प्रश्न – ईश्वर का निवास कहाँ है?
उत्तर :- अर्जुन ने यह प्रश्न नहीं किया था। लगता है इतना सूक्ष्म प्रश्न करने की क्षमता नहीं थी। इसीलिये गीता के समापन से पूर्व जब अर्जुन प्रश्न करके शान्त हो गया, भगवान ने यह प्रश्न स्वयं उठाया और पूछा, ‘‘अर्जुन! जानते हो, भगवान कहाँ रहते हैं?’’ स्वयं ही उन्होंने इसका उत्तर भी दिया-
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। १८/६१
अर्जुन! वह ईश्वर, परमतत्त्व परमात्मा समस्त भूतों के हृदय-देश में निवास करता है। भूत का अर्थ प्राणी होता है अर्थात् ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय-देश में निवास करता है।
‘भूत’ वैदिककाल का बहुत सम्मानित शब्द है। भूत अर्थात् प्राणी। ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय-देश में निवास करता है। हृदय के अन्दर इतना समीप है फिर भी लोग देखते क्यों नहीं? भगवान कहते हैं- लोग मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिये नहीं देख पाते। मायारूपी यन्त्र में वे स्वयं दौड़कर चढ़ जाते हैं। कितना भी समझाएँ, दिनभर ज्ञान सुनेंगे लेकिन कोई न कोई पैतरा भाँजकर सुरा-सुन्दरी में उलझ जायेंगे।
जब ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान कहते हैं-
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। गीता, १८/६२
अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। ‘सर्वभावेन’– सम्पूर्ण भावों से जाओ। थोड़ा भाव संकटमोचन, थोड़ा भाव पशुपतिनाथ, कुछ भाव वैष्णव दैवी, कुछ भाव बम्बा देवी, कुछ मैहर देवी, कुछ गड़बड़ा देवी- हमारा तीन चौथाई भाव तो बिखर गया। मन एक है, उसका भाव इतनी जगह वितरित हो गया। भगवान के लिए स्वल्प अंश ही बचा पाये। इस प्रकार से कल्याण नहीं होगा। सम्पूर्ण भावों से हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ।
मान लें, हमने सारी मान्यतायें तोड़ीं और हृदयस्थित ईश्वर की शरण चले ही गये तो उससे लाभ क्या होगा? ‘तत्प्रसादात्परां शान्तिं’– उसके कृपा-प्रसाद से परमशान्ति को प्राप्त कर लोगे और ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– उस निवास स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। तुम रहोगे और तुम्हारा निवास शाश्वत रहेगा।
रूढ़ियाँ सुदीर्घ परम्परा से चली आ रही हैं। ये हमें विरासत में मिली हैं। बचपन से ही माताएँ बच्चों से कहती हैं, ‘अगरबत्ती जला, यह भुइयाँ रानी हैं, यह चौरा माँ, यह डीह, यह कुल देवता भैरव!’ बड़े होते-होते बच्चों के मन में एक रील तैयार हो जाती है, जड़ता पकड़ लेती है, इसीलिये भाव बिखर जाता है। भगवान कहते हैं- इन भावों को समेटकर हृदयस्थित ईश्वर की शरण में जाओ। ये पूर्वाग्रह शीघ्र पीछा नहीं छोड़ते। यदि पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सर्वभाव से शरण में गये तो उनकी कृपा से परमशान्ति, सदा रहनेवाला धाम, अनन्त जीवन, अमृतमय पद और समृद्धि प्राप्त कर लेंगे – इसी का नाम निजस्वरूप है।
हदय स्थित ईश्वर को हमने देखा नहीं तो शरण किसकी जायँ? श्रीकृष्ण ने कहा- मेरी शरण में आ जाओ अर्थात् किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण जाओ।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *