श्रीरामचरित मानस में ‘अहिंसा’
भगवान शिव द्वारा विरचित, संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा भाषाबद्ध, जन-जन की जिह्वा पर विराजमान लोकविश्रुत अमरकृति श्रीरामचरित मानस में अहिंसा का स्पष्टीकरण उत्तरकाण्ड में है- परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। परनिन्दा सम अघ न गरीसा।। (मानस, ७/१२०-२२) मानस में अहिंसा को परम धर्म बताया गया है। ठीक यही निर्णय महाभारत में है- ‘अहिंसा परमो धर्म:।’
संसार में जीवों को मारना यदि हिंसा है तो अपने सुदीर्घ जीवन की अवधि में रावण ने जितनी हत्यायें कीं, मात्र चौदह वर्ष के वनवासकाल में भगवान राम ने वह कीर्तिमान तोड़ दिया। उससे कहीं अधिक जीवों का संहार, हत्या राम ने की। माना कि उन्होंने निशाचरों की हत्या की थी किन्तु वे थे तो मनुष्य ही। जनकपुर में सीता से विवाह के लिये वे आये थे। धनुष यज्ञ में उन्होंने भाग लिया था। सम्मानित नरेशों की पंक्ति में उन्हें स्थान मिला था। अतएव निशाचर भी मनुष्य ही थे, हमारे-आपके ही भाई थे। हाँ, उनकी वृत्ति आसुरी थी- किन्तु उनकी संख्या अपार थी।
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।। (मानस, १/१८०-२) उसने अपने असीम परिवार को देखा। ‘सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती।।’ पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवकों का समूह! निशाचरों की अनन्त जातियाँ! आजकल लगभग छ: अरब जनसंख्या है। इससे भी अधिक खरब, नील, पद्म, शंख, महाशंख और उससे भी अधिक, अगणित! किन्तु रावण ने जहाँ सीता का अपहरण किया, ‘रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।’ (मानस, ७/१०३-१०)- कुल में कोई अश्रु बहानेवाला अथवा जल तर्पण करनेवाला नहीं बचा। राम ने अपार निशाचरों का अन्त कर दिया।
भगवान राम बाल्यकाल में मृगया के लिये जाते थे। ऐसा नहीं था कि वह लूले-लँगड़े या अपाहिज मृग मारते रहे हों। वे कुचाँले भरते तेज मृगों का शिकार करते और उसे पिताश्री को दिखलाकर प्रोत्साहन प्राप्त करते थे। ‘पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।।’ (मानस, १-२०४-२)। क्षत्रियोचित कुल-परम्परा के अनुरूप आखेट करना उनका अभ्यास था। वनवासकाल में भी उन्होंने इस नियम को नहीं त्यागा। उन्होंने संन्यास ले लिया, मुनि-वेष धारण किया, वल्कल पहने किन्तु शिकार करना नहीं छोड़ा।
