आस्तिकता के नाम पर…..
जो नश्वरों के पीछे भटक रहा है, नश्वरों की पूजा करता है, वही नास्तिक है।
जो अस्तित्व का उपासक है, जो एकमात्र परमात्मा के प्रति श्रद्धावान् है, वही आस्तिक है।
श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द द्वारा प्रकाशित पुस्तिकाओं पर (विशेषकर ‘वर्ण व्यवस्था’, ‘पशु गाय धर्म नहीं’ और ‘सनातन-धर्म’ पर) आक्षेप करते हुए वाराणसी के श्री मस्तरामजी ने एक विरोध-पुस्तिका ‘नास्तिकों से सावधान’ नामक शीर्षक से प्रकाशित की है। पुस्तिका में आपका कहना है कि जाति-पाँति ही सनातन-धर्म है- यह वेद में लिखा है। जिसने संस्कृत और वेद का अध्ययन नहीं किया, वह धर्म नहीं जान सकता। वेद के रक्षक ब्राह्मण हैं, इसलिए ब्राह्मणों की रक्षा के लिए भगवान अवतार लेते हैं। वेद में यज्ञ की आवश्यकता पर बल दिया गया है, यज्ञ में पंचगव्य के लिये गाय जरूरी है, इसीलिये गाय धर्म है।…. इत्यादि।
इन कथनों को विचार-बिन्दु बनाने से पूर्व लेखक महोदय की भाषा-शैली पर दो शब्द कह देना अप्रासंगिक न होगा। परम्परागत दुरूह भाषा और लम्बी भूमिका बाँधने के पश्चात् उन्होंने जो प्रश्न उठाये हैं, उन्हें प्रश्न की संज्ञा देना भी असंगत होगा; क्योंकि उनके लेखन में सिद्धान्तगत आपत्तियाँ अत्यल्प, व्यक्तिगत कटूक्तियाँ ही अधिक हैं। उन्होंने इस सम्बन्ध में काफी श्रम किया है कि पूज्य परमहंसजी और उनके शिष्य कैसे हैं और लेखक के गुरु कैसे थे।
लेखक महोदय ने जगह-जगह याद दिलाया है कि परमहंसजी गाँजा पीते थे। मैं आपको बताना चाहूँगा कि गाँजा उनके लिए दवा के रूप में थी। अपने किसी शिष्य को उन्होंने गाँजा पीना नहीं सिखाया। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण हो जाते हैं। गीता में है-
आपूर्यमाणमचल प्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।। (गीता, २/७०)
अर्थात् भयंकर वेग से बहनेवाली हजारों नदियाँ हरहराते हुए बड़े वेग से समुद्र में गिरती हैं, किन्तु समुद्र को न एक इंच ऊपर उठा पाती हैं और न गिरा पाती हैं बल्कि उसी में समाहित हो जाती हैं। ठीक इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ महापुरुष के प्रति सम्पूर्ण भोग उतने ही वेग से आते हैं किन्तु उनमें समाहित हो जाते हैं। ऐसे समुद्रवत् स्थितप्रज्ञ महापुरुष परमहंसजी का नाम उछालना अपने को ही कलंकित करना है। ठीक इसी प्रकार करपात्रीजी को हम पूर्ण आदर देते हैं। प्रयाग से काशी तक डेढ़ वर्ष निराधार विचरण के दौरान मात्र हथेली पर आनेवाले स्वल्प भोजन पर निर्वाह करके ‘करपात्री’ की ख्याति अर्जित की। वे त्यागी, विरक्त, निस्पृह और सरल महात्मा थे। कर्मकाण्ड और गद्दियों की पैरवी तो उनसे करवायी गई थी, उनका कोई दोष नहीं था। लेखक महोदय ने ऐसे महापुरुष का नाम विवाद के घेरे में क्यों घसीट लिया? जिस समय परमहंसजी ने करपात्रीजी को चित्रकूट में रामराज्य परिषदीय दलगत राजनीति में आने के लिए मना किया था, उस समय करपात्रीजी आयु में परमहंसजी के बच्चे के समान थे। महाराजजी को उन्हें कहने-सुनने-समझाने का पूरा हक था। महान् लोगों की बात है, उसे आपने अपने लिये अपमानजनक कैसे मान लिया? इतनी मात्र घटना से पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं होना चाहिए।
इसी प्रकार कृति की समीक्षा में लेखक के नाम को तोड़-मरोड़कर सम्बोधित करना समीक्षा की किस मान्य विधा के अन्तर्गत है? ऐसा करके विद्वान् लेखक ने (सुना है कि वे वेदान्ताचार्य भी हैं) सामान्य शिष्टाचार के स्थान पर वैचारिक बौनेपन का ही परिचय दिया है। ‘जो रहे करवा वहीं बहे टोंटी’। उन मान्यवर ने जिन विशेषणों या भाषा का प्रयोग किया है, वह सन्तों या विद्वानों की भाषा प्रतीत नहीं होती। आदि शंकराचार्य ने कहा था- ‘जयति परमहंसो मुक्तिभावं समेति’ और इन सज्जन के वाक्य हैं- ‘वाह रे परमहंसी पोपलीला!’ मजे की बात तो यह है कि वे अपने को काशी विद्वत्परिषद् का अध्यक्ष भी मान बैठे हैं। अस्तु व्यक्तिपरक मूल्यांकन को यही विराम देकर हम प्रकरण पर आते हैं।
आश्रम से प्रकाशित पुस्तिकाओं में धर्म के नाम पर प्रचलित रूढ़ियों का खण्डन किया गया है; किन्तु इन लेखक महोदय ने ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह…’ (गीता, २/४१) श्लोक में विपक्षियों के अर्थ को भी हमारा मत मान लेने की भूल की है। हमारा दुर्भाग्य है कि इतनी स्पष्ट बात भी वे समझ नहीं पाये। उन्होंने पुस्तिकाओं पर जितनी आपत्तियाँ उठायी हैं, उन सबका उत्तर पर्याप्त विस्तार से उन्हीं पुस्तिकाओं में है। लगता है कि उन्होंने उन पुस्तिकाओं को आद्योपान्त पढ़ा नहीं- यदि पढ़ा है तो सम्पूर्ण पुस्तिका में जितने प्रमाण दिये गये हैं, ससन्दर्भ उन सबका खण्डन करना चाहिये था। उन्हें बताना चाहिये था कि हमारा कौन-सा कथन वेद की किस ऋचा के विरुद्ध है और हमने जिन ऋचाओं को दिया है क्या वे वेद में नहीं हैं?
आरम्भ में ही एक स्पष्टीकरण आवश्यक है। लेखक को यह भ्रम है कि जिस धर्म की चर्चा हमने की है वह हम अथवा हमारे गुरुदेव से पहले नहीं था, जैसे हम कोई नया धर्म चलाने जा रहे हों! जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। हम तो कहते हैं कि संसार भर के लोगों का धर्म एक ही है- सनातन-धर्म! कैसा हमारा? कैसा आपका? कैसा सम्प्रदाय? कैसा नया? कैसा पुराना? हम ठीक वही चाहते हैं जो वैदिक ऋषियों ने बताया है, जो उपनिषदों में है, भगवान शिव, भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण ने जिसे दृढ़ाया है। गीता में उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा है। अध्याय तेरह में वे कहते हैं, ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः।।’ (१३/४)- जो ऋषियों द्वारा कहा गया, जो वेद में है, जो ब्रह्मसूत्र के पदों में है, वही सब अकेले गीता में है। महात्मा बुद्ध, महावीर, मूसा, ईसा, मुहम्मद, कबीर और नानक – इन सबकी मूल शिक्षा, सबका धर्म एक ही है, कहीं कोई अन्तर नहीं है। धर्म को इसी शुद्ध रूप में जन-जन को बताना हमारा उद्देश्य है।
धर्म हमेशा से एक ही है। उसमें कुरीतियों के समावेश से जब सामाजिक विषमता बढ़ जाती है, तो कोई महापुरुष उसे समता के धरातल पर ला देता है। समानता देता है इसलिये सम्प्रदाय कहलाता है। सम्प्रदाय कोई नया धर्म नहीं बल्कि विकृतियों के परिमार्जन का एक संगठित प्रयास मात्र है। मानव का दुर्भाग्य है कि जब किसी ने सच बताना चाहा, तो परोपजीवियों ने उन्हें नया कहकर समाज को सत्य से परिचित नहीं होने दिया। उन्हें भय था कि लोग सच जान जायेंगे, तो उनकी रोजी-रोटी चली जायेगी। उनका भय सुरेन्द्र के भय की तरह अकारण है, जिसके लिये गोस्वामीजी ने कहा है-
सूख हाड़ लै भाग सठ, स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़, तिमि सुरपतिहि न लाज।। (मानस, १/१२५)
* सर्वप्रथम तो उनका शीर्षक ही आपत्तिजनक है, जिसमें उन्होंने हम सब पर नास्तिक होने का फतवा जारी कर दिया है। आस्तिकता और नास्तिकता के सम्बन्ध में उनका मापदण्ड चाहे जो हो, भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता में है कि- अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का तीनों कालों में अभाव नहीं है। आत्मा ही सत् है और भूतादिकों के शरीर नाशवान् हैं, वे हैं ही नहीं। इस परिभाषा के अनुसार जो अस्तित्व का उपासक है, जो सत् का उपासक है, जो एकमात्र परमात्मा के प्रति श्रद्धावान् है वही आस्तिक है और जो नश्वर के पीछे भटक रहा है, नास्तिक है। ‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८/१६)- ब्रह्मा और ब्रह्मा से उत्पन्न सृष्टि सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, पहाड़, जल, अग्नि, आकाश, पेड़-पौधे इत्यादि नश्वरों की जो पूजा करता है, नास्तिक है। इन नश्वर कलेवरों के पीछे जो भटक रहा है, जो इनमें समय दे रहा है, इनको सन्तुष्ट करने में लगा है, वह नास्तिक है। लेखक महोदय पुनर्विचार करें कि आश्रमीय साहित्य में एक परमात्मा की ही उपासना पर बल दिया गया है अथवा नहीं?
* लेखक ने सनातन-धर्म के महान् प्रचारकों में कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य और उदयनाचार्य का नाम लिया है और अपने को उनका उत्तराधिकारी मान लिया है। इनमें से उदयनाचार्य को कितने लोग जानते हैं? जनसमाज इस नाम के किसी व्यक्ति, उसके जीवन-कृतित्व अथवा किसी देन से परिचित नहीं है।
अब रही बात कुमारिल भट्ट की! कहते हैं, बहुत दिनों तक वे बौद्धों के बीच रहे; किन्तु लोग उन्हें इसलिये जानते हैं कि आचार्य शंकर कर्मकाण्ड के विरोध में उनसे शास्त्रार्थ करने गये थे। उन्हीं आचार्य शंकर की गद्दी से आप कुमारिल की, शंकर के विरोधियों की पैरवी कर रहे हैं! उस समय कुमारिल भट्ट प्रयाग में तुषानल में अपना शरीर हठ करके जला रहे थे। उन्होंने आचार्य शंकर को अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने को कहा और स्वयं जल गये। कुमारिल से शंकर का शास्त्रार्थ हुआ ही नहीं, तो वे आचार्य शंकर के समर्थक या सनातन के प्रचारकों में कब से गिन लिये गये?
आचार्य शंकर जिस सिद्धान्त के प्रचार के लिए विख्यात हैं, वह है- ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।’ उनका श्लोक है-
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मायामयं जगत्।
सत्यं सत्यं पुनर्सत्यं हरेर्नामैव केवलम्।।
अर्थात् ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् नश्वर है। इसमें सत्य है केवल हरि और हरि का नाम। इसलिये ‘करतल भिक्षा तरुतल वासं’ करना पड़े तब भी ‘भज गोविन्दम्’– एक परमात्मा के भजन पर बल दिया। उन्हीं की गद्दी से आप सब करोड़ों देवी-देवता की पूजा बता रहे हैं। आचार्य शंकर ने कहा कि ‘न मे जातिभेदः’, तो लेखक महोदय जाति-पाँति को ही धर्म बता रहे हैं। न राम ने अपने नाम के साथ सिंह लगाया, न श्रीकृष्ण ने यादव। क्या आचार्य शंकर ने अपने को तिवारी कहा या शुक्ला?
कर्मकाण्डों के विषय में आदि शंकराचार्यजी ने कहा-
कुरुते गंगासागर गमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनं सर्वमतेन मुक्तिर्नभवति जन्मशतेन।।
अर्थात् गंगा ही नहीं, गंगासागर तक की तीर्थयात्राओं से, व्रत अथवा दान से भी कुछ होनेवाला नहीं है। हर तरह से यह निर्विवाद है कि आत्मज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती। यह आचार्यश्री का मत है और उन्हीं की पीठ पर बैठकर आप सब कर्मकाण्ड की पैरवी कर रहे हैं।
अनुश्रुति है कि बत्तीस वर्ष की अल्पायु में आचार्य शंकर की हत्या कर दी गयी थी। उन्होंने जिन पाँच हजार उद्भट कर्मकाण्डियों को परास्त किया था, उस समय की परम्परा के अनुसार उन सबको आचार्य शंकर का शिष्यत्व स्वीकारना पड़ा था। वे निरुत्तर भले हो गये थे लेकिन उनका दिल-दिमाग उस कर्मकाण्ड से मुक्त नहीं हो पाया था जिन्हें वे आजीवन करते आ रहे थे। दिग्विजयरत आचार्य शंकर के सान्निध्य में रहने अथवा उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिल पाया था। लगता है कि उन्होंने शिष्यत्व का अभिनय मात्र किया था। यही कारण है कि आचार्य शंकर के तिरोहित होते ही उनकी गद्दियों से कर्मकाण्ड समर्थक श्लोक और आचार्य शंकर के नाम से गीता और उपनिषदों के भाष्य लिखे जाने लगे।
कितना अन्तर्विरोध है कि जो महापुरुष ‘एको ब्रह्म’ का उद्घोष कर रहा हो, उसी के नाम से विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियाँ प्रचलित हैं। जिन महापुरुष ने कहा- ‘कः पूजनीयः शिवतत्त्वनिष्ठः।’– पूज्यनीय कौन है? आचार्य कहते हैं कि शिवतत्त्व में स्थित कोई महापुरुष! लेकिन आज अपने को उन्हीं महापुरुष का शिष्य बताकर कोई गाय-बैल की पूजा बता रहा है, तो कोई संध्या-गायत्री की। जिन आचार्य ने ‘किं कर्म यत्प्रीतिकरे मुरारे।’ कहकर एक ही प्रशस्त कर्म बताया, तो उन्हीं के गीताभाष्य में कर्म को पाँच प्रकार का बताया गया है। दोनों में से किसे पूज्य आचार्य का मानें, किसे न मानें?
