युगधर्म

युगधर्म

युगधर्म साधना के चार सोपान हैं न कि चार प्रकार के धर्म। साधक को इन्हीं चार सोपानों से होकर गुजरना पड़ता है। युगों का उतारचढ़ाव मन के अन्तराल में होता है। सबमें इसकी व्यवस्था है।स्वामी अड़गड़ानन्द

महाकुम्भ के अवसर पर चण्डीद्वीप, हरिद्वार में दिनांक १८०४१९८६ ई. की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी का प्रवचन।

बन्धुओ!

समाज में आये दिन सुनने को मिलता है, ‘‘घोर कलियुग आ गया है महाराज! अब धरम-करम कैसे होगा?’’ उनकी मान्यता है कि सृष्टि के आदि में कभी सत्ययुग था। जिस समय वेदों का आविर्भाव भारत में होता है, उस समय लोग धार्मिक होते हैं तथा त्रेता, द्वापर और कलियुग तक क्रमशः वेद, गंगा और धर्म का ह्रास होते-होते वे इस मृत्युलोक से ब्रह्मलोक में चले जाते हैं। चार लाख बत्तीस हजार मानव-वर्षों का कलियुग, इससे दूना द्वापर, कलियुग का तिगुना त्रेता और चौगुने मानव-वर्षों का सत्ययुग- यह सब मिलाकर ब्रह्मा का एक दिन और इतनी ही लम्बी रात को एक कल्प कहते हैं। इकहत्तर महायुगों अर्थात् तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षों का एक मन्वन्तर होता है, जिसमें देवराज इन्द्र और मनु आदि जैसे बड़े-बड़े पदाधिकारी भी काल कवलित हो जाते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के अन्त में खण्ड प्रलय होता है। इकतीस पद्म दस नील चालीस खरब मानव-वर्षों में एक ब्रह्मा पदधारी बदल जाते हैं। ब्रह्मा की हजार गुनी आयु विष्णु की और बारह लाख विष्णु की आयु अर्थात् चौवालीस लाख अठहत्तर हजार नौ सौ छिहत्तर महाशंख मानव-वर्ष भगवान शिव की आयु मानी जाती है। जितने समय में अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड भाण्डोदरी ब्रह्मशक्ति जगदम्बा एक बार पलक झपकाती हैं, उतने समय में भगवान शिव एक खरब पचास अरब बार अपनी पलक झपकाकर ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण प्रलय करके ब्रह्म में लय हो जाते हैं और इसी क्रम से पुनः सृष्टि का आविर्भाव होता है। इस प्रकार की काल-गणना ‘देवी-मीमांसा’, ‘देवी-भागवत’, ‘शक्ति-रहस्य’, ‘मार्कण्डेय-पुराण’, ‘मनुस्मृति’ इत्यादि ग्रन्थों में देखने को मिलता है। जिसका निष्कर्ष यह निकाला जाता है कि युगों के आरोह-अवरोह के साथ मनुष्य की क्षमता घटती-बढ़ती रहती है, वह चाहते हुए भी धर्म का आचरण नहीं कर सकता, इसीलिये प्रत्येक युग के धर्म अलग-अलग निर्धारित हैं, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजी के रामचरितमानस में भी दृष्टिगोचर होता है। गीता में भी भगवान युग-युग में अवतार लेने की बात कहते हैं। जब कलियुग में धर्म का उत्तरोत्तर ह्रास ही होना है तब धर्माचरण का प्रयास क्यों किया जाय?

अतः आइये इस प्रश्न पर विचार करें कि युग है क्या? हमारे पूर्व मनीषीगण इस सन्दर्भ में क्या कहते हैं? जहाँ तक रामचरितमानस में कलियुग-महिमा गायन का प्रसंग है, उस पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि कभी सत्ययुग था और आज कलियुग आया है, ऐसी कोई बात नहीं है। काकभुशुण्डिजी ने अपने पूर्वजन्मों का वृतान्त प्रस्तुत करने के क्रम में मल-मूल कलियुग का वर्णन जिन शब्दों में किया, ठीक उसी शब्दावली और उन्हीं लक्षणों का उल्लेख गोस्वामीजी ने उत्तरकाण्ड में असन्त-लक्षण तथा बालकाण्ड में रावण की उत्पत्ति और निशाचरों के आतंक के अवसरों पर किया है। कलियुग में सब नर काम लोभ रत क्रोधी।(७/९८/३) होते हैं, तो असन्त काम क्रोध मद लोभ परायन। (७/३८/५) होते हैं- दोनों एक ही बात है। कलियुग में परत्रिय लंपट कपट सयाने।(७/९९/१) लोग होते हैं, तो असन्त पर द्रोही पर दार रत, परधन पर अपबाद। (७/३९) हैं। इसी प्रकार निशाचरों के आतंक के समय बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लम्पट परधन परदारा।। (१/१८३/१) का साम्य देखने को मिलता है।

छिटपुट स्थल तो अनेकों हैं; किन्तु उपर्युक्त तीन-चार स्थलों पर गोस्वामीजी ने कलियुग के गुणधर्म पर प्रकाश डाला, कलियुग के अनेक लक्षण बताये-

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी।

श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।

द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन।

कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।। (७/९७/१-२)

इसी प्रकार-

नारि बिबस नर सकल गोसाईं।

नाचहिं नट मर्कट की नाईं।। (७/९८/१)

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं।

उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।। (७/९८/८)

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर, कहहिं न दूसरि बात।

कौड़ी लागि लोभ बस, करहिं बिप्र गुर घात।। (७/९९ क)

इत्यादि पचासों लक्षण गिनाये और अन्त में निर्णय देते हैं कि-

ऐसे अधम मनुज खल, कृतजुग त्रेताँ नाहिं।

द्वापर कछुक बृन्द बहु, होइहहिं कलिजुग माहिं।। (७/४०)

अर्थात् ऐसे अधम मनुष्य सत्ययुग और त्रेता में तो होते ही नहीं, द्वापर में कुछ होते हैं और कलियुग में झुण्ड-के-झुण्ड होते हैं। प्रश्न खड़ा होता है कि क्या सत्ययुग और त्रेता में अधम मनुष्य होते ही नहीं थे?

ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं कि सत्ययुग में हिरण्यकशिपु नाम का एक नरेश हुआ। अपनी वेधशाला में उसने ऐसा आविष्कार कर लिया कि न वह दिन में मरे, न रात में मरे, न अस्त्र-शस्त्र से मरे, न पशु-पक्षी से और न मानव-देवता से मरे। जब उसने देखा कि हमें मरना ही नहीं है फिर भगवान की क्या आवश्यकता! अतः उसने घोषणा करा दी कि मैं ही भगवान हूँ। जो मुझसे भिन्न किसी भगवान का नाम ले, उसे मृत्युदण्ड दिया जाय। अपने सिद्धान्त का वह इतना कट्टर था कि इकलौते पुत्र प्रह्लाद को भी क्षमा नहीं कर सका। प्रह्लाद को भी फाँसी पर चढ़ा ही दिया, मारने के अनेक प्रयत्न किये; किन्तु भगवान यदि एक मासूम बच्चे का भी स्पर्श कर दे तो संसार में कोई शक्ति नहीं जो उसे मिटा दे। प्रह्लाद के माध्यम से उस युग में भक्ति की एक लहर सर्वत्र दौड़ गयी।

इस प्रकार उस सत्ययुग में भी ऐसी परिस्थिति आयी कि धर्म की चर्चा मात्र करने पर मृत्युदण्ड का विधान था और यहाँ तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे अधम मनुष्य कृतजुग त्रेताँ नाहिं’- सत्ययुग और त्रेता में होते ही नहीं, जबकि उसी सत्ययुग में ऐसे भयंकर लोग हुए कि भगवान का नाम मात्र लेने पर फाँसी की सजा सुना देते थे। आज कोई फाँसी तो नहीं देता। बहुत हुआ तो दस लोग छींटाकशी करेंगे कि बड़े भक्त बने हैं। किन्तु उतने ही प्रशंसक भी मिलेंगे कि दादाजी महात्माओं के यहाँ जाते हैं, तीर्थयात्रा करते हैं, चौथेपन की यही शोभा है- इत्यादि।

आइये, उस त्रेता पर दृष्टिपात् करें जिसका इतिवृत्त मानस में चित्रित है। त्रेता में भी अधम नर थे। रावण धर्म सुनिअ नहिं काना, आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ (१/१८२ छन्द)- धर्म कहीं कानों से सुन भर पाता तो बौखलाकर स्वयं चल पड़ता था, धर्म को नष्ट करने के लिए सेना भेज देता था। अधर्मियों को नष्ट करने की आज्ञा नहीं थी, केवल धर्म को ही निर्मूल करने की योजना थी। चोर-डाकुओं को नष्ट नहीं करना था बल्कि राम-राम कहनेवालों को नष्ट करने का आदेश था। ऋषि-महात्माओं से रक्त के रूप में कर वसूल किया जाता था। उनका अपराध मात्र इतना ही था कि भगवान का चिन्तन करते थे। गुप्त रूप से निशाचरों की टुकड़ियाँ चला करती थीं, जो धार्मिकों को मौका पाते ही मारकर चट कर जाती थीं। वनवासी राम जब चित्रकूट से आगे बढ़े तो नर-कंकालों का एक पहाड़ मिला।

अस्थि समूह देखि रघुराया।

पूछि मुनिन्ह लागि अति दाया।। (३/८/६)

हड्डियों का विशाल संग्रह देख भगवान राम ने मुनियों से पूछा कि ये नर-कंकाल किसके हैं? मुनियों ने कहा कि आप तो अन्तर्यामी हैं, जानते हुए भी क्यों पूछते हैं? परन्तु जब आप पूछते ही हैं तो बताना ही होगा- निसिचर निकर सकल मुनि खाए। (३/८/८) यह उन्हीं की हड्डियों का ढेर है। आज आप नाम तो ले सकते हैं। कोई इसके लिए टैक्स तो नहीं लेता, वेद-पुराण कहने पर देश निकाला तो नहीं मिलता? संसार भर तो रावण के वश में था, तो देश निकाला का मतलब? इस लोक से छुट्टी! वेद-पुराण कहने पर आज कोई मार तो नहीं डालता? उस समय युग कौन-सा था? त्रेता! और गोस्वामीजी कहते हैं कि ऐसे अधम खल कृतयुग और त्रेता में होते ही नहीं।

कलि का एक अन्य लक्षण त्रेता के सन्दर्भ में ही देखें-

सौभागिनीं बिभूषन हीना।

बिधवन्ह के सिंगार नबीना।। (७/९८/५)

उस त्रेता में सूपनखा विधवा ही तो थी। उसका पति विद्युत्जिह्व युद्ध में रावण द्वारा मारा गया, तो वह उलाहना देते हुए बोली, ‘‘तू मेरा भाई है या शत्रु, तूने मुझे विधवा बना दिया।’’ रावण ने सान्त्वना देते हुए कहा- ‘‘बहन! मुझसे तो अवश्य भूल हुई है; किन्तु हमारी जाति की स्त्री भी क्या कभी विधवा होती है? हम हजारों स्त्रियाँ रखते हैं, तुम हजारों पुरुष रख सकती हो। भाई खर-दूषण के साथ जाओ और जनस्थान में मनचाहा विचरण करो।’’ इसी उद्देश्य से,

पंचबटी सो गइ एक बारा।

देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।। (३/१६/४)

जब वह राम के समक्ष पहुँची तो रूप-स्वरूप बनाकर मुस्कराकर बोली- मनु माना कछु तुम्हहि निहारी। (३/१६/१०) तुम बहुत सुन्दर हो, ऐसी बात नहीं है; हाँ, काम चल जायेगा। इसीलिये तो अभी तक कुमारी हूँ। जबकि एक भी कुकर्म उससे छूटा नहीं था। सूपनखा जैसी अधःपतिता आज तो नहीं पायी जातीं, फिर भी गोस्वामीजी की उक्ति है कि त्रेता में ऐसे अधम नर होते ही नहीं।

फिर जब त्रेता में अधम नर थे ही नहीं, तो राम को लड़ने की आवश्यकता क्या थी? उनका चरित्र ही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि त्रेता में भी अधम खलों का अस्तित्व था और केवल अस्तित्व ही नहीं था वरन् उनके अत्याचारों से धरती भी आकुल हो उठी थी। वास्तविकता तो यह है कि आज से भी अधिक अधम नरों का अस्तित्व उस युग में पाया जाता है। फिर गोस्वामी तुलसीदासजी कहना क्या चाहते हैं?

युगधर्म? युग कहते हैं दो को। स्त्री-पुरुष, भला-बुरा, पाप-पुण्य, सुख-दुःख सब दो तो हैं ही; किन्तु नहीं, ये प्रकृति के ही दो पहलू हैं। प्रकृति में स्थित सारा जीव-जगत् अचेत है, प्रसुप्त है, या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी (गीता, २/६९)- केवल संयमी पुरुष जाग जाता है। जिस दिन से वह जाग जाता है उस दिन से वह परमतत्त्व परमात्मा के सामने हो जाता है। एक ओर वह संयमी पुरुष, दूसरी ओर परमात्मा- यही है युग। उस दिन से वह परमात्मा सँभालने लगता है, आत्मा से संचालक हो जाता है। उसी दिन से युग-धर्म की शुरुआत होती है।

समाज जिसे युग के रूप में जानता है वस्तुतः वह काल-गणना है, धर्म नहीं। काल अनन्त है, असीम है। सृष्टि अनादि है और इसी प्रकार अबाध गति से चलती रहती है। जीव कब से आया? संसार की उत्पत्ति कैसे हुई? इस प्रश्न पर माथापच्ची करना गौतम बुद्ध ने भी अनावश्यक समझा। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार-

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। (गीता, १३/१९)

अर्थात् प्रकृति और पुरुष दोनों की अनादि हैं। कब से यह चल रहा है, यह प्रश्न ही नहीं है बल्कि श्रीकृष्ण के अनुसार सृष्टि सदा से ही इसी प्रकार चलती रही है; किन्तु पुराण और स्मृतिग्रन्थों में इस तथ्य को न समझ पाने के कारण सृष्टि-प्रकरण को रेखांकित करने का असफल एवं अनावश्यक प्रयास किया गया है।

पाश्चात्य विद्वान् भी सभ्यता के विकास-क्रम के आधार पर सृष्टि का तिथि-क्रम निश्चित करने के प्रयास में लगे हैं; किन्तु सभ्यता भी इसका मापदण्ड नहीं है। पहले कभी लोग पेड़ों पर रहे, जंगली पशुओं की तुलना में सभ्य होते गये। बुद्धि-बल पर आकाश और समुद्र में तैरने लगे। आरोह के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा मानव कभी-कभी युद्ध की विभीषिकाओं से अभिशप्त हो उठा। धन-जन एवं संचित ज्ञानराशि तिरोहित हो गयी। एक दीपक यहाँ जल रहा है तो दूसरा उत्तरी ध्रुव पर। मनुष्य, मनुष्य को देखने के लिए तरसने लगता है। इतिहास अपने को दुहराता है, पुनः प्राकृतिक जीवन जीने के लिए लोग विवश हो जाते हैं। उत्तरोत्तर विकास हो जाने पर पुराने लोगों को असभ्य कहा जाता है। इसी प्रकार यह काल अबाध गति से उत्थान और पतन देखता चला आ रहा है; किन्तु जिस दिन से युगधर्म का सूत्रपात आपके हृदय में हो जाता है उस दिन से यह असीम काल ससीम हो जाता है, उस दिन से यही काल गणित पर चढ़ जाता है, काल कटने और घटने लगता है, काल का पार पा लिया जाता है, मरणधर्मा मनुष्य मृत्यु का अतिक्रमण कर जाता है, अकाल पुरुष अमृत-तत्त्व परमात्मा में प्रवेश पा जाता है- काल न खाय कलप नही ब्यापै, देह जरा नहिं छीजै।

युगधर्म क्या है? यह कहाँ होता है? कैसे होता है?- इसे स्पष्ट करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ‘मानस’ में कहते हैं-

नित जुग धर्म होहिं सब केरे।

हृदयँ राम माया के प्रेरे।। (७/१०३/१)

सभी युगों के धर्म सबके हृदय में होते हैं। कैसे होते हैं? ‘राममाया’ की प्रेरणा से होते हैं। राममाया, आत्ममाया, योगमाया इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं और इसी का दूसरा नाम विद्या है। युगधर्म का श्रीगणेश राममाया की प्रेरणा से होता है। जब तक राममाया जागृत नहीं है तो युगधर्म अभी आरम्भ ही नहीं हुआ। यह राममाया या विद्या क्या है? देखें, ‘राममाया’-

जब भगवान राम वनवासकाल में पंचवटी में कुटी बनाकर विश्राम कर रहे थे, उसी समय लछिमन बचन कहे छलहीना। (३/१३/५)- लक्ष्मण ने छलहीन होकर कुछेक प्रश्न किये कि माया क्या है? ईश्वर क्या है? जीव क्या है? ज्ञान-वैराग्य क्या है? और वह कौन-सी भक्ति है जिससे आप प्रसन्न होते हैं? (इस प्रकार पाँच-सात प्रश्न किये) तब भगवान राम ने कहा कि- थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।। (३/१४/१)- मैं संक्षेप में ही कहता हूँ, मन और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। (३/१४/२)- ‘मैं हूँ, यह मेरा है’, ‘तू है, यह तेरा है’ – यही माया है, जिसने चराचर को पराधीन कर रखा है। तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।। (३/१४/४)- इस माया के दो भेद हैं- एक विद्या और दूसरी अविद्या। एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।। (३/१४/५)- एक अविद्या अत्यन्त दुष्ट है, जिससे विवश होकर जीव भवकूप में पड़ा है और एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। (३/१४/६)- दूसरी विद्या है जो संसार को रचती है, सजाती है और गुन बस जाकें’- गुण जिसके वश में हैं, जो सत्, रज और तम तीनों गुणों को नियन्त्रित करती है; किन्तु यह विद्या है प्रभुप्रेरित! जब तक प्रेरक के रूप में प्रभु खड़े नहीं हो जाते, तब तक वह विद्या आती ही नहीं। स्वयं में उसका अपना कोई बल नहीं है। वह तीनों गुणों को संयत करके गुणों से परे कर देती है; किन्तु सम्भव तभी है जब प्रेरक के रूप में प्रभु स्वयं जागृत हो जायँ और आप उन्हीं के निर्देशन में चलने लगे। जिस दिन से इस विद्या का आविर्भाव होता है उसी दिन से आपके अन्तःकरण में युगधर्म शुरू हो जाता है। स्वामी और सेवक आमने-सामने हो जाते हैं, इससे यही युग है।

‘कभी सत्ययुग था और आज कलियुग है’- ऐसी कोई बात नहीं है। गोस्वामीजी कहते हैं, नित जुग धर्म होहिं’- युगधर्म नित्य ही होते हैं। एक ही समय में कोई सत्ययुगी तो दूसरा कलियुगी हो सकता है। यह कैसे जाना जाय कि कौन-सा युग कार्यरत है? इस पर कहते हैं- तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। (७/१०३/५)- जब तामसी गुण का बाहुल्य है, चारों ओर बैर-विरोध है, तो यह कलियुग का प्रभाव है। ऐसी परिस्थिति में वह चिन्तन का आरम्भ कहाँ से करे? इस पर बताते हैं- कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। (७/१०२/४) भगवान की लीला-गायन करो और सेवा करो। भव का थाह पा जाओगे।

साधना और सूक्ष्म हुई, साधक का स्तर उठा तो बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।। (७/१०३/४)- राजसी गुण का बाहुल्य हो, कुछ सात्त्विक गुण हो और कुछ तामसी गुण भी जीवित हो, मन में हर्ष और भय हो, दुविधाजनक स्थिति बनी हो तो द्वापर श्रेणी का युगधर्म है। उस समय द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। (७/१०२/३)- वह भगवान के पद को पूजने, चरणों में सुरत लगाने का यत्न तथा उन चरणों के चिन्तन का प्रयास करता है। (ध्यान तो लगेगा नहीं; क्योंकि मन में दुविधा लगी है। बस अभ्यास करने की क्षमता होती है।) ऐसा करके वह भवसागर का पार पा जाता है। किंचित् और परिपक्व होने पर, सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। (७/१०३/३)- सत्त्वगुण बहुतायत में है, कुछ राजसी गुण जीवित है, तामसी गुण समाप्त हो चुका है, सब प्रकार की सुख-समृद्धि है- यह त्रेता का धर्म है। इस परिस्थिति में भजन किस स्तर का होता है? त्रेताँ बिबिध जज्ञ नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। (७/१०२/२)- विविध यज्ञ- मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, धारावाही चिन्तन और यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (गीता, १०/२५)- यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ यज्ञ जपयज्ञ (यज्ञ श्रेणीवाले जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर होता है।) अतः श्वास-प्रश्वास का यजन और इसी प्रकार गीता में ईश्वर-प्राप्ति के निमित्त जिन यज्ञों की चर्चा है, उन सबकी उसमें क्षमता रहती है। सभी क्रियाएँ उसमें जागृत रहती हैं।

