अहिंसा – महावीर स्वामी की दृष्टि में ‘अहिंसा’

महावीर स्वामी की दृष्टि मेंअहिंसा

जन-जीवन में अहिंसा के नाम पर जितना अतिवादी तथा भ्रामक प्रयोग भारत में है, विश्व में अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। यहाँ जीव-हत्या से बचना अहिंसा का पर्याय बन बैठा है। संसार के अन्य किसी भी देश में अहिंसा की साधना नहीं है। अरब में अहिंसा के अनुयायी कितने हैं? क्या यूरोप में अहिंसा का कोई कीर्तिमान है? आस्ट्रेलिया में अहिंसा के कितने प्रचारक हैं? साइबेरिया, जहाँ वनस्पति होती ही नहीं, सील मछली और कवक (काई) खाकर जीवित रहने वाले प्राणी के लिए अहिंसा की इस अवधारणा का कौन-सा उपयोग है?

‘अहिंसा’ लोक-जीवन का शब्द ही नहीं है। यह तो योग-साधना से प्राप्त होने वाली अन्तरंग अवस्था है; किन्तु लोगों ने इसे लोक-व्यवहार से जोड़ दिया है। इसे वे महावीर स्वामी का सिद्धान्त कहते हैं। आइये देखें, भगवान महावीर ने क्या कहा और प्रचलन में क्या है?

आचार्य समन्तभद्र विरचित ‘रत्नकरण्ड-श्रावकाचार’ के १०६वें श्लोक की टीका करते हुए पं० विद्याभूषण जी ने लिखा- ‘‘केवल आहार का त्याग मात्र ही उपवास नहीं है, वह तो लंघन के सदृश है। पंचेन्द्रिय विषय एवं क्रोधादि कषायों के वर्जन सहित चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए स्व-स्वरूप में लीन होने का प्रयास करना उपवास कहलाता है।’’

इस प्रकार उपवास इन्द्रियों को विषयों से पृथक् रखने की साधना है, अहर्निश एवं निरन्तर चलनेवाली साधना है, प्रतिदिन की साधना है जबकि अगले ही श्लोक में उन्होंने लिखा है कि उपवास के दिनों में जैनियों को कृषि-कर्म नहीं करना चाहिए, व्यापार नहीं करना चाहिए, नौकरी पर नहीं जाना चाहिए। प्रतिदिन ये कार्य न करें तो करें क्या? जैनियों में मान्यता है कि रात्रि में भोजन न करें, सब्जियों का निचला भाग, फल के बीज इत्यादि न खायें, पत्तियाँ खायें, झाड़ू से बुहार कर पाँव रखें, पानी छानकर या उबालकर पीयें, मुख-नाक पर कपड़ा बाँधकर चलें, कदाचित् कोई जीव मर गया हो उसके लिये एक महीने पश्चाताप करें, इत्यादि-इत्यादि। प्रश्न उठता है कि हम रात्रि-भोजन क्यों न करें?

प्रत्येक महापुरुष अपने अनुयायियों को रहन-सहन, चलने, उठने-बैठने की विधि बताते हैं। भगवान महावीर से भी पूर्व महात्मा भरत का उल्लेख मिलता है। जैन धर्मावलम्बी उन्हें द्वितीय तीर्थंकर मानते हैं। वह ऋषभदेवजी के पुत्र, चक्रवर्ती सम्राट थे। राजकीय वैभव का परित्याग कर वह सन्त हो गये, बड़े अच्छे महापुरुष हुए। उन्होंने नियम दिया कि पानी पीये छान के, गुरु करे जान के, रास्ता चले देख के और बिना विचारे ऐसा कोई कार्य कर डालें कि आजीवन शोचनीय हो जाय।

पानी छानकर पीना चाहिए; क्योंकि जल-प्रदूषण से बहुत-सी बीमारियाँ हो जाया करती हैं। आजकल बिसलरी का जल पीना लोगों का स्वभाव बनता जा रहा है। शादी-विवाह-उत्सव आयोजनों में भी जल की बोतलें प्रचलन में हैं। दूध से भी अधिक मूल्य पर यह बिक रही है जबकि यह है पानी! कारण मात्र इतना है कि वह छना हुआ है। उबला या छना हुआ जल पीने में उद्देश्य कीटाणुओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-सुरक्षा का है कि उससे बहुत-सी बीमारियों से बचे रहेंगे।

इसी प्रकार, गुरु करे जान के– ऐसा न हो कि जल्दबाजी में किसी को भी गुरु बना लिया जाय। गुरु एक स्थिति है- नास्ति तत्वं गुरो: परम् जिसका कभी विनाश नहीं होता, वह अविनाशी तत्व ही परम गुरु है। उस तत्व पर दृष्टि रखते हुए गुरु की पहचान करनी चाहिए।

रास्ता देखकर चलना चाहिए अन्यथा कंकड़-पत्थर, कुश-कंटक अथवा कोई नुकीली वस्तु पैर में चुभ सकती है, सर्प अथवा बिच्छू के ऊपर पैर पड़ सकता है, कोई भी घटना घट सकती है। अत: रास्ता देखकर चलना चाहिए। इसी प्रकार बिना विचारे कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो आजीवन शोचनीय हो जाय।बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय। काम बिगारे आपना, जग में होत हँसाय।। परिणाम पर विचार कर ही कदम उठाना चाहिए।

इसी प्रकार महावीर स्वामी ने भी कुछ निर्णय दिये जिसका उल्लेख दूसरी शताब्दी में उमा स्वामी ने अपने ग्रन्थ ‘मोक्षशास्त्र’ (तत्वार्थ सूत्र) में इस प्रकार किया है- वाङ्मनो गुप्तीर्यादान निक्षेपण समित्यालोकित पान भोजनानि पंच। (अध्याय ७, सूत्र ४) अर्थात् वाणी का संयम, मनोवृत्ति का निग्रह, देखकर चलना, किसी वस्तु को देख-समझ कर रखना और उठाना तथा प्रकाश में भोजन शोधकर छानकर ग्रहण करना- साधक को इन पाँच बातों को सदैव ध्यान में रखना चाहिए।

साधक को सर्वप्रथम वाणी का संयम करना चाहिए- ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करें आपहु सीतल होय।। (रहीम)। गोस्वामी तुलसीदास जी का मन्तव्य है- तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजे चहुँ ओर। वसीकरन एक मंत्र है तजि दे वचन कठोर।।वाणी के संयम में किञ्चित् प्रमाद आने से महारानी द्रौपदी से भूल हो गयी जो महाविनाश का कारण बना।