स्पष्ट है कि विरक्त महापुरुषों का स्थान जब उनके साधनरहित, अधकुचले शिष्य ग्रहण करने लगते हैं, तो साधन उनसे पार होता नहीं, अपने पूर्व गृहस्थ जीवन के आग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते, इसीलिये वास्तविक क्रिया के स्थान पर वे अनन्त क्रियाओं का प्रचार करने लग जाते हैं। यह उन्हीं की देन है कि एक धर्म अनेक विपरीत धर्मों के रूप में दिखाई देने लगता है, जो कालान्तर में कलह का कारण बनता है। आचार्यजनों से अनुरोध है कि पूज्य गुरुजनों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर उनमें अश्रद्धा की भावना न पैदा करें।
* लेखक को यह गलतफहमी हो गयी है कि वेद को मानने और उसके बारे में प्रामाणिक रूप से कुछ भी कहने का ठेका उन्हीं को मिल गया है। वेद अकेले उन्हीं का नहीं, मानवमात्र की निधि है। परमात्मा की शोध का पहला विवरण वैदिक ऋषियों द्वारा मिला है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक परमात्मा का ही तो अस्तित्व है। अतः परमात्मा के शोध-ग्रन्थ वेद को कौन इनकार कर सकता है। वेद का महत्त्व इसलिए है कि वह शाष्वत सत्य परमात्मा को दृढ़ाता है; किन्तु जो बात वेद में नहीं है, उसको भी ‘वेद में है…वेद में है’ ऐसा कहकर सीधी, श्रद्धालु जनता का भयादोहन न करें। अब हर बात को धर्म कहकर मनवाने का औचित्य नहीं रह गया; क्योंकि भारत अब साक्षर है।
लेखक का दावा है कि वेद सनातन इसलिए है कि उसमें तारीख नहीं दी गई है या किसी आदमी ने उसे नहीं बनाया है। सनातन का यह कौन-सा लक्षण है? तारीख लिखना भूल गये, तो कृति सनातन बन गई? अंग्रेज इतिहासकार इसीलिये कहते हैं कि भारत के लोग इतिहास लिखना नहीं जानते थे। प्राचीन भारतीय वस्तुओं का तिथि- निर्धारण अन्य देशों की वैसी वस्तुओं की तुलना द्वारा करने का प्रयास चल रहा है। तिथि न लिखी होने से कोई वस्तु न तो प्राचीन हो जाती है और न इससे वस्तु का गौरव ही बढ़ता है।
जब वेद ही लेखक का मुख्य ग्रन्थ है तो अधिक अच्छा होगा कि अपने प्रवचनों में जनता को वेद की ऋचाएँ और संस्कृत में ही उनका अर्थ बताया करें। वेद जानने की बात तो दूर, अधिकांश जनता ने इन पुस्तकों को देखा तक नहीं और देख भी नहीं सकते; क्योंकि लेखक के अनुसार वेद सबको देखने और पढ़ने का अधिकार ही नहीं है। हम उनसे पूछना चाहते हैं कि जिस पुस्तक पर वे लोग कुण्डली मारकर बैठे हैं, उनके अनुसार जिस पुस्तक को रटे बिना कोई मोक्ष नहीं पा सकता, उन्हीं द्वारा अनुमोदित पाराशरादि स्मृतियों में है कि उसी पुस्तक का एक वाक्य पढ़ लेने पर शूद्र नरक में चला जायेगा। यह पुस्तक है या नरक का दरवाजा? अपवर्ग की साधिका है या नरक का आरक्षण? वे तो शंकराचार्यजी के भी बहुत पहले से हैं, इस पर शंकराचार्यजी का एकाधिकार या आपलोगों का कब्जा कब से हो गया? शंकराचार्यजी का ही मत सनातन है, जो वि.सं. ८४५-८७७ में हुए थे?
लेखक का दावा है कि वेद मोक्ष का दरवाजा है; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण यह नहीं मानते। गीता में है कि ‘त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन’ (गीता, २/४५) अर्थात् वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते हैं, इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। अर्जुन! तू तीनों गुणों से ऊपर उठ। नित्यवस्तु आत्मा है, उसमें स्थिति प्राप्त करो। जो तीनों गुणों तक सीमित है वह मोक्ष का दरवाजा कैसे?
तो क्या वेद का कोई महत्त्व नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि महत्त्व है; किन्तु एक सीमा तक ही। कितना है? इस पर बताते हैं-
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।। (गीता, २/४६)
अर्थात् चारों ओर लबालब भरे हुए स्वच्छ जलाशय के प्राप्त होने पर गड़ही इत्यादि छोटे-मोटे जलाशयों का जितना उपयोग रह जाता है, उतना ही ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से रह जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ‘वेद-वेद’ कहकर चिल्लानेवालों की ‘वेदवादरताः’ कहकर भर्त्सना की है। (देखें, गीता, २/४१-४४)
भगवत्पथ में वेद कहाँ तक सहायक हैं? पोथियों का कितना उपयोग है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई उपयोग नहीं है। ये सहायक नहीं प्रत्युत् बाधक हैं-
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।। (गीता, २/५३)
अर्थात् वेदवाक्यों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब स्थिर हो जायेगी, तब तू योग को प्राप्त होगा। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेदवाक्यों को सुनने से बुद्धि विचलित हो जाती है।
मान लें, वेदों में वर्णित धर्म का पालन यदि किसी ने कर ही लिया तो मिलेगा क्या? योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं- ‘एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता, ९/२०)। कहते हैं कि वेदों में बताये धर्म का पालन करनेवाले ‘गतागतं लभन्ते’- आते-जाते रहते हैं, आवागमन में पड़े रहते हैं, इसी को आदि शंकराचार्य ने ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी-जठरे शयनम्’ कहकर सतर्क किया है।
क्या वेद के अध्ययन या वेदान्त वाक्यों के श्रवण से ईश्वर को देखा जा सकता है? योगेश्वर श्रीकृष्ण का निर्णय सुनें- अर्जुन! मैं न तो वेद से, न यज्ञ से, न अध्ययन से, न दान से, न अनेक क्रियाओं से और न उग्र तप से ही देखा जा सकता हूँ। परन्तु हे परंतप! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं न केवल देखने बल्कि तत्त्व से जानने और प्रवेश करने के लिए सुलभ हूँ। (गीता, ११/४८, ५४)
इन उद्धरणों से लगता है कि भगवान श्रीकृष्ण वेद को नहीं मानते; किन्तु ऐसी बात नहीं है। वे जिस वेद को मानते हैं, वह इन चारों वेदों से अलग ही कोई वेद है-
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। (गीता, १५/१)
ऊपर उत्कृष्ट परमात्मा ही जिसका मूल और नीचे प्रकृतिपर्यन्त जिसकी शाखा-प्रशाखायें हैं- यह संसार ऐसा अविनाशी वृक्ष कहा गया है। वेद इसके पत्ते हैं। जो इस संसार-वृक्ष को जानता है अर्थात् जो प्रकृतिसहित परमात्मा को जान लेता है, वह वेदवित् है। आगे कहते हैं- ऊपर-नीचे सर्वत्र इसकी जड़ें और शाखायें हैं अर्थात् परमात्मा और प्रकृति सर्वत्र हैं। हर व्यक्ति में परमात्मा का निवास है। अतः जिस क्षण से वह अनन्य भाव से परमात्मा में श्रद्धावान् होता है तत्क्षण वह परमात्मा उसमें जागृत हो जाता है, उसे जानकारी प्रदान करने लगता है; यही वेद है, न कि पोथी। इसे भगवान ही पढ़ाते हैं। आज भी ऐसा ही है और सदैव ऐसा ही रहेगा। इसी अर्थ में वेद अपौरुषेय हैं। इसी अर्थ में वेद परमात्मा का निःश्वास है, न कि परमात्मा किसी पत्ते पर लेटा आराम कर रहा है और उसकी श्वसन-क्रिया से वेद लिख उठा।
वेद जिसके पत्ते हैं ऐसे सुविरूढ़मूल अश्वत्थ की पूजा नहीं करनी है, बल्कि ‘असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ (गीता, १५/३)- असंगरूपी शस्त्र से इस वृक्ष को काट डालना है। आप असंग हो जायेंगे, तो कौन-सा वैदिक अनुष्ठान, कौन-सा कर्मकाण्ड करेंगे? कोई कर्मकाण्ड नहीं, केवल ‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं’ (गीता, १५/४) उस परमपद की खोज करनी चाहिये। गीता में ही भगवान कहते हैं कि-
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।। (गीता, १५/१५)
अर्जुन! मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान, तर्कशक्ति है। जानने की सभी वस्तुओं में मैं ही जानने योग्य हूँ और जब जानकारी हो गई तो मैं ही वेदान्त का कर्त्ता और मैं ही वेदवित् अर्थात् वेद को जाननेवाला हूँ। अभी पहले श्लोक में कहा था कि जो जानता है वह वेदवित् है, यहाँ कहते हैं कि मैं भी वेदवित् हूँ। जैसे वह जाननेवाला, वैसे ही श्रीकृष्ण वेदवित् हैं। परमात्मा का ज्ञान हो जाना ही वेद का अन्त या वेदान्त है न कि उपनिषद् या महर्षि बादरायण के नाम से प्रचलित उत्तर-मीमांसा वेदान्त है। एकमात्र परमात्मा के स्मरण को ही योगेश्वर स्मृति मानते हैं न कि मनु या कपिल की स्मृति को। अतः इस प्रलाप का कोई औचित्य नहीं रह जाता कि हम वेद नहीं मानते। हम भी वेद को उतना ही और उसी रूप में मानते हैं जैसा और जितना योगेश्वर श्रीकृष्ण की गीता एवं अन्य उपनिषदों में है।
* लेखक ने अच्छा याद दिलाया कि हम श्रौत और स्मार्त का अन्तर नहीं जानते। वे कहते हैं कि स्मार्त लोग वेद भी मानते हैं। तब तो श्रौत लोग स्मृति भी मानते होंगे! फिर दोनों में अन्तर ही क्या रहा? जिन धर्मसूत्रों, स्मृतियों, पुराणों को आप मानते हैं, हम उन्हीं से उद्धरण देना चाहेंगे कि पहले श्रौत और स्मार्त किसे कहते थे?
दाराग्निसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम्।
स्मार्तो वर्णमाश्रमाचारो यमैश्च नियमैर्युतः।।
श्रौत के अन्तर्गत वे कृत्य आते हैं जिनके नाम वेद में हैं और विधि-विधान संहिता-ग्रन्थों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में हैं; जैसे- अग्नियों की स्थापना, दर्श पौर्णमासादि यज्ञ, सोमकृत्य इत्यादि। स्मार्त में वे कृत्य आते हैं जो स्मृतियों में हैं तथा वर्णाश्रम आचार-विचार से सम्बन्धित हैं- ‘अग्न्याधान पूर्वकोऽधीत प्रत्यक्षवेदमूलो दर्शपौर्णमासादि श्रौतः। अनुमित परोक्ष शाखामूलः शौचाचमनादिः स्मार्तः।।’ मजे की बात तो यह है कि सभी स्मृतियों का भी मूल वेद में खोजने का प्रयास किया जाता है और जिस आचरण के सम्बन्ध में वेद में कहीं नहीं मिलता उसके लिए पट्टी पढ़ा देते हैं कि इस सम्बन्ध में कोई श्रुति रही होगी जो अब लुप्त हो गई है।
यहाँ हम यह भी रहस्योद्घाटन करना चाहेंगे कि लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि स्मार्तानाम वेद को मानते हैं? ऐसा इसलिये कहते हैं कि स्मार्तानाम सम्प्रदाय आदि शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित बताया जाता है। शंकराचार्यजी के पहले इस नाम का कोई संगठित सम्प्रदाय नहीं था। स्मार्तानाम में पंचदेवोपासना (विष्णु, शिव, गणेश, शक्ति और सूर्य की पूजा) अनिवार्य है। कितनी विडम्बना है कि जिस महापुरुष ने कहा था- ‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ (श्रुति है ‘एकं सत्’, वेदान्त है ‘एको देवो’) तो उन्हीं शंकराचार्य के सुयोग्य शिष्य पंचदेवः का प्रचार कर रहे हैं, जबकि पंचदेव होते ही नहीं, पंच तो महाभूत होते हैं। क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर इनको या ग्रहों-उपग्रहों को जल चढ़ाना, पर्वत और वृक्षों की पूजा कोई विधा नहीं है। कदाचित् फल मिल भी जाय तो श्रीकृष्ण कहते हैं वह फल नष्ट हो जाता है और पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। तो जब करना ही है तो उस विधि से पूजन क्यों न करें, जिसका न तो फल नष्ट होता है और न पूजनेवाला- ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’ (गीता, ९/३१)। शैव, वैष्णव और शाक्त सम्प्रदायों का आचार्य शंकर ने खण्डन किया था, आज के स्मार्त उन्हीं की पूजा कर रहे हैं। श्रौत-स्मार्त विशेषज्ञ लेखक महोदय कृपया बतायें कि श्रुतिसम्मत एक परमात्मा की पूजा गलत है या स्मार्तों की पंचदेवोपासना गलत है?