वनवास के आरम्भिक दिनों में सीता स्वजनों की स्मृति में आँसू बहा रही थी, लक्ष्मण क्रोध में तमतमा रहे थे, उस विषम स्थिति में भी रामजी ने चार मृगों का वध किया (आदिकाव्य, अयोध्याकाण्ड, बावनवाँ सर्ग, श्लोक १५२)। यही क्रम चौदह वर्ष तक चलता रहा। इस अनुपात से चौदह वर्षों में कितनी पशु-हत्या उनसे हुई? स्मृतियों का विधान देखें तो सियार मारने पर इतना दान! शेर मर गया तो तीन गाय का दान! नंगे पैर कितने कीटाणु मरे होंगे। स्मृतिकाल में जीव-हत्या हिंसा हो गयी। दान दो अन्यथा नरक और हत्या का भय! अहिंसा-जैसे यौगिक शब्द को बाह्य सामाजिक व्यवहार से जोड़कर स्मृतियों ने भारत को नपुंसक और कायर बना दिया। हर जीव की मृत्यु में भारतीयों को अपना नरक दिखायी दे रहा है। इस व्यवस्था ने भारतीयों को निहत्था कर दिया, उनका हाथ पीठ पीछे बाँध दिया।
विदेशों में मान्यता है कि विधर्मियों को मार डालें तो उन्हें स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग में रोजगार मिलेगा, ऊँचे पद मिलेंगे, ईश्वर के समीप रहने को मिलेगा। भारत में व्यवस्था है कि किसी को मार दिया तो पाप हो गया, नरक जाओ। ब्राह्मण को मारा तो तीस गाय, क्षत्रिय मारने पर बीस गाय, शूद्र को मारा तब भी दस गाय दान दें अन्यथा नरक आरक्षित है। भगवान एक और पाने के तरीके दो। कहीं कोई किसी को मार कर स्वर्ग जाता है, तो कहीं प्रायश्चित करना पड़ता है। इस प्रकार अहिंसा एक उलझा हुआ प्रश्न है।
वस्तुत: अहिंसा एक यौगिक शब्द है। समाज में दया सभ्यता का प्रतीक है। पालन-पोषण, सुरक्षा, संगठन का सामाजिक मूल्य है; किन्तु अहिंसा मूलत: योग का शब्द है। चित्तवृत्ति जब शान्त प्रवाहित हो जाती है, आत्मा का हनन करने वाले विकार जब शान्त हो जाते हैं उस समय साधक अहिंसा की कसौटी पर आ जाता है।
वनवासकाल में सीता ने राम से कहा, ‘‘देव! यह विलक्षण मृग है। बरौनियाँ सोने की, सींग सोने के, खुर सोने के- यह सर्वाङ्गीण स्वर्णिम है। इसे मारकर लायें, कुटिया सजाऊँगी अथवा इसे जीवित ही पकड़ लायें। जब हम अयोध्या लौटेंगे, यह रनिवास की शोभा बढ़ायेगा।’’ भगवान ने देखा कि सीताजी अब सोने से नीचे चरण नहीं रखना चाहतीं तो उन्हें सुवर्णमयी लंका में ही भेजने की योजना बना ली जिससे वे सुवर्ण सुख का उपभोग कर सकें; किन्तु वहाँ उन्हें जीभर रोने को आसूँ तक नहीं मिले। सुख न तो सोने में है न चाँदी में, सुख तो भगवान की सेवा में है। अस्तु, सीता के प्रस्ताव पर राम ने हिंसा-अहिंसा का विचार नहीं किया। वे उस मृग को मारने गये, उसे मारा भी; यद्यपि वह एक असुर निकला। जितने भी असुर मिले, राम ने सबका मूलोच्छेद कर दिया। फिर भी राम ‘श्रुति पथ पालक धर्म धुरन्धर।’ श्रुति मर्यादा के पोषक और धर्म की धुरी को धारण करनेवाले अहिंसक थे जबकि निशाचर हिंसक और पापी थे- ‘कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं विश्व परितापी।।’ (मानस, १/१७५-८) वे कृपारहित, सब हिंसक और पापी थे। कौन? रावण और उसका परिवार!
बरनि न जाइ अनीति, घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति, तिन्हके पापहि कवनि मिति।। (मानस, १/१८३)
हिंसाप्रिय लोगों के पापों की क्या कोई सीमा होती है? क्या थी उनकी हिंसा?
जेहि विधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। (मानस, १/१८२-५)
हिंसा है धर्म का उन्मूलन। वेद के प्रतिकूल आचरण हिंसा है। वेद का अर्थ है जानकारी। अविदित तत्व परमात्मा को विदित करना वेद कहलाता है। उसके विपरीत आचरण जिससे व्यक्ति परमात्मा को कभी विदित न कर सके, प्रकृति के अन्धकार में भटकता रहे, यही वेद-प्रतिकूल आचरण और धर्म का ह्रास ही हिंसा है। धर्म तब निर्मूल होगा जब धार्मिक संस्थान मिट जायँ, धर्मगुरु समाप्त हो जायँ। यही रावण ने किया- ‘जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।’ (मानस, १/१८२-६) जिन-जिन स्थानों में धेनु और ब्राह्मण पाये जाते, उन नगर-गाँव और पुर में आग लगा देना उनका आचरण था। उनका दोष इतना ही था कि संस्कृति के प्रचारक ब्राह्मणों को उन्होंने अपने गाँव-नगर में क्यों स्थान दिया जबकि रावण भी ब्राह्मण कुल-परम्परा का था।
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव विप्र गुरु मान न कोई।।
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।। (मानस, १/१८२-८)
धर्म तो तभी नष्ट होगा जब धार्मिक शिक्षा प्रतिबन्धित हो, शिक्षण संस्थान बन्द हो जायँ; वेद-पुराण-गीता सुनाई न पड़े। रावण ने इससे भी कड़ा कदम उठाया-
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।। (मानस, १/१८२ छन्द)
जप-योग-वैराग्य-भजन-चिन्तन में अनुरक्त किसी व्यक्ति को रावण देखता या सुन लेता तो अपनी सेना भेज देता या स्वयं दौड़ पड़ता। यज्ञ-विध्वंस कर देता था कि यह जप क्यों कर रहा है, तप क्यों कर रहा है, भजन क्यों कर रहा है? हमारे राज्य में ऐसा अपराध क्यों हो रहा है? जो भी ऐसा करते, रावण उन्हें अनेक प्रकार की यातनायें देता था। आजकल संदिग्ध व्यक्तियों की जाँच पुलिस जिस प्रकार करती है, कभी सिर नीचे, पैर ऊपर कर देते हैं; कभी लाल मिर्च का धुआँ देते हैं; कभी पेट से गुबरैला बाँध देते हैं। गुबरैला वज्रकीट की एक प्रजाति है जो कठोर मिट्टी को भी काटकर जमीन में प्रविष्ट हो जाता है, उसे पेट में खरोंचते कितनी देर लगेगी? फिर भी यदि कोई अपना हठ नहीं छोड़ता, भजन करना बन्द नहीं करता, तो रावण उसे देश-निष्कासन का दण्ड देता था। विधाता की सम्पूर्ण सृष्टि रावण का देश था- ‘ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्त्ती नर नारी।।’ विधाता की सृष्टि के बाहर कौन-सा देश था जहाँ रावण उन्हें निष्कासित करता? रावण के देश-निष्कासन का अर्थ था शरीर से प्राण का निष्कासन! शरीर से इस सृष्टि में जीने का अधिकार समाप्त! वह था मृत्युदण्ड।
निशाचरों में भी आहार के अनुष्ठान थे। जैसे महात्माओं में कोई फलाहारी, कोई शाकाहारी, कोई दुग्धाहारी तो कोई मट्ठा ही पीकर भजन करते हैं, उसी प्रकार निशाचरों में ‘दुर्मख सुर रिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।’ कोई अतिकाय था, कोई सुर रिपु, दुर्मुख तो कोई मनुज अहारी थे। वे केवल मनुष्य का आहार करते थे। पता नहीं किस डाक्टर ने यह सुपाच्य आहार उन्हें बता दिया! जहाँ रावण ने किसी का देश-निकाला दिया, मनुज अहारियों का काम बन गया। इस प्रकार धर्म का उन्मूलन हिंसा है।
राम धर्म की धुरी धारण करनेवाले थे। धर्म है क्या?-
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। परनिंदा सम अघ न गरीसा।। (मानस, ७/१२०-२२)