राजसूय यज्ञ चल रहा था। चक्रवर्ती सम्राट की महारानी द्रौपदी के मन में विनोद उछाल मारने लगा। उन्होंने अपने ही ज्येष्ठ श्वसुर को अन्धा कहा। उनका यह कथन मर्यादा के विरुद्ध था जिसकी परिणति चीरहरण और महासंग्राम में हुई। इन्द्रप्रस्थ के अद्भुत सभा-भवन को देखने में दुर्योधन का सिर एक दीवाल से टकराया। उसे वहाँ गलिआरा प्रतीत हो रहा था। स्फटिक और शीशों के पारदर्शी दरवाजे थे, दीवालें थीं। उसने घबराहट में चतुर्दिक दृष्टिपात् किया- कोई देख तो नहीं रहा है? किन्तु देखने वाले देख रहे थे। आगे बढ़ने पर उसे जल बहता दिखाई दिया। वह वस्त्र समेटने लगा। एक दासी ने निवेदन किया- ‘‘युवराज! यहाँ जल नहीं है, रास्ता है।’’ वह दासी उसी मार्ग से निकल गयी। दुर्योधन भी उसी तरह निकल गया। कुछ आगे बढ़ने पर दासी ने कहा- ‘‘युवराज सावधान! आगे पानी है।’’ दुर्योधन को वहाँ समतल रास्ता प्रतीत हुआ। उसे चिढ़ हुई कि अब दासियाँ भी विनोद करने लगीं। वह आगे बढ़ा और जलाशय में गिर पड़ा। द्रौपदी यह दृश्य देख रही थी। उसके मुँह से निकल गया- ‘अन्धे की सन्तान भी अन्धी।’ इतनी-सी बात दुर्योधन को चुभ गयी। इसी बात के लिये द्रौपदी की साड़ी खिंच गई; उसे केश पकड़कर घसीटा गया और महाभारत हो गया। इसलिये वाणी का संयम आवश्यक है। साधकों के लिये वाणी का संयम मात्र इतना है कि जब बोले तो हरि गुन गावें। मौन रहे तो नाम जपावें।।

दूसरा संयम मनोवृत्ति का निग्रह है अर्थात् वृत्ति सदैव चिन्तन में शान्त प्रवाहित हो। साधक भिक्षाटन करते हैं। बगल से कौन-कौन आ जा रहे हैं, कोई आपस में झगड़ रहा है, कोई कुछ कर रहा है, मातायें बच्चों को डाँट रही हैं- कुछ न कुछ कान में पड़ता ही है। ऐसे परिवेश में उनके आव-भाव से, आँखों से देखने से, कानों से सुनने से वृत्ति में उद्वेग न पैदा हो। ऐसा न हो कि आप भी उसी वातावरण में बहने लगें या वही गणित आप भी लगाने लगें। संसार में यह सब चलता रहेगा। समुद्र है तो लहरें उठेंगी। साधक को अपने लक्ष्य पर, अपनी टेक पर दृष्टि रखकर चलना चाहिए, चिन्तन में अनुरक्त रहना चाहिए, सचेतावस्था में रहकर चलना चाहिए।

मार्ग देखकर चलना भी एक संयम है। पहले आज की तरह राजमार्ग तो थे नहीं। प्राचीनकालीन पगडंडियों में कहीं सर्प, कहीं बिच्छू, कहीं काँटा तो कहीं कुश, कहीं कीचड़ तो कहीं गड्ढे- कुछ न कुछ रहता ही था- अस्तु, रास्ता देखकर चलना चाहिए। यह आज के परिवेश में भी उतना ही प्रासंगिक है।

किसी वस्तु को देख-समझकर रखना और उठाना चाहिए कि यह जगह इस वस्तु को रखने योग्य है अथवा नहीं। वस्तु कहाँ से ले रहे हैं तब भी देख समझकर उठायें। शक्तेशगढ़ के समीपवर्ती ग्राम के एक पहलवान आश्रम आया-जाया करते थे। छियानबे वर्ष की आयु में अभी उनका शरीर छूटा है। एक बार हमने उनसे पूछ लिया कि आपकी पहलवानी कैसी थी? उन्होंने बताया- महाराजजी! घर से दस किलोमीटर दूर एक अखाड़े पर हम अभ्यास के लिये जाया करते थे। हम घर से अखाड़े तक दौड़ते हुए जाते, वहाँ लड़ते और पुन: दौड़ते हुए ही घर आते थे।

हमने विनोदवश पूछा, ‘‘पहलवानी में तो अच्छी-अच्छी वस्तुएँ खाने को मिलती रही होंगी?’’ उन्होंने किञ्चित् उदास होकर कहा, ‘‘वही तो नहीं मिला महाराज! अन्यथा अच्छे पहलवानों में मेरी गणना थी, ऊँचे अरमान थे। अच्छे भोजन के अभाव में प्रगति नहीं कर सके।’’ हमने पूछा, ‘‘आपके जीवन की कोई उल्लेखनीय घटना हो तो बतायें।’’ उन्होंने बताया, ‘‘एक बार हम पशुओं के चारे के लिये खेत में गये। पास में बाँस की कोठ थी। हमने झुरमुट में टोकरी रख दी। उस समय मैं अखाड़े के बारे में सोच रहा था। हमने देखा नहीं कि टोकरी कहाँ रख रहे हैं? वहाँ एक काला सर्प था। टोकरी उसी के ऊपर पड़ी। सर्प ने मुझे डस लिया। उधर ध्यान होते ही मैंने सर्प को पकड़ लिया। सर्प हाथ में लिपटने लगा। उसका कसाव इतना प्रबल था, लगता था हाथ की हड्डी टूट जायेगी; किन्तु हमने साँप की गर्दन नहीं छोड़ी। दौड़ते हुए घर आये, लोगों को बुलाया। किसी तरह सर्प को हाथ से छुड़ाया, दूर पटक दिया, उसे मार डाला; किन्तु हम बेहोश हो गये। घरवालों ने उपचार कराया। तीसरे दिन हमें होश आया।’’ यदि उन पहलवान ने देखकर ही टोकरी रखी होती तो क्या यह घटना घटती?

एक अन्य सज्जन ताँबे के पात्र में जल अपनी चारपाई के नीचे रखकर शयन करते जिसे प्रात: सोकर उठते ही वह पीते थे। गर्मियों के दिन थे। एक बिच्छू ठंडक की तलाश में उसी लोटे पर बैठ गया। प्रात: अभ्यासवश उन्होंने चारपायी से नीचे हाथ बढ़ाया तो बिच्छू ने डंक मार दिया। कदाचित् उन्होंने देखकर हाथ बढ़ाया होता तो ऐसी दुर्घटना क्यों होती? इसीलिये इन महापुरुष ने नियम बनाया कि वस्तु रखते या उठाते समय देख-समझकर उठाना चाहिए।

