यज्ञ?
प्रश्न– महाराजजी! श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’- यज्ञ के सिवाय जो कुछ किया जाता है वह इसी लोक का एक बन्धन है। कृपया बतावें कि यज्ञ क्या है? कैसे किया जाता है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ की पूर्ति में भगवान् मिलते हैं लेकिन संसार में इतना हवन–यज्ञ होता है फिर भी भगवान् किसी को मिलते दिखाई नहीं देते। कृपया यज्ञ के स्वरूप को स्पष्ट किया जाय।
उत्तर– आपकी शंका स्वाभाविक है। गीता के तीसरे अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। (गीता, 3/9)
अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। कर्म वह है जिससे यज्ञ पूर्ण होता है। इस यज्ञ के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है, जिसमें सारा जगत् दिन-रात व्यस्त है, वह इसी लोक का बन्धन है। कर्म तो ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (गीता, 4/16)- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला होता है, वह बाँधता नहीं। ‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर’- इसलिए कौन्तेय! उस यज्ञ की पूर्ति के लिए, संग-दोष से अलग रहकर, भली प्रकार कर्म का आचरण कर। इस प्रकार यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह प्रक्रिया-विशेष ही कर्म है, जिससे यज्ञ पूर्ण होता है। सिद्ध है यज्ञ कोई निर्धारित दिशा है। अतः आपका प्रश्न स्वाभाविक है कि वह यज्ञ है क्या?
श्रीकृष्ण ने इस प्रश्न का गीता में सविस्तार निरूपण किया है। उन्होंने केवल इतना ही नहीं बताया कि यज्ञ क्या है बल्कि प्रकरण की महत्ता समझाते हुए यह भी बताया कि यज्ञ आया कहाँ से और हमें देता क्या है?
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। (गीता, 3/10)
प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजा को रचकर कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ। यहाँ बुद्धि ही ब्रह्मा है- ‘अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान।’ (मानस, 6/15) बुद्धि चार प्रकार की कही गयी है- ब्रह्मविद्, ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविदुर्यान और ब्रह्मविद्वरिष्ठ।
‘ब्रह्मविद्’ वह बुद्धि है जो ब्रह्मविद्या से ओतप्रोत हो किन्तु यह केवल रटी-रटायी विद्या मात्र है, क्योंकि इस स्तर की बुद्धिवाला उस पर पूर्णतः चल नहीं पाता। ब्रह्मविद्वर वह है जिसे ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठता प्राप्त हो। क्रियात्मक जानकारी होने पर साधन क्रमशः इतना उन्नत हो जाय कि वह स्वयं तो ब्रह्म का ज्ञाता हो ही, दूसरों को भी उस मार्ग पर चला देने की क्षमता रखे, उस बुद्धि को ब्रह्मविद्वरीयान् कहते हैं। ब्रह्मविद्वरिष्ठ ब्रह्मज्ञाता की वह स्थिति है जिसमें इष्ट समाहित हो। ऐसी बुद्धि मात्र यंत्र होती है और उसके माध्यम से आराध्य ही अपनी वाणी प्रसारित किया करता है। ऐसे ही महापुरुषों की वाणी का संकलन वेद है। वेदों को अपौरुषेय इसीलिए कहा जाता है, यद्यपि वह सौ-दो सौ महर्षियों की वाणी का संकलन है; बोलनेवाले सौ-सवा सौ महात्मा ही हैं। फिर भी उसमें महात्माओं का कुछ भी नहीं है बल्कि वह अव्यक्त परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है। ऐसे ही महापुरुषों ने कल्प के आदि में प्रजा को यज्ञ से संयुक्त किया।
कल्प के आदि का आशय भजन के आरम्भ से है। भवरोगों से त्रस्त मरणधर्मा जीवात्मा का कल्प भजन से ही है। इसी के द्वारा वह पूर्ण नीरोग होता है, उसका कायाकल्प हो जाता है। भजन की दो अवस्थाएँ हैं- आरम्भ एवं पराकाष्ठा। कल्प का आदि भजन की आरम्भिक स्थिति है; जबकि पराकाष्ठा वह स्थिति है जहाँ आत्मा शाश्वत ब्रह्म का दिग्दर्शन पाकर पूर्ण नीरोग, अचल स्थिर हो जाती है, पुनः योनियों में प्रवेश नहीं करती, जिसे श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! तू मुझमें निवास करेगा। इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा ने अर्थात् जिसकी बुद्धि मात्र यन्त्र है, ऐसे स्थितप्रज्ञ महापुरुष ने कल्प के आदि में अर्थात् भजन के प्रारम्भ में प्रजा को यज्ञ से संयुक्त किया अर्थात् साधक के अन्तःकरण में यज्ञ का बीज वपन किया और कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुमलोग वृद्धि को प्राप्त होओ।
