एक बार हरि घोड़ा भये

एक बार हरि घोड़ा भये

(गुरु महाराज जब विचरण काल में मधवापुर थे) झाड़ियों के पार उधर मधवापुर गाँव था। लड़के स्कूल जायें तो उनकी निगाह पड़ गयी। एक ने कहा– पगला बैठा है, मारो। तो गिट्टी उठा-उठा के सड़क के किनारे की मारा करे। कोई गिट्टी इधर पड़े, कोई उधर पड़े, वो चले जायें। आहिस्ते-आहिस्ते लड़के हो गये ढीठ। एक लड़का एकदम पास आके पीठ में मारा तो गिट्टी लगी छपाक पीठ में। महाराज सोचे– यार, अब तो लड़के ढीठ होते चले जा रहे हैं। खड़े होकर बिगड़े– धत् तेरी लड़कन-पड़कन की सार! बस लड़का एक में दो-दो, चार-चार उलझ के गिर पड़े सड़क पर। सड़क किनारे गर्दा होता है न बैलगाड़ियों के चलने से। उस समय कारें कहाँ थीं? कार केवल एक थी मनिकापुर नरेश के पास। और कहीं नहीं। वो गिर पड़े। बैलगाड़ियों का जखीरा चलता था। तो फिर वो गड़-गड़ देना गिर पड़े। भाग के गये घर, माई की गोद में छिप गये और बोले– पगला मारा! पगला मारा! पगला मारा! लोग बोले– सब लड़का गिनो रे, सब आ गये कि कुछ मार डाला। गिना तो लड़के सही थे सब। फिर लाठी लेके वे बोले– दौड़ो रे, इधर से घेरो, इधर से घेरो, चारों तरफ से घेरो। जब काण्ड किया तो भागता होगा।

चारों तरफ से घेराव डाला। महाराज तो बैठे थे। फिर घेरकर सब आये। लाठी महाराज के सिर तक ले जायँ, बोले– मार, मार रे, तब बोली। फिर उन्होंने कहा– कहीं संत न हो यार! संत की पहचान तो रामपदारथ सिंह कर सकते हैं। वे बहुत संतों की सेवा किये हैं, उनको बुलाओ।

उन ठाकुर साहब को बुलाया गया। आते ही उन्होंने महाराज के सामने एक दोहा कहते हुए दण्डवत् किया-

एक बार हरि घोड़ा भये, ब्रह्मा भये लगाम।

चाँद सूरज रविका भये, चढ़ गये चतुर सुजान।।

महाराज ने हाथ उठाया, आशीर्वाद दिया। वे बोले– भगवन्! इस दोहवा का अर्थवा बताय देत्यौ।

महाराज बोले– मन ही घोड़ा है। ये वायु से तेज चलनेवाला है।

तुलसीदास (मन) बस होहिं तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजे।’ (विनय० ८९)

मन को मनुष्य अपने से वश में नहीं कर सकता। छूटइ मल कि मलहिं के धोएँ’ (मानस, ७/४८/५)– मल में लथपथ चद्दर मल से कभी नहीं धुलता। मल गाढ़ा होता चला जाता है। मनुष्य के पास है क्या? मन है, बुद्धि है, इन्द्रियाँ हैं। ये तभी वश में होती हैं जब भगवान खुद प्रेरणा करके खड़ें हो जायँ, मन की लगाम पकड़ के खुद ले चलें। उनके निर्देशन में, संरक्षण में चलते हुए मन सिमटते-सिमटते एक दिन स्थिर हो जाता है, वश में हो जाता है।

मन ही घोड़ा है- हरि घोड़ा भए’ब्रह्मा भये लगाम’– बुद्धि ही लगाम है। बुद्धि की लगाम भगवान जब अपने हाथ में ले लें। चाँद सूरज रविका भए’– इंगला और पिंगला…. ये दाहिने स्वर का नाम सूर्य नाड़ी, बायें का चन्द्र नाड़ी। यही रकाब है जिस पर पैर रखकर लोग घोड़े पर सवार होते हैं। चढ़ गये चतुर सुजान’– जो चतुर है, वास्तविकता के ज्ञाता, वे चढ़ जाते हैं। साँस आयी तो ‘रा’ गयी तो ‘म’। ‘रा’…‘म’ के बीच में कबिरा रहा लुकाय। इस प्रकार चिन्तन करते हुए भगवान के निर्देशन में जब मन चलने लगता है एक दिन अचल, स्थिर ठहर जाता है। चढ़ गये चतुर सुजान’– चतुर सुजान इस मन पर असवार हो जाते हैं।

अब बिगड़ा बुढ़वा– नालायकों, सात दिन से भूखे-प्यासे महात्मा पड़े हैं, गाँव का सर्वनाश हो जायेगा। जल्दी जाओ, दूध लाओ हमारे यहाँ से दौड़ के। फिर दूध आया, फिर दही आया गाँवभर सेवा में लग गये। चतुर्मासा शुरू हो गया।

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(‘अनुसुइया के परमहंस जी’ से उद्धृत)

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