प्रश्न – मंत्र क्या है?
उत्तर – मंत्र परमात्मा का नाम है, वाचक है, सम्बोधन है, नाम-जप से मिलनेवाली स्थिति है। परमात्मा का बोध करानेवाले किसी दो-ढाई अक्षर के नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है। आरम्भ बैखरी से है। इससे उन्नत क्रमश: मध्यमा, पश्यन्ती और परा की श्रेणियाँ हैं। वायु से भी तीव्र गति से चलनेवाला मन परावाणी के प्रवेशकाल में सब ओर से सिमटकर नाम के अन्तराल में स्थान पा जाता है, तब यह साधारण-सा नाम मंत्र की संज्ञा पा जाता है। मंत्र एक अवस्था है। ‘मन अंतर स मंत्र’– जिससे अपने अन्तराल में मन स्थिर हो जाय, मंत्र है। मन विषयों से कभी तृप्त नहीं होता– ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ (मानस, ६/१०१/१)। विषयों में विचरते हुए यह मन कभी स्थिर नहीं होगा। नाम को मंत्र बनाने के लिए श्रद्धा के साथ प्रभु के नाम का जप करें।
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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)