यज्ञ से कौन-सी उन्नति होगी? दो पुत्र हैं तो क्या चार हो जायेंगे? एक मकान है तो क्या दो हो जायेंगे? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, यह यज्ञ ‘इष्टकामधुक्’- इष्ट-सम्बन्धी कामना की पूर्तिवाला होगा। इष्ट वह है जिससे कभी अनिष्ट नहीं होता। ऐसा तो एकमात्र परमात्मा है, जिसकी प्राप्ति के पश्चात् कभी पतन नहीं होता। देवता तक ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता, 9/21)- पुण्य क्षीण हो जाने पर मृत्युलोक में उसी स्थान पर लौटकर आ जाते हैं, जहाँ से चलना प्रारम्भ किया था। इससे बड़ा अनिष्ट क्या होगा? अतएव एकमात्र परमात्मा ही परमकल्याणकारी है। वही हमारा इष्ट हो सकता है और यज्ञ इसी इष्ट-सम्बन्धी कामना की पूर्ति करनेवाला है।
जिज्ञासा स्वाभाविक है कि यज्ञ से किस प्रकार इष्ट की उपलब्धि होगी? क्या इष्ट अकस्मात् कल्याण कर देगा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, बल्कि-
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।। (गीता, 3/11)
इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो। अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद्। आसुरी सम्पद् काम, क्रोध, मद, लोभ, माया की चपेट में तो जीव पहले से है ही। अतः इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो; हृदय में दैवी सम्पद् को बलवती बनाओ। विवेक, वैराग्य, मन का शमन, इन्द्रियों का दमन इत्यादि दैवी सम्पद् हैं जिसका विस्तरशः उल्लेख सोलहवें अध्याय में है। यह सम्पत्ति आंशिक रूप से है तो सब में, किन्तु दुर्बल है; उसी को बलवान भर करना है। यही आपका अपना बल है। उसी की उन्नति में आपकी उन्नति निहित है। दैवी सम्पद् ज्यों-ज्यों बलवती होगी, मन अन्तराल में सिमटता जायेगा, ध्यान में बल मिलता जायेगा। इस प्रकार परस्पर उत्थान करते-करते परमश्रेय परमात्मा को प्राप्त हो जाओगे। यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जो दैवी सम्पद् को उत्तरोत्तर उन्नत करनेवाला है, परम कल्याण करनेवाला है।
दैवी सम्पद् को विकसित किये बिना अर्थात् साधन किये बिना यदि कोई अपने कल्याण को सिद्ध मान लेता है, श्रीकृष्ण उसकी निन्दा करते हैं-
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।। (गीता, 3/12)
यज्ञ द्वारा संवर्द्धित देवता तुम्हारे लिए इष्ट-सम्बन्धी भोग देंगे और ‘तैर्दत्तान्’-वे दाता हैं। जो बिना उनके दिये ही अपने को पूर्ण मान लेता है, श्रीकृष्ण के शब्दों में वह चोर है।
प्रश्न– महाराजजी! ‘इष्टान्भोगान्’ का अर्थ क्या इच्छित भोग नहीं होगा?
उत्तर– नहीं, क्योंकि सांसारिक इच्छाएँ धन, स्त्री, पुत्रादि की हो सकती हैं किन्तु इनसे परम कल्याण सम्भव नहीं है लेकिन यज्ञ तो ऐसी वस्तु है जिससे ‘श्रेयः परमवाप्स्यथ’- परम कल्याण होता है। अतः इष्ट-सम्बन्धी भोग, ध्यान की मस्ती, ईश्वरीय वातावरण की उपलब्धि से सम्बन्धित है। इस प्रकार देवता तुम्हारे लिए इष्ट-सम्बन्धी भोग देंगे (चिन्तन-क्रम यज्ञ-क्रिया है) और वही एकमात्र दाता हैं। अर्थात् बिना किये कोई नहीं पाता। इन दैवी प्रवृत्तियों का सम्वर्द्धन किये बिना ही जो उस अव्यक्त सत्ता की स्थिति का उपभोग करता है, बिना चले ही जो मंजिल पर पहुँच जाने का दम्भ भरता है, वह निश्चय ही चोर है, मुँह छिपानेवाला है। अतः यज्ञ करना नितान्त आवश्यक है। यज्ञ से मिलेगा क्या?