उन्होंने ‘आलोकित पान भोजनानि’ की व्यवस्था दी कि भोजन और जल प्रकाश में देख-समझकर ग्रहण करें। जैन आचार्यों ने इसकी व्याख्या की कि आलोक का तात्पर्य दिन भी हो सकता है अत: रात को भोजन नहीं करना चाहिए। ढाई हजार वर्ष पहले भगवान महावीर हुए। उन दिनों केरोसिन तेल का आविष्कार नहीं था इसीलिये घोर जंगलों में रहनेवाले आचार्यों ने व्यवस्था दी होगी कि खाना-पीना दिन में ही कर लेना चाहिए। यह उन दिनों की व्यवस्था थी जब प्रकाश के साधन जनसाधारण को सुलभ न थे। आजकल महानगरों में अँधेरे की कोई समस्या नहीं है, रात में भी क्रिकेट खेलते हैं। जमीन के नीचे रेल चल रही है, पनडुब्बियों में जीना-खाना चलता ही रहता है। आलोक का अर्थ केवल दिन मान लेना एक भ्रान्ति है; क्योंकि वही आजकल जैन समाज का मापदण्ड बनकर रह गया।

यह भी एक अन्धविश्वास ही है कि सब्जी में पत्तियाँ तो खायी जा सकती हैं क्योंकि उनमें कम जीव होते हैं। पृथ्वी के अन्दर तैयार होनेवाली सब्जियाँ मूली, आलू, जमीकन्द, गाजर इत्यादि इसलिये न खायें क्योंकि उनमें जीव अधिक होते हैं। पृथ्वी के ऊपर की वनस्पतियों के प्रयोग से जीव-हिंसा कम होती है। एक जैन परिवार के लोगों ने बताया- हम लोग बटाटा नहीं खाते, मूली-गाजर-शकरकन्द भी नहीं खाते। हमने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया- ‘‘महाराज! हमलोग अहिंसक हैं। जमीन के अन्दर जो वनस्पति तैयार होती है उसमें जीव अधिक होता है। ऊपरवाला भाग खाकर हमलोग जीव-हिंसा कम करते हैं।’’ हमने पूछा- ‘‘ऊपर से किसी का गला काटकर खा लेने से वह तो मर ही गया। उसका निचला हिस्सा भी खाते तो कुछ समय पश्चात् दूसरे जीवों का क्रम आता। ऊपरी हिस्सा प्रयोग कर आपने जीवों को मारने की प्रक्रिया तीव्रतर कर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि व्यवस्था भ्रामक प्रतीत होती है। हमने उनसे पूछा, ‘‘अदरख-हल्दी तो आप खाते ही होंगे?’’ उन्होंने कहा, ‘‘इनके बिना चटनी या सब्जी कैसे बनेगी? दाल कैसे पकेगी?’’ हमने कहा, ‘‘यह तो बटाटा से भी अधिक गहराई में पैदा होता है। इसमें जीव अधिक नहीं रहते?’’ उन्होंने कहा, ‘‘तब तो यह भी भ्रमास्पद है।’’

अनेक महात्मा हाथ में मुलायम ब्रश या कपड़े का झाड़न लिये रहते हैं। उससे वे रास्ता साफकर अपना पाँव रखते हैं जिससे पैर से दबकर कोई कीटाणु न मर जाय। कुछ लोग जल छानकर पीते हैं, कुछ उबाल लेते हैं, कोई बिसलरी बोतल के रूप में उबला और शुद्ध किया जल पीते हैं क्योंकि जल प्रदूषित है, उसमें कीटाणु हैं। जल उबालकर वे कीटाणुओं की रक्षा करते हैं अथवा उन्हें मृत्युदण्ड देते हैं। उन कीटाणुओं को हटाकर लोग अपने प्राणों की रक्षा करते हैं। हमारे गुरु महाराज भी पानी उबालकर पीते थे क्योंकि जल में खराबी थी। जीवों की रक्षा या हत्या का प्रश्न ही नहीं था।

इसी प्रकार सैकड़ों महात्मा अहिंसा के नाम पर मुख पर कपड़ा बाँधकर चलते हैं जिससे मुख में कोई कीटाणु न आ जाय और मुख की गर्म नि:श्वास से छोटे जीवों को कष्ट न हो। यह भी एक भ्रान्ति है। श्वास लेने का कार्य तो नाक का है। अपनी क्षमता के अनुसार जीवों की श्वास तीव्र या मन्द गति से चलती ही है। हाथी बैठकर स्वास लेता है तब भी धूल उड़ती रहती है, अजगर श्वास से छोटे जीवों को खींच लेता है। कुम्भकर्ण की श्वास के साथ सैकड़ों बन्दर उसके मुँह में चले जाते थे। यह तो हर जीव की अपनी क्षमता और आवश्यकता है। मुख से कहाँ वायु निकलती है?

फिर भी भूल से कोई जीव कदाचित् मर गया हो उसके लिये एक माह पश्चाताप करने का नियम जैन समाज में है। यह है जीवों पर दया जिसे वे अहिंसा का ही अंग मानते हैं। भरत मुनि ने मृग के शावक पर दया ही की थी, उस अनाथ शावक की प्राणरक्षा ही की थी, उन्हें अगला जन्म मृग के रूप में लेना पड़ा।

भगवान महावीर की दृष्टि में शरीर ओंस की एक बूँद है। जाड़े के दिनों में फसलों की नोंक पर ओंस की बूँदें मोती की तरह चमकती रहती हैं। सूर्य की किरण पड़ते ही वे बूँदें पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं, एक घण्टे में ही सारी ओस वाष्प बनकर उड़ जाती है। प्रात: आप फसलों के समीप भ्रमण करें, ओंस से पाँव भींग जायँगे, कपड़े भींग जायँगे, दोपहर तक ओंस का कहीं कोई निशान नहीं रह जाता। जब शरीर इतना क्षणभंगुर है फिर आप जीव की कौन-सी रक्षा कर रहे हैं? सूर्य निकलना ही है, ओंस की बूँदों का भाप बनकर उड़ना ही है। आप ओंस की बूँदों को रोक भी तो नहीं पायेंगे। अहिंसा के नाम पर आप किसे बचा रहे हैं?

