प्रश्न– महाराजजी ! आपकी वाणी सुनने से ऐसा प्रतीत होता है कि रामचरित मानस सबके अन्दर की वस्तु है। इसको समझने की कोई दिशा बतायें।
उत्तर– प्रत्येक मानव बाहर खड़ा है एवं वहीं से सिमटकर शनैः-शनैः अन्दर की जानकारी प्राप्त करता है। अतः ऐसा नहीं समझना चाहिए कि बाहर वाला व्यक्ति गलत है। भगवत्-पथ की एक सीमा को पार कर लेने पर भजन के वास्तविक स्वरूप की जानकारी उसे होने लगती है। ऐसी स्थिति के बाद मानस की एक भी चौपाई का उपयोग बाहर नहीं रह जाता। जैसा कि-
बालमीक नारद घटजोनी।
निज निज मुखनि कही निज होनी।। (मानस, 1/2/3)
मानस के प्रथम रचयिता एवं मानस के विशेषज्ञ इन महापुरुषों ने अपने-अपने मुखों से अपनी-अपनी होनी को व्यक्त किया है, न कि अन्य किसी राम एवं उनकी कथा को। शीर्षक का विस्तार अन्दर की पंक्तियों में हुआ करता है। उदाहरण के लिए, यदि पुस्तक का नाम ‘घर का डाक्टर’ है तो उसके अन्दर दवाइयों का ही विवरण रहेगा। उसमें यदि हम कर्मकाण्ड और देश-नीति खोजें तो नहीं मिलेगी। गोस्वामीजी की इस रचना का नाम है ‘रामचरितमानस’, जिसका अर्थ होता है- राम के वे चरित्र, जो अन्तःकरण में समाहित हैं। अब आप ही बतायें कि राम का घर हृदय है या पुस्तक? भगवान का घर हृदय ही बताया गया है। जैसा कि-
जिन्ह के कपट दम्भ नहिं माया।
तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया।। (मानस, 2/129/2)
भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। (मानस, 2/127/5)
इसी प्रकार सम्पूर्ण मानस में भगवान के रहने के जितने भी स्थल बताये गये हैं, वे सभी हृदय अथवा विशेष अवस्थावाले अन्तर्मन हैं। सम्पूर्ण मानस में यही रूप है। अतः यह हृदय की वस्तु है। कृतिकार के शब्दों में इसका शीर्षक है ‘रामचरितमानस’ अर्थात् राम के वे चरित्र जो अन्तःकरण में समाहित हैं। मानस का अर्थ मानसरोवर नहीं हुआ करता।
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोये।
ते कायर कलि काल बिगोये।। (मानस, 1/42/7)
अर्थात् मानस एक ऐसी वस्तु है जो धोयी भी जा सकती है। कलियुग के भयंकर वेग को देखकर भगवान शंकर ने विचार किया कि मानव की बुद्धि विकल है। यदि उन्हें साक्षात् भगवान भी मिल जायेंगे तो वे उनसे उदरपूर्ति ही करायेंगे। बुद्धि कुण्ठित है अतः पूर्व साधनक्रमों से कल्याण नहीं हो सकता, इसीलिए द्रवित होकर कल्याणकारी साबर मंत्र की रचना की।
कलि बिलोकि जगहित हर गिरिजा।
साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।। (मानस, 1/14/5)
कलि के भयंकर प्रवाह को देखकर शंकर जी ने साबर मंत्र की रचना की जो जगत् के लिए कल्याणकारी है। वह साबर मंत्र है कैसा?-
अनमिल आखर अरथ न जापू।
प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। (मानस, 1/14/6)
न तो अक्षरों की ही संगति बैठती है और न अर्थ-जाप का ही कोई सिलसिला है। तब तो सिद्व हुआ कि यह निरर्थक है; किन्तु शंकर जी के प्रभाव से प्रत्यक्ष फल देने की यदि क्षमता है तो साबर मंत्र में। कलियुग में दूसरा कल्याण का कोई उपाय नहीं है। इसलिए उन्होंने स्पष्ट व्यक्त किया है कि-
सो उमेस मोपर अनुकूला।
करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। (मानस, 1/14/7)
वही शंकरजी मुझपर अनुकूल हैं अतः यह कथा मैं कल्याणहेतु कहने जा रहा हूँ। इस कथा को सर्वत्र एवं सभी से नहीं कहना चाहिए। जैसा कि-
यह न कहिअ सठही हठसीलहि।
जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।
जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ।
सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। (मानस, 7/127/3-5)
यह हठधर्मी, कामी एवं क्रोधी के प्रति नहीं कहना चाहिए। भला आप ही बताइए कि इन दोषों से रहित हृदय कितने मिल सकते हैं? यहाँ तक कि इन दोषों से युक्त इन्द्र के समान प्रतिभाशाली पुरुष के प्रति भी नहीं कहना चाहिए। जब इन्द्र के समान प्रतिभाशाली होगा तो हजार-पाँच सौ विद्वानों को बुलाकर सुन लेगा। जब घर-घर में रामचरितमानस (रामायण) है तो न कहने का क्या सवाल है। यदि एक-एक चौपाई में हम बहुत से अर्थ करें तो भी कहने-सुननेवाली बात से वंचित रह जाते हैं क्योंकि यह साबर मंत्र है। जैसा कि-