यज्ञ से होनेवाली उपलब्धि के बारे में श्रीकृष्ण कहते हैं-
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।। (गीता, 3/13)
यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न अर्थात् यज्ञ की पूर्तिकाल में शेष ब्रह्मानन्द को पाकर यह आत्मा सदा-सदा के लिए तृप्त हो जाती है। उस ब्रह्मानन्द का पान करनेवाले सन्त सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं; किन्तु जो पापी केवल शरीर-पोषण मात्र के लिए परिश्रम करते हैं वे और अधिक पाप का ही संग्रह करते हैं। वे यज्ञ तो करते हैं किन्तु बदले में शरीर और तत्सम्बन्धित सुख-सुविधाओं की आशा रखते हैं, जबकि देवताओं तक का शरीर पुनरावर्तनशील है। अतः यज्ञ निष्काम भाव से ही करना चाहिए।
इस प्रकार ब्रह्मा ने यज्ञ से संयुक्त प्रजा को बनाया, तो अन्ततः वे सम्पूर्ण भूत यज्ञ से संयुक्त क्यों हो गये? कौन-सा प्रलोभन उन्हें दिखायी पड़ा? श्रीकृष्ण कहते हैं-
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।। (गीता, 3/14)
भूत प्राणी अन्नाद् अर्थात् अन्न को खानेवाले होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् की भृगुवल्ली में अन्नाद् शब्द का प्रयोग ‘अन्न का उपभोग करनेवाले’ के लिए किया गया है। भूतों की उत्पत्ति संकल्प से होती है। इसी अन्न को उद्देश्य बनाकर अर्थात् ब्रह्म को उद्देश्य बनाकर सभी भूत (संकल्प) यज्ञ से संयुक्त हुए। अन्न ब्रह्म है- ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’ (तैत्ति0/भृगु0 द्वितीय अनुवाक्) वही तो आत्मिक आहार है जिसे पाकर आत्मा तृप्त हो जाती है, कभी अतृप्त नहीं होती। उसी ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर समस्त संकल्प यज्ञ से संयुक्त हुए।
संकल्पों की उत्पत्ति तो ब्रह्म के लिए हुई, अन्न के लिए हुई; किन्तु उस अन्न की उत्पत्ति कैसे होती है? श्रीकृष्ण कहते हैं- वृष्टि से। पूर्वजन्म में कुछ करते बन गया अथवा इस जन्म में किसी महापुरुष की कृपावृष्टि हो, जबकि वह हमारा ही पूर्व का किया हुआ यज्ञ-संचार है जो अब मिलता है, तभी ब्रह्मानन्द का आस्वादन सम्भव है। यह कृपावृष्टि कैसे होगी? श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ से। या तो किसी महापुरुष के कृपा-प्रसाद से हो अथवा ‘अनेकजन्मसंसिद्धः’ (गीता, 6/45)- पूर्वजन्म से वह पार लगा हो। वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। ज्यों-ज्यों आप क्रिया करते जायेंगे, यज्ञ उन्नत होता जायेगा।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।। (गीता, 3/15)
कर्म को तू वेद से उत्पन्न हुआ जान! जिन महापुरुषों को यह तत्त्व विदित है, बुद्धि मात्र यंत्र है, उन्हीं की वाणी वेद है। ऐसे महापुरुषों की वाणी से इस कर्म की रचना हुई, तो क्या महापुरुषों ने अपनी बुद्धि से रचना की? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, ऐसे महापुरुषों के माध्यम से स्वयं ब्रह्म ही अपनी वाणी प्रसारित करता है। इसलिए वेद को तू अक्षय ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ जान। इसीलिए वेद अपौरुषेय हैं। यद्यपि वेद सैकड़ों महापुरुषों की वाणियों का संकलन है, जो ब्रह्म में भली प्रकार स्थित थे फिर भी वह किसी पुरुष की वाणी नहीं है बल्कि महापुरुषों के मूल में जो अव्यक्त है उसके श्रीमुख की वाणी है। श्रुति है- ‘ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मैव भवति।’, ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, 2/126/3) स्वरूप में स्थित होने के पश्चात् महापुरुष के मुख से जो भी निकलता है वह सब वेद है; क्योंकि उनकी बुद्धि मात्र यंत्र है, शरीर रहने का एक मकान मात्र है। अव्यक्त ब्रह्म ही उनमें व्यक्त होता है। इसलिए वेद को तू अक्षय ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ जान। इसीलिए वह सर्वव्यापी अक्षर परमात्मा सदैव यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।। (गीता, 3/16)
श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं कि, हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाये हुए साधन-चक्र के अनुसार नहीं बरतते, वे इन्द्रियों का आराम चाहनेवाले पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीते हैं। किस साधन-चक्र को? जिस पर श्रीकृष्ण ने अभी प्रकाश डाला कि क्रमशः देवताओं की उन्नति करो, दैवी सम्पत्ति को बलवती बनाओ। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् का संग्रह होगा, इष्ट की ओर चित्त केन्द्रित होता जायेगा, वही तुम्हारी प्रगति है। परस्पर उन्नति करके परमकल्याण को प्राप्त कर लो। वही एकमात्र दाता हैं। उनके दिये बिना अपने को पूर्ण मान लेनेवाला पुरुष चोर है, मुँह छिपानेवाला है। वे अघायु इन्द्रियाराम के लिए हैं। देवता भी तो मरणधर्मा हैं। उनका शरीर भी मिल जाय तो क्या? उतने से भी परमकल्याण सम्भव नहीं है। यज्ञ से शेष बचनेवाला ब्रह्मानन्द ही इस आत्मा का अशन है। उसका पान करनेवाले सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं और जो शरीर के लिए ही पचते हैं, वे पाप ही भोगते हैं। इसी ब्रह्मानन्दरूपी अन्न को उद्देश्य बनाकर प्राणी यज्ञ से संयुक्त हुए। अन्न अर्थात् ब्रह्म की उत्पत्ति कृपावृष्टि से होती है। पूर्वजन्म के यज्ञाचरण अथवा यज्ञस्वरूप महापुरुषों के द्वारा यह वृष्टि होती है। वेद अविनाशी से उत्पन्न होता है; इससे सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है। यदि आपको परमात्मा की चाह है तो यज्ञ का आचरण करें। इस साधन-चक्र के अनुसार क्रमशः परस्पर उत्थान करते-करते जो परमकल्याण तक नहीं पहुँच जाते, श्रीकृष्ण के शब्दों में, इन्द्रियों का आराम चाहनेवाले ऐसे पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीवित रहते हैं। सिद्ध है कि इस चिन्तन-पथ में इन्द्रियों के आराम का कोई विधान नहीं है। मन और इन्द्रियों के दमन के साथ ही भोगों से विरत रहकर ही इस यज्ञ का किया जाना सम्भव है।
श्रीकृष्ण की मान्यता है कि यज्ञ को किये बिना उस परमतत्त्व को न कोई पाया है और न कोई पा सकेगा। पूर्व में होनेवाले जनक इत्यादि महर्षिगण इसी कर्म को करके परमनैष्कर्म्य स्थिति को प्राप्त हुए; किन्तु जो महापुरुष आत्मा में ही तृप्त एवं स्थित हैं, उनके लिए कर्म करने से न कोई लाभ है और छोड़ने से कोई हानि ही है। इसी को और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते।। (गीता, 4/23)
आसक्ति एवं संग-दोष के प्रभाव से सर्वथा रहित तथा साक्षात्कार द्वारा प्राप्त जानकारी में स्थित चित्त, यज्ञ के लिए भली प्रकार आचरण करनेवाले मुक्त पुरुष के सम्पूर्ण कर्म नष्टप्राय रहते हैं। यज्ञ का आचरण ही तो कर्म है। कर्म करते हुए भी वह महापुरुष लिपायमान नहीं होता। क्यों! जब वह कर्ता है तो कर्म उसे बाँधते क्यों नहीं? श्रीकृष्ण कहते हैं-
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।। (गीता, 4/24)
ऐसे महापुरुषों द्वारा जो समर्पण किया जाता है वह भी ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्म ही कर्ता है और जो हवन किया जाता है वह भी ब्रह्म ही है। उसके द्वारा जो प्राप्त होने योग्य है, वह भी ब्रह्म है; क्योंकि कर्म के द्वारा वह ब्रह्म में समाधिस्थ हो चुका है। उसके लिए तो ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’– सर्वत्र ब्रह्म ही ब्रह्म है। सारांशतः ऐसा महापुरुष वस्तुतः कुछ करता नहीं बल्कि पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए अभिनय मात्र करता है। यज्ञ से न तो उस पर शुभ संस्कार पड़ता है और न अशुभ ही।
यज्ञ–विधि
यह तो प्राप्तिवाले पुरुष के आचरण हैं; किन्तु यज्ञ-विधि क्या है? हम आरम्भ कहाँ से करें? इस पर देखें श्रीकृष्ण के ही शब्दों में-
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।। (गीता, 4/25)
मुक्तपुरुष के लिए यज्ञ की कोई आवश्यकता नहीं है; किन्तु दूसरे योगी, जिन्हें अभी उपलब्धि नहीं हुई है, देवयज्ञ को अच्छी प्रकार उपासते हैं, दैवी सम्पत्ति को अच्छी प्रकार बलवती बनाते हैं। वैराग्य, शम, दम इत्यादि गुण जिसमें परमदेव का देवत्व निहित है, उसको अर्जित करते हैं। परात्पर ब्रह्म अग्नि है ही, उसी में प्रवेश पाने के लिए यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।
यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करना क्या है? अर्जुन ने जब प्रश्न किया कि भगवन्! कर्म क्या है? अध्यात्म क्या है? अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ क्या हैं और इस शरीर में वह अधियज्ञ किस प्रकार है? तब श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! मैं ही इस शरीर में अधियज्ञ हूँ, यज्ञ का अधिष्ठाता हूँ। जो महापुरुष यज्ञ को पूर्ण कर लेता है और यज्ञ से प्राप्तव्य उस ब्रह्म के अनुरूप स्थितिवाला है वह अधियज्ञ कहलाता है। (अध्याय 8/1-4) ‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।’ (गीता, 5/29)- अर्जुन! यज्ञ और तपों का भोक्ता भी मुझे ही जान! अतः महापुरुष ही यज्ञ के अधिष्ठाता हैं। ऐसे यज्ञस्वरूप किसी महापुरुष को उद्देश्य बनाकर जो यजन करते हैं, मानसिक प्रवृत्तियों का हवन करते हैं, वे यज्ञ के द्वारा यज्ञ का हवन करते हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।। (गीता, 4/26)
अन्य योगीजन श्रोत्रादिक सम्पूर्ण इन्द्रियों (आँख, कान, नाक, रसना इत्यादि) को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियों को बाह्य विषयों से समेटकर संयमित करते हैं। यहाँ अग्नि नहीं जलती बल्कि जैसे अग्नि में डालने से भली-बुरी सभी वस्तुएँ भस्मसात् हो जाती हैं ठीक इसी प्रकार संयम एक ऐसी अग्नि है जिसमें इन्द्रियों का बहिर्मुखी प्रवाह सर्वथा शान्त हो जाता है। इसलिए संयम को अग्नि की संज्ञा दी गयी।