दीर्घकाल के अभ्यास से चलते-चलते साधना और सूक्ष्म हो गई, तो सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। (७/१०३/२) पहले बताया था कि राममाया या विद्या गुणों को संयत करती है। उसी विद्या- प्रभुप्रेरित विद्या की देन है कि अब दो गुण सर्वथा शान्त हो गये, केवल सात्त्विक गुणमात्र शेष बच रहा, अनुभवी उपलब्धि है। वह बुद्धि से कोई काम नहीं लेता, आकाश से (हृदयाकाश से) जो शब्द मिलता है, उसके सहारे चलने की क्षमतावाला विज्ञानी है, विषमता उसमें से समाप्त हो गई, समता है- यह सब सत्ययुग का प्रभाव है, कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना’- वह सदैव प्रसन्नचित रहता है। इस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति करता क्या है? उसके चिन्तन का माप-तौल क्या है? तो कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। (७/१०२/१)- इस स्तर पर सभी योगी होते हैं, ईश्वरीय निर्देशों पर चलनेवाले विज्ञानी होते हैं। सहज ही हरि के ध्यान में लव लग जाती है और वह भव का पार पा जाता है। आज आपका ध्यान नहीं लगता, उस युग की योग्यता में सहज ही ध्यान की स्थिति रहती है। अतः वह भव का पार पा जायेगा।

उपर्युक्त विवेचन से लगता है कि जैसे चार भवसागर हों, किन्तु ऐसी कोई बात नहीं है। भवसागर एक ही है। भव अर्थात् पैदा होना। जन्म और पुनर्जन्म, आवागमन का चक्कर- यही है भवसागर। इसी एक भवसागर को पार करने के लिए चिन्तन-पथ को चार श्रेणियों में बाँटा गया, उन्हें ही कलियुग, द्वापर, त्रेता और सत्ययुग इन शब्दों से सम्बोधित किया गया। आरम्भ में तामसी गुण का बाहुल्य रहता है, उस समय भव का थाह मिलता है लीला-गायन से, नाम-जप से। दीर्घकाल तक सेवा-चिन्तन चलते रहने पर वही साधक द्वापर श्रेणी में परिणत हो जाता है। कलियुग से सीधे भवसागर से पार नहीं होंगे बल्कि द्वापर में प्रवेश मिलेगा। मन के अन्तराल में पद-पूजा की क्षमता आ जायेगी। वही साधन और सूक्ष्म हुआ, तो त्रेता में ढल जाता है। उस समय श्वास-प्रश्वास का यजन, ईश्वर में कर्मों का समर्पण करने की योग्यता स्वाभाविक होगी। चिन्तन और सूक्ष्म हुआ, तो वही पथिक ध्यान और समाधि की क्षमतावाला होगा। जब लगाना चाहेंगे, जिस क्षण लगाना चाहेंगे, मन तुरन्त स्वरूप को पकड़ लेगा, केन्द्रित हो जायेगा। प्रत्येक समस्या का हल बुद्धि से न होकर ईश्वर के निर्देशन पर आधारित होगा। ऐसा करके वह भवसागर का पार पा जायेगा।

इस प्रकार युगधर्म एक ही साधना के चार सोपान हैं, न कि चार प्रकार के धर्म (या चार भवसागर)। एक ही साधक को चारों सोपानों से गुजरना पड़ता है। गीता में इन्हीं को चार वर्ण कहा गया है। महर्षि पतंजलि ने ‘योगदर्शन’ में इन्हीं चारों को अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट श्रेणी के साधकों के रूप में बताया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने अरण्यकाण्ड (४/१२) में उत्तम के अस बस मन माहीं। माताओं के माध्यम से इन्हीं चार युगधर्मों का निरूपण किया है।