* इसी तरह महाराज मनु या मनुस्मृति की निन्दा करना हमारा मंतव्य नहीं है; क्योंकि उनका धर्मशास्त्र जिस रूप में उपलब्ध है उसमें बहुत कुछ घटाया-बढ़ाया और बदल दिया गया है। नारदस्मृति में है कि मनु के धर्मशास्त्र का संक्षेपण और परिवर्द्धन नारद, मार्कण्डेय और सुमति भार्गव ने किया। कई स्मृतियों में मनु ने जो श्लोक कहे हैं आज की मनुस्मृति में दिखायी नहीं देते। हेमाद्रि ने बताया कि मनु के शास्त्र को भृगु, नारद, बृहस्पति और अंगिरा ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। अनुश्रुति है कि वर्तमान सभी स्मृतियाँ पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में लिखी गईं- इसकी पुष्टि स्वयं मनुस्मृति से भी होती है; जैसे इसमें यवन, कम्बोज, शक, पहलव और चीनों के नाम हैं (१०/४४) जिनका उल्लेख मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों में है, पहले नहीं। अतः ये स्मृतियाँ मौर्य-शासन के बाद की हैं।
यहाँ हमें एक स्पष्टीकरण देना है। इस प्रकरण में अथवा अन्यत्र की अनेक आधुनिक कृतियों से उद्धरण दिये गये हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम समग्र ग्रन्थ से सहमत हैं। इसका आशय भी नहीं निकाला जाना चाहिये कि हमने अपने काम की पंक्ति को तो ले लिया और शेष विचारों से बच निकले। उद्धरण तो हम लेखक की विरोध-पुस्तिका का भी देते हैं, तो क्या हम उन्हें मान लेते हैं? आपके उचित को ही मानते हैं। जहाँ आवश्यक है, समीक्षा करनी पड़ती है। उनके या उन-जैसों के विचारों का खोखलापन दिखाने के लिये या उन्हीं के तर्कों में अन्तर्विरोध बताने के लिये भी उद्धरण दिया जाता है और कहीं-कहीं उद्धरण देना मात्र भाव-साम्य के लिये होता है। इसका यह भी आशय नहीं कि हम किसी पुस्तक को प्रमाण नहीं मानते। सर्वांग रूप से हम श्रीमद्भगवद्गीता को प्रमाण मानते हैं। हम यह भी मानते हैं कि गुरु का एक वाक्य मिल जाय, तो वह करोड़ों शास्त्रों से बढ़कर है और साधन आरम्भ होने पर प्रभु जो आन्तरिक निर्देश देते हैं, जिसे मनीषियों ने स्वानुभव की संज्ञा दी है, वह सभी बाह्य प्रमाणों से बढ़कर है, इसके पश्चात् पुस्तक का कोई सहयोग नहीं रह जाता। क्रिया में उतरने पर गीता, सद्गुरु और आन्तरिक निर्देशों में कहीं कोई टकराव नहीं है। परमात्मा अपरिवर्तनशील है। करोड़ों वर्ष पश्चात् भी जब वह निर्णय देगा तो एक-जैसा ही देगा।
केवल पोथी ही प्रमाण नहीं है। सन्त कबीर कहते हैं- ‘तूँ कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी, मेरा तेरा मनवा कैसे एक होय।’ पूज्य गुरुदेव कहते थे- साधन लिखने में आता ही नहीं। लिखा ही नहीं जा सकता। भजन भगवान करा लेते हैं, हृदय से रथी बन जाते हैं। मार्गदर्शन करने लग जाते हैं। उनकी आज्ञा का पालन ही भजन है। वह सब शास्त्रों से बढ़कर है, विधि-निषेधों से ऊपर है; किन्तु लेखक महोदय की विवशता है कि वह जिस सम्प्रदाय से चिपक गये हैं, वहाँ वेद के अतिरिक्त स्वानुभव के लिये कोई स्थान ही नहीं है। वेद का भी वे वही अर्थ मान सकते हैं जो उनकी साम्प्रदायिक व्याख्या है। श्री रामानुजाचार्य की व्याख्या उन्हें स्वीकार्य नहीं है। पाश्चात्य विद्वानों में मैक्समूलर, कीथ, मैकडानल, रास, जॉली इत्यादि के भाष्य तथा स्वामी दयानन्द या सातवलेकर इत्यादि भारतीय विद्वानों ने वेद का जो अर्थ लगाया है वह इन्हें मान्य नहीं है।
ये ईश्वरीय संकेत, अन्तर्प्रेरणा, अनुभव या ईश्वरीय आदेश जैसी भी कोई बात स्वीकार नहीं सकते अन्यथा इनकी आधारशिला ही खिसक जायेगी। ‘निज निज मुखन कही निज होनी।’ (मानस, १/२/३), ‘कबि उर अजिर नचावहिं बानी।’ (मानस, १/१०४/६), ‘उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।’ (मानस, ७/११२/१), ‘उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।’ (मानस, ३/३८/५), ‘उभय घरी महँ सब देखा।’ (मानस, ७/८१/८), ‘निज अनुभव अब कहउँ खगेसा।’ (मानस, ७/८८/५) इत्यादि स्वानुभव प्रमाण की कोई व्याख्या इनके पास नहीं है। जितना वेद में लिखा है उतना ही सच है, जितना बाइबिल में है उतना ही सच है या जितना कुरान में या ग्रन्थसाहिब में है उतना ही सच है। संकीर्णता, कट्टरता, साम्प्रदायिकता और क्या होती है? कहा जाता है कि किसी सेनापति ने सिकन्दरिया का विशाल पुस्तकालय यह कहकर जला दिया कि यदि ये पुस्तकें कुरान के खि़लाफ हैं तो कुफ्र हैं और यदि इनमें वही सब है जो कुरान में है, तो इतना पढ़ने की जरूरत क्या है? कुरान तो है ही। ऐसी भावुकता न तो प्रशंसनीय है और न अनुकरणीय। पुस्तक कोई भी हो, पूजा की वस्तु नहीं, माइल स्टोन (मील के पत्थर) की तरह है, देखा और रास्ते पर बढ़ गये। अस्तु, अब हम पुनः मनुस्मृति पर आते हैं।
यह स्मृति किसी सत्ययुग की रचना नहीं है। उन मनु ने भी इसे नहीं लिखा है, जिनके लिये ‘मानस’ में है कि ‘स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।’ (मानस, १/१४१/१) वे आदिपुरुष माने जाते हैं और जब भगवान ने वर दिया तो कहा ‘कस्यप अदिति महातप कीन्हा।’ (मानस, १/१८६/३) सारी सृष्टि कश्यप और अदिति से मानी जाती है। इस प्रकार मनु-शतरूपा, कश्यप-अदिति आदिपुरुष हैं, एक हैं। इनकी सन्तानों में हैं देवता और दानव, सुर और असुर, आर्य और दस्यु, जिनका वर्णन वेद में है। आरम्भ में इन दो जातियों का उल्लेख मिलता है। इसके पश्चात् यक्ष और रक्ष जातियों का वर्णन मिलता है, गन्धर्व और किन्नरों की चर्चा है और वाल्मीकीय रामायण तक मंडूर, हैहय, गज, वानर, ऋक्ष, गृद्ध इत्यादि मानव-जातियों का वर्णन मिलता है। जामवन्त अच्छे ज्योतिषी थे, हनुमान सुसंस्कृत परिमार्जित भाषा बोलते थे। उस समय तक यही जातियाँ थीं; किन्तु मनुस्मृति में जिन कहार, केवट, सुनार, तेली, लुहार, झल्ल, मल्ल, लिच्छिवि जातियों का विवरण है, सब-की-सब आधुनिक हैं। अधिक से अधिक यह स्मृति महाभारतकाल के बाद की है; क्योंकि इसमें से कुछ नाम तथा शक-यवन-कम्बोज-द्रविड़-दरद-खस-किरात जातियों का वर्णन महाभारत के पहले से किसी ग्रन्थ में नहीं है। ऐसा लगता है कि वर्तमान मनुस्मृति और वर्तमान महाभारत दोनों में परिवर्तन हुआ है।
महाभारतकाल तक भैंस और भैंसा जंगली जानवर थे। उनसे दूध भी निकाला जा सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं थी। महाभारत में भेड़, बकरी, गाय, गधी और उँटनी तक के दूध की चर्चा है किन्तु भैंस के दूध की खोज नहीं थी; परन्तु मनुस्मृति में है कि जंगली पशुओं में भैंस का दूध लिया जा सकता है। लगता है कि उस समय भैंस की धर-पकड़ शुरू हो गई थी- जैसे आजकल अफ्रीका में मृगी का दूध निकाला जा रहा है, मृगी डेरी फार्म बने हैं; भारत में अभी ऐसा नहीं है। इससे स्पष्ट है कि मनु के नाम पर जो स्मृति उपलब्ध है वह किसी सत्ययुग में नहीं लिखी गई है। इस किताब का मनु कथानक के काल्पनिक पात्र की तरह है, जैसे- कालिदास का मेघदूत।
इस प्रदूषित मनुस्मृति में महाराज मनु के वास्तविक विचारों की झलक भी यत्र-तत्र है, जो गीता के अनुरूप है, जैसे- अध्याय दो में है कि वेद में वर्णित हवन, यज्ञादि क्रियाओं के फल नष्ट हो जाते हैं; किन्तु ओंकार का कभी नाश नहीं होता। दर्श पौर्णमासादि विधि यज्ञों से, चार पाक यज्ञों (पितृकर्म, हवन, बलि, वैश्वदेव) इन सबसे जप-यज्ञ सोलह गुना बड़ा है (१/८४-८६), जिसे लेखक ने दोना चाटने की संज्ञा दी है।
अध्याय चार में मनु का प्रशस्त विचार है- जो गीता की अनुकृति है, वही शैली, वही शब्द कि यज्ञशास्त्र के जानकार लोग ऋषियज्ञ (वेदाध्ययन), देवयज्ञ (होम), भूतयज्ञ (बलि), नृयज्ञ (अतिथि सेवा) और पितृयज्ञ (तर्पण) जैसे महायज्ञों को न करके सदैव ज्ञानेन्द्रियों में विषयों का हवन करके इन यज्ञों का सम्पादन करते हैं। गीता के भी चौथे अध्याय में ‘जुह्वति’ वाले कई श्लोक हैं।
लेखक ने मनु की इस उक्ति का दुरुपयोग किया है कि सम्पूर्ण क्रियाओं का अन्तर्भाव ईश्वर की उपासना में है (१२/८७) और गढ़ने लगे हैं अपने मन से क्रियाएँ। लिखते हैं कि सनातन-धर्म में क्रिया की उतनी महिमा नहीं है जितनी भावना की है। साधारण क्रिया भी अच्छे भाव से की जाय तो धर्म है और भावना के अनुसार फल देती है, जैसे- गाय भले पशु-योनि में है यदि उसकी पूजा की जाय तो वह आपको तार देगी; किन्तु इन निष्कर्षों का मनु से कोई सम्बन्ध नहीं है। नितान्त अच्छी भावना से साँप पकड़िये, वह काट लेगा। भावना के लिये आधार भी प्रशस्त होना चाहिये।
जिन क्रियाओं का अन्तर्भाव ईश्वर की उपासना में होता है, मनु ने उन छः क्रियाओं को गिनाया है कि वेदाभ्यास, तपस्या, ज्ञान, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा और गुरुसेवा; किन्तु आत्मज्ञान इन सबसे श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि वह सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है और उसी से अमृतत्व की प्राप्ति होती है (१२/८३-८५)। मनु ने गिनाया छः तो गढ़ लेते हैं साढे़ छः सौ। और मनु के विपरीत एक मजेदार तर्क देते हैं कि इन पंक्तियों में कर्मकाण्ड की निन्दा नहीं बल्कि आत्मज्ञान की प्रशंसा है। अर्थात् किसी की प्रशंसा करनी हो तो दूसरों की निन्दा की जा सकती है- इसी तर्क का सहारा लेकर लेखक महोदय और उनका पूरा ग्रुप कहता है कि जिन प्रसंगों में वेदादि की तुच्छता बतायी गयी है वह वेद की निन्दा नहीं है बल्कि भक्ति की महिमा में या आत्मज्ञान की महत्ता सूचित करने के लिये है। तब तो लेखक को यह भी मान लेना चाहिए कि वेद में भक्ति या आत्मज्ञान है ही नहीं। यह तो ऐसा ही हुआ कि दवा की महिमा बताने के लिये कुपथ्य को प्रोत्साहन दिया जाय।
समस्या की जड़ में स्वयं वेद हैं, जिनके ९६ हजार कर्मकाण्ड और अन्तिम चार हजार मन्त्र ज्ञानपरक बताये जाते हैं, जिनमें कर्मकाण्डों का खोखलापन दिखाया गया है, अतएव दोनों भाग परस्पर विरुद्ध हैं। आदि शंकराचार्य इसके लिये यह समाधान देते हैं कि कर्मकाण्ड उसके लिये है जो अविद्या के पाश में बँधा है और ज्ञानपरक उद्बोधन उसके लिये है जो इन कर्मों का खोखलापन जान चुका है और इनसे ऊपर उठने के लिये प्रयत्नशील है। मीमांसावाले वेद के ब्राह्मण भाग (कर्मकाण्ड) को प्रधान मानते हैं और उपनिषद् वाले हिस्से को महत्व नहीं देते। उनका कहना है कि इन कर्मकाण्डों के करने के बाद वह योग्यता स्वतः आ जाती है। रामानुज कहते हैं कि दोनों भाग सबके लिये है। हर प्रकार का कर्मकाण्ड भी किया जाय लेकिन गीता की निष्काम-भावना से। कोई अनुष्ठान फल की कामना से न किया जाय। इस प्रकार वेद को लेकर अनेक परस्पर विरोधी सिद्धान्त प्रचलित हैं। इस सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी विचार दिया है- ‘श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।’ (मानस, ७/११६/६) ये तो उपाय हैं ही नहीं। तो करें क्या? गोस्वामीजी तो कहते हैं-
गुरु कह्यो राम भजन नीको लगत मोहिं राज-डगरो सो। (विनय०, १७३)