बहुत से योगी शब्दादिक विषयों का इन्द्रियाग्नि में हवन करते हैं। शब्द इत्यादि का तात्पर्य पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से है। उदाहरणार्थ, साधक शान्तचित्त होकर चिन्तन में अग्रसर है, मन के अन्तराल में विजातीय संकल्प नहीं हैं; ठीक तभी दूसरों द्वारा उच्चरित कोई शब्द बलात् सुनाई पड़ता है। साधक ऐसे शब्द किंचित् भी सुनना नहीं चाहता फिर भी दुनिया में रहकर मनन करना है तो सुनाई पड़ना स्वाभाविक है, किसी दृश्य का दिखायी पड़ना स्वाभाविक है। तब साधक उसके द्वारा आनेवाले विषयों को ‘इन्द्रियाग्निषु जुह्वति’- इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन कर देता है अर्थात् इन्द्रियों के अन्तराल में विषयजनित आशय को बदल देता है। साधक विषय को इन्द्रियों से ग्रहण नहीं करता अन्यथा वह पतित हो जाय। वह तो संकल्प-दृष्टि पैदा होते ही विकारोत्पादक भावना को ही बदल देता है।
इस प्रकार की एक घटना हमारे जीवन में भी घटित हुई। अष्टग्रही योग की चर्चा थी। हम गाजीपुर में थे। उस वर्ष विवाह की केवल तीन ही लग्न थी। शहर का मामला! हजारों लाउडस्पीकर एक साथ बज उठे। ‘समधिन चली बजार, चार यार संगे चले।’, ‘अकेली डर लागे रात मोरी अम्मा’ इत्यादि गीत वातावरण में तैरने लगे। एकाध दिन तो एक भी शब्द हमारे कान में नहीं पड़ा क्योंकि चित्त उधर था ही नहीं; किन्तु शब्दों के बार-बार टकराने से कुछ सुनाई पड़ने लगा। तीसरे दिन एक लाउडस्पीकर उस दीवाल से सटकर बजने लगा, जहाँ हम रहते थे। एक-एक शब्द विषय-उद्दीप्त करनेवाला था। एक-एक शब्द गोली की तरह प्रभाव डाल रहा था। हमने सोचा कि यहाँ रहेंगे तो पतित हो जायेंगे। तुरन्त वहाँ से भाग खड़े हुए और शहर से दो-एक मील बाहर निकल गये; किन्तु जिससे भय लगता है, यह मन उसे ही शीघ्र पकड़ता है। क्षीण स्वर में भी संगीत सुनाई पड़ने पर मन तुरन्त ही उस गीत को पहचान लेता था। अब तो बड़ी घबड़ाहट हुई। चार-पाँच मील तक चारों ओर वे शब्द गूँज रहे थे।
हमने महाराजजी का स्मरण किया, प्रार्थना की और तुरन्त ही एक दिशा मिल गई कि ‘कबीर’ का भजन सुनाते समय महाराजजी भी तो प्रायः ऐसा ही कहते थे-
साईं के संग सासुर आई।
संग न सूती स्वाद न मानी, गयो जोबन सपने की नाईं।।
इत्यादि कबीर के भजन भी तो ठीक इससे मिलते-जुलते हैं। क्यों न इसी दृष्टि से इन गानों का भी आशय लगाया जाय। बस, हम लौट आए। लिप्सावाले वे गाने साधन-क्षेत्र में भी इतने उपयोगी लगे कि कई बरस तक हम उन भजनों को गाते रहे, समाज में सुनाते भी थे। जब-जब मन न लगे, उन गीतों को हम गा लें तो विरह-वैराग्य एवं अश्रुपात सब कुछ हो जाय। जैसे- ‘समधिन चली बाजार, चार यार संगे चले।’ चिन्तन करते-करते साधना समाधि के स्तर पर पहुँच गई, केवल परमात्मा में विलय शेष है, ऐसी अवस्था में यदि हम चिन्तन छोड़कर ‘माया गढ़ खूब बजार’- इस मायिक बाजार की ओर दृष्टिपात करते हैं तो ‘चार यार संगे लगे’– काम, क्रोध, लोभ और मोह- ये चारों यार अन्तःकरण में पनपने लगते हैं अर्थात् एक इंच भी इष्ट अलग है और हम उससे अलग हैं तब तक खतरा है। इस प्रकार शब्दों के माध्यम से जो विषय आये, उनके आशय को बदला। ऐसा ही अवसर अर्जुन के समक्ष देवसभा में उस समय उपस्थित हुआ जब वे उर्वशी को टकटकी लगाकर देख रहे थे। देवताओं के पूछने पर उन्होंने बताया कि मैं देख रहा था कि माता कुन्ती स्वर्गलोक में कैसे आ गईं? बहुत दिनों से माँ को नहीं देखा था, इसीलिए उत्कण्ठापूर्वक देखता ही रह गया। उर्वशी बौखलाकर अर्जुन के पीछे ही पड़ गई किन्तु अर्जुन अडिग रहे। उर्वशी ने शाप भी दिया किन्तु सत्य पर आरूढ़ रहनेवाले का अहित कैसे होता? अज्ञातवास में वह शाप भी आशीर्वाद के रूप में बदल गया, सहायक सिद्ध हुआ। इस प्रकार रूप दिखाई तो पड़ा किन्तु श्रीकृष्ण के शिष्य अर्जुन ने उसका आशय बदल लिया, मातृरूप देखा। इस प्रकार बहुत से योगी शब्द, रूप, स्पर्श इत्यादि के माध्यम से आनेवाले विषयों को ‘इन्द्रियाग्निषु जुह्वति’– इन्द्रियाग्नि में हवन कर देते हैं, उसके आशय को बदल देते हैं; जो वैराग्य एवं परम कल्याण में सहायक होता है। यह इन्द्रियाग्नि वासना का निरोध करती है।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। (गीता, 4/27)
दूसरे योगीजन सम्पूर्ण इन्द्रियों की चेष्टाओं को और प्राण के व्यापार को अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के कार्यकलापों को भलीभाँति निरोध करके साक्षात् अनुभूति द्वारा प्रकाशित आत्म-संयमरूपी योगाग्नि में हवन कर देते हैं, परमात्मा में स्थितिरूपी योगाग्नि में हवन करते हैं। यह पराकाष्ठा तक पहुँचे हुए योगी का यज्ञ है।
प्रश्न– महाराजजी! उपर्युक्त श्लोकों में ‘अपरे’, ‘अन्ये’ शब्द आया है। ऐसा तो नहीं कि ये कई प्रकार के योगी हों या यज्ञ हों। देवयज्ञ करनेवाले एक प्रकार के, इन्द्रिय–संयम करनेवाले दूसरे और विषयों के आशय बदलनेवाले तीसरे योगी हों?