युगधर्म वहीं तक चलते हैं जब तक ईश्वर अलग है, हम अलग हैं। साधन पराकाष्ठा पर पहुँच जाने पर युगधर्म और उसकी केन्द्रभूमि दोनों शान्त हो जाते हैं, मन में प्रवाहित तीनों गुणों का भी विलीनीकरण राममाया द्वारा हो जाता है। यही त्रिगुणातीत या गुणों से ऊपर उठ जाने की अवस्था है, जिसका चित्रण गीता में है। यही राममयी स्थिति है- जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (२/१२६/३) इसलिए युगधर्म का कार्य पूर्ण हो जाता है- काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। (७/१०३/७)

सारांशतः युग कहते हैं दो को! मानस के अनुसार विद्या के जागृत होते ही स्वामी संचालक है, सेवक चलनेवाला है। स्वामी-सेवक आमने-सामने हैं, यही है दो! उसी दिन से युगधर्म की शुरुआत होती है और काल जो अनन्त है उसके अन्त की गणना शुरू हो जाती है, काल का बन्धन कटने लगता है और इस सात्त्विक गुण के शमन के साथ ही युगों का अन्त हो जाता है। प्रकृति शान्त हो गई तो पुरुष ही शेष बच रहा और उसकी अनुभूति के साथ ही- सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। (२/१२६/३)- उसे जानकर द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। आत्मभाव, परमात्म-स्थिति प्राप्त हो जाती है। उस समय काल का क्रम ‘युग’ भी समाप्त हो जाता है। जब दूसरा है ही नहीं, युग हो नहीं सकता- सहजे सहज समानी।

गीता (४/८) में भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस युग पर बल दिया कि सम्भवामि युगे युगे– मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। वस्तुतः प्रत्येक युग में इष्ट प्रत्यक्ष साथ देते हैं, तभी तो युगधर्म शुरू होता है। हाँ, उच्चश्रेणी में अनुकूलता की भरपूरता प्रतीत होती है, निम्न श्रेणी (युगों) में सहयोग क्षीण प्रतीत होता है। आप कैसे प्रकट होते हैं?-

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।। (गीता, ४/६)

अजन्मा और समस्त भूतप्राणियों के स्वर में प्रवाहित होनेवाला ईश्वर, अव्यक्त होने पर भी अपनी आत्ममाया द्वारा त्रिगुणमयी प्रकृति को अधीन करके मैं प्रकट होता हूँ।

ठीक वही बात जो मानस में है, वही गीता में भी है। वहाँ कहते हैं- विद्या गुणों को वश में करती है, यहाँ कहते हैं- आत्ममाया करती है। वास्तव में आत्मा की स्थिति दिला देनेवाली विधि आत्ममाया है। दूसरे शब्दों में, वही योगमाया है जो परमात्मा से जोड़ देती है, मिलन करा देती है, संसार के संयोग-वियोग से रहित शाश्वत-नैष्कर्म्य की परमसिद्धि को दिला देती है। इसी का तीसरा नाम विद्या है।

यह विद्या सम्भव तब है जब भाविक भक्त के हृदय में भगवान स्वयं जागृत होकर रथी हों। इसलिए यहाँ उन्हीं का महत्व है। साधक केवल निमित्त मात्र होता है। उसके द्वारा जो पार लगता है, उन्हीं प्रभु की देन है। इसी के लिए भगवान की जरूरत है। इन्हीं प्रेरणाओं से भगवान की पहचान है। योगेश्वर कहते हैं, मैं प्रकट होता हूँ- ‘सम्भवामि युगे युगे’। जिस दिन से जागृत होते हैं, उस समय तामसी गुण का बाहुल्य होगा- अभी-अभी तो यह जागा है, अतः बाहुल्य होगा। राजसी गुण का अल्प संचार होगा, सात्त्विक गुण प्रसुप्त होगा। ऐसी परिस्थिति में पथिक कलियुगीन है लेकिन आत्ममाया जागृत है अतः वह गुण-गायन से, सेवा और समर्पण से लग जाता है। यह लगना भी प्रेरक प्रभु की देन है। वह हर युग में आमने-सामने खड़ा रहता है। यदि वह न बताये तो अभी विद्या जागृत ही नहीं हुई, युगधर्म का प्रश्न ही नहीं खड़ा होता।