भगवान महावीर के अनुसार पाँच समिति और तीन गुप्तिसम्पन्न मुनि अहिंसक हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध हैं। इन पाँचों इन्द्रियों का संयम पाँच समिति हैं, आँखें वाह्य जगत् में रूप देखना बन्द करें, जिह्वा रस के लिये लालायित न हो। इनका संयत होना समिति है। महात्माओं ने इनके संयम पर उपदेश किया है। इसी पर बल देते हुए सन्त कबीर कहते हैं-सन्तो! घर में झगड़ा भारी।। रात दिवस मिलि उठउठ लागें, पाँच ठोटा एक नारी। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच लड़के हैं जिनके पीछे मायारूपी नारी प्रेरक रहती है। न्यारोन्यारो भोजन चाहैं, पाचों अधिक सवादी। कोउ काहू कर हटा माने आपुहिं आप मुरादी।। पाँचों ज्ञानेन्द्रिय अलग-अलग भोजन चाहते हैं। इन सबका अलग-अलग भण्डार-घर है। आँखें रूप देखकर तृप्त होती हैं, कान शब्द सुनना चाहते हैं, त्वचा को स्पर्श चाहिए, रसना को स्वाद तो नासिका को गन्ध चाहिए। इन पाँचों का भोजन अलग-अलग और पूरे स्वाद का भोजन चाहिए। अपनी खुराक में कटौती इन्हें सह्य नहीं है। इनमें से कोई भी इन्द्रिय किसी का अनुशासन मानना नहीं चाहती, केवल इनकी अपनी मुराद पूरी होनी चाहिए, अभीष्ट विषय-रस सिद्ध होना चाहिए। इन भ्रमित इन्द्रियों का अभीप्सित रस भी देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। बच्चे को थोड़ा छू भर दें, वह धमकी देता है- मम्मी से कह दूँगा। तुम्हारे पीछे फोर्स लगा दूँगा। कुछ बड़ा होने पर वही बालक खिलौनों में उलझ जाता है। युवावस्था में वही क्रिकेट, नृत्य-गान में लिप्त पाया जाता है। वृद्धावस्था में बच्चों का प्रमोशन सुनने या उनकी एक झलक देखने को ही आँखें तरसती हैं। कान पहले कुछ और सुन रहे थे, आज इसमें ही खुश हैं। इस प्रकार, अवस्था के अनुसार इन पाँचों की खुराक भी बदलती जाती है। शरीर छूटने पर भी पाँचों इन्द्रियाँ नये कलेवरों में तैयार मिलती हैं। इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों में जो विकृति है, न्यारी-न्यारी दिशाओं में अपने रस के लिये दौड़ रही हैं- ये सम हो जायँ, संगठित हो जायँ, एक समिति बन जायँ।

मन, वचन और कर्म को गुप्त रूप से प्रभावित करनेवाले तीन गुण सत्, रज और तम ही तीन गुप्ति हैं। यह तीनों प्रभाव न डाल सकें। इनके प्रभाव क्षेत्र से साधक जिस क्षण ऊपर उठ जाता है, उस समय पाँच समिति और तीन गुप्तिसम्पन्न मुनि अहिंसक हैं। इसके विपरीत जिनका जीवन असंयमी है, जिसका संयम नहीं सधा, वह हिंसक है।

संयमी व्यक्ति किसी जीव की हत्या करे या न करे, वह हिंसक अथवा अहिंसक नहीं कहलाता क्योंकि अहिंसा का आधार आत्मा का अध्यवसाय है। आत्मा के संरक्षण में चलना, आत्मस्थिति के लिये दृढ़तापूर्वक लगना अहिंसा है। यह वाह्य जगत् के क्रियाकलाप में है ही नहीं। आत्मपथ पर अग्रसर होने पर योग-साधना का एक अंग अहिंसा है।

एक श्रद्धालु ने हिंसा-अहिंसा के बारे में भगवान महावीर से पूछा। भगवान ने बताया- जिसका हृदय दुष्टभावों से युक्त है, जो वासनाओं एवं विकारों से युक्त है वह जीवों का घात न करने पर भी हिंसक है तथा जिसका हृदय पवित्र है, वह संसार में जीवों का घात करते हुए भी शुद्ध अहिंसक है।

जैन तीर्थंकर भगवान महावीर के उपदेश पंच महा अणुव्रतों पर आधारित हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह- सब मिलाकर एक अणुव्रत होता है। अणुव्रत अर्थात् अतिसूक्ष्म व्रत। भगवान बुद्ध ने इन्हीं पाँचों को पंचशील कहा। महर्षि पतंजलि ने ‘योगदर्शन’ में इन्हें ही पाँच यम कहा।

प्रसिद्ध जैनाचार्य अमृतचन्द ने ‘पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय’ नामक ग्रन्थ में लिखा है-

अप्रादुर्भाव: खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति।

तेषामेवोत्पत्ति हिंसेति जिनागमस्य संक्षेप:।।४४।।

अर्थात् अंत:करण में रागादि विकारों का न होना अहिंसा है तथा इन विकारों का होना ही हिंसा है। यह सम्पूर्ण जैनशास्त्र का सारांश है। रागादि विकारों से क्षति क्या है?

‘‘यत्खलु काषाय योगात् प्राणानाम् द्रव्यभावरूपानाम व्यपरोणस्य सुनिश्चिता सम्भवति हिंसा।।’’

राग-द्वेष इत्यादि विकारों के कारण मन, वचन और शरीर से द्रव्यरूप में या भावरूप में प्राणों का जो घात किया जाता है वह हिंसा है। सृष्टि में जो कुछ है द्रव्य है, सम्पद् है। जिसके दो रूप हैं- दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद्। आत्मिक सम्पद् स्थिर सम्पद् है, निज धन है। राग-द्वेषादि विकारों से अलग रहकर मन, वचन और कर्म से जो आत्मिक सम्पत्ति संयम के द्वारा संग्रहीत हो रही थी तथा सद्गुरु के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धाभाव रूप में प्राण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में जो घात या ह्रास होता है; दैवी सम्पद् का संकलन अवरुद्ध हो जाता है, यह ह्रास ही हिंसा है; क्योंकि साधक, जो आत्मपथ की ओर जा रहा था, उसमें रुकावट आ गई।

अन्यत्र वह कहते हैं-

आत्मपरिणाम हिंसन हेतुत्वात्सर्वमेव हिंसैतत्।

अमृत वचनाभि: केवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय।। (पुरुषार्थ० ४२)

अर्थात् आत्म-परिणाम का हनन करनेवाले सभी विकार हिंसा ही हैं। झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, व्यभिचारादि का निषेध जो अलग-अलग बताया जाता है, शिष्यों को समझाने के लिये है। वस्तुत: अहिंसा आत्म-परिणाम अर्थात् जिस साधना का परिणाम आत्म-साक्षात्कार है- का हनन करनेवाले उससे पथभ्रष्ट और वंचित करने वाले समस्त विकार हिंसा हैं।

तत्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र) में जैनाचार्य उमास्वामी का कथन है- प्रमत्तयोगात्प्राण व्यपरोपणं हिंसा।।१३।। अर्थात् प्रमाद से युक्त होने पर जीव के भावप्राण तथा द्रव्यप्राण का अपहरण हो जाना ही हिंसा है। प्रमाद अर्थात् व्यर्थ की चेष्टाएँ। जब संयम टूटता है, राग-द्वेषादि विकार आ जाते हैं, साधक व्यर्थ की चेष्टाओं में उलझ जाता है। प्रमाद से युक्त होने के कारण जीव के भावप्राण अर्थात् प्राणों में जो भाव था, श्रद्धा थी, वह अभाव में परिवर्तित हो जाती है। अन्त:करण में श्रद्धा का जो प्रवाह चल रहा था, अवरुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार द्रव्यप्राण अर्थात् दैवी सम्पद्, आत्मिक सम्पद्, निज धन जो मिल जाने पर निश्चित कल्याण करती है, उस द्रव्य का प्राणों के व्यापार से अपहरण हो जाना ही हिंसा है। अर्थात् मन के अन्तराल में उत्पन्न होनेवाले रागादि उद्वेगों को रोकना ही अहिंसा है। स्पष्ट है कि अहिंसा के पालन में मानसिक क्रिया ही प्रधान है। वाह्य क्रियाओं से अहिंसा का सम्बन्घ नहीं है। यदि मन प्रमाद से युक्त नहीं है तो वह मुनि किसी प्राणी को मारकर भी हिंसा नहीं करता।

जैन शास्त्रों में है कि ईरिया समिति को प्राप्त अर्थात् देखकर चलनेवाले मुनि के पैर के नीचे कितने भी जीव आकर मर जायँ तो उन्हें न हिंसा है न अहिंसा।

अहिंसा की भूमिका को ओजस्वी बनाने के लिये अन्त:करण को पवित्र बनाना होता है। अपनी पवित्रता में अहिंसा सहज जगमगा उठती है। वहाँ सर्वत्र अपना ही दर्शन होता है। क्या वाह्य जीव न मारने से सर्वत्र अपना दर्शन होता है? अहिंसा कोई ऐसा स्तर है जहाँ सर्वत्र अपना ही दर्शन होता है। अहिंसक अपनी ही तरह सबको जानता है, उसे केवल सहानुभूति नहीं, समानुभूति होने लगती है। उसे ईशावास्यमिदं सर्वम्– सर्वत्र इष्ट ही प्रसारित दिखायी देने लगता है। इस प्रकार जो स्वरूप में स्थित है, वह महापुरुष कुछ भी करे, उससे कल्याणस्वरूप अहिंसा ही प्रवाहित होती है और जो स्वरूप के बाहर है, कितना भी फूँककर पाँव रखता हो, उससे हिंसा ही प्रवाहित होती है। अर्थात् आत्मरमण, आत्मचिंतन और अहिंसा एक ही हैं। स्वरूप में प्रतिष्ठित होने से पूर्व अहिंसा अधूरी है, अभी चलना शेष है। अहिंसा तपश्चरण का परिणाम है। परिस्थिति-विशेष में कतिपय मुनियों ने अहिंसा का प्रयोग सामाजिक व्यवस्था के सन्दर्भ में किया जो कालान्तर में भ्रान्ति का कारण बनी।

कहा जाता है, सब प्राणियों को आयु प्रिय है। सब जीव जीने की इच्छा रखते हैं। दु:ख सबको प्रतिकूल है, वध सबको अप्रिय है। सब सुख के अभिलाषी हैं इसलिये किसी को मारना या कष्ट देना नहीं चाहिए; किन्तु जैसा ‘समयसार’ नामक ग्रन्थ में आचार्य कुन्द कुन्द ने कहा है-

जो मण्णादि हिंसामि हिंसिज्जामि परेहिं सत्तेहिं।

सो मूढ़ो अण्णाणी णाणी एतोदु विवरीदो।।२४७।।

अर्थात् जीवों का जन्म-मरण, सुख-दु:ख अपने उपार्जित कर्मोदय से होता है। कोई किसी को मार ही नहीं सकता और मरते को बचा भी नहीं सकता, तो मारने का नाम हिंसा और बचाना अहिंसा कैसे हो सकती है? जब सब कुछ अपने ही कर्मों का परिणाम है तो कौन किसे कष्ट देता है?

एक बार भगवान महावीर जंगल में एक छायादार वृक्ष के नीचे ध्यान में निमग्न बैठे थे। एक चरवाहा दो बैल लेकर आया और वहीं पर बैठ गया। बैल भी वहीं बैठ गये। अकस्मात् वह व्यक्ति जंगल में कुछ लेने चला गया। वह लौटकर आया तो बैल वहाँ न थे। उसने महावीर स्वामी से पूछा, ‘‘भगवन्! हमारे दो बैल यहीं थे, किधर गये?’’ वह महापुरुष ध्यान में मग्न थे। उन्हें भान ही नहीं था कब वहाँ कौन आया, कब तक बैठा या कब चला गया? चरवाहे ने दो-एक बार पूछा। वह महापुरुष नहीं बोले। आँखें खुली थी, त्राटक जैसा लगा था, सुरत अन्दर थी, दृष्टि स्थिर थी। उन्हें शान्त मुद्रा में देख वह बैलों को ढूढ़ँने चला गया।

कुछ समय पश्चात् बैल चरकर उसी वृक्ष के नीचे पुन: आ गये। वे वहीं पुन: बैठ गये क्योंकि महापुरुष के चतुर्दिक वायुमण्डल शान्त प्रवाहित रहता है। उन्हें भी आराम मिला; क्योंकिहित अनहित पशु पक्षिउ जाना। वे शान्ति से पागुर करने लगे। वह चरवाहा भी दो-चार घड़ी जंगल में यतस्तत: भटककर आया। बैलों को उन महात्मा के पास बैठा देख उसे बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा- यह बाबा बैलों के बारे में जानता था। इसने जान-बूझकर हमें नहीं बताया। यह बहरा बनने का स्वाँग कर रहा है। इसे सचमुच का बहरा बना देते हैं। उसने कुश का एक पौधा उखाड़ा। कुश की जड़ नुकीली और ठोस होती है। चरवाहे ने उसे कील की तरह महावीर स्वामी के कान में ठोंक दिया, कान के बाहरवाले कुश को सरौती से काट दिया जिससे कोई उसे निकाल न सके। भक्तों की दृष्टि पड़ी। उन्होंने वह कुश निकालने का प्रयत्न किया। कुश नहीं निकल रहा था। लुहार बुलाया गया। उसने सड़ँसी से वह कुश निकाला। रक्त की धारा कान से बह चली। महावीर के मुख से एक चींख निकली। उसी के साथ उन्हें एक आकाशवाणी भी सुनायी पड़ी कि, ‘‘पूर्वजन्म में तुम राजा थे। तुमने अपने सामने एक निरपराध व्यक्ति के कान में कील ठुकवाया था। आज वह प्रायश्चित पूरा हुआ। अब भविष्य में ऐसा कोई बदला शेष नहीं है।’’ अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतम् कर्म शुभाशुभम्’- किया हुआ शुभ अथवा अशुभ कृत्य अवश्य भोगने में आता है। जैन विचारधारा में कहा जाता है कि किसी को सताओ मत। कौन किसको सताता है? क्या उस चरवाहे ने महावीर को सताया था? उसे तो अपना बदला पूरा करना ही था। यह उसका अधिकार था, होनी थी। महावीर के स्वयं के संस्कारों ने उन्हें यहाँ लाकर खड़ा कर दिया, कील ठुक गयी। यह तो होनी का प्रभाव है जो समय पर होता ही रहता है।