मनुस्मृति में ही है कि जो स्मृतियाँ वेद से बाहर हैं, जो कुतर्कयुक्त हैं वे सब परलोक के लिये निष्फल होती हैं। इस कथन से स्पष्ट है कि बहुत-सी स्मृतियाँ वेद के विपरीत भी हैं। जनसाधारण को बताना चाहिए कि वे कौन-कौन सी हैं? अतः किसी कथन को इसलिये नहीं माना जा सकता कि स्मृति में है। वेद से बाहर यह लोग घोषित करते हैं कपिल की स्मृति को, जिनके लिये गीता में भगवान कहते हैं कि सिद्धों में मैं कपिल हूँ, वह मेरी विभूति हैं। यम-नियम को लेखक महोदय भी स्वीकार करते हैं; किन्तु सांख्य और योगदर्शन को वेदमूलक नहीं मानते।
* लेखक का दावा है कि जो वेद नहीं पढ़ा है वह धर्म नहीं जान सकता, उसे धर्म के बारे में कुछ भी कहने का क्या अधिकार? ब्रह्म वेदान्तैकवेद्य है अर्थात् केवल वेदान्त द्वारा जानने में आता है। लेखक महोदय तो वेदान्ताचार्य हैं, जान लिया ब्रह्म को? दूसरी ओर उन्होंने यह भी लिखा है कि शबरी, रैदास सभी सन्त ब्रह्म को जाननेवाले हुए। बिना वेद पढ़े ये कैसे हो गये? शबरी ने कौन-सा वेद पढ़ा था? रामकृष्ण परमहंसजी ने कब वेद पढ़ा? रैदास को भगवान ने सन्त बनाया था, सनातन-धर्म के ठेकेदारों ने तो कदम-कदम पर उनका विरोध ही किया था। आज ही कितने धर्माचार्य अपने यहाँ रविदास जयन्ती मनाते हैं? बहुत हुआ तो बेचारे कुछेक हरिजन खजड़ी-मजीरा बजाकर उनकी याद कर लेते हैं या सरकारी प्रसारणों में उनका नाम सुनाई पड़ जाता है।
सन्त रविदास की तो बात ही छोड़िये, काशीवालों ने तो गोस्वामी तुलसीदासजी तक को चैन से रहने नहीं दिया, जिसका अन्तर्साक्ष्य उनकी दोहावली में है-
बासर ढासनि के ढका, रजनीं चहुँ दिसि चोर।
संकर निज पुर राखिऐ, चितै सुलोचन कोर।। (दोहावली, २३९)
अर्थात् दिन में काशी के ठगों के धक्के और रात में चोरों के उपद्रव, हे शंकरजी! कृपा करके अपनी नगरी में इनसे मेरी रक्षा कीजिए। उनका दोष क्या था? केवल इतना ही कि उन्होंने देववाणी संस्कृत के स्थान पर जनभाषा हिन्दी को अपनाया था। उनका विचार था कि भगवान के लिये महत्त्व भाषा का नहीं, प्रेम का होता है-
का भाषा का संसकृत, प्रेम चाहिए साँच।
काम जु आवै कामरी, का लै करिअ कुमाच।। (दोहावली, ५७२)
इसके विपरीत लेखक ने अंग्रेजी का उद्धरण देकर कहना चाहा है कि ‘संस्कृत इज द सिम्बल आफ इन्डियन कल्चर एण्ड सिविलाइजेशन’। उन्हें पछतावा है कि हम इतनी संस्कृत नहीं जानते कि श्लोक गढ़ सकें। वैसे, हम किसी भाषा के समर्थक या विरोधी नहीं हैं। भाषा तो विचार-प्रकाशन का माध्यम मात्र है; किन्तु कोई भाषा पवित्र है, कोई अपवित्र, यह वर्गीकरण असंगत है। यह भी ईमानदारी नहीं है कि हम बात करें हिन्दी में, जियें-खायें हिन्दी से, किन्तु गौरव गायें संस्कृत का।
धर्म की तरह संस्कृत भाषा भी एक वर्ग द्वारा अपने कबीले तक सीमित कर दी गई। आज दशमी है तो कल एकादशी होगी ही- आप ऐसा नहीं कह सकते, पण्डित के पास जाना ही होगा। यही कारण है कि लोग अंग्रेजी डेट से काम चलाने लगे। इसी तरह कचहरी में उर्दू प्रचलन में आयी, हिन्दी है, लोग दूसरी-दूसरी भाषाओं से काम चलाने लगे। ये भाषाएँ राजभाषा बनने का गौरव पा गईं और सभी भाषाओं की जननी संस्कृत, आपकी देववाणी, लेखक के अनुसार परमात्मा जिस भाषा में बोलता है वह वाणी भारतीय संविधान में संरक्षण पाने के बावजूद पुरानी और मातृभाषा के रूप में अन्तिम साँस गिन रही है। बच्चे अधिक शुल्क देकर भी कान्वेन्ट में पढ़ते हैं, हिन्दी-अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं; किन्तु कोई भी अभिभावक छात्रवृत्ति, भोजन-वस्त्रादि की सुविधा पाने पर भी अपने बच्चे को संस्कृत पाठशाला में पढ़ाना पसन्द नहीं करता।
वैज्ञानिक आविष्कारों का वर्णन इस भाषा में है- ऐसा तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु यह नियम संस्कृत में अवश्य है कि कौन मन्दिर में जा सकता है, कौन नहीं जा सकता? कौन घर बना सकता है, कौन नहीं बना सकता? कौन सम्पत्ति रख सकता है कौन नहीं रख सकता? ऐतरेय ब्राह्मण (जिसे भगवती श्रुति माना जाता है) में है कि-
शूद्रो अन्यस्य प्रेष्यः कामोत्थाप्यः यथाकाम वध्यः। (३५-३)
अर्थात् शूद्र दूसरों से अनुशासित होता है। वह किसी की आज्ञा से ही उठता-बैठता है, उसे कभी भी पीटा जा सकता है- ऐसे नियम संस्कृत में अवश्य हैं। आदमी-आदमी में घृणा का बीज बोनेवाली, कर्मकाण्डों में समाज को जकड़नेवाली भाषा भी तो संस्कृत ही है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने इन कर्मकाण्डों का समर्थन न करके एक भगवान राम की भक्ति पर बल दिया था। वे जिस काशी में रहते थे, वहाँ मुक्ति पाने के लिये कुछ लोग अपने को करवत (आरे) से चीरते थे। वैसे भी काशी में देहान्त का बड़ा माहात्म्य बताया जाता है; किन्तु इसे न तो सन्त कबीर ने स्वीकार किया और न गोस्वामी तुलसीदासजी ने ही। गोस्वामीजी के अनुसार-
कासीं बिधि बसि तनु तजें, हठि तनु तजें प्रयाग।
तुलसी जो फल सो सुलभ, राम नाम अनुराग।। (दोहावली, १४)
कर्मकाण्डी लोग तुलसीदासजी को केवल काठ की माला धारण करनेवाला कहते थे, ज्ञानमार्गी उन्हें ज्ञानविहीन कहते थे, तो उपासनामार्गी भी उन्हें अपनाने को तैयार न थे-
करमठ कठमलिया कहैं, ग्यानी ग्यान बिहीन।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो, राम दुआरें दीन।। (दोहावली, ९९)
भजन के नाम पर कई मार्ग प्रचलित हैं, जैसे- कर्मकाण्ड, ज्ञान-मार्ग, उपासना-मार्ग इत्यादि; जबकि भजन में कोई दस-बीस मार्ग नहीं होता। भजन स्वयं एक मार्ग है, केवल एक आचरण है- दीनतापूर्वक एक परमात्मा के स्मरण में लग जाना। यही योगेश्वर श्रीकृष्ण का भी निर्णय है कि योग में निर्धारित क्रिया एक ही है और जो भजन के नाम पर अनेक क्रियाएँ करते हैं वे अविवेकी हैं। (गीता, २/४१)
* लेखक ने अन्तःकरण की शुद्धि तथा आत्मदर्शन के लिये यज्ञ, यज्ञोपवीत, ब्रह्मस्वरूपा संध्या-गायत्री, सूर्यार्घ, दान, प्राणायाम, यम-नियमादि और सत्यनारायण की कथा तक का उपयोग बताया है। इनमें से अहिंसा, सत्य इत्यादि यम तथा शौच, स्वाध्यायादि नियम तो अन्तःकरण को शुद्ध कर सकते हैं; क्योंकि ये क्रियाएँ मानसिक हैं, स्मृति के साथ इन क्रियाओं को करने से मन का निरोध होता है अन्यथा माला तो अभ्यासवश भी घूमती रह सकती है-
माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं।
मनवा तो चहुँ दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं।। (कबीर)
अस्तु, इन मानसिक क्रियाओं में भी परमात्मा की सतत स्मृति जरूरी है तभी आत्मशुद्धि सम्भव है; किन्तु बाहर वेदी बनाकर, यहाँ की वस्तु उठाकर वहाँ रखने से या अग्नि में कुछ जलाने से मन का निरोध क्यों होगा? प्रवृत्तिमूलक क्रियाओं से मन का निरोध आज तक किसी का न हुआ और न होगा। मन के संयम के लिये एकान्त-देश का सेवन, हर ओर से सिमटकर परमात्मा के ध्यान में लगना अपरिहार्य है। यह आत्मदर्शन की विधि है। सूर्य को जल देना आत्मदर्शन की विधि नहीं है। सूर्य को उस युग-जमाने में जल देते थे, जब सात घोड़ों की बग्गी पर सवार होकर उदयाचल से अस्ताचल की सीमित यात्रा करते-करते पसीने से लथपथ हो जाते थे और जब उनकी पत्नी उनका तेज नहीं सह पाती है, जिसके उदय के समय राक्षस चारों ओर से घेर लेते थे- अब इन पौराणिक रूपकों में निहित सत्य को कोई बताता नहीं, लोगों की रूचि इनमें नहीं रही। अब सूर्य को जल पिलाकर या जलाशयों को दीप दिखाकर आत्मदर्शन की आशा न करें। सनातन के नाम पर विश्व के लोगों को क्या आप यही सिखाना चाहेंगे?
सत्यनारायण व्रत में दो-चार ऊटपटांग कहानियों के माध्यम से श्रोता के मन में कदाचित् यह बात बैठ भी जाय कि ‘सत्य एव नारायणः’- एक परमात्मा ही सत्य है, तब तक कथा समाप्त हो जाती है। यह तो बताया नहीं जाता कि उस परमात्मा की प्राप्ति का आचरण कहाँ से आरम्भ करें? जिसमें क्रिया बतायी ही नहीं गई उस कथा का क्या उपयोग? रही बात यज्ञोपवीत और गायत्री से शुद्ध होने की। इस सम्बन्ध में आश्रम की एक पुस्तिका में विस्तार से द्रष्टव्य है। यहाँ केवल इतना ही कहना चाहेंगे कि आत्मशुद्धि का यह तरीका क्या केवल हिन्दुओं तक सीमित है; क्योंकि विश्व के अन्य लोगों को आप हिन्दू बनायेंगे नहीं, वह तो आपके अनुसार भगवान ही बना सकते हैं और हिन्दुओं में भी केवल तीस प्रतिशत लोगों को यज्ञोपवीत और गायत्री से शुद्ध होने का अधिकार है, शेष सत्तर प्रतिशत शूद्रों तथा विश्व के सभी लोगों को आत्मशुद्धि का दूसरा रास्ता ढूँढ़ना होगा।
विश्व के मानवमात्र को बिना किसी भेदभाव के वेद के ऋषि आह्वान करते हैं- ‘श्रृण्वन्ति विश्वे अमृतस्य पुत्राः’ (श्वेताश्वतरोपनिषद्, २/५)। बिना किसी भेदभाव के योगेश्वर श्रीकृष्ण सबके लिये आत्मदर्शन की एक ही विधि बताते हैं, तो आप अलग से क्यों गढ़ रहे हैं? क्या भगवान राम, कृष्ण, शिव इन विधियों से परिचित नहीं थे जो आप बता रहे हैं? गीता में कदम-कदम पर वर्णित इस विधि को आप मान क्यों नहीं लेते कि-
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। (गीता, ८/१२-१३)
अर्थात् इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर, मन को हृदय-देश में स्थिर करके प्राण अर्थात् अन्तःकरण के व्यापार को मस्तिष्क में निरोध कर ‘ॐ’ जो ब्रह्म का परिचायक है उसका उच्चारण करें- जप करें और ध्यान मेरा करें- किसी महापुरुष का करें। अध्याय छः में कहते हैं कि अन्तःकरण की शुद्धि के लिये मेरा ध्यान करें (६/१२-१४)। अध्याय अठारह में बताते हैं आत्मदर्शन की विधि कि, शुद्ध बुद्धि से एकान्त-देश का सेवन, युक्ताहार-विहार, शब्दादिक विषयों का त्याग तथा ध्यानयोग के परायण हो वैराग्य का आश्रय लें (१८/५२)। जब महापुरुष ने स्वयं विधि बतायी है, तो उसके अतिरिक्त नई-नई विधियों को गढ़ना जनता को गुमराह करके उनसे दक्षिणा लेने का उपक्रम मात्र है।
* गोस्वामीजी का बड़ा स्पष्ट विचार है कि-
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।। (मानस, १/२/५-६)
अर्थात् सद्बुद्धि, कीर्ति, परमगति, ऐश्वर्य और कल्याण- इतनी वस्तुओं को जिसने जब भी पाया, उसे सत्संग का परिणाम जानना चाहिये। इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय न वेद में है, न लोक में। जब कल्याण का दूसरा कोई उपाय वेद में नहीं है तो आप गऊ और ब्राह्मण की पूजा से परमगति किस वेद से सिद्ध कर रहे हैं? जो बातें वेद में आपको दिखाई दे रही हैं, क्या वे गोस्वामीजी को दिखाई नहीं पड़ी थीं? वेद विरोधी आप हैं या गोस्वामीजी, जिन्होंने लिखा कि- ‘श्रुति पुरान बहु कहे उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।’ (मानस, ७/११६/६) तब तो आप उन्हें भी कह देंगे- ‘चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े।’ (मानस, १/११/२)
‘अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार।’ (दोहावली, ४६४) गोस्वामीजी वेद हमसे या आपसे भी अधिक मानते थे, जानते थे। लिखी हो वेद में कोई बात; किन्तु गोस्वामीजी का विचार है कि-
श्रुति सिद्धान्त इहइ उरगारी।
राम भजिअ सब काज बिसारी।। (मानस, ७/१२२/२)
वेद ही नहीं, सभी पुराणों, किंवा सभी ग्रन्थों का निचोड़ केवल इतना है-
श्रुति पुरान सब ग्रन्थ कहाहीं।
रघुपति भगति बिनु सुख नाहीं।। (मानस, ७/१२१/१४)
सब ओर से सिमटकर एक परमात्मा में श्रद्धा का स्थिरीकरण यही वैदिक अवधारणा है-
सब कर मत खगनायक एहा।
करिअ राम पद पंकज नेहा।। (मानस, ७/१२१/१३)
तो आप भागेंगे कभी देवी की पूजा की ओर, तो कभी लक्ष-चण्डी यज्ञ की ओर!