उत्तर– नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। ‘अन्ये’ या ‘अपरे’ शब्द महापुरुषों से साधकों की पृथकता का बोधक है। सभी एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। पहले प्रारम्भ की अवस्था है, तत्पश्चात् मध्य की अवस्था और अन्त में पराकाष्ठा की अवस्था का चित्रण उक्त सत्ताइसवें श्लोक में किया गया है। प्रारम्भिक स्तर से पुनः प्रारम्भ हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रता।। (गीता, 4/28)
बहुत से योगी ‘द्रव्ययज्ञा’– ईश्वरार्पण बुद्धि से द्रव्य लगानेवाले होते हैं। सत्पुरुष, सद्गुरुओं की सेवा, तीर्थों में धन लगाना तथा भौतिक वस्तुओं से हवन इत्यादि इसी में आ जाते हैं। ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।’ (गीता, 9/26) वे द्रव्य ही तो लगा रहे हैं, महापुरुष की सेवा ही तो कर रहे हैं। यह भी एक यज्ञ है किन्तु आगे कहते हैं- यह यज्ञ सबसे अल्प है, चाहे करोड़ का ही क्यों न हो। बहुत से योगी तप-यज्ञ करते हैं। जिस इष्ट का चिन्तन करते हैं उसी के लिए इन्द्रियों को नियुक्त करने का नाम ‘तप’ है। इन्द्रियाँ सदैव आराम चाहती हैं, उन्हें वासनाओं से समेटकर चिन्तन-पथ पर तपाना ही ‘तप-यज्ञ’ है। इन्द्रियों का निरोध ही तप-यज्ञ है। इसमें शीत-वात सहन करना तथा शारीरिक चेष्टाओं का शमन करना होता है।
दूसरे साधक ‘योगयज्ञ’ का भलीभाँति पालन करते हैं। ‘योग’ मेल को कहते हैं। दो वस्तुओं के मिलन का नाम योग है। लोटा-थाली से मिल गया, हाथ दीवाल को छू गया तो क्या हो गया योग? नहीं, यह तो सभी ‘मैटर’ क्षेत्र की वस्तुएँ हैं, पदार्थ मात्र हैं, दो कहाँ हैं? प्रकृति में स्थित जीवात्मा, प्रकृति से परे परमात्मा से मेल करे, उसी दिग्दर्शन और प्रवेश का नाम ‘योग’ है। योग के साथ ही जीवात्मा एवं अंश की संज्ञा मिट जाती है। शाश्वत पुरुष ‘अव्यक्त’ मात्र शेष रहता है। प्रकृति परमपुरुष के अंक में विलीन हो जाती है, ‘पुरुष’ ही शेष बचता है। अनेक साधक इस मिलन के लिए परिश्रम करते हैं। जिसमें योग के सभी अंग आ जाते हैं। गीता के प्रत्येक अध्याय में श्रीकृष्ण ने इसके साधन पर प्रकाश डाला, जैसे- एकान्त-देश का सेवन, स्थिर आसन, संग-दोष से अलगाव, इन्द्रियों का दमन तथा ब्रह्मचर्य व्रत में स्थिति छिटपुट दिया गया है। महर्षि पतंजलि ने भी स्वतंत्र रूप से ‘अष्टांग योग’ पर प्रकाश डाला है। वस्तुतः योग के उक्त नियम साधना की आधारशिला हैं जिनके ऊपर चिन्तन एवं नाम-जपरूपी मुख्य भवन का निर्माण होता है।
दूसरे अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष ‘स्वाध्याय’ अर्थात् स्वयं के अध्ययन के लिए ज्ञानरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं। ये ज्ञानयोगी स्वयं पर निर्भर होकर कर्म करते हैं। ज्ञानयोगी क्या हैं? ज्ञानयोगी भी वही कर्म करते हैं जिससे इस यज्ञ की पूर्ति होती है, पराकाष्ठा मिलती है।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।। (गीता, 4/29)
बहुत से योगी अपान वायु में प्राणवायु का हवन करते हैं और अन्य प्राणवायु में अपान वायु का हवन करते हैं। ‘प्राण’ वह है जिसे हम ग्रहण करते हैं, ‘अपान’ त्याज्य है। श्रीकृष्ण ने यहाँ प्राण के माध्यम से चिन्तन के विधान पर प्रकाश डाला है। कुछ योगी साँस लेते समय ‘ओम्, ओम्’ जपते हैं, श्वास लेते समय अन्य कोई संकल्प नहीं उठने देते तो दूसरी ओर अनेक योगी श्वास को बाहर त्यागते समय ओम् का जप करते हैं। और जब साधना इतनी सूक्ष्म हो जाय कि न बाहर से किसी संकल्प को ग्रहण करें और न भीतर से संकल्प उठने दें तहाँ ‘प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः’- प्राण और अपान की गति रोककर प्राणायाम परायण हो जाते हैं। प्राणों का याम अर्थात् सर्वथा रुक जाना सम्भव हो जाता है। यही मन की निरोधावस्था है। यही यज्ञ का परिणाम और उसकी पूर्णता का स्थल है। अब पाना ही शेष है।
प्रश्न खड़ा होता है कि साधक यज्ञ करते ही रहेंगे या कभी उनका यज्ञ पूर्ण भी होगा? यज्ञ की पूर्ति में मिलेगा क्या? श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब प्राण और अपान की गति रुक जाय, प्राणों का याम हो जाय, न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश करें और न साधक के भीतर ही संकल्प उठे, चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाय- यही यज्ञ का पूर्तिकाल है। मन के निरोध के साथ ही जगत् का प्रसार, प्रकृति का आदान-प्रदान, उसका प्रवाह शान्त हो जाता है। फिर तो यज्ञ का परिणाम निकल आता है।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।। (गीता, 4/31)
