प्रश्न– आश्रम घोर जंगल में है, कोई रास्ता भी नहीं है। अतः दस बजे के पूर्व किसी भी यात्री का पहुँचना असम्भव है। एक बार कुछ सशस्त्र दर्शनार्थियों ने बहुत सुबह ही पहुँचकर प्रणाम इत्यादि किया, तब महाराजजी ने कहा कि इतनी जल्दी कैसे आ गये? वे उत्तर देते हुए कहे कि महाराजजी, हम लोग शिकार के लिए आये थे। कुछ मिला नहीं तो सोचे कि महाराजजी का दर्शन ही कर लें। इस पर आप बोल पड़े– तुम अहीर, तुम ठाकुर, पर तुम ब्राह्मण होकर यह क्या कर रहे हो? तब वे अति विनम्र शब्दों में बोले कि भगवन्! इसमें मेरा क्या दोष है? ‘उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन’ (मानस, 7/112/1) उनकी प्रेरणा के वगैर पत्ता भी नहीं हिलता, मैं तो उन्हीं के हाथों का यंत्र हूँ।
उत्तर– देखो, इस मानस में तो बहुत कुछ लिखा गया है, उन सभी स्थलों पर विचार करना चाहिए।
किस स्थिति में भगवान प्रेरणा करते हैं और किस विडम्बना में माया। सबके लिए कहीं मोह प्रेरणा करता है तो कहीं काम, कहीं काल प्रेरक है तो कहीं स्वभाव और गुण। ऐसी दुविधा में भगवत्-प्रेरणा का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जहाँ वासनाओं का ही बाहुल्य है, वहाँ तो-
फिरत सदा माया कर प्रेरा।
काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। (मानस, 7/43/5)
जब तक भगवत्-पथ की एक निर्धारित सीमा को नहीं पार कर लेते तब तक माया ही प्रेरक है और उस सीमा को पार कर लेने के बाद भगवान प्रेरक बन जाते हैं। अतः साधन, चिन्तन में संलग्न रहना चाहिए जिससे कि वे प्रेरक बन जायँ। भगवान के प्रेरक बन जाने पर साधक को माया का भय नहीं रह जाता। जैसा कि-
‘करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।’ (मानस, 7/115/7)
‘माया खलु नर्तकी बिचारी।।’ (मानस, 7/115/4)
कागभुशुण्डि अनेक जन्मों से चलनेवाले पथिक थे। अबकी बार वे भक्त की श्रेणी में आये। उनका प्रत्येक कदम भगवत्-प्रेरणा पर उठता था। उनमें जो कमी थी, उसे महामुनि लोमश में प्रेरणा कर भगवान ने पूरी कर दी। भरत ने खड़ाऊँ व चरणों के ध्यान के माध्यम से भगवत्-प्रेरणा प्राप्त कर राज्य का कार्य सँभाला। लक्ष्मण का भी कार्य प्रेरणा पर ही आधारित था। अतः कागभुशुण्डि, भरत, लक्ष्मण और हनुमान आदि कुछ ही सदस्य ऐसे थे, जिनके उर में भगवान प्रेरणा करते थे। आकाश में फेंका हुआ पत्थर पृथ्वी के ऊपर आकर गिरता है। यदि इसके गुरुत्वाकर्षण के बाहर फेंक दिया जाय तो पृथ्वी पर न आकर अन्य ग्रहों पर चला जायेगा। इसी प्रकार भगवान और माया के बीच एक ग्रेवटी की सीमा है, जिसके पूर्व माया प्रेरणा करती है और बाद में भगवान। इसके बाद हम गिरना भी चाहें तो नहीं गिर सकते। जिस प्रकार नारद गिरना चाहते हुए भी भगवत्-प्रेरणा से बच गये।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)