राम कथा के तेइ अधिकारी।
जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।
गुर पद प्रीति नीति रत जेई।
द्विज सेवक अधिकारी तेई।। (मानस, 7/127/6-7)
रामकथा के अधिकारी वे ही हैं जिन्हें सत्संग अति प्रिय है और गुरु के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, उनके द्वारा निर्धारित नीति अर्थात् साधना-पद्धति में जो रत हैं, साथ ही द्विज के सेवक हैं, वही इसके अधिकारी हैं। यह शीघ्र समझ में आनेवाली वस्तु नहीं है बल्कि अधिकारी पाकर शनैः-शनैः हृदय-देश में ढलने लगती है।
मैं पुनि निज गुर सन सुनी, कथा सो सूकर खेत।
समुझी नहिं तसि बालपन, तब अति रहेउँ अचेत।। (मानस, 1/30 क)
प्रत्येक शास्त्र के तीन अर्थ हुआ करते हैं- रोचक, भयानक और यथार्थ। रोचक का अर्थ जो रुचि पैदा करनेवाला हो, जैसे-रामलीला इत्यादि। भयानक उसे कहते हैं, जो प्रकृति से भय पैदा करनेवाला हो। जिस अर्थ से भय प्रकट और निवारण-हेतु हम भगवान की आवश्यकता समझें एवं प्राप्ति का उपाय करने लगे। यथा-
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।
सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सद्गुर दृढ़ नावा।
दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।। (मानस, 7/43/7-8)
जो न तरै भव सागर, नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति, आत्माहन गति जाइ।। (मानस, 7/44)
जो ऐसे तन को पाकर खो देता है, वह अपनी आत्मा का हत्यारा है।
काल रूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। (मानस, 7/40/5)
उनके लिए मैं ही कालरूप बन जाता हूँ। जिनसे मोक्ष की आशा है जब वही कालरूप बन जाते हैं तो भय का संचार होता है और किसी-न-किसी रूप में उसे प्राप्त करने के उपाय होने लगते हैं। यथार्थ का ऐसा स्वरूप है जैसा कि हमने सुना है, वैसा प्रत्यक्ष अपने में देखता भी जाय। उत्पत्ति से पूर्तिपर्यन्त की लीला हमें दिखाई पड़े, रटना दूसरी चीज है। यह तभी सुलभ हो सकता है, जब किसी महापुरुष का साक्षात्कार हो। इन्हीं का रूप पकड़ने से परम चेतन की जागृति सम्भव है। सभी अधिकारी की योग्यता पा जाएँ, ऐसा कदापि सम्भव नहीं। निरन्तर पढ़नेवाले भी डिग्री का अधिकार खो बैठते हैं। इसलिए महापुरुषों ने शास्त्र को तीन भागों में रचा है। यदि आप प्रवेशिका में हैं तो मानस के अध्ययन से दिशा मिलेगी। यदि आपकी स्थिति सूक्ष्म है तो यही प्रत्यक्ष दर्शाते हुए राम की स्थिति से अवगत करा देगा। अब रही बात यह कि मानस की अन्तिम क्रिया हम कैसे समझें?
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।। (मानस, 1/सोरठा, 5/5)
गुरु महाराजजी के चरणों की ज्योति मणि-माणिक्य के तुल्य है। उनके स्मरण से हृदय में दिव्यदृष्टि का संचार होता है।
बड़े भाग उर आवइ जासू।। (मानस, 1/सोरठा, 5/6)
वे बड़े भाग्यशाली हैं, जिनके हृदय में ध्यान के द्वारा गुरु के चरण आ जायँ।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के।
मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।। (मानस, 1/सोरठा, 5/7)
इस प्रक्रिया-विशेष के द्वारा ही आँखें खुलती हैं जिससे कि रामचरितमानस प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। ध्यान में सदगुरु के चरण आ गये तो-
जथा सुअंजनि अंजि दृग, साधक सिद्ध सुजान। (मानस, 1/1)
याद रखें कि गोस्वामीजी ने श्री गुरुदेव के चरण-रज को अंजन-विशेष की संज्ञा दी है, जो हृदय के नेत्रों को खोलनेवाला है; किन्तु यह तभी सम्भव है जब चरण ध्यान में आ जायँ। यह भगवत्-चिन्तन में लगे हुए साधक के लिए ही सम्भव है, जिनकी संख्या औसतन बहुत कम है। अतः चिन्तन में प्रवृत्त साधक ही उसको प्राप्त करता है और उसके बाद सिद्ध और सुजान हो जाता है। उस अंजन का स्पर्श कर, जो लिखने में आ गया है एवं जो लिखने में नहीं आया है, वे सब प्रत्यक्ष हो जाते हैं। कारण कि मनोगत सम्पूर्ण भाव लिखने में नहीं आते। गोस्वामीजी अन्त में इसी निर्णय पर पहुँचते हैं कि मैं इतना ही लिख पाया हूँ, जैसे कि आकाश में मक्खी उड़ती है और थाह नहीं पाती।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)