर-गरीब सबका है, सबको वह सुलभ है।

सत्य से संयुक्त सद्गुरु के उपदेशों का पालन करना, उनके आचरण पर चलना ही धर्म है। जो स्वयं तत्त्व में स्थित हो, ईश्वरीय संकेत समझता हो और समझा सकता हो, वही सद्गुरु है। इन्हीं के पास जाने के लिये गीता, वेद, मुहम्मद, महावीर, ईसा, बुद्ध, नानक और जरथुस्त्र कहते हैं। इसकी विधि सीखने पण्डे-पुजारियों और मौलवियों के पास जाना ही भूल है; क्योंकि किसी भी महापुरुष ने इनके पास जाने को नहीं कहा। ये तो पाठशाला के व्यवस्थापक मात्र हैं।

गुरोर्वाक्यं सतत गेयं न ज्ञेयं शास्त्रकोटिभिः अर्थात् गुरु का यदि एक वाक्य मिल जाय तो वह सत्य है, धारण तथा अनुकरण करने योग्य है और उसके समक्ष करोड़ों शास्त्र भी व्यर्थ हैं। महाजनो येन गतः स पंथा– वास्तव में उस अविनाशी तत्त्व (परमात्मा) के पूर्ण ज्ञाता महापुरुष ने जिस क्रिया से चलकर उसे पाया, वही एक पथ है। उन आप्तपुरुषों की शिक्षा का अनुसरण करना ही संसार में धर्माचरण है। अतएव सृष्टि में धर्म एक ही है।

सृष्टि के आदि में भगवान ने इस धर्म का, अविनाशी योग का उपदेश सूर्य को दिया। कालान्तर में लोप हो जाने से आज से लगभग छः हजार वर्ष पूर्व द्वापर में वही उपदेश भगवान ने अर्जुन के प्रति कहा। तब भी भगवान ने कहा था, दुबारा भी भगवान ने ही कहा। इसलिये गीता सृष्टि का आदिशास्त्र है क्योंकि इसमें भी वही ज्ञान है जो सृष्टि के आदि में भगवान ने कहा था। इसी ज्ञान का विस्तार वेद है।

इतिहासविद् एकमत से स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ है। धर्म और ज्ञान का उद्घोष करनेवाले वैदिक ऋषियों का सुविख्यात निर्णय पुरुषसूक्त में है कि वह एक परमात्मा ही सत्य है, जिसके तेज के अंशमात्र से सृष्टि का संचालन है। वही अमृत तत्त्व है। उसे प्राप्त करने के अतिरिक्त अमर होने का अन्य कोई मार्ग ही नहीं है। पूर्व मनीषियों ने उसी अविनाशी परमात्मा को मानस-यज्ञ के द्वारा हृदय में जाना। सर्वत्र व्याप्त होते हुए उसका निवास हृदय-देश में है। तत्त्वदर्शियों के पास जाकर इसे जानो। इस प्रकार वेद में श्रीमद्भगवद्गीता का ही निर्णय है कि एकमात्र आत्मा ही सत्य, शाश्वत, सनातन और अमृतस्वरूप है। उसके सिवा कुछ भी सत्य नहीं, पूज्य नहीं। उसका निवास हृदय-देश में है और मानस यज्ञ के द्वारा उसे पाया जा सकता है। उसकी विधि किसी तत्त्वदर्शी महात्मा से ही पायी जा सकती है।

भारत के विविध भाषाओं के विविध ग्रन्थों में इसी मूलज्ञान (गीता और वेद) का विस्तार है। बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, कबीर इत्यादि महापुरुषों के उपदेशों का सार यही है कि परमात्मा एक है और कठोर तपस्या से हृदय-देश में जागृत होता है। बुद्ध ने वही तप किया और उसी सर्वज्ञता को पाया।

आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व ईसा मसीह ने भी यही कहा, जो उनके पश्चात् शिष्यों ने बाइबिल में संकलित किया कि ईश्वर एक है और उसका निवास सर्वत्र होते हुए भी प्राप्तिस्थल हृदय-देश में है। ‘मेरे पास आ, तुम भी ईश्वर के पुत्र कहलाओगे।’ पास आने का अभिप्राय है- ध्यान के द्वारा उस ऊँचाई तक पहुँचना, जहाँ महापुरुष की स्थिति है। एकान्त सेवन, निरन्तर सुमिरन और पूर्वभूलों के लिए पश्चाताप यही उसकी प्राप्ति का उपाय है। स्पष्ट है कि ईसा ने भी वही कहा, जो गीता कहती है।