अहिंसा परम धर्म है, शाश्वत धर्म है। इसके आगे कोई धर्म नहीं है। यह अहिंसा सुरति से विदित होती है। सुरति मन की दृष्टि का नाम है। आप यहाँ बैठे हैं, छत्तीसों रंग बरस रहे हैं, मन मस्तिष्क स्थिर है। सहसा किसी ने कान में कह दिया कि बड़े भाई को चोट लग गई, गाड़ी थोड़ा छू गयी है, ऐसा सुनते ही बड़े भाई का स्वरूप स्मृति पटल पर कौंध जायेगा- भैया कैसे हैं? नाक कैसी है? उनका रोम-रोम दिखायी पड़ने लगेगा। यहाँ आँखें खुली हैं, कान खुले हैं किन्तु न तो यहाँ का दृश्य दिखायी पड़ेगा, न एक शब्द सुनाई पड़ेगा और भाई का स्वरूप दृष्टि पटल पर आता-जाता रहेगा। मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसकी वृत्ति कार्य करती है। मन की इसी दृष्टि का नाम सुरत है। इस दृष्टि को सब ओर से समेटकर इष्ट में लगाना सुरत-योग है।
‘सुरत’ शब्द वैदिक वाङ्मय का नहीं है। जन-सामान्य को विविध प्रकार से समझाने के लिए सन्तों ने ही श्रुति साम्य के रूप में इस शब्द का उपयोग किया है, श्रुति का ही तद्भव रूप सुरत है। वायु से भी तीव्रतर यह मन सुरत के माध्यम से सब ओर से सिमट कर अचल स्थिर ठहर जाता है। स्वाँस आई तो ओम्, गई तो ओम्, ओम्, ओम्-स्वाँस बाँस की तरह खड़ी हो जाय; चित्तवृत्ति स्वाँस में तैल धारावत् बहने लगे; न भले संकल्प उठें, न बुरे; वायुमण्डल का कोई भी संकल्प मन में प्रवेश न कर सके- यह है सुरत का विदित होना। यह मन की निरोधावस्था है। जिस क्षण सुरत विदित हुई, अचल स्थिर स्वाँस में टिकी, आत्मा का हनन करने वाले सारे विकार साथ छोड़ देते हैं। यही है विशुद्ध अहिंसा! आत्म-रक्षण ही अहिंसा है।
मन अत्यन्त वेगवान है, दुर्धर्ष है। हम-आप अपनी बुद्धि से इसे रोक नहीं सकते। मन कैसे रुके? ‘छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।’ (मानस, ७/४८-५) कीचड़ से लथपथ चादर को पुन: कीचड़ में धोया जाय तो गन्दगी कम होगी क्या? आवरण और भी घना हो उठेगा। मोटर-गाड़ी धोने पोछने वाले, कल-पुर्जा मरम्मत करनेवाले मिस्त्री नया वस्त्र धारण कर लें किन्तु कुछ ही क्षणों में गंदगी से भर जाते हैं। इसलिए बुद्धि से निर्णय ले यदि कोई साधना भी करता है तो कचरा ही एकत्र करता है; क्योंकि बुद्धि जहाँ तक निर्णय लेती है या मन कल्पना करता है, सब माया ही तो है- ‘गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।’ (मानस, ३/१४-३)। इन्द्रियों और उनके विषयों में मन जहाँ तक कल्पना करता है- ‘सो सब माया जानेहु भाई’- वह सब माया है, मात्र छलावा है।
बुद्धि और मन के अतिरिक्त आपके पास है ही क्या? यदि इनके द्वारा गणित लगाकर हम-आप भजन करें तो मन नहीं रुकेगा। माया के द्वारा माया कैसे रुकेगी? मन तभी रुकता है ‘मन बस होइ तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजे।’ जब प्रभु प्रेरक के रूप में उतर आयें, आपका मार्गदर्शन करने लगें। इसीलिए रामचरित मानस में है- ‘श्रुति पथ पालक धर्म धुरन्धर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।’ (मानस, ७/२३-२)। जिस प्रभु की हमें चाह है, सद्गुरु की शरण-सान्निध्य में हमारी पुकार ऐसी हो कि श्रद्धा से उनसे हमारा सम्बन्ध जुड़ जाय, आत्मा से अभिन्न होकर प्रभु जागृत हो जायँ तो ‘श्रुति पथ पालक’ साधन-पथ, योग-पथ, भक्ति-पथ इसकी सुरक्षा करने वाले हो जाते हैं राम! जहाँ सुरत में विजातीय संकल्प आने को होंगे उससे पहले ही भगवान सावधान करने लगेंगे कि गलत जा रहे हो, रुको! जब सुरत ठीक से लग जायगी तो कहेंगे- लगे रहो। चिन्तन ठीक है। रात दो बजे भगवान ही जगा देंगे कि उठो, बैठो, भजन करो। चिन्तन धारा निर्विघ्न शान्त प्रवाहित हो रही है तो भगवान उसे प्रोत्साहन देते हैं कि लगे रहो। इस अवस्था के पश्चात् बौद्धिक आकलन की आवश्यकता नहीं रह जाती कि भजन क्या, ज्ञान-विज्ञान कैसा, यम-नियम साधना के अंग-उपांग कितने? जोड़-गाँठ के समीकरणों की उपयोगिता नहीं रह जाती, बुद्धि मात्र यन्त्र रह जाती है। उस समय आज्ञा-पालन ही भजन है। अन्य कुछ भी न सोंचे, न यम का प्रयास करें न नियम की चिन्ता करें। केवल इतना करें कि प्रभु कहते क्या हैं, चाहते क्या हैं? उसे समझते रहें और लगे रहें। भजन की तालिका एक बार सुन-समझ लिया- वह याद तो है ही! प्रतिदिन वही दुहराने से क्या लाभ? इष्ट की आज्ञा का पालन ही भजन है। उन्हीं के निर्देश में चलते-चलते आपको भगवान शनै:-शनै: उस बिन्दु पर ला देंगे, जहाँ सुरत शान्त प्रवाहित हो जाती है, सुरत विदित हो जाती है। उस समय भजन के अतिरिक्त अन्य संकल्प उठते ही नहीं- न भले, न बुरे। जहाँ मन के निरोध की यह अवस्था आयी तत्क्षण इस निरोध के साथ प्रभु आपमें दृष्टि बनकर खड़े हो जायँगे, सामने स्वयं खड़े हो जाते हैं। आप नहीं समझोगे तब भी समझा देंगे। इसके साथ ही दर्शन, स्पर्श और प्रवेश मिल जाता है। यह है विशुद्ध अहिंसा। यही है परम धर्म, शाश्वत धर्म, सम्पूर्ण धर्म! इस अवस्था में धर्म पालन में किञ्चित् भी त्रुटि शेष नहीं है। धर्म की पराकाष्ठा है अहिंसा। अहिंसा एक स्थिति है, योग-साधना से मिलनेवाला एक स्तर है; वह भी प्राप्तिकाल में जाकर अहिंसा सम्भव होती है। कब? जब सुरति विदित हो जाय!
सुरति का महत्व प्रतिपादित करते हुए सन्त कबीर कहते हैं- ‘मोरि सुरत सुहागन जाग री।’ कबीर भजनानन्दी महापुरुष थे। वह कहते हैं- ‘का सोवत है मोह निशा में, उठि के भजनिया में लाग री।। मोरी सुरति सुहागन जाग री।।’ साधक सुहागन तब है जब भगवान के वरदहस्त के संरक्षण में आ जाता है। तभी उसका सौभाग्य सदैव उसके साथ है। ऐसा तब होता है जब भजन हृदय में जागृत हो जाता है, प्रभु रक्षक के रूप में खड़े हो जाते हैं। सुरत जग गई तो करें क्या? ‘चित दे सबद सुनो श्वासन लगि, उठत मधुर धुन राग री।’ सब ओर से चित को समेटकर, सचेत होकर लगें कि हमें कहाँ लगना चाहिए, कितना लग पा रहा हूँ, कितनी भूलें हो रही हैं? सचेतावस्था से शब्द सुनें! कौन-सा शब्द? पूज्य गुरुदेव महाराज जी कहते थे- स्वाँस नाम के अतिरिक्त अन्य कुछ कहती ही नहीं। हमें नाम जपना नहीं, केवल देखना है कि स्वाँस कब आई? क्या कहा? कब लौट कर गई? क्या कहा? इसे देखते रहें, सुनते रहें। स्वाँस आई तो ओम्, गई तो ओम्! ‘उठत मधुर धुन राग री।’– ईश्वरीय माधुर्य की रागिनी उठती रहती है, उसे सुनते रहें, उसी में आह्लादित होते रहें- ‘मस्त हुआ जब अनहद सुनकर तब क्या सुनना तूरों का।’। एक अन्य भजन में सन्त कबीर कहते हैं- माप-तौल की सीमा से बढ़कर भजन जब अनवरत (अनहद) होने लगता है तो सांसारिक वाद्य यन्त्र तूर्य (तुरही) इत्यादि के घोषों से प्रयोजन नहीं रह जाता। वही वे यहाँ भी कहते हैं कि ‘चित दे सबद सुनो स्वाँसन लगि उठत मधुर धुनि राग री। का सोवत है मोह निशा में……।’ मोहरूपी रात्रि में क्यों आगे-पीछे हो रहा है, भजन कर। प्रभु के प्रति समर्पण अनिवार्य है। इसीलिये अग्रेतर पंक्ति में वह कहते हैं- ‘चरन सीस धरि विनती करिहौ’– गुरु महाराज के चरणों में प्रणत होकर विनय करें और यदि कुछ कामना ही हो तो ‘भगति विमल वर माँग री।’ भक्ति का निर्मल वर उनसे याचना करें। विभक्त का अर्थ है विभाजन। प्रभु अलग हैं, साधक अलग है; यह है विभक्त। कल प्रभु के अंक में स्थिति मिलनी है, अगले पल ही स्थिति होनी है, अभी तो हम-आप प्रभु से विलग हैं। यह दूरी जब समाप्त हो जाय, दर्शन-स्पर्श, प्रवेश और स्थिति मिल जाय- यह भक्ति की पराकाष्ठा है, चरमोत्कृष्ट अवस्था है। विमल भक्ति वह है जिसमें प्रकृति के रञ्चमात्र मल की कल्पना नहीं है।
भजन करने की भी एक चर्या होती है। प्रात:-सायं कुछ क्षण ध्यान में बैठ जाना, नाम जप कर लेना और शेष समय में गप्प ठोंकना भजन नहीं है। इस पर संत कबीर भजन की आनुषंगिक सावधानियों पर बल देते हैं- ‘कहत कबीर सुनो भाई साधो! जगत पीठ दे भाग री।’– संतो! ध्यान दें। जगत् की ओर पीठ कर दें। संसार की ओर पीठ कर देने से परमात्मा, सद्गुरु सन्मुख हो जाते हैं। उस अवस्था में शनै:-शनै: न चलें, गति को तीव्र से तीव्रतर बनाते चलें। कुछ भजन, कुछ लोक-व्यवहार। तब उसने घर ही क्यों छोड़ा? करने वाले के पास समय कहाँ? जिसमें लगन नहीं, विरह-वैराग्य-तड़पन नहीं; उस साधक के लिये भगवान कहाँ? साधना तो करनी ही होगी।
अस्तु, विशुद्ध अहिंसा तब है जब सुरत शान्त स्थित ठहर जाय। इसके स्थिर होते ही, तत्क्षण भगवान का ही वातावरण रह जाता है, प्रकृति का वातावरण शान्त हो जाता है। ईश्वरीय आलोक उस समय मिल जाता है। भगवान आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जाते हैं, सामने स्वयं खड़े हो जाते हैं। आप नहीं समझते तब भी समझा लेते हैं। उनका दर्शन मिलेगा, स्पर्श मिलेगा; उनमें प्रवेश मिलेगा, स्थिति मिलेगी। प्रभु जब कृपा करते हैं तो अपना स्वरूप दे देते हैं। आपको जीव के रूप में अलग से कुछ टुकड़ा देकर, स्वर्गिक सुखों में लुभाकर छोड़ नहीं देते। आप जब स्वरूपस्थ होते हैं तो सदा रहनेवाला जीवन प्राप्त कर लेते हैं जिसके पश्चात् मृत्यु नहीं होती है। इस स्थिति को प्राप्त करना अहिंसा है जहाँ ‘काल न खाय कलप नहिं व्यापै, देह जरा नहीं छीजे।’ एक अन्य भजन में यही सन्त कबीर इस स्थिति का चित्रण करते हैं कि उस स्वरूप में परिवर्तन नहीं होता, वह जीर्ण-शीर्ण नहीं होता। सदा रहनेवाला जीवन और शान्ति जैसा महायोगेश्वर श्रीकृष्ण भी कहते हैं- ‘तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।’ (गीता, १८/६२)- परमशान्ति पा लोगे, उस निवास स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है।
समाज में जीवन और मृत्यु काल-क्रम की घटनाएँ है। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ की मृत्यु पर संवेदना व्यक्त करते हुए कुल-पुरोहित महर्षि वशिष्ठ ने कहा-
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।। (मानस, २/१७१)