संस्कारों का नियम है कि वे सहस्रों जन्मों के पश्चात् भी ठीक समय पर स्मृति पटल पर आते हैं। काल के परिवर्तन से उसमें कोई व्यवधान नहीं पड़ता। महर्षि पतंजलि बताते हैं- जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्। (योगदर्शन, ४/९)- जाति अर्थात् जन्म, देश और काल अर्थात् समय का व्यवधान रहने पर भी कर्म संस्कारों में व्यवधान नहीं पड़ता क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों का एक ही स्वरूप है। स्मृति में वही उभरता है जो संस्कारों में होता है। संस्कारों की गति अप्रतिहत है, निर्बाध है। यह जन्म-जन्मान्तरों में यत्र-तत्र-सर्वत्र कर्ता का अनुगमन करती है। कागभुशुण्डि जी को अनेक जन्म मिले, कालचक्र से गुजरे, अनेक देशों में गये किन्तु संस्कारों में कोई व्यवधान नहीं पड़ा-कवनेउँ जन्म मिटिहिं नहिं ग्याना।किसी भी जन्म में उनका ज्ञान नहीं मिटा।

शत्रु-मित्र सबके प्रति समभाव, जीवों के प्रति मैत्री भाव, किसी भी प्राणी को हानि न पहुँचाना- यह अहिंसाप्राप्त संत का स्वभाव है। उनसे जब होगा अहिंसा – मंगल ही होगा। परमात्मभाव को उपलब्ध सन्त के हृदय की यह अवस्था है। ऐसे महात्मा विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके पण्डिता: समदर्शिन:।। विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में, चाण्डाल, कुत्ता, गाय तथा विशालकाय हाथी में समान दृष्टि वाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्याविनययुक्त ब्राह्मण न कोई विशेषता रखता है और न चाण्डाल कोई हीनता ही रखता है क्योंकि वे जानते हैं कि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण लक्ष्य के सन्निकट है और जिन्हें चाण्डाल कहा जाता है, लक्ष्य से कुछ दूर है। दोनों उसी पथ के पथिक मात्र हैं। महापुरुषों की दृष्टि उनकी आत्मा पर पड़ती है। शरीर के गुण-स्वभाव-व्यवसाय उनकी दृष्टि में गौण हैं। किसी को न सताना, करुणा उनका सहज स्वभाव होता है।

जैन साहित्य में महावीर स्वामी के पूर्वजन्मों का इतिवृत्त मिलता है। चौबीस जन्मों पूर्व वह एक लकड़हारे के रूप में थे। उनकी दृष्टि एक संत पर पड़ी। उन्हें वह देखते ही रह गये। ऐसा शान्त स्वरूप उन्होंने कभी देखा ही न था अत: घण्टों देखा। इस संत-दर्शन के प्रभाव से अगले जन्म में उन्होंने दो संतों को भोजन कराया। उस पुण्य के प्रभाव से अग्रेतर जन्म में उन्होंने सत्संग सुना, विरक्त हो गये। वह संन्यासी भी हुए। कहीं किञ्चित् भूल हुई तो नरक भी मिला। भोग समाप्त होने पर पुन: वह सन्त हुए। एक बार उन्हें शेर बनना पड़ा, कभी राजा हुए और अन्तिम चौबीसवें जन्म में तीर्थंकर हुए। इस प्रकार भगवान की साधना सन्त-दर्शन से आरम्भ हुई, जिसने उन्हें पूर्ण कैवल्य ज्ञान सम्पन्न बनाकर ही छोड़ा।

इसलिये जैन-परम्परा में पंच परमेष्ठियों के नमन का नियम ही बन गया कि णमो अरहंताणं’- अरिहन्त को नमस्कार है। काम-क्रोध-राग-द्वेषादि शत्रु जिनके समाप्त हो गये हैं, जो दूसरों के भी इन विकारों को समाप्त करने की क्षमता रखते हैं, उन महापुरुषों को मैं नमन करता हूँ। णमो सिद्धाणं’- परमतत्व परमात्मा जिसे सिद्ध है, जिसने इन्द्रियों को साध लिया है, नैष्ठिकीम् सिद्धि वाले ऐसे महापुरुष को मैं नमन करता हूँ। अर्थात् ऐसे महापुरुष की शरण जायँ, उन्हें नमन करें, उनके प्रति अपने आपको समर्पित करें। णमो आयरियाणं’- जो आर्य पुरुष हैं, जिन्हें आर्यत्व प्राप्त है (महावीर के अनुसार जिनकी बुद्धि यथार्थ है, जो जितेन्द्रिय हैं, जिनका संकल्प यथार्थ है, वह आर्यत्व प्राप्त हैं। आर्य एक वृत्ति है, न कि कोई प्रजाति कि कहीं से आये हों।) ऐसे आर्य पुरुष को मैं नमन करता हूँ, उनकी शरण जाता हूँ जिसने उस अस्तित्व को प्राप्त किया हो। णमो उवज्झायाणं’- उवज्झ्य उपाध्याय को कहते हैं अर्थात् आचार्य! जो स्वयं जानते हों और दूसरों को भी समझा सकते हों, साधन की जागृति आपके हृदय में कर सकते हों- ऐसे आचार्य की शरण जायँ। णमो लोए सव्व साहूणं’- संसार में जितने सन्त हैं जिन्होंने गृह-त्याग कर, अपने माता-पिता तथा सगे-सम्बन्धियों को रुलाकर इस पथ का चयन किया, उस पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर हुए, परावर्त नहीं हुए, उन सभी सन्तों को नमन करता हूँ। इन पाँचों नमन का आशय है कि सन्तों की शरण, उन्हीं की सेवा। वही हैं योगेश्वर! वही हैं जिनेश्वर! उन्हीं के नमन पर बल दिया गया है। एसो पंच णमोक्कारो सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणं सव्वेसिं पढमं हवइ मंगलं। यह पाँच नमस्कार सभी पापों का नाश करनेवाले हैं। यही सबसे बड़ा मंगल है। इन्हें जो करते हैं उनके जीवन में कल्याण ही कल्याण है। यही गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं-प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

