योग क्या है?

प्रश्नयोग क्या है?

उत्तर :- वर्तमान काल में अनेक विशेषणों के बीच योग अपना मूल आशय खो चुका है। लोग ऐन्द्रजालिक कौशल को योग कहते हैं। मारण, उच्चाटन, वशीकरण इत्यादि की ओर ही इनके प्रचारकों का विशेष ध्यान रहता है। अस्वाभाविक क्रियाओं तथा यंत्र, मंत्र, ताबीज, कवच इत्यादि द्वारा कर्मफल खण्डन करने का दावा कतिपय योगी करने लगे हैं। सचमुच के योगी ईश्वर-चिन्तन में इतने तन्मय हो जाते थे कि वे शरीर की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे। बालों में जटाएँ बन जाती थीं, शरीर पर धूल-मिट्टी जम जाती थी, किन्तु आजकल लोग कृत्रिम जटाएँ बना लेते हैं। ईश्वर-पथ प्रेम, चिन्तन और विरह का पथ है, किन्तु देश-विदेश में ‘योगा’ के नाम पर मात्र आसनों का प्रचार, कुण्डलिनी जागरण, ध्यान शिविर, प्राणायाम प्रशिक्षण का प्रचलन देख प्रतीत होता है कि वर्तमान समाज ‘योगदर्शन’ के प्रणेता महर्षि पतंजलि के योग के आशय से वंचित होता जा रहा है।

योग शब्द ‘युज्’ धातु में ‘धञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार युज् धातु तीन गणों में पायी जाती हैं – (१) युज् समाधौ दिवादिः आत्मने पदी, (२) युजिर योगे रुधादिः उभयपदी और (३) युज् संयमने चुरादिः परस्मैपदी। इस प्रकार योग का अर्थ क्रमशः समाधि, जोड़ और संयमन होता है।

प्रसिद्ध संस्कृत कोश ‘अमरकोश’ में है- योगः सन्नहनोपायः ध्यान संगति युक्तिषु’- योग ध्यान की संगति है, ध्यान की युक्ति है। ‘सन्नहन’- उस ध्यान में संघर्षशील होना योग है। वैद्यक में नुस्खे (उपाय) को भी योग कहते हैं। ध्यान द्वारा चित्त को एकाग्र करना योग है। दो वस्तुओं की संगति अर्थात् मेल को योग कहते हैं।

साधारण जन योग को वह अभ्यास मानते हैं, जिससे कोई अलौकिक सिद्धि मिल जाय। जिससे ऐसे कार्य किये जा सकें, जो साधारण मनुष्य की शक्ति से बाहर हों।

ऋग्वेद, पंचम पण्डल, सूक्त इक्यासी की पहली ऋचा में है-

युञ्ज्ते मन उत युञ्ज्ते धियो विप्रा विप्रस्य वृहतो विपश्चितः।

वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः।।

विप्र अर्थात् ज्ञानीजन बुद्धि और ज्ञान के स्रोत परमात्मा में मनः युञ्ज्ते– अपना मन लगाते हैं और धियः युञ्ज्ते– उसी में बुद्धि लगाते हैं। वही एकः इत देव– एकमात्र देव है, सब कुछ जाननेवाला है, यशों को धारण करता है, उसकी स्तुति महान् है।

इस प्रकार वैदिक संहिताओं में योग का आशय मन को परमात्मा में लगाना है।

योग अनादि है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के चतुर्थ अध्याय के आरम्भ में कहा- इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।इस अविनाशी योग को मैंने विवस्वान (सूर्य) के प्रति कहा। स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। (४/३) वही पुरातन योग अब मैंने तेरे लिए वर्णन किया है। इस प्रकार गीता योगशास्त्र है। जिसमें भगवान ने योग के लिए राजयोग, हठयोग, सुरति योग, लय योग जैसे विशेषणों का प्रयोग न कर मात्र ‘योग’ शब्द को ही समग्रता से लिया है।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः– गीता उन्हें महायोगेश्वर कहती है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना (६/४७) योगियों में भी वह योगी मुझे अत्यन्त प्रिय है जो अन्तरात्मा से मुझे भजता है और निरन्तर मुझमें लगा हुआ है अर्थात् मन, वचन, कर्म से एक परमात्मा में लगने का नाम योग है।

गीता में भगवान कहते हैं-

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। ९/२२

अनन्य अर्थात् अन्य न, मेरे अतिरिक्त अन्य किसी को न भजता हुआ जो केवल मुझे भजता है ऐसे निरन्तर मुझसे संयुक्त भक्त के योगक्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ अर्थात् अनन्य भाव से भगवान में लगने का नाम योग है।

गीता के अनुसार योग में लगने की विधि क्या है?-

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ।। ८/१२

सम्पूर्ण इन्द्रियों के दरवाजों को विषयों से समेटकर, मन को हृदय-देश में स्थिर कर, सुरत को मस्तिष्क में स्थिर कर, ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। (८/१३) ओम् बस इतना ही उस परमतत्त्व परमात्मा का परिचायक है, उसका जप करते हुए और मामनुस्मरन्– मेरे स्वरूप का ध्यान करते हुए जो देहाध्यास का त्याग कर देता है वह परमगति प्राप्त कर लेता है। अर्थात् एक परमात्मा के मिलन का नाम योग है। आप मिलेंगे कब?

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।। ८/१४

अनन्य भाव से अर्थात् अन्य किसी देवी-देवता का चिन्तन न करके जो निरन्तर मुझे भजता है, सदा मुझसे संयुक्त उस योगी के लिए मैं सुलभ हूँ। अर्थात् योग का परिणाम है भगवान का दर्शन, न कि सिद्धियों का प्रदर्शन। योग है क्या?-

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।। ६/२३

जो संसार के संयोग-वियोग से रहित है उसी का नाम योग है। जो अत्यान्तिक सुख है, जिसे परमतत्त्व परमात्मा कहते हैं उसके मिलन का नाम योग है।

मौर्यवंश के अन्तिम सम्राट बृहद्रथ के निधन के पश्चात् उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग का शासनकाल आया, जिसने भगवान बुद्ध के सिद्धान्तों का खण्डन कर जन्म से निर्धारित ब्राह्मणों की पूज्यता पर आधारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की स्थापना की। इस नवीन व्यवस्था की पोषक स्मृतियाँ धर्मशास्त्र के नाम से उसी काल में प्रतिष्ठित हुईं।

महर्षि पतंजलि पुष्यमित्र के समकालीन कहे जाते हैं। उस काल में धर्म की नयी-नयी व्यवस्थाओं से आशंकित हो उन्होंने योग के कल्याणपरक ज्ञान को संक्षिप्त सूत्रों में प्रस्तुत किया, जिससे भारत की प्राचीन विद्या का लोप न हो। योग के सिद्धान्तों को उन्होंने सूत्र-रूप में किन्तु स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत किया, जिससे प्रतीत होता है कि शब्दानुशासन व्याकरण पर उनका असाधारण अधिकार था। लोकोक्ति भी है कि भगवान पतंजलि ने मनोवाक्काय दोष निवारणार्थ योगसूत्र महाभाष्य और चरक संहिता की संरचना की।

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।

योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिं प्राञ्जलरानतोऽस्मि।।

महर्षि पतंजलि ने योग के नाम पर नया कुछ नहीं लिखा, बल्कि वही सूत्रबद्ध किया जो गीता में है। चित्तवृत्तियों का निरोध गीता में है, यत्रो परमते चित्तं निरुद्धं योग सेवया। (६/२०) यमों में परिगणित अपरिग्रह गीता के एकाकी यत चित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः। (६/१०) से लिया गया है। स्थिर सुखमासनम्(पातं०, २/४६) गीता के स्थिरमासनमात्मनः (६/११) की पुनरुक्ति है। अभ्यास और वैराग्य से मन का निरोध (गीता, ६/३५) महर्षि पतंजलि का भी अभिमत है। ओम् का जप, वीतराग सद्गुरु का ध्यान उनके द्वारा साधना की जागृति, स्वरूप की उपलब्धि, महर्षि का सब कुछ गीता का ही रूपान्तर है।

वर्तमान काल में योग की दो प्रमुख प्रणालियाँ प्रचलित हैं- एक तो वह जो महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर आधारित है और दूसरी प्रणाली हठयोग के नाम से प्रसिद्ध है। पातंजल योग चित्तानुशासनम्– चित्तवृत्तियों को अनुशासित करने पर आधारित है, जबकि हठयोग का सम्बन्ध शरीर-संचालन, स्वास्थ्य एवं रोग-मुक्ति से है। पतंजलि ने मन की स्थिरता एवं सुख से बैठने को आसन कहा है, जबकि हठयोग के ग्रन्थ चौरासी से चौरासी लाख आसनों की लम्बी श्रृंखला देते हैं। हठयोग में नेति, धौती, वस्ति, नौली, त्राटक, कपालभांति, महामुद्रा, खेचरी, जालन्धर, उड्डीयान, मूलबन्ध बङ्कोली, अमरोली एवं सहजोली जैसी क्रियाएँ प्रचलन में हैं, जिनके विषय में योगदर्शन मौन है। हठयोग प्रणाली में षट्चक्रों का भेदन करते हुए कुण्डलिनी को ब्रह्मरंध्र तक ले जाना होता है। उसमें योग के आठ अंगों के स्थान पर छः अंगों की ही चर्चा है, यम-नियमों को छोड़ दिया गया है। हठयोग के प्राणायाम में श्वासों के पूरक, कुम्भक और रेचक की प्रक्रिया पर दृष्टि रखनी होती है, जिसके कई रूप उज्जायी, भस्रिका, सूर्यभेदी, भ्रामरी, शीतली इत्यादि हैं। सिद्धियों को महर्षि पतंजलि ध्येय की प्राप्ति में व्यवधान मानते हैं, जबकि हठयोगी इसे योग की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानकर इनका प्रदर्शन करते रहते हैं। कहना न होगा कि योग के नाम पर अनेक भ्रान्त धारणाओं का सृजन इन दोनों प्रणालियों को मिला देने से हुआ है अथवा यह कहना अधिक समीचीन होगा कि शारीरिक क्रियाओं को योग की संज्ञा देने से विकृतियों को प्रोत्साहन मिला है। कल्याणकारक योगविधि वही है जिसकी परम्परा वेदों से लेकर गीता तक अक्षुण्ण है, शुंगकाल में जिसे महर्षि पतंजलि ने पुनः सूत्रबद्ध किया है।

महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन विश्व के मानव मात्र को उद्देश्य बनाकर प्रस्तुत किया है, जिसमें मानव-मात्र के अन्तःकरण में निहित दुःख के कारणों का उन्मूलन कर शाश्वत कैवल्य की प्राप्ति का मार्गदर्शन है।

योगसूत्र कठिन है और योगाभ्यास की कतिपय अवस्थाओं की पूर्ण व्याख्या उपस्थित नहीं करते। वे संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में हैं, मानो निर्देश करते हैं कि किसी तत्त्वदर्शी सद्गुरु की शरण में जायँ।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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