मुहम्मद साहब ने चौदह सौ वर्ष पूर्व अल्लाह की वाणी कुरान में उसी परमतत्त्व पर प्रकाश डाला, जो गीता और वेद का निर्णय है कि ‘ला इलाह इल्लिल्लाह’ अर्थात् अल्लाह (परमात्मा) के सिवाय अन्य कोई पूजनीय नहीं है। उस अल्लाह का निवास दिल में है- दिल मत किसी का दुखाओ बन्दे, यह घर खास खुदा का है। प्राणिमात्र में अपनी आत्मा को देखते हुए उन्होंने कहा कि हरी घास मत तोड़ो, किसी जीव को मत काटो, किसी प्राणी की आत्मा को ठेस न पहुँचाओ- जो इस राह पर चलते हुए प्रार्थना करते हैं, वे अल्लाह की आसमानी आवाज़ सुनते हैं। उसकी प्राप्ति का साधन बताते हैं कि जो खुदा के बन्दे हैं, तत्त्वदर्शी सन्त हैं, उनमें ईमान लाओ। उनके निर्देशन में चलकर संसार की हर वस्तु को तिलांजलि देकर, कठोर चिन्तन करके उसे हृदय-देश में पा सकते हो। निष्कर्षतः मुहम्मद साहब के उपदेश गीता और वेद-उपनिषद के उपदेशों से अनुप्राणित हैं।

वेद तथा वेदों के भी मूल आदिषास्त्र गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जो निर्णय दिया, वही ज्ञान विश्व में अनेक स्थलों पर अनेक भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है- कहीं कोई तात्त्विक भेद नहीं। गीता और वेद द्वारा उद्घाटित सत्य और साधन-पद्धति ही विभिन्न लोगों को समझाने के लिये विभिन्न सन्तों के द्वारा विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में कही गयी है। उन भक्तों के हृदय में आन्तरिक अनुभूतियों के द्वारा परमात्मा ने एक ही जैसा निर्णय दिया है; किन्तु भगवत्प्राप्ति की सम्पूर्ण, क्रमबद्ध साधना केवल गीता में ही सुरक्षित है जिसे समझने के लिए गीता की यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ विश्व की अधिकांश भाषाओं और इण्टरनेट पर भी उपलब्ध है।

जब ईश्वर एक है, धर्म एक है तो धर्मनिरपेक्षता की बात महत्त्वहीन लगती है। सापेक्ष और निरपेक्ष की बात तो तब उठती, जब धर्म एक से अधिक (दो-चार) होते। एक ही सत्य को उद्घाटित करनेवाला धर्म एक ही है तो निरपेक्ष कैसा? भाषाओं और वेशभूषा की पैरवी धर्म से सम्बन्ध नहीं रखती। इसलिये भारत सरकार को चाहिये कि सभी धर्माचार्यों से इस पुस्तिका-जैसी तालिका माँगकर धर्म का शुद्ध स्वरूप प्रस्तुत करे, इससे समाज के सारे झगड़े स्वतः शान्त हो जायेंगे। जिस प्रकार सूर्य की किरणें कोहरे को मिटा देती हैं, अन्धकार को नष्ट कर देती हैं, उसी प्रकार ज्योंही ईश्वरीय प्रकाश से अज्ञान का कुहासा छँट जायेगा तो एक-जैसा बोध, एक-जैसा इष्ट और एक-जैसा मार्ग होने पर कोई झगड़ने का कारण कहाँ रह पायेगा?