कृपया स्पष्ट उत्तर दें कि वेद के आशय को उज्जैन के उन विप्र ने जाना था, जो वेद की ही विधि से शिव-पूजा करते थे, जिन्होंने शूद्र को शिवमन्त्र दिया था-
एक बार हर मन्दिर, जपत रहेउँ सिव नाम। (मानस, ७/१०६ क)
वह शूद्र शिव-मन्दिर में घुसकर बैठा था। या आज के लोग वेद के आशय को जानते हैं, जिन्होंने शूद्र के प्रवेश पर काशी में शंकरजी का दूसरा मन्दिर बना लिया, जो कहते हैं- ‘धर्म की जय हो।’- लेकिन मन्दिर में जाना मत! जायेंगे ही नहीं तो धर्म सीखेंगे कहाँ से? ‘प्राणियों में सद्भावना हो’- किन्तु हमें छूना मत! यह कैसी सद्भावना है? साँप न छूते, बिच्छू न छूते, किन्तु आदमी आदमी को न स्पर्श करे? ‘विश्व का कल्याण हो’- किन्तु समुद्र पार करना मत।
धर्म के नाम पर लोक और वेद में वर्णित क्रियाओं का मूल्यांकन भी गोस्वामीजी ने किया है-
तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना।
संजम दम जप तप मख नाना।।
भूत दया द्विज गुर सेवकाई।
बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरि भगति भवानी।। (मानस, ७/१२५/४-७)
वेदवर्णित इन सभी साधनों का फल है हरि भगति और ‘सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई।’ (मानस, ७/१२५/८)- श्रुति में एक परमात्मा की भक्ति का गायन हुआ है किन्तु भक्ति मिलेगी कहाँ? इन साधनों में? पुस्तक में? कहते हैं, नहीं –
भगति तात अनुपम सुख मूला।
मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।। (मानस, ३/१५/४)
‘धर्म तें बिरति’ (मानस, ३/१५/१)- धर्म वैराग्य-प्रधान है। ‘निज निज कर्म निरत श्रुति रीति।’ (मानस, ३/१५/६) श्रुति की रीति पर अपने-अपने धर्म के अनुसार चलने का परिणाम बताते हैं- ‘एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा।’ (मानस, ३/१५/७)- मुख्य ध्येय इन कर्मकाण्डों को करना नहीं, मन में विषयों के प्रति वैराग्य लाना है, इसके पश्चात् भगवान के चरणों में समर्पण- पूर्ण विरक्ति!
सम्पूर्ण रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने एक ही कर्म पर बल दिया है; किन्तु आप घूम-फिरकर अनेक क्रियाओं की पैरवी अवश्य करेंगे। कभी कहेंगे कि यह तो सत्संगति की महिमा में कहा गया है कर्मकाण्ड की निन्दा नहीं, तो कभी भक्ति की महिमा का वर्णन मानकर पुनः अनेक क्रियाओं की ओर भागेंगे। गोस्वामीजी का स्पष्ट आदेश देखें-
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।। (मानस, ३/३५ छन्द)
लेखक का आक्षेप है कि हम गीता का मनमाना अर्थ करते हैं; किन्तु गोस्वामीजी की भाषा तो सरल हिन्दी है। इसे तो सब समझते हैं। यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं कि अनेकों कर्म, अनेकों मत- यही सब अधर्म हैं और ‘अधर्म का नाश हो’- यह तो लेखक भी कहते हैं। ये शोकप्रद हैं, इनका त्याग करो। फिर करें क्या? केवल एक कर्म – श्रीरामजी के चरणों में प्रेम!
लेखक की पुस्तिका का उप-शीर्षक है- ‘चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े।’ किन्तु उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि गोस्वामीजी वेद-मग किसे मानते हैं और कुपंथ क्या है? आइये गोस्वामीजी के ही शब्दों में देखें-
श्रुति सम्मत हरि भक्ति पथ, संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस, कल्पहिं पंथ अनेक।। (मानस, ७/१०० ख)
श्रुति-सम्मत पथ क्या है?- क्या लेखक की गऊ-भक्ति? ब्राह्मण-भक्ति? संध्या-गायत्री-भक्ति? सत्यनारायण-भक्ति? सूर्य-भक्ति या कौन-सी भक्ति श्रुतिसम्मत है? गोस्वामीजी कहते हैं कि केवल हरि भक्ति! एकमात्र परमात्मा की भक्ति! यही वेद-मग है और केवल एक मग है। ‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।’ (श्वेताश्वतरोपनिषद्, ३/८)- कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं। इस एक के अतिरिक्त जो अनेक पथ, अनेक साधन, अनेक रास्तों की कल्पना करते हैं, गोस्वामीजी के अनुसार वही कुपंथी हैं। विचार करें कि ‘चलत कुपंथ’ की अर्द्धाली कहाँ लगेगी? गोस्वामीजी इसका प्रयोग अपनी दीनता निवेदन के सन्दर्भ में किया है, वे अपने में दोष ढूँढ़ते थे; किन्तु उनके मानस की कथा बाँचनेवाले कतिपय विद्वान् इसे दूसरों पर ही मढ़ने का उद्योग कर रहे हैं।
* लेखक ने इस बात को बहुत उछाला है कि ‘जन्मना जायते शूद्रः….’वाला श्लोक अत्रिस्मृति का नहीं है, हमने कैसे कह दिया? अतः उनकी जानकारी के लिए हम इतना और बताना चाहेंगे कि अत्रिस्मृति अभी तक मौखिक तथा यत्र-तत्र हस्तलिखित रूप में है और उसकी श्लोक-संख्या पर मतैक्य नहीं है। अत्रि के नाम से यह श्लोक किसी महात्मा ने ही बताया था। यह स्मृति मुद्रित रूप में देखने में नहीं आयी है अतः इस श्लोक को समीक्षा से पृथक् किया जा सकता है; किन्तु इतनी-सी बात से जन्मना जाति-व्यवस्था प्रमाणित हो गई क्या ? इसी क्रम में उन्होंने ध्यान दिलाया है कि ब्रह्म शब्द से ब्रह्मज्ञ बनता है ब्राह्मण नहीं बन सकता, आपने कैसे लिख दिया? हम पुनः कहना चाहेंगे कि अथर्ववेद में ‘ब्रह्म’ शब्द ब्राह्मण के अर्थ में आया है, यथा- ‘ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो नरिष्यतः।’ (२/१५/४)। तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी है कि- ‘ब्रह्म वै ब्रह्मणः क्षत्रं राजन्यः’ (३/९/१४)।
आश्चर्य है कि इतनी बाल की खाल निकालनेवाले लेखक महोदय ने स्वयं भी एक दोहा गढ़ा है, वह भी गोस्वामी तुलसीदासजी के नाम पर- ‘ब्रह्म ज्ञान जाना नहीं, कर्म दिया छिटकाय। सो नर पाँवर मूढ़ हैं, पुनि पुनि नरकहि जाय।।’
अत्रि तो अत्यन्त प्राचीन ऋषि थे, उनकी रचनाओं को लेकर मतभेद हो सकता है; किन्तु गोस्वामीजी की कृति तो जन-जन की जुबान पर है। उनके नाम पर इतना बड़ा झूठ देववाणी कल्पद्रुम कही जानेवाली संस्कृत की इस सूक्ति को चरितार्थ कर देता है कि-
खलः सर्षपमात्राणि परछिद्राणि पश्यति।
आत्मानस्तु बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति।।
लेखक इसलिये भी हताश हैं कि जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा, वह धर्म को क्या समझेगा। यहाँ हम लेखक से सहमत नहीं हैं; क्योंकि ईश्वरानुभूतिवाले अधिकांश महापुरुष पार्थिव शिक्षा में शून्य थे। व्याकरण जिन सूत्रों पर आधारित है, कहा जाता है कि वे सूत्र भगवान शंकर के डमरू से निकले हैं। उस डमरू ने कौन-सा व्याकरण पढ़ा था? मुण्डकोपनिषद् के इस मन्त्र की संगति कैसे लगायेंगे कि-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।। (३/२/३)
ब्रह्मविद्या के लिये शिक्षा और व्याकरण का कितना उपयोग है, इस पर मुण्डक उपनिषद् में विचार किया गया है। इस उपनिषद् के आरम्भ में ही एक कथानक है कि शौनक नाम के प्रसिद्ध मुनि थे। वे एक बहुत बड़े विश्वविद्यालय के कुलपति थे। पुराणों में है कि उनके निर्देशन में अट्ठासी हजार ऋषि पढ़ते थे। ब्रह्मविद्या जानने के लिए वे महर्षि अंगिरा की शरण में गये। (विचार करें, यदि यह विद्या किताबों में रही होती, तो वे क्यों जाते?) महर्षि अंगिरा ने उन्हें बताया कि विद्या दो प्रकार की होती है- एक परा और दूसरी अपरा। इनमें से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कला, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष- ये सब तो अपरा विद्या हैं; किन्तु जिससे वह परमात्मा जानने में आता है, वह परा विद्या है।
लेखक महोदय अपनी पुस्तिका के पृष्ठ ८ से मिलान करें, जहाँ उन्होंने लिखा है कि व्याकरण, ज्योतिष, शिक्षा, निरुक्त और कल्पसहित वेद का अध्ययन करना चाहिए! जहाँ मुण्डक उपनिषद् के ऋषि कहते हैं कि ब्रह्म को जानने के लिए न तो व्याकरण जरूरी है, न शिक्षा। गम्भीर बात तो यह है कि जिस वेद को आप मीमांसकों की तरह स्वतःप्रमाण तो कोई इसे परतःप्रमाण सिद्ध करने की माथापच्ची में लगे हैं, इन महर्षि ने तो चारों वेदों को भी काट दिया। क्या लेखक महोदय इन्हें भी नास्तिक कहने की धृष्टता करेंगे? यह मुण्डक उन एकादश उपनिषदों में है जिन्हें आदि शंकराचार्यजी ने सैकड़ों उपनिषदों के बीच से चुना था। ठीक इसी तरह की कथा छांदोग्य उपनिषद् (७/१/१-३) में है। सनत्कुमार के पास नारदजी आये। प्रार्थना किया कि भगवन्! उपदेश कीजिये।
अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदः स्त ँ् होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति।।१।। स होवाच ऋर्ग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि।।२।। सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुत ँ् ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति। सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवांछोकस्य पारं तारयत्विति….।।३।।
यहाँ नारदजी ने वेद-व्याकरणादि को आत्मज्ञान के लिये अनुपयुक्त बताया। सनत्कुमारजी ने उन्हें बताया कि यह सब वाणी के विषय हैं। इससे भी आगे मन है, बुद्धि है। भगवान इससे भी परे हैं। ध्यान द्वारा उन्हें पाया जा सकता है। वे पंचमहाभूतों के ऊपर प्राण के भी प्राण हैं, भूमा हैं, अमृत हैं, सर्वत्र हैं, आत्मा हैं। सातवें अध्याय में वर्णित इस स्पष्ट प्रकरण से बच निकलने के लिए लेखक महोदय तर्क देंगे कि यह कथन वेदादि शास्त्रों की तुच्छता बताने के लिए नहीं, आत्मज्ञान की महत्ता सूचित करने के लिये है। अतः व्याकरण रटनेवालों के लिये आदि शंकर के विचार देखें-
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते।
प्राप्ते सन्निहिते मरणे न हि न हि रक्षति डुकृंकरणे।।
इतनी स्पष्ट चेतावनी को भी क्या लेखक महोदय कह सकते हैं कि यह व्याकरण की तुच्छता बताने के लिए नहीं, मृत्यु की महिमा बताने के लिये कहा गया है। व्याकरण रटनेवालों को शंकराचार्यजी ने ‘मूढमते’ कहा है, कितना फटकारा है कि मौत आने पर व्याकरण के सूत्रों को रटना काम नहीं आयेगा, फिर भी आप व्याकरण की पैरवी कर रहे हैं, व्याकरण रटाकर आत्मज्ञान दे रहे हैं। आदि शंकराचार्यजी ने जिन-जिन बातों को मना किया था, लगता है उनके स्वयंभू पीठाधीश्वर लेखक महोदय वह सब करने पर तुल गये हैं। यदि सन्त कबीर की बात कहें कि ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ’ केवल मृत्यु हाथ लगती है, तो आप कहेंगे कि वे तो ‘कलम गह्यो नहिं हाथ’ वालों में से थे। अतः आप गोस्वामी तुलसीदासजी की सलाह पर विचार करें-
बाक्य-ज्ञान अत्यन्त निपुन भव-पार न पावै कोई।
निसि गृहमध्य दीप की बातन्ह, तम निबृत्त नहिं होई।।
जबलगि नहिं निज हृदि प्रकास, अरु विषय-आस मनमाहीं।
तुलसिदास तबलगि जग-जोनि भ्रमत सपनेहुँ सुख नाहीं।। (विनयपत्रिका, १२३)
इसलिये बन्धुओ! मानव-तन की सार्थकता तो तब है जब आप ऐसा कुछ यत्न करें कि हृदय में प्रकाश उत्पन्न हो जाय। बच निकलने के लिये यह तर्क मत दीजियेगा कि यह तो हृदय-प्रकाश की प्रशंसा में कहा गया है, वाक्य-ज्ञान की तुच्छता बताने के लिए नहीं। कोई मना कर रहा है कि इस नाव में छिद्र है, नई दृढ़ नाव में बैठिये। यह कहकर जीर्ण-शीर्ण नौका में मत बैठियेगा कि यह तो नई नाव की प्रशंसा में कहा जा रहा है।
संस्कृत और व्याकरण जानने का दावा करनेवाले इन लेखक महाशय ने अपनी पुस्तिका के पृष्ठ १२ पर ‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्यकार्य व्यवस्थितौ।’ (गीता, १६/२४) का अर्थ लिखा है कि- धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, कार्य-अकार्य सबके निर्णय में वेद ही प्रमाण है। इस श्लोकांश का क्या यही अर्थ होता है? इसमें वेद शब्द किस शब्द का अर्थ है? शास्त्र माने वेद होता है क्या?