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ के परिणामस्वरूप ज्ञानामृत को भोगनेवाला योगी ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- सनातन शाश्वत परमात्मा में प्रवेश करता है। यही शाश्वत ब्रह्म यज्ञ का परिणाम है, जहाँ जाकर यज्ञ भी शान्त हो जाता है। आगे कोई सत्ता ही नहीं है तो किसे ढूँढ़ा जाय। आत्मा, जो अजर-अमर तथा अमृतस्वरूप है, विदित हो जाता है। उस प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही ज्ञान है। जब इष्ट का साक्षात्कार ही हो गया तो साक्षात्कार के साथ ही उस अमृतत्व का पान करनेवाला योगी सनातन शाश्वत परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
किन्तु मान लीजिए, हम यज्ञ ही न करें, कौन इतना बड़ा झंझट पाले। पार न लगे तब? श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञरहित पुरुष के लिए पुनः यह मनुष्य लोक भी नहीं है फिर परलोक कैसे होगा? उसे मानव-योनि भी नहीं मिलेगी, परलोक प्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। अतः इस यज्ञ को करने का अधिकार मनुष्य-शरीर को है। मानवमात्र को है।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।। (गीता, 4/32)
छोटी-मोटी विधियों में विभक्त ऐसे बहुत प्रकार के यज्ञ ‘वितता ब्रह्मणो मुखे’- वेदज्ञ पुरुषों की वाणी में कहे गये हैं, इन सभी यज्ञों को तू ‘कर्मजान्विद्धि’- कर्म से उत्पन्न हुआ जान, मन तथा इन्द्रियों की क्रिया से उत्पन्न हुआ जान। इसमें कोई भौतिक वस्तु नहीं लगती। अब यदि इन्द्रियों का संयम, प्राण में अपान का और अपान में प्राण का हवन या प्राणायाम परायण होना फरसा चलाने से होता हो, कपड़ा बेचने से होता हो, तेल बेचने से होता हो तो करिये! नेतागिरि से होता हो तो करिये! लेकिन नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं- कर्म को मनसहित इन्द्रियों की क्रिया से उत्पन्न हुआ जान। इसमें भौतिक द्रव्यों का कोई उपयोग नहीं है। तो क्या भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ व्यर्थ हैं? कहीं लाख-दस लाख रुपये लगाकर हवन हो रहा है, क्या यह यज्ञ नहीं है? श्रीकृष्ण ऐसे किसी कृत्य को यज्ञ की संज्ञा नहीं देते। समाज के सामूहिक कल्याण के लिए प्रार्थना-स्थल, मन्दिर इत्यादि का निर्माण, असहायों की सहायता, दान इत्यादि सर्वोपरि यज्ञ हैं। सन्तों, सत्पुरुषों, तत्त्वस्थित महापुरुषों की सेवा में श्रद्धानुसार वस्तुओं का अर्पण द्रव्ययज्ञ है। ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’– जो कुछ भी भाव से पत्र, पुष्प, फल इत्यादि समर्पित करता है उसे मैं सेवन करता हूँ, यज्ञ है। श्रीकृष्ण कहते हैं-
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। (गीता, 4/33)
अर्जुन! सांसारिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान-यज्ञ श्रेयस्कर है; क्योंकि उसका परिणाम प्रत्यक्ष दर्शन है। यज्ञ के पूर्तिकाल में जो अमृत-तत्त्व शेष बचता है, उसी का दिग्दर्शन और उसमें प्रवेश का नाम ही ज्ञान है। हे पार्थ! यावन्मात्र कर्म ज्ञान में ही शेष होते हैं। इस ज्ञान के पश्चात् कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।
सारांशतः भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ एक निर्धारित क्रिया है। जो लोग शास्त्रविधि से नियत अर्थात् गीता में नियत विधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों से दम्भपूर्वक यजन करते हैं, यज्ञ है नहीं किन्तु नाम दे दिया कि यही यज्ञ है, ऐसे लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। ऐसे क्रूरकर्मी, पापाचारी नराधमों को मैं बारम्बार घोर नरक अर्थात् निम्न योनियों में गिराता हूँ। अतः गीता की विधि को त्यागकर अन्य किसी विधि से यज्ञ के नाम पर कोई कुछ भी करता है तो भगवान को खुश करने के स्थान पर अधम योनियों का अपने लिए आरक्षण ही करता है। (गीता, 16/15-20)
प्रश्न– सरकार! श्रीकृष्ण ने यह नहीं बताया कि यज्ञ क्या है?
