सन्तों का उद्भव एवं उनकी परम्परा

सन्तों का उद्भव एवं उनकी परम्परा

परमपूज्य परमहंसजी का जीवन पूरा का पूरा उन महापुरुषों से मिलता है, जो आदि से लेकर आज तक होते आये हैं; जैसे- राम, कृष्ण, बुद्ध इत्यादि से लेकर तुलसी, कबीर आदि हुए हैं। आज का मानव इन प्राचीन महापुरुषों को जिन युक्तियों के द्वारा सम्बोधित करता है, उनका यही तो रूप है कि दो या तीन को जीवनदान, कुछ रोगियों एवं पागलों का ठीक होना आदि। पूज्य परमहंसजी में इन सब का पाया जाना एक साधारण बात थी। मनुष्य अपने समझने के लिए चाहे जो भी बना ले, परन्तु उन महापुरुषों के अन्दर की वस्तु यह नहीं है। मारने, जिलाने अथवा रोग-निवारण से उन महापुरुषों की उपलब्धि का लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। यह तो उनकी ऐसी आभा है जो स्वाभाविक घटित होती रहती है। जब कोई चलकर वास्तव में ब्रह्म में लीन हो जाता है, तब ये रश्मियाँ स्वाभाविक कार्य करती रहती हैं और भली-बुरी जैसी जिनकी मनःस्थिति पाती हैं, वैसा ही उनका निदान करती रहती हैं। हाँ, प्राचीन महापुरुषों के पीछे अनुयायियों ने शनैः-शनैः पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुछ न कुछ उपाधि देते हुए अवतार आदि बड़ी-बड़ी संज्ञाओं से विभूषित कर दिया और अपने-अपने लिए प्रतीक बना लिया; किन्तु महापुरुषों के यहाँ भेदजन्य संघ या संस्था नहीं होती।

महापुरुष किसी देश-काल में जब भी हुए हैं, वास्तव में उन्होंने उस परमसत्ता को एक ही जैसा पाया है। कारण कि सबके ऊपर नियंत्रण करनेवाली परमसत्ता एक ही जैसी रहा करती है अर्थात् वह भगवान एक ही जैसा है। यदि वास्तव में किसी ने उस परमात्मा की उपलब्धि की है तो वह समाज के बीच दरार नहीं डाल सकता। तुम खुदा के साथ हो गये और हम गॉड के- इसी प्रकार अनन्त शाखाएँ हो सकती हैं। यदि कोई दलबन्दी की दरार डालता है तो सिद्ध है कि अभी वह पाया नहीं है। महापुरुष के लिए आप सब एक ही मानव के रूप में हैं। यदि आप अधिकारी की स्थिति में हैं तो महापुरुष प्रकृति के दलदल की एक सीमा से उठाकर दूसरी सीमा को पार कराता है।

महापुरुष जिस इष्टमयी युक्ति से पथिक को साधना में उत्तरोत्तर उठाते हैं वह लिखने में नहीं आती। अधिकारी के हृदय में स्वयं महापुरुष प्रेरक के रूप में खड़े हो जाते हैं। अधिकार के अर्जन में हममें सर्वभावेन श्रद्धा एवं लगन की आवश्यकता है। इसमें किसी जाति व कुल के लिए प्राथमिकता हो, यह भूल है।

जब प्राचीन कथानकों पर दृष्टि डाली जाती है तो उनमें किसी जाति-विशेष का वर्णन नहीं मिलता। देवासुर-संग्राम में दो जातियों का अभ्युदय हुआ, पहली देवता एवं दूसरी असुर। उसके बाद यक्ष, रक्ष, किन्नर, गन्धर्व, नाग और यवन के रूप में मनुष्य का जन्म हुआ एवं आगे चलकर इस मनुष्य ने वानर, रीछ, मण्डूक आदि में पलटा खाया। शनैः-शनैः मानव आर्य का रूप लेकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र के रूप में बदल गया। यह बदलना बन्द नहीं होगा, कारण कि यह सामाजिक सद्व्यवस्थाओं का चक्र है। मनुष्य सदैव अपने रहन-सहन के तरीके को सुलझाता आया है, यही कारण है कि अपने को दलों में विभक्त कर अनेक रूढ़िगत परम्पराओं का अनुयायी बताने लगा है। हो सकता है कि आगे चलकर मानव और कोई रूप ले ले, क्योंकि प्रत्येक द्वीप में यही होता आया है। इन शारीरिक व्यवस्थाओं के सुधार से उस परमात्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है। उस परमात्म-धर्म की प्रक्रिया मन से क्रियान्वित होती है और क्रमशः मन के अचल, स्थिर व पूर्ण निरोध हो जाने पर इष्ट-दर्शन के साथ पूरी होती है।