अध्याय पन्द्रह के अन्त में योगेश्वर ने स्वयं बताया है कि शास्त्र से उनका आशय क्या है? गीता शास्त्र है- ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’ (गीता, १५/२०) और अध्याय सोलह के इस श्लोकांश में कहते हैं कि कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में तेरे लिये शास्त्र ही प्रमाण है, तो आप शास्त्र के नाम पर वेद की ओर ही क्यों भागते हैं? विशेषतः उस दशा में जबकि वक्ता स्वयं अपना शास्त्र बता रहा हो।
जिन महापुरुष ने वेद का संकलन किया, उन व्यासजी ने वेद को शास्त्र नहीं कहा, उनके नाम से प्रचारित उत्तर-मीमांसा या वेदान्त को शास्त्र नहीं कहा, जिसे छः शास्त्रों में गिना जाता है, तो शास्त्र के नाम पर आप इधर-उधर क्यों भागते हैं? महाभारत, भीष्मपर्व के तैंतालीसवें अध्याय में व्यासजी ने लिखा है- ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ कहीं आप इसे गीता की स्तुति न मान लें। अन्य शास्त्रों के संचय को अनावश्यक बताया- ‘किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः’। होते हों अनेक शास्त्र; किन्तु ‘सर्वशास्त्रमयी गीता’ कहकर व्यासजी ने अपना निर्णायक मत दे दिया, तो आप गीता को अपना शास्त्र मान क्यों नहीं लेते? वेद का नाम लेकर उस वेदान्त दर्शन की ओर क्यों भागते हैं जिसके पहले अध्याय में ही धर्म बताया गया है कि शूद्र को ब्रह्मविद्या या वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है और प्रमाण दिया गया है स्मृतियों का- ‘श्रवणाध्ययनादि प्रतिषेधात् स्मृतेश्च…’ (१/३/३८)
आदि शंकराचार्यजी ने भी अनेक धर्मग्रन्थों के बीच गीता का ही नाम लिया है ‘गेयं गीता नाम सहस्रं’– गायन योग्य है तो गीता। सहस्रनाम का अर्थ विष्णु सहस्रनाम की पुस्तक नहीं बल्कि उस परमात्मा के हजारों, असंख्य नाम हैं उनमें से किसी नाम का गायन (जप)। ‘भगवद्गीता किंचितधीता’ जिसने गीता को थोड़ा भी पढ़ लिया, आगे कहते हैं कि यम उसका क्या कर लेगा? पढ़ने के लिये यदि किसी ग्रन्थ की उन्होंने सिफारिश की तो वह थी गीता। आप भी उनके निर्देशों को मानें और गीता को ही धर्मशास्त्र घोषित कर एकता के सूत्रधार बनें।
* विद्वन्प्रवर का तर्क है कि वेद में यज्ञों का वर्णन है जिसे करना धर्म है। यहाँ हम लेखक के शब्दों को उद्धृत करना चाहेंगे, जिससे यज्ञ-सम्बन्धी उनकी अवधारणा स्पष्ट हो सके। वे लिखते हैं कि यज्ञ विहित और अविहित दो प्रकार का होता है। अविहित यज्ञ तो हम सब करते रहते हैं, जैसे- मुख में ग्रास डालना, आटे में पानी डालना इत्यादि; किन्तु विहित यज्ञ वह है जिसमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्नि में आहुति डाली जाती है। वह आहुति सूर्यमण्डल में जाती है। सूर्यमण्डल से वर्षा द्वारा वनस्पतियों में, अन्न में और प्राणियों के वीर्य में आती है, उसी से प्राणियों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार यह सृष्टि-चक्र चलता है।…..अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास लक्षाहुति यज्ञों में गाय के दूध-दही- घी-गोबर तथा मूत्र तक की जरूरत है। यदि वेदशास्त्रानुमोदित धार्मिक यज्ञों में गोजनित पंचगव्य का अपरिहार्य महत्त्व है, तो गाय को धर्म मानने में क्या आपत्ति है?
आपत्ति तो कुछ भी नहीं है, हम मान भी लेते; किन्तु यज्ञ में पंचगव्य लगने से गाय धर्म हो गई, तो यज्ञ में तो बहुत-सी वस्तुओं का प्रयोग होता है। यज्ञ में समिधा लगती है, तो पेड़ को धर्म मान लें? जौ-तिल-दसांग भी लगता है, उन्हें धर्म क्यों नहीं मान लेते? यज्ञ में शहद लगता है, तो मधुमक्खी को धर्म मानने में क्या आपत्ति है? गाय से पाँच नहीं, कई वस्तुएँ मिलती हैं- गोबर, मूत्र और दूध। दूध का रूपान्तरण दही और घी है, छेना भी बना सकते हैं। यह तो उसके प्रयोग हैं। उसके चमड़े और हड्डी तक का उपयोग है; किन्तु पंचगव्य जैसे विशिष्ट आविष्कार की चर्चा गीता में तो कहीं है नहीं। गाय का दूध निःसन्देह पौष्टिक है, आधा किलो तक भी दूध देनेवाली गाय संरक्षणीय है। शिशुओं के रूप में कल का भारत इन्हीं पर निर्भर है। इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए; किन्तु उसे धर्मस्वरूपा न बनायें- क्योंकि आपके पाराशर स्मृति में है कि शूद्र यदि कपिला गाय का दूध पीता है तो नरक जायेगा। सत्तर प्रतिशत बच्चों के लिये तो गाय नरकदात्री बन गई, जिसके लिये धर्मस्वरूपा होती हो वह जाने! आश्रम की पुस्तिका में हमने गाय की उपयोगिता से इनकार नहीं किया है। हमने तो अस्वीकार किया है उसकी धार्मिकता को, गाय की पूँछ पकड़ाकर वैतरणी पार कराने की कुप्रथा को। आश्रम की उस पुस्तिका में यह भी नहीं लिखा है कि ‘गो’ शब्द का अर्थ सर्वत्र इन्द्रिय ही होता है। उस पुस्तिका में है कि मानस में ७० बार गाय और उसके पर्यायों का प्रयोग है, जिसमें १७ बार पशुरूप में उदाहरण मात्र है, तेरह बार मूल्यवान् सम्पत्ति के रूप में है और चालीस बार ‘गो’ शब्द इन्द्रिय-अर्थ में है। भगवान अवतार लेते हैं लेकिन किसी पशु के लिये नहीं बल्कि अमलात्मा भक्तों के सकलेन्द्रिय-संयम के लिये।
आटे में पानी मिलाना, मुख में ग्रास डालना या अग्नि में कोई वस्तु जलाना- यह कौन-सा यज्ञ है? गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक ही यज्ञ की तेरह-चौदह क्रियाओं को अध्याय चार में बताया; किन्तु इन यज्ञों की चर्चा तक नहीं है। लगता है योगेश्वर श्रीकृष्ण अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमासादि यज्ञ नहीं जानते थे अन्यथा वे गीता में इसकी चर्चा अवश्य करते। योगेश्वर ने जिस यज्ञ को बताया है उसके अतिरिक्त नाममात्र के यज्ञों को, जो यज्ञ नहीं हैं; किन्तु लोगों ने यज्ञ का नाम दे रखा है, ऐसा यज्ञ करनेवालों को क्रूरकर्मी, नराधम और पापाचारी कहा है। अध्याय सोलह में है कि ऐसे दम्भियों को वे बार-बार आसुरी और अधम योनियों में गिराते हैं- (१६/१७-१९)।
इस वैज्ञानिक युग में शहरों का कचरा अग्नि में ही तो जलाया जाता है। तब तो हो गया यज्ञ? अग्नि में स्वाहा बोलने से बादल नहीं, कार्बन-डाई-आक्साईड बनती है। इससे वायु शुद्ध होने को कौन कहे, प्रदूषण फैलता है। यह धुआँ न तो सूर्य तक पहुँच पाता है और न इससे पानी बरसने में ही कोई सहयोग मिलता है। लेखक द्वारा दी गई व्याख्याओं से ऐसा लगता है कि वेद परमात्मा का निःश्वास या परमात्मा की कृति भी नहीं है; क्योंकि सृष्टि के रचयिता को इतना तो ज्ञान होना चाहिये था कि बादल कैसे बनता है? यदि यज्ञ के धुएँ से ही सृष्टि-क्रम चलता है तो जिन देशों में यज्ञ नहीं हुए वहाँ किस धुएँ से सृष्टि चल रही है? यहाँ की सृष्टि तो आप चला रहे हैं (धुआँ करके), वहाँ कौन सृष्टि चला रहा है? और मन्त्र भी क्या है? उस युग-जमाने की प्रचलित भाषा में की गई गद्यात्मक अथवा पद्यात्मक प्रार्थनाएँ! अस्तु गीता का प्रमाण देकर जिन यज्ञों को लेखक ने पृष्ठ तेरह पर गिनाया, वे गीता में हैं ही नहीं। उन्होंने लिखा है- ‘गीता में मात्र श्रौत-स्मार्त यज्ञों को ही यज्ञ नहीं कहा गया अपितु चौदह प्रकार के यज्ञों को समझना चाहिये।’ गीता में जिन चौदह यज्ञों का वर्णन है यदि लेखक उन्हें लिख देते तो सबको स्पष्ट हो जाता कि इन सब यज्ञों में बाहर की कोई वस्तु नहीं लगती, सभी यज्ञ मानसिक हैं। लेखक ने लेबल (शीर्षक) तो लगाया गीता का; किन्तु भीतर वस्तु अपने कुतर्क से भर दिया।
जिन श्रौत-स्मार्त यज्ञों पर लेखक जोर देते हैं उनमें से वैदिक इष्टियों को आज का समाज जानता भी नहीं। वेद के कुछ शब्दों को यज्ञार्थक मानकर उसके विधि-विधान के लिये कई संहिताएँ, कई आरण्यक, कल्पग्रन्थ (श्रौत-सूत्रादि) और ब्राह्मण-ग्रन्थ (शतपथ, ऐतरेय, ताड्य, गोपथ इत्यादि) लिखे गये हैं और इनको भी चारों वेदों के बराबर मान लिया गया है। इनमें वर्णित सभी यज्ञों में प्रमुख हैं सात प्रकार के सोमयज्ञ- अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। इन सबमें सोलह-सोलह पुरोहित लगते हैं, जिनकी दक्षिणा सहस्रों गायें हैं। राजसूय यज्ञ की दक्षिणा दो लाख चालीस हजार गाय है। सौत्रामणी यज्ञ में सुरा की आहुति और पशुओं की बलि दी जाती है। अश्वमेध यज्ञ में पटरानी मृत अश्व के पार्श्व में लेटती है और सभी पुरोहितों का रानियों और उनकी नवयुवती दासियों से अश्लील भाषा में गालियों का दौर चलता है।
इन यज्ञों के अतिरिक्त प्रत्येक ऋतु की सन्धि पर तीन-चार चातुर्मास्य जैसे- वैश्वदेव, वरुण प्रघास, साकमेघ और शुनासीरीय; प्रत्येक नये फसल को खाने से पहले आग्रयण यज्ञ, निरूढ़ पशुबन्ध अर्थात् आँत निकाले हुए पशु की आहुति, वर्षा कराने के लिये बादलों की तरह काला कपड़ा पहनकर ‘कारीरिष्ट’, सुरक्षापूर्ण यात्रा के लिये ‘सज्ञानी’, पुत्र के लिये ‘पुत्रकामेष्टि’; सात प्रकार के हविर्यज्ञ जिसमें अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श अर्थात् अमावस्या के दिन किया जानेवाला यज्ञ, पौर्णमास इत्यादि यज्ञ आजीवन करते रहने का आदेश दिया गया है। प्रत्येक यज्ञ में जरूरी है कि पुरोहितों द्वारा यजमान की पत्नी का सन्नहन। वह भी उस विधि से, जिसे न लिखना ही उचित है, उस तरह से मेखला पहन लेने के बाद ही यजमान की पत्नी यज्ञ में सम्मिलित हो सकती है।
बहुत से यज्ञ एकाह अर्थात् एक दिन में होते हैं, जैसे- विश्वजित्, जिसमें सम्पूर्ण सम्पत्ति का दान करना होता है। गोसव यज्ञ में यजमान को एक वर्ष तक पशु की तरह जल पीना, पषु की तरह भोजन करना, माँ-बहन-बेटी-स्त्री सबके साथ पशुवत् समान पारिवारिक व्यवहार करना होता है। ‘शुनः कर्णोग्निष्टोम’ यज्ञ में यजमान अपना सब कुछ पुरोहितों को सौंपकर स्वर्ग के लिये अग्नि में प्रवेश कर जाता है। कोई यज्ञ तीन दिन, कोई दस दिन, कोई बारह दिन, एक वर्ष, सौ-सौ वर्ष और कई हजार-हजार वर्षों तक चलनेवाले हैं जिनमें समापन की पूर्व संध्या पर सभी स्त्री-पुरुष प्रजापति की प्रसन्नता के लिये सामूहिक रूप से मैथुन कर्म में प्रवृत्त होते हैं जिसे महाव्रत कहा गया है।
ये हैं अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमासादि, श्रौत-स्मार्त यज्ञ, जिसे लेखक महोदय वेद के नाम पर श्रद्धालु जनता के गले मढ़ना चाहते हैं; किन्तु विज्ञजनों से हमारा निवेदन है कि वेद में यज्ञ का यह स्वरूप नहीं है। पुरुष-सूक्त में जिस मानसिक यज्ञ की कल्पना है, वही और उतना ही गीता में है। वेद में नाम पर नाना प्रकार के यज्ञों का सृजन बादवालों की देन है। हजारों वर्षों में समाज में इनमें से कोई यज्ञ देखने में नहीं आया। कोई इन्हें करता नहीं, करना चाहेगा भी नहीं। यदि ये प्रचलन में ही रहे होते तो आज यह अटकल लगाने की जरूरत न पड़ती कि सोम कौन-सी जड़ी-बूटी है? कहाँ मिलती है। विद्वान् लेखक विधि-विधान लिखकर प्रकाशित कर देते तो वेद-वेद चिल्लानेवालों के उत्साह की परीक्षा हो जाती। जनता भी जानती कि कौन इन विधानों का कितना पालन कर सकता है और स्वयं लेखक महोदय इन विधियों से कौन-सा यज्ञ कर चुके हैं या करते हैं?
जिन यज्ञों को कोई करता नहीं, इतनी जटिलतायें हैं कि कोई कर भी नहीं सकता, अनेक शब्दों के अर्थ विस्मृत हो गये, ऐसे यज्ञों की उपयोगिता को मूल्यांकन करते हुए मुण्डक उपनिषद् के ऋषि कहते हैं कि स्वर्ग की प्राप्ति के लोभ में लोग इनको करते हैं; किन्तु इनकी क्रियाओं में तनिक भी भूल होने पर ये यज्ञ उस अग्निहोत्री के सातों पुण्य-लोकों का नाश कर देते हैं। यह है इन यज्ञों का परिणाम।
इसी उपनिषद् में इन यज्ञों की व्यर्थता बताते हैं कि निश्चय ही ये अठारहों प्रकार की यज्ञ-नौकाएँ दृढ़ नहीं हैं। इनमें जो कर्म बताया गया है, वह निम्नकोटि का है। जो इन्हीं को कल्याण का मार्ग बताते हैं, जो इनकी प्रशंसा करते हैं, वे मूढ़ हैं और वे बारम्बार जरा और मृत्यु को ही प्राप्त होते रहते हैं (१/२/७)।
कहीं कोई गुंजाइश न निकाल लें इसलिये ऐसे मूढ़लोगों को दसवें मन्त्र में पुनः सचेत करते हैं कि इष्ट और पूर्त कर्मों को श्रेष्ठ माननेवाले लोग ‘प्रमूढा’ अर्थात् विशेष रूप से मूढ़ हैं। ये लोग श्रेय जानते ही नहीं। वे कल्पित स्वर्ग में इनका फल भोग कर इस मनुष्य शरीर या इससे भी अत्यन्त हीन-योनियों में प्रवेश पाते हैं (१/२/१०)। आश्चर्य है कि अद्वैत को लक्ष्य माननेवाले स्वर्ग का अस्तित्व स्वीकार करते हैं और उसी की प्राप्ति के लिये कर्मकाण्डों की पैरवी करते हैं। अच्छा तो यह होता कि वास्तविक यज्ञ बताया जाय जैसा कि गीता में है। उसमें हवन भी है- श्वास का प्रश्वास में हवन, संकल्पों का हवन। उस यज्ञ का परिणाम मोक्ष है जिसे शरीर रहते ही प्राप्त करना है। उस यज्ञ को करने का अधिकार मानवमात्र को है। भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ को योगेश्वर ने अत्यल्प बताया, तुच्छ बताया, तो आप वह यज्ञ क्यों नहीं करते जिसका परिणाम अनन्त है?