उत्तर– बताया तो! चराचर जगत् ही हवन-सामग्री है। श्वास का प्रश्वास में हवन करना यज्ञ है। यज्ञस्वरूप किसी महापुरुष का ध्यान करना यज्ञ है। इन्द्रियों का दमन यज्ञ है। मन का शमन यज्ञ है। एकाग्रता यज्ञ है। दैवी सम्पद् बलवती बनाना यज्ञ है। शब्द, रूप इत्यादि विषयों के आशय को बदलकर साधन पर निरन्तर दृष्टि रखना यज्ञ है। चित्त की प्रवृत्ति को चलायमान न होने देना यज्ञ है। इस यज्ञ में आग नहीं जलती; किन्तु जिस प्रकार अग्नि में डाली हुई वस्तु भस्मसात् हो जाती है, ठीक उसी प्रकार संयम, प्राण-अपान का निरोध ऐसा यज्ञ है कि प्रवृत्तियों सहित मन उसमें विलय होकर उपराम हो जाता है और मन में स्थित चराचर जगत् की हवन-सामग्री दग्ध हो जाती है। अमृत-तत्त्व प्रगट हो जाता है। जिसका आस्वादन करनेवाला योगी अमृतस्वरूप सनातन ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है- ‘यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (गीता, 4/31) सभी यज्ञ कर्म से, मन-इन्द्रिय की क्रिया से सिद्ध होनेवाले हैं। जगत् में भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ अल्प फलवाले हैं किन्तु हैं आवश्यक; क्योंकि पुण्य और पुरुषार्थ का आरम्भ उन्हीं से होता है।
किसी तत्त्वज्ञ महापुरुष की शरण में जाने से, उनकी टूटी-फूटी सेवा करने से, उनकी बताई हुई क्रिया को कार्यरूप देने से योग-साधना का क्रम हृदय में जागृत हो जाता है। इसलिए यज्ञ-प्रकरण के समापन पर श्रीकृष्ण किसी तत्त्वस्थित महापुरुष की शरण में जाने का निर्देश देते हैं-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। (गीता, 4/34)
अर्जुन! उस यज्ञ को जानने के लिए किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाओ। उन्हें भली प्रकार दण्ड-प्रणाम करो। उनकी सेवा करो और निष्कपट भाव से उनसे प्रश्न करके उस ज्ञान को जानो। वे तत्त्वदर्शी ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं है। यह क्रियात्मक पथ है। केवल किताब पढ़कर नहीं, बल्कि करने से ही आता है। तत्त्वस्थित महापुरुषों के माध्यम से ही आत्मा जागृत हो जाती है। वही आत्मा से रथी होकर उसको संचालित करते हुए इन यज्ञों से अवगत कराते हैं।
प्रश्न– महाराजजी! मुक्त पुरुषों के लिए यज्ञ की आवश्यकता नहीं रह जाती तब वे किसी को यज्ञ का उपदेश क्यों करेंगे?
उत्तर– नहीं, वे करेंगे! लोक-शिक्षण उनका कर्त्तव्य है। यदि वे मार्गदर्शन न करें तो लोक ही भ्रष्ट हो जाय और वे वर्णसंकर के कर्ता होंगे। इसके अतिरिक्त अठारहवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रचलित विचारधाराओं की समीक्षा करते हुए अपने निश्चय को व्यक्त करते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म कदापि त्यागने योग्य नहीं हैं। यह विवेकी पुरुषों को भी परम पवित्र करनेवाले हैं, महापुरुषों के लिए भी उपादेय है- परहित के लिए। अतः यज्ञ की क्रियात्मक जानकारी के लिए तत्त्वज्ञ महापुरुषों की शरण, उनकी सेवा, उनका सान्निध्य, सत्संग, दर्शन, स्पर्श नितान्त आवश्यक है।
।। ओम्।।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)