यदि अनुराग व विरह-वैराग्य है तो आवश्यक नहीं कि आप सही माता-पिता के पुत्र हों तभी ब्रह्मर्षि व सन्त की स्थिति में आयेंगे। महर्षि वशिष्ठ उर्वशी के उदर से उत्पन्न हुए थे, परन्तु उनके ब्रह्मत्व में कोई कमी नहीं थी। महर्षि वाल्मीकि कोल के संयोग से और ब्रह्मर्षि व्यास मछोदरी (मत्स्यपालिका) के संयोग से उत्पन्न हुए थे किन्तु उनके ऋषित्व में कोई अन्तर नहीं था। कबीर तालाब के किनारे शैशवकाल में मिले। ईसा अपनी माँ के अविवाहित काल में ही सात माह के उदर में थे, इतने पर भी पूर्ण सन्त हुए। अतः भगवत्-पथ में माता-पिता की त्रुटियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हाँ, भगवत्-पथ का पथिक इन्द्रिय-संयम की पूर्ण कसौटी के बिना उस लक्ष्य को नहीं पाता। चिन्तन की प्रवेशिका से ही यह संयम आवश्यक है।

अब इन महापुरुषों को विशेष तारीफ का कलेवर पहना देना तो उन लोगों की देन है जो महापुरुष को हृदय से पकड़ने में असफल रहे और कोरी भावुकता से भरे हैं। अब उन महापुरुषों पर विचार करें, जिनके पीछे संकीर्णता पैदा हो गई है, जिनके परिणामस्वरूप संघ का निर्माण हो गया। भावुक उन्हें ईश्वर का इकलौता बेटा कहते हैं। बड़े-बड़े अक्षरों में इतना अवश्य लिख देते हैं कि ईश्वर ने अपने इकलौते बेटे को स्वर्ग से भेजा। इसका मतलब अब ईश्वर के पास कोई और पुत्र नहीं है एवं कोई दूसरा पुत्र हो भी नहीं सकता; किन्तु महात्मा ईसा ने बताया कि केवल मैं ही ईश्वर का पुत्र हूँ, अब नहीं होंगे, ऐसी बात नहीं। ईसा ने कहा- मेरे पास आओ, इसलिए कि ईश्वर के पुत्र कहलाओगे। सन्त के पास आने का तात्पर्य है- सन्त के साधना स्वरूप में आना।

कबीर के अनुयायी कहते हैं कि तालाब के किनारे वह प्रकाश एकत्रित हुआ और बालक बन गया- यह कोरी भावुकता है। इससे तो यह सिद्ध होता है कि भविष्य में कोई कबीर होना ही नहीं चाहिए। अतः परमात्मा ही पिण्डरूप में ढल गया, किन्तु उन महापुरुष ने अपनी वाणी में अपना परिचय देते हुए कहा है कि-

कबिरा कबिरा क्या करै, सोधो सकल शरीर।

आशा तृष्णा बस करै, सोई दास कबीर।।

जब कबीर ने महापुरुष की स्थिति प्राप्त कर लिया तब समाज कुछ कल्याण के कारण देखकर कहने लगा कि कबीर बड़े अच्छे महापुरुष हैं, वे तो योगी हैं आदि। तब कबीर ने अपना परिचय देते हुए कहा कि क्या कबीर-कबीर की रट लगाए हो, सम्पूर्ण शरीर (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) की शोध करो। आशा और तृष्णा को वश में कर लो, बस तुम कबीर हो। कबीर एक स्थिति है, वह रहनी पाकर सभी कबीर हो सकते हैं।

अतः सिद्ध हुआ कि महापुरुष किसी देश, जाति एवं कुल-विशेष के नहीं होते। उनकी उपलब्धि सार्वभौमिक चेतन में होती है, अधूरी अवस्था में नहीं। परमपूज्य श्री परमहंसजी भी ऐसे ही आदर्शों में थे। अब चाहे हम भारतीय हों अथवा विदेशी, हिन्दू हों या यवन, सिख, ईसाई अथवा कोई भी हों; यदि उस आत्मा को परमकल्याण की स्थिति में प्रत्यक्ष पाना है, तो सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़कर किसी महापुरुष के प्रति अपने को समर्पित करना होगा।