* लेखक ने जाति-व्यवस्था को गीता से सिद्ध करने का हास्यास्पद प्रयास किया है क्योंकि वेद और गीता का वर्ण आज की जाति-व्यवस्था नहीं है। वर्ण का अर्थ है रंग या आकृति, जैसा कि ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में है। वेद में दैवी वर्ण, असुर वर्ण, ‘कृष्ण च वर्णं अरुणं च’ ‘उभौ वर्णौ’- दो वर्ण माने गये। वर्ण शब्द गुणवाचक है, भजन की क्षमता मापने की ईकाई है जबकि जाति शब्द में है- जन्म से निर्धारण, विवाह और खानपान में छुआछूत का विचार, जीविका के निर्धारित व्यवसाय, व्यवसाय-भेद से बहुत-सी उपजातियाँ, ऊँच-नीच की भावना और बिरादरी पंचायतें। वेद में वर्ण शब्द का प्रयोग कहीं भी इन अर्थों में नहीं है और जिस पुरुष-सूक्त में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की चर्चा है, मजे की बात तो यह है कि वहाँ वर्ण शब्द का प्रयोग ही नहीं है।
गीता के ‘अन्तवन्त इमे देहा’ के विरुद्ध लेखक ने बताया है कि शरीर नाशवान् होते हुए भी समष्टि में नाशवान् नहीं है। उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि समष्टि में ब्राह्मण और शूद्र का बँटवारा भी होता है क्या?
समान प्रसवात्मिका जातिः। समान नस्ल के समान सन्तान उत्पन्न करनेवालों की एक जाति मानी जा सकती है, जैसे- कुत्ता कुतिया के साथ ही अपने समान प्रजनन कर सकता है। बकरी से कुत्ता पैदा नहीं होता। इस प्रकार कुत्ता अलग जाति है, बकरी पृथक् जाति है। न्यायदर्शन के इस सूत्र-जैसा गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं- ‘बड़े भाग मानुष तनु पावा।’ (मानस, ७/४२/७) मानव तन एक जाति है। ब्राह्मण तन और क्षत्रिय तन नहीं, केवल मानुष तन पर्याप्त है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तो आन्तरिक योग्यता की डिग्रियाँ थीं, जिनका प्रयोग व्यवस्थाकारों ने सामाजिक स्तरीकरण के लिए भी करके एक भ्रम पैदा कर दिया। बाहर वर्ण होता ही नहीं।
लेखक महोदय अपनी पुस्तिका के पृष्ठ दो-तीन का पुनरावलोकन करने की कृपा करें, जहाँ उन्होंने लिखा है कि शम, दम, तप, शौच, शान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं उपार्जित नहीं तथा परिचर्या शूद्र का स्वाभाविक कर्म है उपार्जित नहीं। विचार और कार्य गुणों के अधीन होते हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर तत्तद् वर्णों में जन्म होता है। जो जिस शरीर से पैदा हो गया वही उसकी जाति हो गई। परिष्कार मन का होता है तन का नहीं। अर्थात् लाख अच्छे या बुरे कर्म किये जायँ जाति नहीं बदलेगी। वह तो शरीर बदलने के समय गुण-संस्कार देखकर भगवान पुनः वैसी जाति में जन्म देंगे।
यहाँ गीता के अठारहवें अध्याय के जिन श्लोकों को लिया गया है उनका वह अर्थ नहीं है जो लेखक ने दिया है। श्लोक में ‘ब्रह्मकर्म स्वभावजम्’, ‘क्षात्रं कर्म स्वभावजम्’, ‘वैश्यकर्म स्वभावजम्’ और ‘शूद्रस्यापि स्वभावजम्।’ क्या स्वभावजम् का अर्थ स्वाभाविक होता है? ‘उपार्जित नहीं’- यह वाक्यांश श्लोक में किस शब्द का अर्थ है? स्वभावजम् का अर्थ है स्वभाव से उत्पन्न। समासान्त ज का अर्थ होता है जायमान, पैदा हुआ या उद्भुद, जैसे- जलज, अण्डज इत्यादि। फिर आप जैसे संस्कृत के धुआँधार विद्वान् से ऐसी गलती कैसे हो गई?
हम इस पर विचार करना चाहेंगे कि लेखक ने स्वभाव से उत्पन्न के स्थान पर जान-बूझकर ‘स्वाभाविक’ क्यों लिखा और ‘उपार्जित नहीं’ क्यों जोड़ा? वह कहना चाहते हैं कि स्वाभाविक अर्थात् जन्मजात, जन्म के साथ-साथ जिसका निर्धारण हो गया, जिसे बदला नहीं जा सकता, जैसे- प्रकाश सूर्य का सहज गुण है, अर्जित नहीं। जलना अग्नि का सहज गुण है, अर्जित नहीं।
इस प्रकरण में लेखक ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का कर्म तो बताया; किन्तु इन श्लोकों से पहले का एक श्लोक छोड़ दिया जिसमें बताया गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र का कर्म कैसे निर्धारित होता है? कोई प्रकरण जहाँ से आरम्भ होता है वहाँ से लेना चाहिये। प्रमाण से पलायन कब तक करेंगे? वह श्लोक इस प्रकार है-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (गीता, १८/४१)
‘स्वभावप्रभवैः’ का क्या अर्थ होता है? वही जो ‘स्वभावजम्’ का होता है। ‘प्रभवैः’ का अर्थ है- उत्पन्न होनेवाला। जन्म से नहीं, स्वभाव से उत्पन्न। स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा इन चारों के कर्म बाँटे गये। बाँटने का पैमाना है गुण, और बँटनेवाली वस्तु है कर्म। ‘कर्माणि प्रविभक्तानि’– कर्म बाँटे गये हैं, न कि मनुष्य।
स्वभाव बदलता रहता है। यदि स्वभाव कभी बदला ही न जा सकता, तो मानव-तन की सार्थकता ही क्या है? यदि यह जन्म लेने से ही निर्धारित होता तो उस जाति में पैदा होनेवाले सभी लोगों में एक समान गुण पाया जाता, जैसे- सभी ब्राह्मण ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न होते; किन्तु ऐसा नहीं पाया जाता। मनुस्मृति में है कि केवल जाति के नाम पर जीनेवाला और केवल नाम से ब्राह्मण कहलानेवाला ब्राह्मण भी राजा की ओर से धर्म का प्रवक्ता हो सकता है; किन्तु शूद्र कभी नहीं हो सकता। (८/२०) क्यों? जाति में जन्म यदि स्वभाव से बने गुणों के आधार पर भगवान ने दिया, तो निर्धारित कर्म उससे क्यों नहीं हुए? क्या भगवान से भी भूल होती है?
वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। स्वभाव और गुणों में परिवर्तन करना हर मनुष्य के वश में है। महर्षि बनने में वाल्मीकि का स्वभाव ही तो बदला था। तुलसीदास स्वभाव बदलने से ही गोस्वामी बन गये। योगेश्वर श्रीकृष्ण भी स्वभाव और गुण को परिवर्तनशील मानते हैं। गीता के अध्याय चौदह में है-
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।। (गीता, १४/१०)
अर्थात् रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है। सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण तथा सत् और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है। अर्थात् तीनों गुणों में से किसी को भी घटाया-बढ़ाया जा सकता है। गुणों में परिवर्तन होता है।
बीसवें श्लोक में बताते हैं कि पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को लाँघकर जन्म-मृत्यु से मुक्त होकर अमृततत्त्व को प्राप्त होता है।
स्पष्ट है कि गुणों को बदला जा सकता है, इनसे ऊपर उठा भी जा सकता है। गुणों से पार जाने के लिए ही मानव-तन मिला है। गुणों से पार होने का तरीका भगवान स्वयं बताते हैं-
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते।। (गीता, १४/२६)
अर्जुन! जो कोई भी अव्यभिचारिणी अर्थात् अनन्य भाव से भक्तिपूर्वक मेरा स्मरण करता है, वह इन तीनों गुणों को भली प्रकार लाँघ जाता है और ब्रह्म को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।
जब इसी शरीर में, इसी जीवन में तीनों गुण बदल सकते हैं, तो वर्ण क्यों नहीं बदलेगा? गुण पर ही तो वर्ण आधारित था। अतः एक ही जन्म में हर व्यक्ति क्रमशः शूद्र से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय, क्षत्रिय से ब्राह्मण बन सकता है और अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा गुणों को पार कर लेने पर आदि शंकराचार्य की तरह उद्घोष कर सकता है कि ‘न ब्राह्मणो न क्षत्रियः न वैश्यो न शूद्रश्चिदानन्द रूपो शिवो केवलोऽहम्।’ वह तीनों गुणों और तज्जन्य चारों वर्णों से ऊपर उठकर स्वरूप की स्थिति प्राप्त कर लेता है।
योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि भी स्वभाव को परिवर्तनशील मानते हैं। ‘वृत्ति सारूप्यमितरत्र।’– जैसी वृत्ति जैसा स्वभाव, वैसा पुरुष! मनुष्य जो करता है वही उसका स्वभाव बन जाता है। अंग्रेजी में है कि ‘स्टाइल इज द मैन हिमसेल्फ।’ पूज्य महाराजजी कहा करते थे- ‘गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द।’ (विनयपत्रिका, पद २०३) सिद्ध है कि गुण और स्वभाव बदले जा सकते हैं, त्यागे भी जा सकते हैं। अस्तु, वर्ण में परिवर्तन स्वतः सिद्ध है।
लेखक के अनुसार पूर्वजन्मों के कर्मजन्य संस्कारों, तज्जन्य गुणों को देखकर भगवान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के शरीर में जन्म देते हैं। विचारणीय है कि इस प्रकार न तो ईसाई जन्मता है, न मुसलमान जन्मता है। न पारसी, जैन, बौद्ध या सिख ही इस प्रकार से पैदा होता है। क्या सृष्टि भर में केवल भारत और भारत में भी मुट्ठी भर हिन्दुओं को इन चार जातियों में जन्माने के लिए भगवान की कोई अलग से व्यवस्था है?
अपनी पुस्तिका के पृष्ठ दो पर लेखक ने लिखा है कि तमोगुण की प्रधानता से शूद्र की रचना की- जो गीता के विरुद्ध है; क्योंकि तमोगुण की अधिकता होने पर मूढ़योनियों में, कीट-पतंगादि तिर्यक् योनियों में जन्म मिलता है (१४/१५-१८)। यदि तमोगुण की अधिकता में मरनेवाले भारत के शूद्र ही बनने लगें, तो कीट-पतंग कौन बनेगा? फिर तो सृष्टि का एक अंग अधूरा ही रह जायेगा।
गीता के अध्याय ४/३१ में है कि यज्ञ न करनेवालों को मानव-शरीर मिलता ही नहीं, यह लोक मिलता ही नहीं और लेखक महोदय शूद्र को यज्ञ का अधिकार मानते ही नहीं, तो शूद्र पैदा कैसे हो गये और आगे इन बेचारों को मनुष्य-तन भी कैसे मिलेगा? जैमिनि की पूर्वमीमांसा में है कि अग्निहोत्र और वैदिक यज्ञों के लिये शूद्र को अधिकार नहीं है। तैत्तिरीय संहिता में है- ‘शूद्रो मनुष्याणां अश्वं पशुनां….तस्माच्छूद्रो यज्ञेनऽवक्लृप्तः। (७/१/१-६)- जैसे पशुओं में घोड़ा वैसे मनुष्यों में शूद्र है। शूद्र यज्ञ के योग्य नहीं है। ताण्ड्य महाब्राह्मण में लिखा है-
तस्माच्छूद्र बहुपशुरयज्ञियो विदेवो न हि तं काचन देवतान्व सृज्यन्त तस्मात्पादावनेज्यं नाति वर्धते पत्तो हि सृष्टः। (६-१-११)
अर्थात् शूद्र, भले ही उसके पास बहुत से पशु हों, यज्ञ करने के योग्य नहीं है। वह देवविहीन है, उसके लिये किसी देवता की रचना नहीं की गई है; क्योंकि उसकी उत्पत्ति पैरों से हुई है।
यह है आपका वैदिक साहित्य! क्या यही भगवती श्रुति है? क्या यही अपौरुषेय व्यवस्था है? नहीं, श्रुति यह नहीं है। श्रुति का यह आशय भगवान श्रीकृष्ण ने जाना था। गीता के अध्याय ९/३२ से तुलना करें, जहाँ भगवान कहते हैं कि स्त्री, पुरुष, शूद्रादि तथा कोई पापयोनि क्यों न हो, मेरी शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होता है। यहाँ शूद्र को शरण देनेवाला देवता भी है, भजन का एक-जैसा अधिकार सबको है और परिणाम में एक-जैसी परमगति का विधान सबके लिये है। भगवान ने कोई भेदभाव नहीं बनाया।
लेखक का दावा है कि स्मृतियों में या प्राचीन ग्रन्थों में किसी जाति के साथ पक्षपात नहीं किया गया है। आइये देखें कि इस पंक्ति में कितनी सचाई है। वैश्यों के लिये तैत्तिरीय संहिता में है- ‘वैश्यो मनुष्याणां गावः पशूनां तस्मात्त आघाअन्नधानादध्य सृज्यन्त तस्माद् भूयांसोऽन्येभ्यः।’ (७/१/१/५) अर्थात् मनुष्यों में वैश्य और पशुओं में गाय अन्य लोगों के उपभोग की वस्तुएँ हैं। वे भोजन के उद्देश्य से उत्पन्न किये गये हैं, इसी से संख्या में अधिक हैं।
क्षत्रियों के लिये है कि कोई कार्य आरम्भ करने से पूर्व उन्हें किसी ब्राह्मण से आज्ञा लेनी चाहिए। एक ब्राह्मण बिना राजा के रह सकता है; किन्तु ब्राह्मण के बिना एक राजा का भी काम नहीं चल सकता। मनुस्मृति में है कि दस वर्ष के ब्राह्मण और सौ वर्ष के क्षत्रिय को पिता-पुत्र समझना चाहिए। दोनों में ब्राह्मण पिता है, पूज्य है (२/१३५)।
अब उन सुविधाओं का भी अवलोकन करें, लेखक के अनुसार, जिनके लिये मनुस्मृति में लिखा बताया है कि ‘जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः’ अर्थात् ब्राह्मण जन्म से होता है; क्योंकि लोग प्रश्न कर सकते हैं कि आपका आचरण? तब एक ही उपाय है कि हम जन्म से होते आये हैं। तैत्तिरीय संहिता में लिखा है कि देवता दो प्रकार के होते हैं। देवता तो देवता हैं ही, ब्राह्मण भी जो पवित्र ज्ञान का अर्जन करते और पढ़ाते हैं, मानव देवता हैं (४/१/४/६)। मनुस्मृति में है कि यदि ब्राह्मण चोरी भी करता है तो धार्मिक राजा उसे दण्ड न दे; क्योंकि राजा की मूर्खता से ही वह ब्राह्मण भूख से कष्ट पा रहा है। दण्ड के स्थान पर राजा को चाहिये कि उसके परिवार के भरण-पोषण के लिये राज्य की ओर से वित्तीय व्यवस्था कर दे (११/२१-२२)। अन्य अध्यायों में है कि ब्राह्मण किसी भी जाति की स्त्री को रख सकता है; किन्तु कोई दूसरी जाति ब्राह्मण-कन्या से विवाह करे तो दोष है। मन्त्रों से शुद्ध करके ब्राह्मण मांस तक खा-पी सकता है, वह देव-भोजन है, सनातन विधि है (५/३६)।
मनुस्मृति में है कि सम्पूर्ण संसार का स्वामी ब्राह्मण होता है (१/९४)। संसार का अर्थ क्या केवल भारत होता है? संसार के कितने देश ब्राह्मण को अपना स्वामी मानते हैं? लिखा है कि चोरों से वसूल किये धन और धरती में गड़े धन का आधा ब्राह्मणों का होता है (८/३७/३८)। यज्ञ के लिए ब्राह्मण किसी का भी धन लूट सकता है (११/२६)। किन्तु जो पापात्मा ब्राह्मण का धन हरता है, उसे मरने पर गीधों का छोड़ा घृणित पदार्थ खाने को मिलता है। यह किसी वर्ग-विशेष की सुरक्षा व्यवस्था नहीं है तो और क्या है? यह धर्म है क्या?