जन्म लेना और मरना, हानि और लाभ, यश और अपयश- मनुष्य के हाथ में कुछ भी नहीं- यह सब प्रारब्ध के हाथ में है। ‘बिलखि कहेउ मुनिनाथ’- ज्ञानियों में अग्रगण्य वशिष्ठ भी बिलखने लगे। दशरथजी होनी से मरे, भावी से मरे। मौत भावी के हाथ में है। वह सारी भावी मिट जाती है, प्रारब्ध कट जाता है- समर्पण के साथ चिन्तन करने से, सद्गुरु की शरण जाने से! दुर्दान्त हत्यारा दस्यु ‘बालमीकि भये ब्रह्म समाना।’ वह ब्रह्मर्षि हो गये। भगवान जब वन गये ‘मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा। आसिरबाद बिप्रवर दीन्हा।।’ भगवान ने उन मुनिश्रेष्ठ को दण्डवत् किया, विप्र वाल्मीकि ने आशीर्वाद दिया। इसलिये भजन से सब सम्भव है। जीव-हत्या आपस के बदले हैं। अहिंसा तो तब है जब आत्मा- यह मरणधर्मा पुरुष अपने अमर तत्व को प्राप्त कर ले। भक्तिपथ में सर्वाङ्गीण साधना परिपक्व हो जाने पर यह स्थिति आती है। अहिंसा की अलग से कोई साधना नहीं है।
एक महात्मा रामेश्वरम् तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। मार्ग के घने जंगल में छ: दस्युओं ने उन्हें घेर लिया। महात्मा ने कहा, ‘‘जो कुछ मेरे पास है, आप ले लें।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमलोग पहले मारते हैं तब लेते हैं। हम परिश्रम की कमाई करते हैं, दान नहीं लेते।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘ठीक है, मरने से पहले आधा घण्टा भगवान का चिन्तन तो करने दें।’’
डाकू सहमत हो गये। महात्मा भजन में बैठ गये। उन्होंने भगवान से पूछा, ‘‘जब हम इन्हें सब कुछ दे रहे हैं, ये हमें मारना क्यों चाहते हैं?’’ भगवान ने बताया, ‘‘पिछले जन्म में तुमने इन सबको काटा था। यदि भजन न करते तो छ: अलग-अलग जन्मों में तुम्हें काटकर इनके बदले समाप्त होते। भजन का प्रभाव है कि वे सब तुम्हें एक साथ मिलकर काटना चाहते हैं। इनके हाथों तुम्हें केवल एक बार मरना होगा। इसके पश्चात् तुम्हारे लिये कोई विघ्न नहीं है। शरीर का क्या, वह तो पुन: मिलेगा, ठाठ से भजन करना।’’
भजन से निवृत्त होकर महात्मा ने कहा, ‘‘शीघ्र काटो।’’ दस्युओं को आश्चर्य हुआ- अभी तो आप जीवन के लिये गिड़गिड़ा रहे थे, अब आप बड़ी प्रसन्नता से जीवन क्यों देना चाहते हैं? महात्मा ने कहा, ‘‘उससे आप लोगों का कोई प्रयोजन नहीं है। आप सबकी समझ में वे बातें नहीं आयेंगी। आप लोग तलवार उठाइये और मुझे मार डालिए।’’ दस्युओं ने कहा, ‘‘आप जब तक यह रहस्य नहीं बतायेंगे हम आप को नहीं मारेंगे, और न जाने ही देंगे।’’
अन्तत: महात्मा को बताना ही पड़ा कि जब वह भजन कर रहे थे, भगवान ने उन्हें एक दृश्य दिखलाया कि आप सबकी हत्या हमने पूर्व जन्म में की थी। उसी का बदला भजन के प्रभाव से इस एक जन्म में समाप्त होने जा रहा है अन्यथा छ: बार जन्म लेते और काटे जाते।
दस्युओं ने पूछा- हम जो कर रहे हैं यह बदला है? तब तो आप भी हमें काटेंगे? महात्मा ने कहा, ‘‘वह तो है ही। यह सृष्टि बदलों का अन्तहीन सिलसिला है। क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई अन्त नहीं है।’’ दस्युओं ने कहा, ‘‘महात्मन्! अब हम आपको नहीं काटेंगे। हमें नहीं लेना है बदला। गलत कार्य करते, जंगलों में छिपते, पशुओं की तरह जीवन व्यतीत करते हम सबकी पर्याप्त आयु व्यर्थ व्यतीत हुई। अब आप हमारा मार्गदर्शन करें, भजन की विधि बतायें।’’
जिस दृढ़ता से वे आपराधिक कार्यों में लिप्त थे, उसी मनोयोग से वे चिन्तन में लग गये और अच्छे सन्त के रूप में परिणित हो गये। ऐसा कोई पाप नहीं जो भजन से न कट जाये। अत: बाह्य मारकाट आपस के बदले हैं, दु:खद भी है किन्तु अहिंसा से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। अहिंसा साधनापरक है।
।। ॐ ।।
(‘अहिंसा का स्वरूप’ से उद्धृत)