जैन साहित्य में भरत मुनि का उल्लेख है। वह भगवान ऋषभदेव, जिन्हें आदिनाथ भी कहते हैं, की कुल-परम्परा में थे। जैन-परम्परा का आरम्भ इन्हीं भगवान ऋषभदेव से माना जाता है। भागवत महापुराण में उनका विस्तृत उल्लेख है। वह आर्यों के चौथे अवतार थे जो राज्य का त्याग कर सन्त हो गये थे। इनके सौ पुत्रों में से इक्यासी ब्रह्मचिन्तन कर ब्राह्मण हो गये, नौ योगेश्वर हुए। उनमें से ज्येष्ठ भरत और उनके अनुज बाहुबली भी महान सन्त हुए। भरत चक्रवर्ती सम्राट थे। इन्होंने गृहत्याग किया और तपस्या में अनुरक्त हो गये। उनका भजन पूर्ण हो चला था। अन्तत: परीक्षा की घड़ी आई। कुटीर के समीप ही गण्डकी नदी प्रवाहित थी। भरत मुनि नदी तट पर चिन्तन में बैठे थे। उसी समय एक हरिणी प्यास से व्याकुल हो नदी तीर पर आयी। अभी वह जल पी ही रही थी कि समीप ही शेर की दहाड़ सुनायी पड़ी। हिरणी नदी पार करने के लिए छलाँग लगाने ही वाली थी कि उस आसन्नप्रसवा का गर्भ नदी की धारा में गिर पड़ा। नदी पार करते ही हिरणी के प्राण-पखेरू उड़ गये, मृग शावक प्रवाह में बहने लगा। दयावश भरत मुनि उस मातृहीन शावक को आश्रम ले आये, उसका पालन-पोषण किया। उस अनाथ शरणागत शावक की हिंसक वन्यजीवों से रक्षा करते रहे।

क्रमश: मृग शावक बढ़ने लगा। वह कुलाचें मार जंगल में जाता तो भरत मुनि विकल हो उठते कि यह इतना अबोध और मिलनसार है कि बहेलिये का मुख भी सूँघ लेगा, यह चीते के पास भी जा सकता है। कोई भी हिंसक पशु इसे मार सकता है। जीवन के अन्तिम क्षणों में भी भरत मुनि मृग के लिए ऐसा ही चिन्तन कर रहे थे। इसीलिये शरीर छूटने पर उन्हें अगला जन्म मृग का मिला।

मृग-योनि में भी भरत को पूर्वजन्म की स्मृति थी। उन्होंने मृगों का झुण्ड त्याग दिया। ऋषियों का एक आश्रम दिखायी पड़ा। वह मृग बेहिचक उस आश्रम में चला गया, जैसे कोई बहुत पुरानी पहचान हो। प्रारब्ध क्षय होने पर गण्डकी नदी की धारा में खड़े रहकर उस मृग ने शरीर-त्याग किया।

भरत का अगला जन्म एक ब्राह्मण कुल में हुआ। उस जन्म में भी उनका नाम भरत ही था। विमाता से उत्पन्न नौ भाइयों के अतिरिक्त वह सबसे कनिष्ठ थे। अन्य सभी भाई पठन-पाठन, पढ़ाई-लिखाई में कुशाग्र थे; किन्तु भरत लोकदृष्टि में पागल, मूर्ख, अन्धे और बधिर की तरह आचरण करते थे। उनकी शिक्षा में रुचि तथा प्रगति न देख भाइयों ने उन्हें खेतों की रखवाली के लिये नियुक्त किया; किन्तु चिन्तन में लीन भरत इस दायित्व का भी निर्वाह न कर सके। क्षेत्र के सभी पशु-पक्षी उसी खेत में उदर-पूर्ति कर रहे थे। भरत कह रहे थे-राम की चिड़िया राम का खेत। खा ले चिड़िया भरभर पेट।।’ भाइयों ने सुना। अत्यन्त क्रोधित होकर उन सबने भरत को भोजन देना बन्द कर दिया और घर से निष्कासित कर दिया।

महात्मा भरत इसी प्रतीक्षा में थे। गृह से महाभिनिष्क्रमण के पश्चात् वह भजन करते हुए निर्द्वन्द्व, परम विरक्त त्यागी के रूप में निस्पृह भाव से विचरण करने लगे। जंगल में दस्युओं का दल एक युवक की बलि देवी को चढ़ाने जा रहा था। युवक उनके बंधन से मुक्त हो भाग निकला। बलि के लिये किसी अन्य की खोज हो रही थी। भरतजी ध्यान में बैठे थे। उन्हें बलि के लिये ले जाया गया। सरदार ने उनकी गर्दन पकड़कर देवी के चरणों में झुकाया। ज्योंही उसने तलवार उठायी, देवी-प्रतिमा में आग लग गयी। एक पुतला निकला, सरदार के हाथों से खड्ग छीनकर सभी दस्युओं को मार डाला। सन्नाटा होने पर भरत उठ खड़े हुए। देखा, सभी मरे पड़े हैं। वह शान्ति से चिन्तन करते हुए आगे बढ़ गये।

इस घटना के कुछ ही दिनों पश्चात् सिन्धु सौवीर देश के नरेश रहूगण सद्गुरु की खोज में पालकी पर चढ़कर जा रहे थे। जब वह इक्षुमती नदी के किनारे से जा रहे थे, पालकी उठानेवाला एक कहार बीमार हो गया। उसके स्थान पर एक अन्य कहार की खोज के समय महात्मा भरत उन्हें मिले। सिपाहियों ने बेगार में पकड़े हुए अन्य कहारों के साथ इन्हें भी पालकी ढोने के कार्य में लगा दिया। कुश, कंटक, चींटी इत्यादि जीवों को दबने से बचाने के प्रयास में महात्मा भरत अन्य कहारों की तरह नहीं चल पा रहे थे। राजा ने कहारों से कहा, तो उन्होंने बताया कि यह नया कहार कदम मिलाकर नहीं चल रहा है। राजा ने पालकी रूकवाई, भरत से कहा, ‘‘तुम दुबले-पतले भी नहीं हो। क्या तुम्हारे कन्धे पर अधिक भार है? तुमसे रास्ता चलते नहीं बनता?’’ भरतजी जीवन में पहली बार बोले, ‘‘राजन्! दुबला या मोटा वह होता है जिसे देहाध्यास होता है। भार और रास्ता चलने का हाल वह जानता है जो सचमुच रास्ता चलता है। तुम क्या जानो! कभी भार ढोकर देखा भी है?’’ रहूगण को प्रतीत हुआ कि जिस गुरु की खोज में वह निकला है, कदाचित् वैसे ही सद्गुरु मिल गये। उसने साष्टांग दण्डवत् किया, शरण में लेने तथा कल्याण का साधन बताने की अभ्यर्थना की।

महात्मा भरत ने कहा- रहूगण! महापुरुषों के चरणों की धूलि से अपने को नहलाये बिना केवल तप, यज्ञ, दान, अतिथि-सेवा, वेदाध्ययन, गृहस्थोचित कर्म अथवा जल, अग्नि या सूर्य इत्यादि देवताओं की उपासना आदि किसी भी साधन से यह परमात्म-ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। यही महापुरुष तत्वदर्शी हैं, यही जिनेश्वर हैं जो स्वयं जितेन्द्रिय हैं, दूसरों में भी ऐसी क्षमता जागृत कर सकते हैं। ऐसे किसी तत्वदर्शी महापुरुष के चरणों की धूल में लोटे बिना परमात्म-दर्शन की विधि जागृत नहीं हो सकती।