अतः बन्धुओ! यह भूल जायँ कि आज कलियुग है या बहुत जल्द ही सत्ययुग आनेवाला है, जैसा कि आजकल कथित धर्माचार्य कहते हैं। सृष्टि में युगों की कहीं कोई चर्चा नहीं है। संसार में, वह भी केवल भारत में और उसमें भी केवल हिन्दूशास्त्रों में इसकी चर्चा है। केवल भारत में ही यह धर्म से सम्बन्ध रखनेवाला भ्रम है। जब चारों युग सृष्टि के लिये बने हैं तो इन्हें सर्वत्र होना चाहिए था; किन्तु ऐसा कहीं नहीं है। भारत के आध्यात्मिक ग्रन्थों में भी इसका जो उल्लेख मिलता है, कल्याण-पथ के नियम हैं। कल्याण-पथ के नियमों को न समझने के कारण केवल सामाजिक व्यवस्था देनेवाले स्मृतिकारों ने इसे बाहर देखना शुरू किया, वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। उन्होंने एक घपला दे दिया कि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का कलियुग होता है, और फिर सज्जनो! उससे दूना हो गया द्वापर, उससे तिगुना हो गया त्रेता, तो चौगुना सत्ययुग। यह एक बिना सिर-पैरवाली बात थी, जिसका अपने जीवन में प्रयोग उन्होंने कभी नहीं किया बल्कि इसका उपयोग उन्होंने अपने साम्प्रदायिक देवताओं की महत्ता बढ़ाने और आश्चर्य का सृजन कर निरीह जनता का भयादोहन करने के लिए किया। मानस का एक कथानक इसी मनोवृत्ति पर करारा व्यंग्य है, जिसमें राजा प्रतापभानु को मिलनेवाले कपटी मुनि ने सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय की आश्चर्यजनक कहानी सुनाकर उनके साथ विश्वासघात किया। वास्तव में ऐसी कोई गणना नहीं, इस गणना का कोई विधान नहीं, कोई उपयोग नहीं और आर्षग्रन्थों में इसका कोई समर्थन नहीं है।

मनुस्मृति तथा पाराशर-स्मृति दोनों ही समकालीन हैं, कोई विशेष अन्तर नहीं है, दोनों गौतम बुद्ध के आगे-पीछे लिखी गई हैं; किन्तु पाराशर-स्मृति कहती है कि मनुस्मृति तो सत्ययुग के लोगों के लिए थी, कलियुग के लिए तो यही पाराशर-स्मृति ही प्रमाण है। इन स्मृतिकारों को यह भी ज्ञात नहीं है कि युग रहते कहाँ हैं? वास्तव में इन युगों का उतार-चढ़ाव मन के अन्तराल में होता है, सबमें इसकी व्यवस्था है, सब उसके पात्र हैं। सभी युग आपके लिए ही हैं और आपको ही क्रमशः चलकर इन युगों का परिणाम पाना है।

बुध जुग धर्म जानि मन माहीं।

तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। (मानस, ७/१०३/६)

विवेकी पुरुष युगधर्म को मन के अन्तराल में जानते हैं- तन में नहीं, बाहर समाज में नहीं; सूर्य, चन्द्रमा, नदी और पहाड़ोंवाली धरती में नहीं। मन में ही इसकी जागृति सम्भव है, इसलिए विवेकी पुरुष अधर्म का त्याग करके धर्म में अनुरक्त हो जाते हैं, उस प्रभु का संचार तथा उसकी प्रेरणा प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार युगों को जागृत कर और क्रमशः चारों युगों को पार करके परमभाव को प्राप्त कर लेते हैं। अब रही इन युगों के सामाजिक उपयोग की बात, तो व्यक्ति से ही समाज बनता है। यदि आप समाज का वास्तविक कल्याण चाहते हैं, तो सभी मिलकर सत्य के लिये प्रयास करें। जब बहुमत में सत्यप्रधान लोग होंगे तो वातावरण में सत्य समा जायेगा, अतः सत्ययुग स्वतः आ जायेगा। समाज में आप परमकल्याण के स्रष्टा कहलायेंगे। लोककल्याण भी होगा और स्वयं तो कल्याणभाजन होंगे ही।

अनुभवी अन्तस्प्रेरक महापुरुष द्वारा ही युगधर्मों का पार पाने का विधान है। अतः किसी अनुभवी तत्त्वदर्शी महापुरुष के लिए अन्तःकरण में सदैव शोध तथा सत्य की लालसा रखें।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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