लेखक ने आपत्ति किया है कि स्मृतियों को आपने कानून या व्यवस्था कैसे कह दिया? यह तो सनातन-धर्म है। आप ही विचार करें कि जिन नियमों से मनुष्य का खान-पान, शादी-विवाह, रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई, गोद लेना, व्यवसायों का निर्धारण, समझौता, सम्पत्ति के मुकदमे, कम दण्ड राज्य द्वारा दिये जाते हों, वह कानून नहीं, व्यवस्था नहीं तो और क्या है? जिनसे मनुष्य के बाह्य क्रिया-कलापों का नियमन होता है, जिन्हें राज्य लागू करता है, वह काननू नहीं तो और क्या है? धर्म आन्तरिक अनुशासन के नियम हैं।
लेखक ने सफाई दी है कि दण्ड देने के प्रश्न पर मुनस्मृति में शूद्रों की तुलना में ब्राह्मणों के प्रति कम कठोर नहीं हैं; क्योंकि उसमें है कि ब्राह्मण यदि मदिरा पीता है तो उसे खौलती हुई मदिरा तब तक पिलायी जाय जब तक वह मर न जाय (११/९०)। किन्तु आप विचार करें तो पायेंगे कि यह कोई दण्ड है ही नहीं। इस प्रकार के एक भी व्यक्ति के दण्डित होने का प्रमाण सम्पूर्ण इतिहास में नहीं है। आपने विचार किया कि क्यों? क्योंकि यह ऐसा दण्ड है जिसे कभी दिया ही नहीं जा सकता। मदिरा, स्पिरिट तथा पेट्रोल ऐसी वस्तुयें हैं जिन्हें कभी खौलाया ही नहीं जा सकता। ये उड़ जायेंगी, जल जायेंगी, इनमें आग लग जायेगी। आज भी बहुत से ब्राह्मण मदिरा का सेवन करते हैं, शराब के सरकारी ठेके लेते हैं; किन्तु उन्हें यह दण्ड देकर सनातन-धर्म के पालन की कोई सोच भी नहीं सकता। फिर ऐसी धमकी क्यों? इसके पीछे भी एक कारण है। सुविधाओं से सम्पन्न ब्राह्मणों में से कोई शराब के नशे में कहीं इस तिकड़म का भण्डाफोड़ न कर दे कि पूरी जाति का अहित हो जाय, इसलिये उस एक ब्राह्मण को मार डालने तक की सतर्कता बरती गयी है। अतः यह भी सुरक्षा का प्रबन्ध मात्र है, न कि स्मृतिकारों की सदाशयता अथवा निष्पक्षता। इसीलिये इन स्मृतियों को सबको दिखाने का निषेध है। पाराशर-स्मृति में है कि यह स्मृति विशेषकर ब्राह्मणों के हित के लिये लिखी गयी है। मनुस्मृति में है कि इसे उसी ब्राह्मण को दिखावें जिसका गर्भाधान से लेकर सभी संस्कार हुआ हो और जो चिता तक के संस्कारों का मन्त्र जानता हो; क्योंकि जिसने इतना रट लिया होगा उसे प्रमाणों की जरूरत है, सपोर्ट और बैकिंग की जरूरत है, केवल उसे दिखाया जाय।
विचारणीय है कि एक मुसलमान अपने लड़के को दस-बारह वर्ष की उम्र तक कुरान रटाकर हाफिज बना देता है, विवाह में कुरान और रेहल दहेज में देता है, ईसाई दैनिक प्रार्थनाओं में पृष्ठ-पृष्ठ पढ़ाकर बाइबिल कण्ठस्थ करा देता है। (धर्मनिरपेक्ष कहे जानेवाले अमेरिका के होटलों में, प्रत्येक कमरे में पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर केवल एक किताब रखी रहती है- वह है बाइबिल!) और भारतीय धर्माचार्यों की दूरदर्शिता देखें कि अपने ग्रन्थों को किसी को दिखाना मत! शास्त्र हमारा और हम देख नहीं सकते।
आइये शूद्रों की स्थिति भी देखें। लेखक महोदय कहते हैं कि सनातन-धर्म शूद्रों के लिये वरदान है; किन्तु कोई शूद्र आपका यह वरदान लेने के लिये तैयार नहीं है। वरदान में है क्या? यह कि शूद्र का नाम घृणासूचक रखना चाहिये (२/३१)। वे पेड़ों के नीचे रहें, मिट्टी के बर्तनों में खायें। शूद्र का अपना कुछ भी नहीं होता। धन पाकर ब्राह्मण को ही सताता है इसलिये शूद्र का धन ब्राह्मण बेरोक-टोक ले सकता है (मनु. ८/४१७)। मनुस्मृति में है कि ‘एषः धर्मविधिः’– यह धर्मविधि है। यही धर्म है, तो कौन शूद्र इसे मानता है?
मनुस्मृति के दसवें अध्याय में है कि जीवन-निर्वाह के लिये शूद्र अन्य जातियों की सेवा कर सकता है; किन्तु स्वर्ग के लिये, लोक और परलोक दोनों के लिये वह ब्राह्मण की ही सेवा करे। ब्राह्मण को चाहिये कि उस शूद्र को जूठा अन्न, सारहीन अन्न खाने को दे। पुराना वस्त्र, फटा ओढ़ना और बिछौना दे। ऐसी व्यवस्था में रहते हुए जब शूद्र यह ख्याति अर्जित कर ले कि बड़ा अच्छा सेवक है, तो वह स्वर्ग जाता है।
लिखा है कि ब्रह्मा ने ब्राह्मण की सेवा के लिये ही शूद्र की सृष्टि की है- ‘दास्यायैव हि सृष्टौऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयं भुवा।’ आज वे सेवा ले रहे हैं। ब्रह्मा की आज्ञा के विपरीत आज शूद्र अच्छा पहनते, खाते और रहते हैं। उन्हें फिर से पेड़ों के नीचे रहने और फटा पुराना पहनने को बाध्य नहीं किया जा सकता।
लेखक महोदय का तर्क था कि अध्ययन से कोई लाभ मिलनेवाला नहीं है, तो वे निरर्थक क्यों पढेंगे? आज उन्होंने हर किताब को पढ़कर रख दिया। आपका संविधान तक बना दिया। स्मृतियों के अनुसार शूद्र को कभी न्यायकर्त्ता नहीं होना चाहिए था, आज वे जज हैं। शासन में भाग लेने के लिये चुनाव लड़ा तो पासवान इत्यादि रिकार्ड मतों से विजयी हुए। रूढ़िवादी, दकियानूसी, अन्ध-परम्पराएँ धराशायी हो गईं; किन्तु कुछ लोग अभी भी प्रतिगामी अवशेषों से चिपककर बैठे हैं। कहते हैं- जाति धर्म है। इसी व्यवस्था की सहचरी आश्रम व्यवस्था भी थी, उसे पुनर्जीवित करने की इन्हें कोई चिन्ता नहीं है। यदि जाति-व्यवस्था ही सनातन थी, तो घर क्यों छोड़ा? संन्यासी क्यों हो गये?
आज शूद्र आन्दोलन कर रहे हैं कि सवर्ण जातियाँ आर्य हैं, भारत के बाहर से आयी हैं, उन्हें भारत से बाहर चले जाना चाहिये। मौर्य, कुर्मी-जैसी कई वैश्य जातियों ने ब्राह्मणों की पूज्यता को तिलांजलि दे दी। अधिकांश ब्राह्मण भी जन्मना पूज्यता के पक्ष में नहीं हैं। क्षत्रिय सोचने में लगे हैं कि क्या करें? फिर कितने हिन्दू जाति-व्यवस्था को धर्म कहने के लिए आपके साथ हैं? कदाचित् उनसे भी कम लोग आपके साथ बचे, जिन्हें आप मुट्ठी भर मुसलमान कहते हैं।
घृणासूचक व्यवस्थाओं को पढ़कर शूद्र इतना बौखलाये हैं कि वे बौद्ध, ईसाई, मुसलमान या कुछ भी बनते जा रहे हैं- जहाँ उन्हें समानता का प्रलोभन दिया जा रहा है। पहले इन जा रहे लोगों को आश्वस्त कर लें, इन्हें सन्तोष दे लें फिर अपनी पूज्यता मनवाते रहियेगा, क्योंकि जब हिन्दू ही नहीं बचेगा तो कौन आपको पण्डित कहेगा? ‘अरध तजहिं बुध सरबस जाता।’ (मानस, २/२५५/२)- युगद्रष्टा गोस्वामीजी की इस सलाह पर विचार करें-
जलचर-बृन्द जाल-अन्तरगत, होत सिमिटि इक पासा।
एकहि एक खात लालच-बस, नहिं देखत निज नासा।। (विनयपत्रिका, ९२)
कहा जाता है कि लंका के समरांगण में जब लक्ष्मण को शक्ति लगी और सुषेण वैद्य की विश्वसनीयता पर किसी ने सन्देह व्यक्त किया, तो राम ने कहा था कि सुषेण वैद्य हैं और वैद्य धर्म से विमुख नहीं हो सकते। इसी प्रकार धर्माचार्यों से हमारा निवेदन है कि भारत की यह भोलीभाली निरक्षर जनता उनसे आशावान है। उसे गलत न बताया जाय, गुमराह न किया जाय। इसी प्रकार ब्राह्मण बन्धुओं को भी सोचना चाहिये कि वे उन ऋषियों के वंशज हैं, जिन्होंने समाज का नेतृत्व किया था। उसी गौरवशाली विरासत के साथ उन्हें सामाजिक विघटन को बचाने के लिये भी प्रस्तुत हो जाना चाहिये।
लेखक महोदय ने कतिपय प्रश्न उठाकर धार्मिक भ्रान्तियों के निराकरण का एक अवसर प्रदान किया, एतदर्थ हम उनके आभारी हैं। कदाचित् किसी बिन्दु को हम समझा न पाये हों, तो कभी आश्रम पधारें। इतने समीप रहते हुए भी स्वयं न पधार कर, डाक द्वारा विरोध-पुस्तिका भेजने के द्राविणी प्राणायाम की क्या आवश्यकता थी?
रही बात आप द्वारा शास्त्रार्थ आह्वान की, तो घर में बैठकर शास्त्रार्थ की बात करना आपको शोभा नहीं देता। शास्त्रार्थपरायण जिन आदि शंकराचार्यजी की आप नकल करना चाहते हैं वे भारत भर में स्वयं पैदल घूमकर शास्त्रार्थ करते थे। फिर, आजकल मौखिक वाद-विवाद की अपेक्षा लिखित प्रश्नोत्तर अधिक प्रामाणिक माना जाता है और मौखिक शास्त्रार्थ के स्थान पर यह रास्ता स्वयं आपने चुना है फिर शास्त्रार्थ की धौंस क्यों? यदि आमने-सामने प्रश्न-परिप्रश्न ही करना है तो अपनी गली से थोड़ा बाहर निकलें। दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, कश्मीर जैसे स्थलों में यह आयोजन रख लें। निर्णायकों के पैनल में हर जाति के विद्वान्, प्रोफेसर, कुलपति, राजनेताओं को रख लें जिन्हें इस धर्म में रहना है, जिन्हें इस धर्म में जीना है, उनकी उपस्थिति में ही शास्त्रार्थ होना उचित है। उसकी एक सुनिश्चित रूपरेखा प्रकाशित करें। यदि केवल शंका-समाधान ही करना है तो आश्रम में कभी पधारें, सदैव स्वागत है।
।। बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)