किन्तु रहूगण राजा ही ठहरा। उसने देवी-देवताओं के अनेक मन्दिर बना रखे थे- कहीं शिक्षा की देवी, कहीं युद्ध की देवी तो कोई ग्राम देवी। उन्होंने पूछा- भगवन्! यह देवी-देवता? भरत ने कहा- यह देवी-देवता बटेर की तरह कायर, कौवे के समान सर्वभक्षी, बगुले की तरह ऊपर से साफ-सुथरे किन्तु भीतर से घात करनेवाले, उल्लू की तरह अचेत आत्माओं की हत्या करनेवाले हैं, अन्य कुछ भी नहीं हैं। भरत ने स्वयं देखा था कि जिन डाकुओं ने आजीवन देवी को बलि चढ़ाया किन्तु देवी के प्राणों पर आ बनी तो भक्त को ही काट डाला। भरत ब्रह्मलीन महापुरुष थे। उनका अनिष्ट सोचनेवाले परमात्मा के प्रकोप से बच नहीं सकते थे। इसीलिये अपनी सुरक्षा के लिये देवी ने अपने भक्तों का ही उन्मूलन कर दिया। भगवान के वरदहस्त के नीचे रहनेवाले भक्त का अनिष्ट देवी-देवता भी नहीं कर सकते-हरि भक्तन के पास आवैं भूतप्रेत पाखंड।

भरत मुनि ने मृग शावक पर करुणा ही तो की थी, शरणागत की रक्षा की। कहते हैं कि जीवों पर दया करें- यह अहिंसा है। भरत ने इस तथाकथित अहिंसा की ओर ही कदम उठाया था। जाने-अनजाने, परिस्थितिवश एक मृग के प्राण ही तो बचाये थे। उसी जन्म में प्राप्ति होनेवाली थी, तीन जन्म और लेना पड़ा। अस्तु, जीवन-मृत्यु तो परस्पर बदले हैं। ये समय पर चुकाये ही जाते हैं। इसमें हिंसा-अहिंसा का प्रश्न ही नहीं उठता।

जैनियों की एक मान्यता है कि तीर्थंकर केवल क्षत्रिय होते हैं। वह राजा और चक्रवर्ती होते हैं। लोकहित के लिये वह शस्त्र उठाते हैं, बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ते हैं। युद्ध में जो भी आया, उसका वध ही तो करते हैं। वैâसी है यह अहिंसा? जीव मत मारो- तो युद्ध में ये करते क्या हैं?

कथा आती है कि महावीर स्वामी का जीव देवानन्दा ब्राह्मणी के गर्भ में चला गया। शक्र को बड़ी चिन्ता हुई। देवताओं के स्वामी इन्द्र-जैसे पचासों इन्द्र के ऊपर शक्र का पद है। उसने सोचा, तीर्थंकर केवल क्षत्रिय होते आये हैं। ब्राह्मणी की तुच्छ कुक्षि से भगवान का जन्म होने से इस परम्परा में व्यतिक्रम हो जायेगा। उसने देव-वैद्य को निर्देश देकर उस गर्भस्थ जीव को वहाँ से निकालकर क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थापित कर दिया। पहले देवानन्दा शुभ शकुनवाले स्वप्न देखती थी, जैसे- ऐरावत हाथी, उच्चैश्रवा घोड़ा, श्वेत वृषभ, कामधेनु, रत्नों की ढेरियाँ, उगता सूर्य, द्वितीया का चन्द्र इत्यादि। गर्भ बदलने पर यही स्वप्न त्रिशला क्षत्राणी देखने लगी। प्रतीत होता है उस युग में क्षत्रिय ब्राह्मण से उन्नत योनि के रूप में प्रतिष्ठित थे- कालान्तर में ब्राह्मण उन्नत, प्रतिष्ठित मान लिये गये। शेष वर्गों का अवमूल्यन हो गया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत के नये संविधान का प्रवर्तन होते ही मत तथा आरक्षण इत्यादि की सुविधा के लिये वरिष्ठ जातियाँ भी अनुसूचित जातियों में सम्मिलित होने का प्रयास कर रही हैं।

आदिशास्त्र गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्’- सुखरहित क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर। भगवान राम कहते हैं-बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रन्थन्ह गावा।।भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण प्रभृति सभी महापुरुष भजन का अधिकार दो हाथ-पैर वाले मनुष्य मात्र को देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि शूद्र या वैश्य श्रेणीवाला स्त्री-पुरुष कोई भी हो, कहीं क्यों न जन्मा हो, मेरी शरण होकर निश्चित ही मुझे प्राप्त होता है, मोक्ष प्राप्त करता है; फिर क्षत्रिय और ब्राह्मण श्रेणी वालों के लिये तो कहना ही क्या है? उन्हें तो पार होना ही है क्योंकि क्षत्रिय भजन-पथ का क्रमोन्नत सोपान है न कि कोई जाति। इस श्रेणी पर पहुँचे साधक को पार होना ही है। भगवान उसे गिरने ही नहीं देते। यही भगवान गीता के अध्याय ग्यारह में अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि मेरे द्वारा पहले ही मारे हुए इन शत्रुओं को मार, यश प्राप्त कर, विजय तुम्हारी होगी। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू मुझमें निवास करेगा। यहाँ अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है। इसीलिये जैन-दर्शन की मान्यता है कि तीर्थंकर क्षत्रिय होते हैं जो स्वयं पावन हो तथा दूसरों को भी पावन करने की क्षमता वाला है, वही तीर्थंकर है। यदि सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत क्षत्रिय जाति की कुलीनता ही अभीप्सित है फिर तो जैनियों के लिये कैवल्य की कोई आशा नहीं प्रतीत होती; क्योंकि जैन समाज अब जाति-पाँति के भेदभाव से मुक्त है। उनमें अब कोई क्षत्रिय नहीं है फिर तीर्थंकर कहाँ से होंगे?

वस्तुत: वर्ण योग-साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। यदि योग साधना नहीं ज्ञात है तो या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९) जगतरूपी रात्रि में अचेत प्राणी है। योग साधना जागृत होने पर प्रारम्भिक अवस्था में साधक शूद्र है, विधि प्राप्त होने पर वैश्य, संघर्षशील क्षत्रिय  और विलय की योग्यता आने पर वही ब्राह्मण है। क्षत्रिय श्रेणी वाला निश्चित निर्विघ्न तीर्थंकर होते हैं। वह स्वयं पावन और दूसरों को पवित्रता प्रदान करने वाले होते हैं। अत: कोई किसी कबीले का हो, तीर्थंकर बनने के लिए योग-साधना से चलना ही होगा। गीतोक्त साधना को पकड़कर कोई भी तीर्थंकर हो सकता है।

।। ।।

(‘अहिंसा का स्वरूप’ से उद्धृत)

Q & A
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