हाँ, स्वयंसिद्ध कुछ समस्याएँ मानव के समक्ष हैं। यह मौलिक रूप से विचारणीय है कि मनुष्य किसी-न-किसी कुल-विशेष में पैदा होता है और पैदा होते ही उसमें कुल-धर्म के संस्कार पड़ने लगते हैं। धीरे-धीरे वह कुल-धर्म की सीमा में बँध जाता है और उसी को परमशान्ति का लक्ष्य मान बैठता है, परन्तु समाज में अनेकानेक कुल पाये जाते हैं। इस तरह तो वह लक्ष्य भी अनेक रूपों में दिखाई देगा, जबकि वस्तुतः वह एक ही है। यथार्थतः यदि हम परमकल्याण की ओर बढ़ना चाहते हैं तो हमें इस संकीर्ण कौटुम्बिक सीमा का परित्याग कर व्यापक विचारों की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। जब हम कुटुम्ब-धर्म से आगे बढ़कर जैसे ही विकासोन्मुख होने के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वैसे ही अपनी जाति का ममत्व हमें जाति-धर्म के बन्धन में पूर्णतया आबद्ध कर लेता है।

यदि कोई सच्चा अनुरागी है, उसकी समझ कार्य कर रही है तो उसे जाति-धर्म को भी ठीक उसी प्रकार तिलांजलि दे देनी होगी, जैसे कि कुल-धर्म को। ऐसी अवस्था में ही वह ससीम से असीम की ओर बढ़ सकेगा, व्यष्टि से समष्टि का स्पर्श कर सकेगा; क्योंकि वह भगवान नाम की अलौकिक वस्तु एक ही है, भाषा-भेद से भले ही उसे अनेक रूपों में सम्बोधित किया जाय। जाति-धर्म की सीमा का परित्याग कर जैसे ही हम साधनोन्मुख होते हैं, वैसे ही अनेक मत-मतान्तरों का बन्धन हमें पुनः अनेकात्मकता की संकीर्णता में जकड़ लेता है। इसी बीच कतिपय नैतिक आदर्शवादियों के सम्पर्क से कुछ अनुरागी देश-प्रेम की ओर उन्मुख हो जाते हैं। वे अपने देश का विकास ही चाहते हैं, उसी को सर्वोपरि मानते हैं और उसके लिए प्राणोत्सर्ग करने के लिए भी तत्पर रहते हैं। परन्तु क्या भारत भर ही देश है? क्या परमात्मा यहीं तक ही सीमित है? इस प्रकार अनेक देश होने के कारण वह एकरस सत्ता तो अनेक रूपों में दृष्टिगोचर होगी। यदि वस्तुतः आप परमशान्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो देशभक्ति की सीमा व देशभक्ति के भ्रम का परित्याग कर सार्वभौमिक विचारों को आत्मसात् करना पड़ेगा। इस सीमा के आगे बढ़ने पर मज़हब (सम्प्रदाय) साधक को सीमाबद्ध कर लेते हैं। कोई राम को मानता है तो कोई रहीम को, कोई ईसा को मानता है तो कोई बुद्ध को, कोई महाबीर स्वामी को मानता है तो कोई खुदा को। इस प्रकार हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्धिस्ट आदि अनेक मज़हबी रोगों से साधक ग्रसित हो जाता है; किन्तु इन अनेक मज़हबों से ईश्वर की अभिन्न स्थिति नहीं मिल सकती जो कि व्यापक है। अन्ततः जब अनुरागी साधक कुल-धर्म, जाति, सम्प्रदाय, मत-मतान्तर, देश-प्रेम एवं विविध मज़हबों के द्वन्द्व को तिलांजलि देकर असीम सत्ता का अन्वेषण करने लगता है तभी क्रमागत प्रगति के पश्चात् उस सर्वव्यापी स्वरूप का साक्षात्कार होता है, जो सभी कुल-धर्मों एवं जातियों में है। सभी सम्प्रदायों में विभिन्न मत भले ही क्यों न हों, पर हर देश व धर्म का वही सर्वोपरि परमचेतन स्वरूप है जो शुद्ध, बुद्ध, असीम एवं व्यापक है। इसी परमतत्त्व की उपलब्धि मानव-जीवन का अमर लक्ष्य है।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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