रहन-सहन, आचार-विचार, वेश-भूषा, भाषा दो हो सकते हैं; किन्तु साधना दो नहीं है- क्योंकि हैं सभी अविनाशी कल्याण तत्त्व की ओर ही बढ़नेवाले, एक ही वस्तु के उपासक। जैसे- कपड़े की पचीसों दुकानें हैं लेकिन सबके साइन बोर्ड, सबके ट्रेडमार्क अलग-अलग हैं; किन्तु प्रत्येक दुकान में वस्त्र ही मिलेगा। ठीक इसी प्रकार समस्त सम्प्रदायों में एक ही अविनाशी सत्य की शोध है। ये चिह्न गुरुघरानों के हैं। किसी महापुरुष की शिष्य-परम्परा में जब संख्या बढ़ जाती है तो वही मज़हब या सम्प्रदाय बन जाता है।

प्रत्येक सम्प्रदाय में कालान्तर में सच्चे फकीर और साधनारत लोग अलक्ष्य होते जाते हैं, व्यवस्था ही प्रमुख होती जाती है तो वे बाह्य ट्रेडमार्क को ही सजाने में लग जाते हैं, भीतरी वस्तु छोड़ देते हैं, इस प्रकार धर्म के नाम पर भ्रान्तियों और संकीर्णताओं को प्रवेश मिल जाता है।

आप स्वयं विचार करें कि सभी सम्प्रदायों में आराध्य एक है। जो सर्वत्र व्याप्त है, वह अविनाशी तत्त्व एक ही है। उसे खोजने का तरीका है महापुरुषों का सान्निध्य, जो परमात्मा के रसूल हैं, ईश्वर के दूत हैं, तत्त्वदर्शी हैं, परमतत्त्व परमात्मा के तद्रूप अनुभूतिवाले हैं। प्रकृति के प्रवाह से हटकर परमात्मा के तद्रूप होनेवाला साधन एक ही है। मरणधर्मा को अनन्त जीवन दिलाना, दुःख के स्थान पर आनन्द सबका लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के साथ देहाध्यास शान्त हो जाता है। शाश्वत- जो अपरिवर्तनशील है, अमृततत्त्व – जो मृत्यु से परे है, अकालपुरुष – जहाँ काल नहीं है, इसकी प्राप्ति जिस विधि से होती है उस विधि को धारण करना ही तो धर्म है। वस्तुतः सनातन – जो सदैव था, है और रहेगा, उस अविनाशी को धारण करना, उसकी प्राप्ति की क्रिया में अनुरक्त रहना धर्म है। इस पथ पर कोई आरम्भ में है, कोई मध्य में तो कोई प्राप्ति पर। इसमें सम्प्रदाय कैसा? अलगाव कैसा? विरोध कैसा?

मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर परमात्मा के प्रार्थना-स्थल हैं। ये ईश्वर के दरबार हैं, परमात्म-तत्त्व की शिक्षास्थलियाँ हैं, ईश्वरीय पाठशालायें हैं। यदि इन स्थलों पर यह नहीं बताया जाता कि ईश्वर क्या है, कहाँ रहता है और उसे प्राप्त करने का तरीका क्या है?, तो उनकी स्थापना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थलियाँ कालान्तर में धर्म के नाम पर किसी धोखे को ही जन्म देंगी। जिन स्थलियों में उक्त प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत नहीं किया जाता, वे ऐसी पाठशालाओं के समान हैं जिनमें पढ़ाई नहीं होती। केवल पूजा कराने और प्रसाद बाँटनेवाले मन्दिर अपने महान् उद्देश्य से दूर हट सकते हैं। भेदभाव की दीवार खड़ी करके अपनी जीविका चलानेवाले लोग सनातन को नहीं जानते- धर्म जानते ही नहीं।

सृष्टि में मनुष्य मात्र का धर्म एक है। ईश्वर-पथ में अमीर-गरीब, काले-गोरे, बुद्धिमान् और मूर्ख का भेद नहीं है। इसमें तो अनन्य चिन्तन से, अनन्य भाव से जुड़ना ही मुख्य है। एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी श्रद्धा है तो वह भटका हुआ है, शोचनीय है। उस एक परमात्मा के लिये यदि आप उसी की प्राप्तिवाले किसी महापुरुष को पकड़कर चलेंगे तो परमात्मा स्वयं अपना बोध करायेगा, सामने खड़ा होकर समझायेगा और अन्त में अपने स्वरूप में विलय कर लेगा। इसी का नाम शाश्वत शान्ति है। अनेक जन्मों से साधन करनेवाला पथिक इस लक्ष्य को बाल्यकाल में ही पा लेता है।

।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

Q & A
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